दैनिक जागरण की घटिया रिपोर्टिंग : नर्सों के नाम के आगे ये क्या लिख दिया! देखें खबर

दैनिक जागरण की महिमा अपरंपार है. यहां जो हो जाए, समझो कम ही है. कभी दलित नेता मायावती के बारे में यहां अभद्र छाप दिया जाता है तो कभी किसी दूसरी स्त्री को लेकर अपमानजनक टिप्पणी कर दी जाती है. दैनिक जागरण को इसी कारण महिला विरोधी अखबार भी कहा जाता है. यह अखबार अपनी सोच और चेतना में सामंतवादी है. महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों को लेकर इस अखबार का रवैया लगातार नकारात्मक रहता है. Continue reading

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दैनिक जागरण जिसे ‘भाजपाई’ बता रहा, जिलाध्यक्ष उसे अपना आदमी नहीं मान रहे (देखें वीडियो)

उन्नाव में दैनिक जागरण इन दिनों चर्चा में है. एक डिप्टी एसपी के खिलाफ दैनिक जागरण अभियान चला रहा है. इस बिना पर कि सीओ के रूप में पदस्थ डिप्टी एसपी ने एक भाजपा कार्यकर्ता को सरेराह मारा-पीटा. उधर, भाजपा जिलाध्यक्ष का कहना है कि जिसे भाजपा कार्यकर्ता बताया जा रहा है, वह पार्टी का आदमी नहीं हैं. Continue reading

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दैनिक जागरण और अमर उजाला ने अटलजी की मौत पर भी कारोबार कर लिया!

अगर नीचता और बेशर्मी की पराकाष्ठा देखनी है तो खुद को ब्रह्मांड का नंम्बर एक अखबार कहने वाले दैनिक जागरण का अटल जी की मौत के अगले दिन का अंक और “जोश सच का” यानी अमर उजाला का भी अटजी के मौत के अगले दिन का अंक उठा कर देखिये. हिंदी के दोनों प्रमुख अख़बारों ने नीचता की लकीर को छूते हुये “अटलजी की मौत” पर भी करोबार किया. Continue reading

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दैनिक जागरण के फोटोग्राफर का पैसा लेते हो गया स्टिंग, देखें वीडियो

सबकी तस्वीरें खींचने वाले और स्टिंग करने वाले फोटोग्राफर का ही स्टिंग हो गया है. ये फोटोग्राफर दैनिक जागरण में कार्यरत है. नाम है जीतू सागर. दैनिक जागरण, गजरौला का छायाकार जीतू सागर बिजली बिल ठीक कराने के नाम पर रिश्वत लेते हुआ वीडियो में कैद. आरोप है कि बिजली बिल का भुगतान कराने के नाम पर 24000 रुपये की नगदी वसूली गई. Continue reading

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कोर्ट में मीडियाकर्मियों द्वारा डाले गए केस को घुमाने-लटकाने में उस्ताद है दैनिक जागरण प्रबंधन

Brijesh Pandey : दैनिक जागरण, हिसार के 41 कर्मियों के टर्मिनेशन का मामला… ये टर्मिनेशन मामले 16 A के तहत सरकार ने 29 जनवरी 2018 को निर्णय के लिए श्रम न्यायालय, हिसार भेजे थे। प्रबंधन को 22 मार्च को क्लेम स्टेटमेंट का जबाब देना था, तो उस दिन प्रबन्धन ने सरकार के रेफर को गलत बताते हुए मामले को ख़ारिज करने की लिखित पत्र दिया। Continue reading

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संयुक्त आयुक्त श्रम ने जागरण के मालिक मोहन गुप्त को नोटिस भेजा, शेल कम्पनी ‘कंचन प्रकाशन’ का मुद्दा भी उठा

दैनिक जागरण के एचआर एजीएम विनोद शुक्ला की हुई फजीहत…  पटना : दैनिक जागरण के मालिक महेंद्र मोहन गुप्त को श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त डा. वीरेंद्र कुमार ने नोटिस जारी कर जागरण कर्मियों द्वारा दायर किए गए जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा को लेकर वाद में पक्ष रखने के लिए तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 22 दिसंबर को होनी है। वहीं दैनिक जागरण पटना के एजीएम एचआर विनोद शुक्ला के जागरण प्रबंधन के पक्ष में उपस्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए अधिवक्ता मदन तिवारी ने संबंधित बोर्ड के प्रस्ताव की अधिकृत कागजात की मांग कर एजीएम शुक्ला की बोलती बंद कर दी। दैनिक जागरण के हजारों कर्मियों को अपना कर्मचारी न मानने के दावे एजीएम शुक्ला के दावे की भी श्रम विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डा.  वीरेंद्र कुमार के सामने हवा निकल गई।

दैनिक जागरण, गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार को प्रबंधन ने गया जिले से जम्मू तबादला कर दिया। पंकज कुमार की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसा के आलोक में वेतन और अन्य सुविधाओं की मांग की थी। पंकज कुमार गम्भीर रूप से बीमार पिछले साल हुए थे। मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर प्रबंधन इतना खफा हो गया कि 92 दिनों की उपार्जित अवकाश शेष रहने के बाद भी अक्टूबर और नवंबर 2016 के वेतन में 21 दिनों की वेतन कटौती कर दी।

पंकज कुमार ने प्रबंधन के फैसले के खिलाफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय की शरण में न्याय की गुहार लगाई। एरियर का बकाया 32.90 लाख रुपए के भुगतान की मांग की। साथ ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय से गया से जम्मू तबादला को रद्द करने की गुहार लगाई। सर्वोच्च न्यायालय ने पंकज कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने आदेश में छह महीने का टाइम बांड कर दिया। यानि छह माह में फैसला हो जाना है।  पंकज कुमार सहित दैनिक जागरण के कई कर्मियों के वाद की सुनवाई 5 December को पटना के श्रम संसाधन विभाग के संयुक्त आयुक्त डा.वीरेंद्र कुमार के समक्ष हुई।

पंकज कुमार की तरफ से अधिवक्ता मदन तिवारी ने जागरण की ओर से उपस्थित एजीएम विनोद शुक्ला की उपस्थिति पर सवाल उठाया। अधिवक्ता मदन तिवारी का कहना था कि किस हैसियत से विनोद शुक्ला जागरण के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता, सीईओ संजय गुप्ता, सुनील गुप्ता एवं अन्य की ओर से उपस्थिति दर्ज कराई है। एजीएम शुक्ला ने कम्पनी सेक्रेटरी द्वारा प्रदत्त एक पत्र की फोटो कापी दिखाई। फोटो कापी पर विनोद शुक्ला को अधिकृत होने की बात कही गई थी।

इस पर अधिवक्ता मदन तिवारी ने कहा कि कम्पनी द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव की अभिप्रमाणित प्रति जो बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता करने वाले चैयरमेन या निदेशक द्वारा हस्ताक्षरित रहेगी, वही प्रति न्यायालय में कम्पनी द्वारा अधिकृत व्यक्ति के शपथ पत्र के साथ दायर की जानी चाहिए। अधिवक्ता मदन तिवारी ने लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कराई। उसके बाद न्यायालय ने विनोद शुक्ला को निर्देश दिया कि वे बोर्ड के प्रस्ताव की अधिकृत प्रति हलफनामा के साथ दायर करें।

अधिवक्ता मदन तिवारी ने श्रम विभाग द्वारा जागरण के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता सहित अन्य निदेशकों के स्थान पर प्रबंधन जागरण को नोटिस जारी करने के मामले को उठाया।  संयुक्त आयुक्त डा. वीरेंद्र कुमार ने आपत्ति उठाए जाने पर कहा कि पूर्व में नोटिस जारी की गई थी। लेकिन अब जागरण समूह के अध्यक्ष मदन मोहन गुप्ता को नोटिस जारी किया गया है।

जागरण के कई कर्मियों ने श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त वीरेंद्र कुमार को बताया कि एजीएम विनोद शुक्ला को ओर से दायर जवाब में कहा गया है कि गोपेश कुमार एवं अन्य कंचन प्रकाशन के कर्मी हैं…  कंचन प्रकाशन के साथ जागरण प्रकाशन का कांट्रैक्ट प्रिंटिंग के जाब वर्क का है… इसलिए ये सभी दैनिक जागरण के कर्मचारी नहीं है।

अधिवक्ता मदन तिवारी ने संयुक्त आयुक्त वीरेंद्र कुमार के सामने न्यूज पेपर रजिस्ट्रेशन एक्ट का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी अखबार एवं पत्रिका को अपने अखबार में अनिवार्य अधिघोषणा में उस प्रेस का नाम पता देना जरूरी है जहां अखबार प्रिन्ट होता है। लेकिन जागरण के किसी भी एडिशन में कंचन प्रकाशन को लेकर कोई घोषणा नहीं की गई या की जा रही है। ऐसे में न्यूज पेपर रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लघंन जागरण प्रकाशन कर रहा है। ऐसे में अनिवार्य अधिघोषणा न करने  के नियम का न पालन करने के कारण अखबार का निबंधन भी रद्द हो सकता है।

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इस फोटो के छापने पर दैनिक जागरण शामली आफिस पर महिलाओं ने किया हमला (देखें तस्वीर और वीडियो)

दैनिक जागरण शामली एडिशन में ट्रैक्टर ट्राला से स्कूल जा रही छात्राओं की एक तस्वीर प्रकाशित की गई. इसमें सभी छात्राएं सिर झुकाकर बैठी हुई थीं. दैनिक जागरण में गुरुवार के अंक में छपी इसी तस्वीर को लेकर शुक्रवार को कुछ महिलाओं ने शामली में दैनिक जागरण कार्यालय पर हमला बोल दिया. महिलाओं के साथ कुछ दबंग पुरुष भी थे. कार्यालय में मौजूद स्टाफ ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने एक न सुनी.

