ये तो फिर कांग्रेस के साथ खेल हो गया भई!

समान नागरिकता विधेयक के जरिए बीजेपी ने बहुत शातिरी से कांग्रेस को ऐसा घेरे में लिया कि देश भर में आज फिर से कांग्रेस मुसलमान समर्थक पार्टी के रूप में हिंदुओं के सामने आ खड़ी हुई है। कहां तो कांग्रेस धीरे धीरे इस छवि से निजात पाने को प्रयासरत थी कि फिर से वह उसी छवि में कैद कर दी गई है।

अजब चालाक है बीजेपी। और बेचारी कांग्रेस। बीते कुछ चुनावों में मंदिर मंदिर जाकर कांग्रेस ने जैसे तैसे करके अपने माथे पर सजा मुसलमान समर्थक होने का मुकुट उतारा ही था कि नागरिकता संशोधन विधेयक के बहाने बीजेपी ने बहुत बवाल खड़ा करके उसे फिर से मुस्लिम परस्त होने का ताज पहना दिया। ज्यादा साफ साफ कहें तो नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में कांग्रेस के साथ खेल हो गया।

पहले तीन तलाक, एनआरसी, जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने, कश्मीर विभाजन और अब नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करते करते बीजेपी उसे राजनीति के उस मंच पर खींच लाई, जहां सिर्फ और सिर्फ यही लगता है कि कांग्रेस हिंदुओं के समर्थन में पता नहीं कितनी है, लेकिन मुसलमानों की पक्की समर्थक है।

बीते कुछ दिनों से देश, समाज और संसद में जो कुछ हुआ और हो रहा है, उसके हिसाब से राजनीतिक तस्वीर के तेवर साफ है। बीजेपी अपने आप को हिंदु समाज की हितैषी होने का जो संदेश देना चाहती थी वह तो प्रसारित हो ही गया। लेकिन इसके साथ ही इससे बड़ा जो संदेश देश की जनता में गया, वह यही है कि कांग्रेस चाहे कितना भी हिंदूवादी होने का स्वांग करती रहे, अंततः वह मुसलिम परस्त पार्टी ही है।

बेचारे राहुल गांधी। उनके मंदिर – मंदिर जाकर खुद के हिंदू होने, स्वयं को जनेऊधारी ब्राहमण घोषित करने, शिवभक्त साबित करने और दत्तात्रेय गोत्र का वंशज बताने की कोशिशों के जरिए कांग्रेस को हिंदुवादी साबित करने के सारे प्रयासों पर पानी फिर गया। देश भर में पिछले कुछ दिनों के दौरान नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में कांग्रेस की ओर से संसद से लेकर सड़क तक जो कुछ हुआ, आप ही बताइए, उससे कांग्रेस की क्या तस्वीर बनी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने नागरिकता संशोधन विधेयक के बहाने राजनीतिक रूप से जबरदस्त चतुराई भरा खेल रचा। बीजेपी को तो जनता को सिर्फ यह संदेश देना था कि इस देश में कौनसी पार्टी हिंदुओं की समर्थक है और कौनसी पार्टी मुसलमानों की हिमायती। कश्मीर के टुकड़े करके और वहां पर धारा 370 हटाकर वैसे भी वह यह साबित कर चुकी थी। सारा देश इसके समर्थन में था लेकिन तब भी कांग्रेस ने उसका विरोध किया। तीन तलाक के मामले में भी यही हुआ।

पहले एनआरसी और अब नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में भी बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसा पहले हुआ। कांग्रेस समझ ही नहीं पाई कि उसके साथ यह क्या हो गया। साफ दिख रहा है कि वह बीजेपी के जाल में फंस गई। और बीते कुछ चुनावों के दौरान उसके सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रति स्नेह प्रदर्शित करने की सारी कोशिशें बेकार हो गईं। क्योंकि नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में संसद में उसके प्रतिनिधियों का जो आचरण रहा, सड़कों पर पार्टी का जो प्रदर्शन रहा और भाषणों में जो भाषा रही, उससे यह साफ संदेश गया कि कांग्रेस और उसके नेताओं को मुसलमानों की बहुत चिंता है। जबकि संसद में गृह मंत्री अमित शाह साफ साफ कह रहे थे कि यह विधेयक भारत के नागरिक मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। शाह ने यह भी कहा कि देश के मुसलमानों को चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय मुस्लिम सुरक्षित हैं और हमेशा सुरक्षित रहेंगे।

संसद में जब कांग्रेस ने इस बिल पर सवाल किए तो गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस को ही लपेटे में लेते हुए कहा कि कांग्रेस के नेता कई मुद्दों पर पाकिस्तान की भाषा बोलते है। जैसा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बोलते हैं वैसा ही विपक्ष भी बोलता है। कश्मीर के मामले में भी वैसा ही हुआ था। इस बिल को पेश किए जाने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी संसदीय दल की बैठक के बाद कहा था कि नागरिकता संशोधन बिल से लोगों को जो राहत मिली है, उनकी ख़ुशी का अंदाज़ा नहीं लगा सकते।

दरअसल, इसकी खुशी मोदी को बहुत ज्यादा थी, क्योंकि इस विधेयक के जरिए वे कांग्रेस को मुस्लिम परस्त पार्टी साबित करने की तरफ बहुत आगे बढ़ चुके थे। मोदी सरकार को देश को सिर्फ यह संदेश देना था कि वह मुसलमानों को घुसपैठिया मानती है। वह उनकी विरोधी है और इस देश में उनको नागरिकता नहीं देने वाली है। इसीलिए तो इस कानून में सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे मुसलिम बहुल देशों से धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर आने वाले वहां के अल्पसंख्यक शरणार्थियों को ही नागरिकता देने का प्रावधान किया गया।

इस विधेयक के जरिए सरकार की मंशा देश को यह संदेश देने की थी कि वह मुसलमानों को छोड़ कर बाकी सबको नागरिकता देगी। इसलिए बिल को तीन देशों तक ही सीमित रखा गया। लेकिन कांग्रेस इस मामले में गच्चा खा गई। और गच्चा तो उसके नेता तब भी खा गए, जब संसद में बीजेपी को देश को धर्म के आधार पर बांटनेवाली पार्टी बताया। क्योंकि उसके जवाब में अमित शाह ने जो तमतमाता जवाब दिया, वह यह था कि कांग्रेस के नेता इतिहास में झांके, इस देश का विभाजन धर्म के नाम पर कांग्रेस ने स्वीकारा था बीजेपी ने नहीं। साफ लगता है कि नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में कांग्रेस बीजेपी के जाल में फंस गई और एक बार फिर वह मुसलिम परस्त पार्टी के रूप में स्थापित हो गई। खेल तो हो गया। हुआ कि नहीं ?

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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