सहारा और जागरण के हजारों मीडिया कर्मियों के इतने बड़े-लंबे आंदोलनों को कवरेज नहीं दे रहे बड़े मीडिया हाउसों को अब बेशर्मी छोड़ने की जरूरत

आउटलुक मैग्जीन को धन्यवाद जो उसने सहारा मीडिया के हजारों कर्मियों की बड़ी पीड़ा को आवाज दी. साल भर से बिना सेलरी काम कर रहे और लगभग भुखमरी के शिकार हजारों मीडियाकर्मियों के सड़क पर उतरने और प्रधानमंत्री व सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखने के बावजूद देश के बड़े मीडिया हाउसों की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली है. लगता है सहारा चिटफंड से अरबों खरबों का पैसा विज्ञापन के नाम पर डकारने के कारण ये मीडिया हाउस नमक का कर्ज अदा कर रहे हैं.

छोटी छोटी घटनाओं को ब्रेकिंग न्यूज बना देने वाले न्यूज चैनलों की नैतिकता भी बाजारू हो चुकी है जो उन्हें दिल्ली एनसीआर के इतने बड़े संकट से आंखें दो चार करने की हिम्मत नहीं पड़ रही है. अब वक्त आ गया है जब सहारा मीडिया के हजारों कर्मियों को उनका हक दिलाने के लिए सभी को एकजुट होकर लिखना पढ़ना और प्रयास करना चाहिए.

सहारा जैसा ही संकट दैनिक जागरण में है जहां नोएडा आफिस से सैकड़ों लोगों को इसलिए बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने की मांग प्रबंधन से की. बर्खास्त किए गए सैकड़ों लोग रोजाना फिल्म सिटी से लेकर जंतर मंतर तक और दैनिक जागरण के आफिस से लेकर इंडिया गेट तक धरना प्रदर्शन के साथ-साथ रैली निकाल रहे हैं लेकिन कोई मीडिया हाउस इसे कवरेज नहीं दे रहा क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि एक डकैत दूसरे डकैत के इलाके में चल रहे संकट में नाक नहीं घुसाता.

उम्मीद करता हूं कि मीडिया हाउस खुद को डकैत नहीं कहलाना पसंद करेंगे, वो मीडिया हाउस ही रहना चाहेंगे. इसलिए सहारा और जागरण के कर्मियों के आंदोलन को कवर करना शुरू करें. ऐसा नहीं करके आखिर फिर आप किस मुंह से पत्रकारिता, नैतिकता, सरोकार, जनहित, मानवीय मूल्य, लोकतंत्र, समानता, कानून, संविधान, न्याय आदि शब्दों को उच्चारेंगे.

-यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com

आगे के पेजों पर देखें सहारा मीडिया के संगठित हो चुके कर्मियों की तस्वीरें और पीएम को लिखा पत्र.

सहारा मीडिया के अखबार व चैनल के कर्मियों की नोएडा आफिस में हुई सभा. 

अगली तस्वीर के लिए अगले पेज पर जाएं>>

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Comments on “सहारा और जागरण के हजारों मीडिया कर्मियों के इतने बड़े-लंबे आंदोलनों को कवरेज नहीं दे रहे बड़े मीडिया हाउसों को अब बेशर्मी छोड़ने की जरूरत

  • Lakshay Sharma says:

    first of all i salute to Mr. Yashvant for his regular initiatives to help poor employees..hats off to you…i think news channels like zee news and newspapers like TOI are required to step forward in this case…if nobody will help them then family of these employees will die in these hard days which only few of us can realize….they are sacrificing…their bellies are empty….let’s we all unite and give the diwali gift to sahara and jagran employees…so that no management can dare to do this mischievous behaviour…#(help empty bellies)…bring the fire within you in front…god is with all of us

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  • Jaspreet Singh says:

    8 साल पहले मीडिया हॉउस ज्वाइन किया था तो ये सोचकर की यही एक जरिया है अपनी व् दूसरों की दबी आवाज को उठाने का हक़ लेने और दिलाने का लेकिन कुछ पैसे वालों ने इस प्रोफ़ेशन पर कब्जा कर लिया और बना लिया अपने हाथों की कठपुतली जिसने बात मानी वो हर शो में दिखने लगा और जो विरोधी हुआ वो गंजे के सर से बालों की तरह ऐसा ग़ायब हुआ जो कभी वापिस ना आ सका। आज कल तो हर चैनल ने अपना ही मीडिया स्कूल भी खोल लिया जहां तैयार होते हैं ऐसे रोबोट….. जो भरे गए प्रोग्राम के हिसाब से काम करते चले जाते हैं…….अब इससे जियादा क्या कहूँ क्यों की रोबोट को फिलिंग्स की जानकारी होती ही नहीं है…..

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  • विनोद महुने ग्वालिरर says:

    जब तक भास्णदेने बाले ये मलिक जेल नहीं जाएंगे तब तक कुछ नहीं मिलेगा पत्रिका में तो कमरचारियो को निकालने के लिए तबादले भी करने चालू कर दिए है अब बस वही काम कर पाएगा जो चम्चागीरी कर सकता हो भलेही उसे कुछ न आता हो पर चम्चा गीरी आती हो

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  • Ye Log aisa nahin karenge Yashvant ji, kyonki Jis tarah ek Stri dusre Stri (aurat) ka sabse bada Dushman hai, waisey hi Ye “Akhbar ke Reporters, Sub Editors” hain. Sabhi Apni Roti Senk Rahey hain. Wey Ye nahin jantey ki Aaj inke bhai Museebat mein hain to Kal ye bhi ussi Museebat ka Shikar ho sakte hain, Lekin abhi to ye issi Guroor mein hain ki..”Chalo meri naukri to pakki hai, Bhand me jaye Duniya-dari”.

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