हमलावर सुबह करीब दस बजे ढेर सारी महिलाओं के साथ दैनिक जागरण कार्यालय आए. आते ही स्टाफ के साथ अभद्रता शुरू कर दी. उन्होंने गाली गलौज करने के साथ ही हमला बोल दिया. तोडफ़ोड़-लूटपाट भी की. हमले में स्टाफ के कई लोग चोटिल हो गए. मौके पर पहले से मौजूद दर्जनभर पुलिसकर्मी तमाशबीन बने रहे. पुलिस के सामने ही हमलावर हत्या की धमकी देते हुए चले गए. घटना की जानकारी मिलने पर एसपी अजय पाल शर्मा जागरण दफ्तर पहुंचे.

एसपी ने लापरवाही बरतने के कारण दो एसआई सतपाल और पंकज को लाइन हाजिर कर दिया है. पुलिस को मामले की तहरीर दे दी गई है. पुलिस ने सभी घायलों का मेडिकल परीक्षण कराया है. हमलावरों का कहना है कि तस्वीर को गलत कैप्शन के साथ प्रकाशित किया गया है जिसके कारण लड़कियों की बदनामी हुई है. हमले के दौरान दैनिक जागरण शामली के ब्यूरो चीफ लोकेश पंडित सहित कई के साथ अभद्रता की गई और कपड़े फाड़ डाले गए. हमले का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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दैनिक जागरण वालों ने भी छापा लंबा-चौड़ा माफीनामा : ‘नंबर वन का हमारा दावा गलत था’

अमर उजाला लखनऊ अखबार में पिछले दिनों एक माफीनामा छपा था कि हमने गलती से खुद को नंबर वन बता दिया. ऐसा ही माफीनामा अब दैनिक जागरण पटना अखबार में छपा है. नंबर वन होने के फर्जी दावों पर कसी गई नकेल के कारण इन अखबारों को माफीनामा छापना पड़ रहा है.

पढ़िए दैनिक जागरण पटना का माफीनामा…

अमर उजाला का माफीनामा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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दैनिक जागरण के कथित अवैध मुंगेर संस्करण की जांच एक माह में करने का आदेश जारी

मुंगेर (बिहार) : बिहार सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के सचिव सह द्वितीय अपीलीय प्राधिकार आतीश चन्द्रा ने मुकदमा संख्या- 424110108021700412 । 2 ए में मुंगेर के लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी केके उपाध्याय को दैनिक जागरण अखबार के मुंगेर के लिए प्रकाशित कथित अवैध ”मुंगेर संस्करण” के मामले में एक माह में जांच रिपोर्ट राज्य सचिव को प्रेषित करने का आदेश जारी किया है।

सचिव सह द्वितीय अपीलीय प्राधिकार आतीश चन्द्रा ने उपयुक्त आदेश 08 सितम्बर 2017 को पटना में अपने कार्यालय कक्ष में परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता) के पक्ष को सुनने के बाद जारी किया। बहस में लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी केके उपाध्याय भी उपस्थित थे।

सचिव आतीश चन्द्रा ने अपने आदेश में लिखा है कि- ”बिहार लोक शिकायत निवारण कानून के प्रावधान के आलोक में मुंगेर के लोक प्राधिकार सह जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी को आदेश दिया जाता है कि वे मुंगेर में पाठकों के बीच वितरित दैनिक जागरण के कथित अवैध संस्करण के आरोप की जांच करें। जांच के दौरान मुंगेर के पूर्व जिला पदाधिकारी कुलदीप नारायण की जांच रिपोर्ट और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट के प्रावधानों को भी जांच में दृष्टिगत रखें। जांच रिपोर्ट एक माह में सुपुर्द करें।”

बहस में परिवादी श्रीकृष्ण प्रसाद (अधिवक्ता) ने आरोप लगाया कि वर्ष 2012 के 20 अप्रैल से प्रबंधन दैनिक जागरण समाचार पत्र प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए दैनिक जागरण के मुंगेर संस्करण को वैध घोषित करते हुए छद्मपूर्वक मुंगेर संस्करण को प्रकाशित कर रहे हैं, जो सही नहीं है क्योंकि उक्त समाचार पत्र भागलपुर संस्करण हेतु निबंधित है, न कि मुंगेर के लिए।

अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने बहस में सचिव को यह भी सूचित किया कि दैनिक जागरण प्रबंधन पूरे बिहार में 38 में 35 जिलों में जिलावार अवैध संस्करण छापकर अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन प्रकाशित कर सरकारी खजाना को चूना लगा रहा है।

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जांच करने पहुंचे श्रम अधीक्षक को दैनिक जागरण के मैनेजर ने गेट के अंदर ही नहीं घुसने दिया

कानून और नियम को ठेंगे पर रखता है दैनिक जागरण प्रबन्धक… गया के श्रम अधीक्षक के साथ दैनिक जागरण प्रबंधक ने की गुंडागर्दी… नहीं करने दिया प्रेस की जांच… पंकज कुमार दैनिक जागरण गया के वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड मांगा तो प्रबंधन ने इन्हें परेशान करना शुरू कर दिया… पंकज ने बिहार के श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के यहां एक आवेदन दिनांक 26.07.2017 को दिया था.. इसमें पंकज कुमार ने आरोप लगाया था कि गया सहित दैनिक जागरण बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर मीडियाकर्मियों को लाभ नहीं दिया जा रहा है. 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकारों एवं गैर-पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक समेत कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत ग्रेड की घोषणा भी नहीं की गई है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए अपने ज्ञापांक 3/डी-96/2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17 के माध्यम से दैनिक जागरण की नियमानुकूल आवश्यक जांच करने का आदेश निर्गत किया था तथा कृत कारवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराने का आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया था.  श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के उक्त आदेश के अनुपालन हेतु कल दिनांक 19 सितम्बर को श्रम अधीक्षक, गया जुबेर अहमद दैनिक जागरण प्रेस की जांच करने के लिए गए थे. परन्तु उन्हें प्रेस के मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करने की ईजाजत दैनिक जागरण के प्रबन्धक द्वारा नहीं दी गई.

यह घटना प्रबन्धक की गुंडागर्दी और कानून की अवहेलना को दर्शाता है.  पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. अपने गया से जम्मू तबादले को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा की मांग की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था.

बिहार से एडवोकेट मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : tiwarygaya@gmail.com

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दैनिक जागरण में सरकारी विज्ञापन छापने पर लगी रोक

पेड न्यूज के मामले की जांच के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने दिया आदेश, केंद्र सरकार से स्वीकृति मिलने के बाद डीएवीपी ने जारी किया निलंबन का आदेश, दैनिक जागरण पर पेड न्यूज यानि पैसे लेकर खबर छापने का आरोप हुआ साबित
नई दिल्ली। मीडिया इंडस्ट्री से एक चौंकाने वाली ख़बर आ रही है। पेड न्यूज यानि पैसे लेकर खबर छापने के मामले में बड़ी  कार्रवाई करते हुए केंद्र सरकार ने दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन पर रोक लगा दी है। भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी एडवाइजरी में डीएवीपी को निर्देशित करते हुए कहा गया है कि वह यह सुनिश्चित करें कि कि दैनिक जागरण सहित 51 समाचार पत्र जिन्होंने पेड न्यूज छापा है उन्हें किसी भी तरह से सरकारी विज्ञापन ना जारी किया जाए। केंद्र सरकार ने यह कार्रवाई पत्रकार एवं पत्रकार संगठनों की सर्वोच्च संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के आदेश के बाद किया है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने ही दैनिक जागरण द्वारा पेड न्यूज छापने के मामले की जांच की। जांच में दैनिक जागरण अपने पक्ष में ठोस एवं पर्याप्त सबूत नहीं पेश कर पाया।

ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान दैनिक जागरण ने पैसे लेकर खबरों का प्रकाशन किया था। हालांकि पूर्व में भी दैनिक जागरण में इस तरह की खबरें प्रकाशित की जाती रही हैं लेकिन अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई थी। यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान दैनिक जागरण द्वारा पैसे लेकर खबर छापने के मामले में उस समय भी बड़ी कार्रवाई हुई थी। गाजियाबाद सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में दैनिक जागरण के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत हुए थे। गाजियाबाद पुलिस ने उस समय दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता सहित उसके कई संपादकों को गिरफ्तार करने के लिए जागरण के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी एवं दबिश दी थी।

दबिश के दौरान संजय गुप्ता किसी तरह बच गए थे। लेकिन पुलिस ने jagran.com के संपादक शेखर त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया था । दैनिक जागरण के संपादक शेखर त्रिपाठी को गाजियाबाद पुलिस ने कवि नगर थाने के लॉकअप में रात भर बंद रखा था। बाद में उन्हें कोर्ट से जमानत मिली थी। शेखर त्रिपाठी ने कहा था कि यह न्यूज़ दैनिक जागरण मैनेजमेंट के कहने पर छापा गया था। खुद को फंसा हुआ देख और जेल जाने के डर से सहमे संजय गुप्ता ने पेड न्यूज छापने के लिए कंपनी के विज्ञापन विभाग को जिम्मेदार बताया  था। दैनिक जागरण के इस कुकृत्य कि मीडिया इंडस्ट्री में एवं पत्रकार बिरादरी में खूब थू – थू हुई थी।

The Hindu Hindustan Times Indian Express Jansatta सहित देश के सभी बड़े प्रमुख एवं सम्मानित राष्ट्रीय अखबारों ने दैनिक जागरण के इस कृत्य की निंदा करते हुए खबरें प्रकाशित की थी। पत्रकारिता के गिरते हुए स्तरं को बचाने एवं उसे फिर से सुधारने के लिए दैनिक जागरण को कसूरवार मानते हुए वरिष्ठ पत्रकारों ने कड़ी कार्रवाई की मांग प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से की थी। प्रसिद्ध पत्रकार एवं इंदिरा गांधी कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने इस मामले में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक के गिरफ्तारी की मांग की थी। रामबहादुर राय ने कहा था कि दैनिक जागरण के प्रधान संपादक एवं मालिक संजय गुप्ता हैं ऐसे में उन्हें हर हाल में गिरफ्तार किया जाना चाहिए। पैसे लेकर खबर छापने के मामले में दैनिक जागरण की पहले भी किरकिरी हो चुकी है वर्ष 2009 में दैनिक जागरण में सभी चुनावी खबरें पैसे लेकर छापी गई थी।

दैनिक जागरण के मालिकों को कटघरे में रखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन ने कहा था कि दैनिक जागरण में खबर छापने के बदले में उनसे पैसे मांगे जा रहे हैं। लालजी टंडन ने कहा कि दैनिक जागरण के मालिक एहसान फरामोश एवं धोखेबाज हैं। दैनिक जागरण के मालिकों को भारतीय जनता पार्टी ने टिकट दिया एवं राज्यसभा मैं सांसद बनाया लेकिन वह लोग इस एहसान को भी भूल गए।

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी ने भी संजय गुप्ता को प्रायश्चित करने की सलाह दी थी और पेड न्यूज के मामले में दैनिक जागरण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की थी। वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र सुरजन अरुण महेश्वरी उर्मिलेश सहित सभी नामी गिरामी पत्रकारों ने एवं संपादकों ने दैनिक जागरण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी। उस समय दैनिक जागरण के एक संपादक की गिरफ्तारी के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया था। लेकिन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए और इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर दैनिक जागरण को दोषी करार दिया। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा 13 सितंबर 2017 को जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि अगले 2 महीने तक दैनिक जागरण को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। 2 महीना पूरा होने के बाद ही इस बारे में सोचा जाएगा कि क्या फिर से दैनिक जागरण को सरकारी विज्ञापन की मान्यता के दायरे में लाया जाए कि नहीं लाया जाए।

मूल खबर…

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बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एक आदेश (3 / डी-96 / 2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17) जारी कर दिया है. आदेश के माध्यम से कहा गया है कि दैनिक जागरण में कार्य के माहौल, श्रम नियमों और मजीठिया वेज बोर्ड आदि के अनुपालन की नियमानुकूल आवश्यक जांच की जाए तथा कृत कार्रवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराया जाए. ये आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया गया है.

पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. पंकज का गया से जम्मू विद्वेष के कारण तबादला कर दिया गया था. इस तबादला को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की अनुसंशा के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा देने की मांग पंकज ने की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था. श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के ताजे आदेश का लाभ हजारों मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को मिलेगा जो दैनिक जागरण सहित अन्य प्रकाशन संस्थानों में काम कर रहे हैं.

गया से जाने माने वकील और पत्रकार मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : 8797006594

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झूठी खबर छापने वाला दैनिक जागरण थूकने के बाद फौरन चाटने लगता है!

Yashwant Singh : सुबह सुबह एक फोन आया. आवाज आई- मैं मनीष राय बोल रहा हूं, मऊ से. मैंने कहा- बोलिए. मनीष जी ने अपना परिचय दिया और जो कुछ बताया उसे सुनकर मैं सन्न रह गया. आखिर दैनिक जागरण जैसे बड़े अखबार अगर इस तरह की गिरी हरकत और गैर-जिम्मेदार हरकत करेंगे तो इस देश में मीडिया की बची खुची प्रतिष्ठा में खत्म हो जाएगी. मनीष एक जमाने में पत्रकार हुआ करते थे. फिर वह राजनीति में आ गए और ब्लाक प्रमुख बन गए. इसके बाद उन्होंने एक ट्रामा सेंटर खोला. दैनिक जागरण में उनके ट्रामा सेंटर से संबंधित खबर छपी कि वहां मरीज की किडनी निकाल ली गई.

मनीष राय ने खुद डीएम को पत्र लिखकर मरीज की लाश कब्र से निकाल कर पोस्टमार्ट कराने का अनुरोध किया ताकि उन पर लग रहे आरोप-दाग की सत्यता सामने आ जाए. परिजनों और अस्पताल प्रशासक दोनों की मांग को देखते हुए कब्र से लाश निकलवा कर डाक्टरों के एक पैनल ने पोस्टमार्टम किया और बताया कि किडनी सलामत है. जब दैनिक जागरण की ब्रेकिंग न्यूज फर्जी साबित हो गई तो जागरण के पत्रकारों ने थूक कर चाटने का काम शुरू किया. इन्होंने छापा कि किडनी गायब नहीं थी.

मनीष राय का कहना है कि किसी की इज्जत एक झूठी खबर से कैसी उतारी जाती है और उसके ब्रांड इमेज को किस तरह बर्बाद किया जाता है, यह इस घटना से जाना जा सकता है. उन्होंने कहा कि वे दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा करने का मन बना रहे हैं. इस मामले को लेकर वह प्रेस काउंसिल और कोर्ट दोनों जगह जाएंगे और झूठी खबर चलाने वाले पत्रकारों को सबक सिखाएंगे.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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अमर उजाला अखबार में छप गई दैनिक जागरण के रिपोर्टर से बातचीत वाली खबर!

अमर उजाला अखबार में गुरुग्राम डेटलाइन से छपी एक खबर में रिपोर्टर लिखता है- ”यह जानकारी प्रदेश के पुलिस महानिदेश बीएस संधू ने दैनिक जागरण से बातचीत में दी.” इस लाइन के छपने से हंगामा मच गया है. लोग कह रहे हैं कि अमर उजाला वालों ने दैनिक जागरण की खबर नेट से चुराई और उसे बिना पढ़े बिना एडिट किए ही अखबार में चेंप दिया. फिलहाल अमर उजाला अखबार में दैनिक जागरण से बातचीत वाली खबर की न्यूज कटिंग ह्वाट्सअप और सोशल मीडिया पर जोरशोर से घूम रही है.

इसके पहले अमर उजाला वालों ने दिल्‍ली के बहुचर्चित बीएमडब्‍लू कांड में दोषी उत्‍सव भसीन पर शनिवार को आए फैसले की ख़बर में भसीन की जगह एक युवा फिल्‍म निर्माता संदीप कपूर की फोटो लगा दी. संदीप कपूर ‘अनारकली ऑफ आरा’ फिल्‍म के निर्माता हैं. अमर उजाला में भसीन की जगह अपनी हंसती हुई तस्‍वीर देखकर संदीप ने फेसबुक पर लिखा- ”When the research of journalists begins and ends with Google and they take Google as Gospel Truth, such blunders happen. My picture has been used by this paper without checking and re-checking. Such journalists bring disrepute to the entire community.”

कुल मिलाकर इन दिनों अमर उजाला कंटेंट के मोर्चे पर निचले स्तर पर गिर चुका है. इस अखबार की एक जमाने में साख हुआ करती थी लेकिन जबसे यह अखबार ब्रांडिंग, सरकुलेशन और मार्केटिंग वाले लोग चलाने लगे, तबसे इसका दम निकलने लगा है. शीर्ष स्तर पर न कोई देखने वाला है और न कोई दुरुस्त करने वाला. सब अपनी नौकरी बचाने और सेलरी लेने में लगे हैं.

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दैनिक जागरण ने मेरा पैसा नहीं दिया तो हाईकोर्ट जाऊंगा

पटना के बाढ़ अनुमंडल से दैनिक जागरण के पत्रकार सत्यनारायण चतुर्वेदी लिखते हैं-

मैं सत्यनारायण चतुर्वेदी दैनिक जागरण बिहार संस्करण के स्थापना व प्रकाशनकाल से बाढ़ अनुमण्डल से निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक संवाद प्रेषण का कार्य करता रहा हूँ. नये सम्पादक जी के आने के कुछ ही महीने बाद वर्ष 2015 के अक्टूबर माह से अचानक मेरी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गयी जो अब तक जारी है। इस बारे में मैंने रोक हटाने का निवेदन श्रीमान सम्पादक जी से किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

मेरा जून 2015 से अक्टूबर 2015 तक का पारिश्रमिक सहित सभी खर्च का भुगतान अब तक नहीं किया गया है। दैनिक जागरण के महाप्रबंधक श्रीमान आनन्द त्रिपाठी जी भी स्थापना काल से हमें अच्छी तरह से जानते हैं। नये सम्पादक जी के यहां आने से पहले श्रीमान महाप्रबंधक जी एवं पूर्व के सम्पादक जी हर माह मुफस्सिल सम्वाददाताओं के साथ बैठक करते थे। पर नए सम्पादक जी के आने के बाद कोई बैठक नहीं हुई। मेरी खबरों के प्रकाशन पर से तत्काल रोक नहीं हटाई गयी और सरकार द्बारा निर्धारित पारिश्रमिक की भुगतान नहीं किया गया तो बाध्य होकर वाजिब हक पाने के लिये उच्च न्यायालय, पटना से गुहार लगायेंगे। मेरे जैसे कई पत्रकार पीड़ित हैं।

Satya Narayan
stnarayan00@gmail.com

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दैनिक जागरण, कानपुर का एक वरिष्ठ अधिकारी सड़क पर घूम-घूम कर गाड़ियां चेक कर रहा!

A senior official of dainik jagran Kanpur is checking vehicles

A senior high rank official posted in Dainik jagran head office Kanpur now a days on an extra duty. He has self pro claimed FLYING SQUAD,  who stop four wheelers on roads, if DAINIK JAGRAN Sticker is pasted on vehicle wind screens. Actually, he want to prove himself as most loyal employee to Dainik jagran prakashan owners. On Saturday, he stopped a commercial Ola cab. He overtook cab on mall road in such a way that cab escaped from a major accident.

He detained driver. Rebuked and ask how he posted Jagran press sticker. Driver made him talk with owner, who is a renowned journalist and recently resigned from i-next news paper of jagran prakshan. Owner told him that he had been worked with jagran for many years and also had been accredited (manyata prapt) journalist from Amar ujala. Even, that senior official from jagran treated him to make his vehicle seize.

The cab owner who is also reputed journalist has decided to make a complaint against this official in jagran very soon. The interesting matter is that self pro claimed loyal senior employee is doing RTO duty on road, but not in good faith of his colleagues. Staff is fed up with his such behavior and this incident has become talk of the town.

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मजीठिया पर आज आएगा कोर्ट का फैसला, जागरणकर्मियों ने बैठक कर एकजुटता दिखाई

आज माननीय सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतन आयोग को लेकर फैसला आना है। इस वेतन आयोग के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अपना फैसला सुनाया था और अख़बार मालिकानों से स्पष्ट कहा था कि वर्कर की राशि एक साल में 4 किश्तों में दें, लेकिन मालिकान 20 जे का बहाना बनाते रहे और आज तक कर्मचारियों को फूटी कौड़ी भी नहीं दी। तरह तरह से परेशान किया सो अलग। जिन्होंने मजीठिया की मांग की, कंपनियों ने उनका तबादला किया। निलंबन और सेवा समाप्ति का फरमान सुना दिया सो अलग। बावजूद इसके वर्कर हारे नहीं और अपनी लड़ाई लड़ते रहे। इस लड़ाई का कल अंतिम दिन होगा, जब माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा।

कल दैनिक जागरण के वर्कर्स की मीटिंग नोएडा के सेक्टर 62 स्थित डी पार्क में हुई, जिसमे सैकड़ों वर्कर शामिल हुए। यह मीटिंग सुप्रीम कोर्ट में आने वाले फैसले को लेकर एकजुटता दिखाने के मकसद से थी। मीटिंग में कोर्ट के आने वाले फैसले को लेकर बहुत सी बातें हुईं। बैठक में श्री विवेक त्यागी, श्री पवन उप्रेती, श्री के के पाठक, श्री महेश कुमार, श्री राजेश निरंजन और रतन भूषण ने आशा, आशंका और अनुभूति के आधार पर इस बारे में बात कही।

पवन जी ने कहा कि एकता हमारी ताकत है और हम कंपनियों से इसी दम पर अपना पाई पाई का हिसाब लेंगे। फैसला निश्चित रूप से हमारे पक्ष में आएगा। विवेक त्यागी का कहना साफ था कि वर्करों के बुरे दिन आज से ख़त्म, मालिकानों के बुरे दिन शुरू।हमारे हक़ को अब कोई नहीं मार सकता। चूँकि कल फैसला सुनाया जायेगा, तो उसमें वकीलों की रहने की जरूरत तो है, पर वे वहाँ कुछ बोल नहीं सकते।अगर उन्हें ऑर्डर को लेकर कुछ कहना होगा, तो उसकी प्रक्रिया अलग है और वह बाद में अपनायी जाएगी।हम किसी भी सूरत में हार नहीं सकते। उन्होंने हमारे मार्गदर्शक आदरणीय श्री के के पुरवार की बात भी दोहरायी कि वर्कर चाहकर भी मजीठिया के केस को हार नहीं सकता।

केके पाठक ने साफ कहा कि रात में कंपनी के कुछ लोगों से बात हुयी है, वे सब परेशान हैं इस बात को लेकर कि अंदर वालों को बरगलाया जा रहा है कि जागरण मजीठिया जुलाई से लागू कर रहा है। लेकिन सच यही है कि यह सब मैनेजमेंट की मीठी गोली है। इस बात से पर्दा कल के बाद उठ जायेगा कि सही में जागरण क्या करने जा रहा है। राजेश निरंजन और महेश कुमार का कहना हुआ कि अगर कंपनी सभी को मजीठिया का लाभ देती है, तो अच्छी बात है लेकिन यह जागरण की सोच के हिसाब से सही नहीं लगता। अगर कंपनी अच्छी होती तो 4 वेतन आयोग को हड़प नहीं कर जाती।

रतन भूषण का कहना हुआ कि कल का दिन अख़बार के कर्मचारियों के लिए सुनहरा दिन होगा। वर्करों की सारी समस्या कल ख़त्म हो जायेगी। मालिकानों की नींद हराम होगी साथ ही उनके प्यादों की भी, क्योंकि मालिकान फ्लॉप प्यादों को अब नहीं रखने वाले। वर्करों के पास हारने के लिए है क्या? हारना तो मालिकों को है और उनकी हार सुनिश्चित है, क्योंकि एक्ट हमारे साथ है और एक्ट हमारा संविधान है, जिससे देश चलता है।

उन्होंने आगे कहा, इस केस के कई रंग दिखे और ये रंग दिखाने वाले थे कुछ वकील जो इस केश में थे। सभी को पता है कि वर्करों के वकीलों में श्री प्रशांत भूषण, श्री कोलिन घोंसाल्विस, श्री परमानंद पांडेय, श्री उमेश शर्मा, श्री आश्विन वैश्य और श्री विनोद पांडेय मुख्य थे, लेकिन इस टीम में जब तक श्री प्रशांत भूषण की एंट्री नहीं हुई थी, केस को कॉलिन साब नाव की तरह मझधार में डगमगाते रहते थे। उनका रवैया कभी चित तो कभी पट वाला होता रहता था, जिसको लेकर हमारे मन में शंकाएं आती थीं। यहाँ हमारी मज़बूरी भी थी। दरअसल कॉलिन सीनियर थे तो कोर्ट उन्हें ही सुनती थी। किसी और को सुनती ही नहीं थी। ऐसी स्थिति में इन उपरोक्त वकीलों की टीम बेकार साबित होती थी। कुछ समय कॉलिन को झेलने के बाद हमने अपने साथियों के साथ निर्णय लिया कि अब प्रशांत भूषण जी को ही लाना होगा, नहीं तो कोर्ट की सुनवाई का यह सिलसिला पता नहीं और कितने साल चलेगा। कॉलिन साहब पता नहीं इसमें और क्या क्या मुद्दे उठवायेंगे। श्री प्रशांत सर का आभार की उनके दो बार कोर्ट में जाने और अपनी बात रखने के बाद हम इस मुकाम पर आ गए। कल आर्डर आएगा।

साथियों के मन में आर्डर को लेकर क्या चल रहा है मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं आशस्वस्त हूँ कि फैसला हमारे पक्ष में आना है। कल 20 जे का अंत होना है। टाइम बाउन्ड भी हो सकता है और पिछले आर्डर में दिए गए समय से सब में कम होगा, जैसे एक साल को 6 माह, 4 किश्त को 2 या 10 दिन के अंदर सब ख़त्म करने की बात भी हो सकती है।
अंत में आगे बड़ी तरक्की है, जीत हमारी पक्की है…. जय हो

मजीठिया क्रान्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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इन दोनों बड़े अखबारों में से कोई एक बहुत बड़ा झुट्ठा है, आप भी गेस करिए

हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबारों ने एक रोज पहले पन्ने पर लीड न्यूज जो प्रकाशित की, उसके फैक्ट में जमीन-आसमान का अंतर था. हिंदुस्तान लिख रहा है कि यूपी में सड़कों के लिए केंद्र ने पचास हजार करोड़ रुपये का तोहफा दिया वहीं दैनिक जागरण बता रहा है कि सड़कों के लिए राज्य को दस हजार करोड़ रुपये मिलेंगे. आखिर दोनों में से कोई एक तो झूठ बोल रहा है.

आप भी गेस करिए, इन दो में से बड़ा वाला झुट्टा कौन है….

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हे जागरण वालों! फर्जी विज्ञापन के जरिये मीडियाकर्मियों का माखौल उड़ाना बंद करो

अक्टूबर 2015, अगस्त 2016, जनवरी 2017 और अभी मई 2017… इतने लम्बे समय से दैनिक जागरण विज्ञापन जारी करके मीडिया कर्मी ही ढूंढ रहा है। अरे भई साफ लिखो न कि हमको पत्रकार नहीं, मजदूर चाहिए जो न तनख़्वाह मांगे और न ही मजीठिया वेज बोर्ड। नौकरी के लिए जारी विज्ञापनों में दैनिक जागरण ने बायोडाटा भेजने के लिए पहले तो मेल आईडी hr@nda.jagran.com देता रहा, अब career@jagran.com पर रिज्यूम मांग रहा। लेकिन career@jagran.com पर कोई भी मेल सेंड नहीं कर पा रहा।

जागरण में प्रकाशित वो विज्ञापन जिसमें बायोडाटा भेजने के लिए जिस मेल आईडी का उल्लेख किया गया है, वह काम नहीं कर रहा. 

बहुत सारे लोगों ने जागरण के जाब वाले विज्ञापन में फर्जी मेल आईडी होने की शिकायत की है.

बहुत सारे लोगों ने शिकायत की है कि दैनिक जागरण ने मीडियाकर्मियों की भर्ती के लिए जिस मेल आईडी पर बायोडाटा मांगा है, वह काम नहीं कर रहा। इसे क्या समझा जाए। यह मीडियाकर्मियों से मजाक नहीं तो और क्या है। वैसे भी कहा जाता है कि जिस अखबार में डिजाईनर मजदूर भरे हों वहां टैलेंट की क्या जरूरत। इधर एक नई जानकारी भी सामने आई है कि खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का पैरोकार बताने वाला दैनिक जागरण अपने ही आफिस में दूसरी वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा रखा है ताकि उसके इंप्लाई कहीं बागी न हो जाएं। दैनिक जागरण ऑफिसों में भड़ास4मीडिया डाट काम समेत कई वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना दरअसल दैनिक जागरण के मालिकों और संपादकों की सामंती मानसिकता को दर्शाता है जो लेखन, विचार और समाचार के जिस पेशे में हैं, उसी पेशे पर कुठाराघात करने में जुटे हुए हैं।

फर्जी मेल आईडी देकर बेरोजगारों का माख़ौल उड़ाने वाला जागरण ग्रुप एक ओर तो छंटाई करने में जुटा है ताकि मजीठिया न देना पड़े, वहीं नए कर्मियों की भर्ती के लिए बेचैन दिख रहा है पर इसके लिए सही मेल आईडी तक नहीं दे पा रहा है। यह है देश के कथित सबसे बड़े अखबार का अलोकतांत्रिक और अराजक चेहरा।

आशीष चौकसे
पत्रकार एवं ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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दैनिक जागरण आफिस में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पढ़ना मना है!

अभिव्यक्ति की आजादी का झूठा ढिंढोरा पीटता है दैनिक जागरण… मीडिया वालों की खबर देने वाले पोर्टल भड़ास4मीडिया पर लगा रखा है प्रतिबंध… बड़े-बड़े लेखों और मंचों के जरिए दैनिक जागरण के संपादक-मालिक लोग हमेशा से आवाज उठाते रहते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए. ये लोग अपने मीडिया कर्मचारियों को भी नसीहत देते हैं कि तथ्य के साथ बातों को रखा जाए, लोकतंत्र में हर खंभे को सम्मान दिया जाए. लेकिन वास्तविकता कुछ और भी है. आज उस समय बहुत बुरा फील हुआ जब पत्रकारिता जगत की खबर देने वाले पोर्टल भड़ास4मीडिया के बारे में पता चला कि इस पर दैनिक जागरण के राष्ट्रीय ऑफिस में पूर्णत प्रतिबंधित लगाया हुआ है.

पत्रकारों के सुख-दुख की खबरों को देने वाले और मीडियाकर्मियों के हित की आवाज उठाने वाले भड़ास4मीडिया की आवाज को कुचलने का प्रयास अखबार मालिक हमेशा से करते आये हैं मगर अखबार मालिक ये क्यों नही जानते कि सभी पत्रकारों के पास आज कल टच स्क्रीन वाला मल्टी मीडिया फोन है, स्मार्ट फोन है, घर में लैपटाप है. आपने ऑफिस में भले ही भड़ास पर पाबंदी लगा दी है लेकिन पढ़ने वाला तो अपने मोबाइल में भी पढ़ लेगा.

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से जुड़े सभी लोगों को हर पहलू पर अपनी बात कहने का अधिकार होता है. स्वस्थ वातावरण का निर्माण तभी सम्भव है जब सबकी बात सुनी जाए. अगर बात संवैधानिक रूप से रखी जा रही है तो उसे सबको सुनना चाहिए. मगर यह पूर्णत: गलत है कि आप समाज में नारा तो लगाओ कि सभी को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है लेकिन सामने वाले की आवाज को चुपचाप कुचल दो.. शायद इसे ही बोलते हैं मुंह में राम बगल में छूरी…. भड़ास4मीडिया पर से दैनिक जागरण प्रबंधन को पाबंदी हटानी चाहिए और उसे कोशिश करनी चाहिए कि वह अपने मीडियाकर्मियों को सभी कानूनी लाभ दे.

लेखक नवीन द्विवेदी गाजियाबाद के अखबार शिप्रा दर्पण के संपादक हैं. उनसे संपर्क 9910091121 या naveendwivedi.pimr@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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शेम शेम दैनिक जागरण! मजीठिया मांगने पर संकट से घिरे वरिष्ठ पत्रकार का जम्मू कर दिया तबादला

दैनिक जागरण बिहार का अमानवीय शोषणकारी चेहरा…दैनिक जागरण के वरिष्ठ एवं ईमानदार पत्रकार पंकज कुमार का मजीठिया के अनुसार वेतन मांगने पर जम्मू किया तबादला…. वीआरएस लेने  के लिए जागरण प्रबंधन बना रहा है दबाव… बिहार के गया जिले में दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुमार अपनी बेख़ौफ़ एवं निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. ये दैनिक जागरण के बिहार संस्करण के स्थापना काल से उससे जुड़े हुए हैं.

इनको स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण 2004 में पेस मेकर लगा था जिसे वर्ष 2016 में बदलकर पुन: अधिक शक्तिशाली पेसमेकर लगवाना पड़ा था. उसी वर्ष अक्तूबर 2016 में इनका पोस्ट्रेट का आपरेशन भी पटना में हुआ. अपनी गंभीर बीमारी एंव स्वास्थ के कारण इन्होंने माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के आलोक में मजीठिया वेतन आयोग की मांग दैनिक जागरण प्रबन्धक से कर दिया. इसके बाद दैनिक जागरण प्रबन्धक ने शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया. पोस्ट्रेट ग्रिड के आपरेशन के दौरान ही पंकज कुमार को डायपर और लुंगी पहनकर कार्यालय आने के लिए बाध्य किया गया. इनके वेतन से पहले 14 दिन फिर एक बार 7 दिन की कटौती भी दैनिक जागरण ने कर ली जबकि इनका 92 दिन का उपार्जित अवकाश देय था.

पंकज कुमार ने गया में दैनिक जागरण को एक विश्वसनीयता प्रदान की थी. वर्ष 2003 के नवम्बर माह में राष्ट्रीय राजमार्ग के उप महाप्रबंधक इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या ने सनसनी फैला दी थी. जहां सभी अखबार इस हत्या का कारण सत्येन्द्र दुबे द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय में भ्रष्टाचार संबंधी की गई शिकायत बता रहे थे वहीँ पंकज कुमार ने इस हत्या का कारण बिहार में गिरती हुई कानून व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हुए सड़क लुटेरों द्वारा इस घटना को अंजाम देना बताया था. सीबीआई की जांच में भी यही सामने आया था.

क्रूर एवं अमानवीय दैनिक जागरण प्रबन्धक ने इस तरह के पत्रकार को भी नहीं बख्शा और मुख्य महाप्रबंधक आनन्द त्रिपाठी ने मजीठिया आयोग के अनुसार वेतन की मांग पर नाराजगी जताते हुए दो माह का वेतन लेकर स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने को कहा दिया तथा इनकार करने पर जम्मू जैसे दुर्गम इलाके में एक बीमार पत्रकार को तत्काल प्रभाव से जाने का फरमान जारी कर दिया. जनता की आवाज होने का दावा करने वाले ये अखबार खुद अपने ही कर्मचारियों का गला हक़ के लिए आवाज उठाने पर घोटने से बाज नहीं आते हैं.  पंकज कुमार ने भी संकल्प ले लिया है कानूनी सबक सिखाने का. उन्होंने पटना के लेबर कोर्ट तथा माननीय उच्च न्यायालय में भी मुकदमा दायर किया है.

अफ़सोस कि राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी शिद्दत के साथ शोषक अखबारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं. मजीठिया वेतन आयोग लागू होने के बाद से अब तक दस हजार से ज्यादा पत्रकारों की नौकरी अखबार प्रबन्धक खा चुके हैं. आज अगर पत्रकार हार गए तो बची खुची पत्रकारिता की भी मौत हो जायेगी.

मीडियाकर्मियों के लिए ये दो लाइनें बहुत प्रासंगिक हो गई हैं….

निकले सड़क पर जनता, बताये शोषक प्रबंधकों को उनकी औकात.
माना कि अन्धेरा घना है पर मशाल जलाए रखना कहाँ मना है?

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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आइडिया चोरी करने और धमकाने के मामले में दैनिक जागरण पर हुआ मुकदमा

दैनिक जागरण वाले चोरी और सीनाजोरी के लिए कुख्यात हैं. ताजा मामला पटना का है. मानस कुमार उर्फ राजीव दुबे अपनी कंपनी चलाते हैं. उन्होंने बिल्डरों और आर्किटेक्ट्स पर आधारित ‘बिल्डकान’ नामक एक प्रोग्राम करने का इरादा बनाया. इसके लिए गल्ती से उन्होंने एक ऐसे आर्किटेक्ट (नाम- विष्णु कुमार चौधरी) की मदद ली जो दैनिक जागरण से भी जुड़ा हुआ था. उस आर्किटेक्ट ने सारा आइडिया दैनिक जागरण वालों को बता दिया.

CIVIL Court Case File Copy

दैनिक जागरण के मार्केटिंग के वाइस प्रेसीडेंट विकास चंद्रा को यह आइडिया भा गया और उन्होंने इस बिल्डकान कार्यक्रम के जरिए जागरण को हर प्रदेश में करोड़ों कमवाने का विचार बना लिया. इसके लिए उन्होंने मानस कुमार उर्फ राजीव दुबे को धमकाना शुरू कर दिया. मानस भी तेजतर्रार हैं. उन्होंने पहले से ही सब कुछ कापीराइट करवा लिया था. सो, तत्काल उन्होंने न सिर्फ दैनिक जागरण वालों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखा दिया बल्कि कोर्ट में मुकदमा ठोंक दिया.

पता चला है कि दैनिक जागरण वाले अब अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए मानस कुमार को धमका रहे हैं. मानस कुमार ने भड़ास4मीडिया को फोन पर बताया कि उन्हें दैनिक जागरण के विकास चंद्रा धमकियां दे रहा है. जिस कार्यक्रम को उन्होंने मेहनत से प्लान किया, उसे अब जागरण हड़प लेना चाहता है. दैनिक जागरण की मंशा यह कार्यक्रम खुद के बैनर तले करने की है ताकि वह सारा रेवेन्यू हड़प ले जाए. मानस ने कहा कि यह चोरी और सीनाजोरी का मामला है जो बिलकुल पेशेवर नहीं है. ऐसी हरकत टुच्ची कंपनियां करती हैं. मानस के मुताबिक वह अंत तक लड़ेंगे. अगर उनके साथ कुछ बुरा होता है तो उसके लिए दैनिक जागरण प्रबंधन और विकास चंद्रा जिम्मेदार होंगे.

उपर कोर्ट में किए गए मुकदमें की कापी के शुरुआती दो पन्ने हैं… नीचे थाने में दी गई तहरीर की कापी है….

 FIR Report

ज्यादा जानकारी के लिए पीड़ित मानस से संपर्क tabletmedia.patna@gmail.com या manaskumar@tabletmedia.co.in या +917633995888 या +918292610840 के जरिए किया जा सकता है.

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दिल्ली की श्रम अदालत ने दैनिक जागरण पर ठोंका दो हजार रुपये का जुर्माना

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोंक दिया है। इस जुर्माने के बाद से जागरण प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। बताते हैं कि गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों के मामले की सुनवाई थी जिन्होंने मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था। इन सभी 15 लोगों को बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया गया था। गुरुवार को जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई।

इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं, अभी रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देते हैं। इस पर वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये लोग मामले को लटकाना चाहते हैं, संबंधित डाक्यूमेंट्स नहीं देना चाहते हैं, वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे। इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये। तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। जज ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर और कानून के हिसाब से जागरण पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की अगली तारीख 4 मई की लगी है।

सूत्रों के हवाले से दैनिक जागरण से जुड़ी एक और चर्चा भी यहां चल रही है कि प्रबंधन अब वर्करों से हारने वाला है। ऐसा कई मोर्चों पर हो रहा है। सूत्र कहते हैं कि एक ओर जहां अदालत में जागरण प्रबंधन की किरकिरी हुयी है वहीं उनमें अब हार का डर भी समाने लगा है। दैनिक जागरण में एक और चर्चा है कि जागरण में एक बड़ी मीटिंग हुई है, जिसमें यह बात भी सामने आयी कि जितने भी वर्कर बाहर हों, सबको जल्दी अंदर लिया जाये।

खबर है कि मालिकानों में अब हर जगह हो रही फजीहत की वजह से आपस में ही जूतमपैजार होने की नौबत आ गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मजीठिया मामले को लेकर जागरण का पूरा घराना एक तरफ और संजय गुप्ता अकेले एक तरफ हैं। दूसरी ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में भी अब मालिकानों को हार नजर आ रही है, इसलिए भी परेशान हैं। जागरण के मालिक संजय गुप्ता की बात करें तो उन्होंने अपने वर्करों से मजीठिया की मांग करने के दौरान यह कहा था कि नौकरी हम देते हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं, हम जैसे चाहेंगे, वैसे काम कराएँगे, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तब की बात है, लेकिन आज ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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संजय गुप्ता समेत पूरी जागरण टीम गिरफ्तार न होने का मतलब चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है!

Ram Janm Pathak : हेकड़ी, एक्जिट पोल और खानापूरी… चुनाव आयोग के स्पष्ट मनाही की जानकारी होने के बावजूद अगर दैनिक जागरण की आनलाइन साइट ने एक्जिट पोल छापने की हिमाकत की है तो यह सब अचानक या गलती से नहीं हुआ है, जैसा कि उसके स्वामी-संपादक संजय गुप्ता ने सफाई दी है। गुप्ता ने कहा कि यह ब्योरा विज्ञापन विभाग ने साइट पर डाल दिया। अपने बचाव में इससे ज्यादा कमजोर कोई दलील नहीं हो सकती। अखबार के बारे में थोड़ा -बहुत भी जानकारी रखने वाले जानते हैं कि समाचार संबंधी कोई भी सामग्री बिना संपादक की इजाजत के बगैर नहीं छप सकती।

जागरण ने जो किया, सो किया। चुनाव आयोग भी केवल प्रभारी संपादक को गिरफ्तार करके अपनी खानापूरी कर रहा है। इसमें जब तक स्वामी-संपादक संजय गुप्ता समेत पूरी टीम को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब यही समझा जाएगा कि चुनाव आयोग भी किसी दबाव में है और बस ऊपरी तौर पर निष्पक्ष दिखने की कोशिश कर रहा है। वैसे भी चुनाव आयोग इस बार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पा रहा है।

दैनिक जागरण का कारनामा पेड न्यूज जैसा भी लगता है, वर्ना विज्ञापन विभाग की इतनी मजाल नहीं है कि वह संपादकीय स्पेस पर कोई एकतरफा एक्जिट पोल छाप दे। असल में, जागरण की कार्य-संस्कृति ही न्यारी है। लंबे समय तक तो उसमें मालिक ही हर जगह संपादक होता था। मुख्य संपादक के तौर पर तो अब भी उसी का नाम जाता है। लेकिन, जब संस्करणों की संख्या बढ़ गई तो कुछ वैधानिक मजबूरियों की वजह से स्थानीय संपादकों के नाम दिए जाने लगे। उसमें भी संपादकीय विभाग के व्यक्ति का नाम कम ही दिया जाता था, तमाम जगहों पर मैनेजर टाइप के लोग ही संपादक भी होते रहे। बरेली-मुरादाबाद में तो चंद्रकांत त्रिपाठी नामक कथितरूप से एक अयोग्य और भ्रष्ट व्यक्ति लंबे समय तक संपादक बना रहा, जबकि उसी का नाम प्रबंधक के रूप में भी छपता था। उसकी कुल योग्यता मालिक को चिट्ठियां लिखने तक सीमित थीं।

हो सकता है कि गिरफ्तार शेखर त्रिपाठी, भी उसी कुल-परंपरा के हों। जागरण में समस्या यह है कि कोई स्वतंत्रचेता व्यक्ति संपादक हो ही नहीं सकता। मालिकों को गुलाम, झुका हुआ और जी-हजूर चाहिए। लेकिन, एक मरा हुआ, मतिमंद और चाटुकार संपादक किसी न किसी दिन नैया डुबाता ही है। अगर आज दैनिक जागरण ने पूरे देश में हिंदी पत्रकारिता की नाक कटाई है और दुनिया-जहान के सामने हिंदी पत्रकारों को अपमानित किया है तो इसके बीज इस संस्थान की कार्य-संस्कृति में पहले से मौजूद थे।

दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दल भी ऐेसे लोगों को पोसते हैं। दैनिक जागरण के स्वामी-संपादक (स्वर्गीय) नरेंद्र मोहन को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा तो उनके छोटे भाई महेंद्र मोहन को समाजवादी पार्टी ने। राजनीतिक दल अखबारों के मालिकों को अपने पोंछने की तरह इस्तेमाल करते हैं तो अखबार मालिक भी इससे कुछ फायदा चाहते हैं। जागरण पहला अखबार है, जिसने अभी मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं तो सिर्फ इसलिए की भाजपा से उसकी सांठगांठ है और वह जानता है कि प्रधानमंत्रीजी अंत में उसकी मदद करेंगे। भले ही वह कर्मचारियों का खून ही क्यों न चूसता हो? पूरी पत्रकारिता में दैनिक जागरण अकेला ऐसा अखबार है जो आज भी नियम-कायदों की सबसे कम परवाह करता है, लेकिन किसी सरकार ने आज तक उस पर कोई कारर्वाई नहीं की।

लेकिन, इस बार तो जागरण ने जो किया है, वह हद ही है। कानून का डंडा मालिक-मुख्तार से लेकर सब पर चलना चाहिए। जागरण की हेकड़ी को तोड़ा जाना जरूरी है। गिरावट की सीमा यह भी रही कि इंडियन एक्सप्रेस समूह को छोड़कर इक्का-दुक्का अखबारों ने ही शेखर त्रिपाठी की गिरफ्तारी की खबर छापी, बाकी तमाम अखबार बिरादाराना हक ही निभाते रहे। सोचिए, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कितने विराट स्वर्णिम युग में रह रहे हैं, जहां सबसे बड़ी पाबंदी अखबारवाले खुद ही अपने मुंह पर लगा कर बैठे हुए हैं। हद है। हर चीज की हद है।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार राम जन्म पाठक की एफबी वॉल से.

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भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन… जागरण कोई अख़बार है! : विमल कुमार

Vimal Kumar : दो साल की सज़ा या जुर्माना या दोनों एक साथ का प्रावधान है। ये लोग अदालत को मैनेज कर केवल जुर्माना देकर बच जाएंगे। जिसने विज्ञापन दिया उसे भी जेल की सजा हो। जागरण कोई अख़बार है, भोंपू को अख़बार न कहो प्रियदर्शन!

Maheruddin Khan : नेता तो किसी न किसी मामले में गिरफ्तार होते ही रहते हैं… एकाध सम्पादक को भी गिरफ्तार होने दो भाई। और एक पाले खड़े हो जाओ। यह नहीं चलेगा कि सम्पादक ने जो किया उसका समर्थन नहीं करते और गिरफ्तारी का विरोध करते हैं।

Dilip Khan : रत्ती भर भी असहमत नहीं हूं चुनाव आयोग के रुख से। क्राइम किया है। सज़ा मिलनी चाहिए। इसमें भागीदार बिग प्लेयर्स को भी सज़ा होनी चाहिए। क़ानून तोड़ने का ये हल्का मामला नहीं है बल्कि डेमोक्रेटिक तरीके से हो रहे चुनाव को प्रभावित करने का मामला है। उमलेश यादव केस में भी ये अख़बार बच गया था। अगर 2011 में ही इस पर कार्रवाई हो जाती तो फिर से ग़लती रिपीट नहीं करता। लेकिन प्रेस काउंसिल के पास नोटिस देने के अलावा और कोई पावर ही नहीं है। इस बार आचार संहिता के दौरान क्राइम किया है इसलिए सज़ा होनी चाहिए। पत्रकारिता के वृहत्तर लाभ के लिए मैं इस कार्रवाई के साथ हूं।

वरिष्ठ पत्रकार विमल कुमार, मेहरुद्दीन खान और दिलीप खान ने उपरोक्त टिप्पणियां एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार प्रिय दर्शन की जिस पोस्ट पर की है, वह इस प्रकार है :

Priya Darshan : मीडिया संपादक पवित्र गाय या कानून से ऊपर नहीं हो सकते। जो जुर्म जैसा है, उसकी वैसी ही सज़ा होनी चाहिए। एक साथी ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा है कि जागरण ने अपने सैकड़ों कर्मचारियों को मजीठिया के लाभ नहीं दिए और उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक अन्य साथी ने बाबरी मस्जिद के दिनों में अखबार की तथ्यहीन रिपोर्टिंग की याद दिलाई। बेशक, इन सबकी लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। इसलिए यह कहना जरूरी है कि यह पोस्ट जागरण के पक्ष में नहीं है। चुनाव आयोग के निर्देश के विरुद्ध एग्जिट पोल छापना अनुचित था- इस लिहाज से और ज़्यादा कि वह संस्थान के मुताबिक विज्ञापन यानी ‘पेड न्यूज’ था। लेकिन यह पूरा मामला मीडिया के और भी संकटों को उजागर करता है। १५ एफआइआर कराने और संपादक को गिरफ्तार करने का फ़ैसला कुछ ज़्यादा सख्त है- याद दिलाता हुआ कि व्यवस्थाएं जब चाहती हैं, मीडिया को उसकी हैसियत बता देती हैं। जो लोग शिकायत या गुमान करते हैं कि मीडिया बहुत ताकतवर है, वे देख सकते हैं कि एक गलती पर किस तरह उसकी बांहें मरोड़ी जा सकती हैं। जो लोग मीडिया पर नियंत्रण के लिए और कानूनों की ज़रूरत बताते हैं, उनको समझना चाहिए कि इस देश में मीडिया के खिलाफ कई कानून हैं, मगर मीडिया के लिए अलग से एक भी नहीं। जिस आजादी का मीडिया इस्तेमाल करता है, वह उसे कानूनों से नहीं, इस देश की उदार परंपरा से और विभिन्न मोर्चों पर अपने विश्वसनीय संघर्षों से मिली है। चिंता की बात बस यह है कि आज इस परंपरा पर भी चोट की जा रही है और मीडिया की विश्वसनीयता पर भी खरोंच पड़ी है।

प्रिय दर्शन की उपरोक्त पोस्ट पर आईं कुछ अन्य टिप्पणियां इस प्रकार हैं :

Mangalesh Dabral यह फैसला कोई सख्त नहीं है. अखबार और हिंदी का तथाकथित सबसे बड़ा अखबार होने के नाते उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी का बोध अनिवार्य होना होता है. क्या वे नादान, अनपढ़ गरीब थे जिन्हें नियमों के बारे में नहीं भी मालूम हो सकता है. या जानबूझकर नियमों को धता बताने वाले राजनीतिक माफिया? आपको याद होगा, अयोध्या में बाबरी विध्वंस से कुछ दिन पहले हुई परिक्रमा और कार सेवा के दौरान गोली चली जिसमें चार-पाच लोगों के मारे जाने की अपुष्ट खबर आयी. हिंदी के एक अखबार के डाक संस्करण में यह संख्या छपी, फिर दूसरा ‘कारसेवक’ प्रभारी आया तो उसका यह संख्या देखकर मन नहीं भरा और उसने एक शून्य बढ़ा कर पचास मृतक बता दिए, फिर जब नगर संस्करण आया तो उसमें प्रभारी महोदय ने इसमें एक शून्य और जोड़कर मृतकों की संख्या पांच सौ कर दी.मकसद था तनाव, वैमनस्य और अंततः दंगा भड़काना. क्या यह पत्रकारिता है? यह विवरण महान कवी रघुवीर सही की उस रपट में दर्ज है जो उन्होंने प्रेस कौंसिल के निवेदन पर फैक्ट फाइंडिंग ईम के रूप- में लिखी थी.

Abhiranjan Kumar सर, बात आपकी भी सही है। लेकिन समस्या यह है कि चुनाव में हर रोज़ बड़े नेता जाति और धर्म के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले के मुताबिक भी अनुचित है, लेकिन चुनाव आयोग उन नेताओं को जेल में नहीं डाल रहा। आचार संहिता उल्लंघन में फंस गया एक संपादक, जिससे ग़लती तो ज़रूर हुई, लेकिन मेरी राय में उसका सिर्फ़ कंधा रहा होगा, बंदूक किसी और की रही होगी, जिसे दुनिया “मालिक” कहती है।

एक लक्ष्मण-रेखा तो सबके लिए होनी ही चाहिए। नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रैट, बिजनेसमैन… इन सबसे ज़रा-सी चूक हुई नहीं कि हम लोग उन्हें फ़ौरन कानून के चंगुल में देखना चाहते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों पर हम आज़ादी की दुहाई देने लगते हैं। इस मामले में संबंधित संपादक पर अधिक सख्ती हो गई, यह मानने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन फिर यह सवाल भी उठेगा कि क्या एक टीवी चैनल के संपादक पर भी अधिक सख्ती हो गई थी, जिन्हें शायद महीना भर या उससे भी अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा था? अनजाने में या अनभिज्ञता में किसी से भी ग़लती हो सकती है… हमसे भी और आपसे भी… पर जो ग़लतियां मीडिया के द्वारा इन दिनों जान-बूझकर की जाती हैं, क्या उनके प्रति भी हमें उतना ही सहिष्णु रहना चाहिए? ये कुछ सवाल उठाते हुए भी मोटे तौर पर मैं आपकी मूल भावना के साथ हूं। अगर पेड न्यूज़ का मामला है तो संपादक को नहीं, मालिक को जेल होनी चाहिए। कोई संपादक अपनी मर्ज़ी से पेड न्यूज़ छाप ही नहीं सकता। उस पर मालिकों का दबाव रहता है, इसलिए उसे ऐसे अनैतिक काम करने पड़ते हैं। अक्सर हमारी व्यवस्था गोली चलाने वालों को फांसी दे देती है, लेकिन गोली चलवाने वाले को सबूतों के अभाव में बरी कर देते हैं। कई बार बरी कर देना तो दूर, उनके गिरेबान तक हाथ तक नहीं पहुंच पाते और आप जो “पवित्र गाय” शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह वही “पवित्र गाय” बने रहते हैं।

Ajeet Singh जहां कहीं भी सांप्रदायिक तनाव या विवाद होता है, वहां दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग देखिए। ये एग्जिट पोल वाली ग़लती छोटी लगने लगेगी। केस स्टडी के तौर पर मुज़फ्फरनगर दंगों को ले सकते हैं। बहरहाल, इस मामले में अकेले संपादक को दोषी मानना सही नहीं है। किसी पार्टी या विचारधारा का मुखपत्र होना अपराध नहीं है। लेकिन जागरण या कई अन्य मीडिया समूह विश्वास और उदारता की परंपरा के साथ जो खिलवाड़ कर रहे हैं, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है।

Aflatoon Afloo CrPC की धारा 144 का उल्लंघन करने पर IPC की धारा 188 के अन्तर्गत सजा होती है। अधिकतर उसी दिन कोर्ट उठने तक की और अधिकतम हफ्ता भर की।मेरी स्पष्ट मान्यता है कि उन्हें झूठ बोलने की भी आजादी है।उसके साथ यदि उससे देश का कोई कानून टूटता हो तो उसे कबूलना भी चाहिए। अधिकतम दो साल की सजा के प्रावधान की पूरी सजा कितनो को मिली है यह जानने लायक है।

Mahesh Punetha मेरा मानना है कि संपादक से पहले अखबार पर कार्यवाही होनी चाहिए. संपादक तो बेचारा है, मालिक जैसा कहे उसे वैसा करना है.

Ramesh Parashar ये व्यापारियों और चाटुकारों का दौर है! मीडिया इस गंदगी मे निर्लज्जता की हद तक लोट लगा रहा है! सामाजिक ज़िम्मेदारी या राष्ट्रीय हित जैसी बातें उसके लिये बेमानी हैं? चारण भांड की भूमिका से भी उसे परहेज़ नहीं? सियासत ने अपनी गंदगी से उसे भी नहला दिया! लोगों का भरोसा भी अब उस पर नहीं! वैसे ‘ जागरण ‘ पर पार्टी विशेष का ठप्पा तो वर्षों से है, निष्पक्ष तो रह नहीं गया?

Jeevesh Prabhakar चुनाव संपन्न होने यानि 11 मार्च तक अखबार के प्रकाशन पर रोक लगा दो…चूलें हिल जायेंगी ….विज्ञापन विभाग तो बहाना है….. बिना मालिक की अनुमति के ऐसा कर पाना संभव ही नहीं है…. मालिक को भी जेल होनी चाहिए…

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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यशवंत की जागरण कर्मियों को सलाह- संजय गुप्ता की गिरफ्तारी के लिए चुनाव आयुक्त को पत्र भेजो

Yashwant Singh : दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता है. यह मालिक भी है. यह सीईओ भी है. एग्जिट पोल वाली गलती में यह मुख्य अभियुक्त है. इस मामले में हर हाल में गिरफ्तारी होनी होती है और कोई लोअर कोर्ट भी इसमें कुछ नहीं कर सकता क्योंकि यह मसला सुप्रीम कोर्ट से एप्रूव्ड है, यानि एग्जिट पोल मध्य चुनाव में छापने की कोई गलती करता है तो उसे फौरन दौड़ा कर पकड़ लेना चाहिए. पर पेड न्यूज और दलाली का शहंशाह संजय गुप्ता अभी तक नहीं पकड़ा गया है.

संजय गुप्ता ने पिछले कुछ वर्षों में मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी और बकाया मांगने वाले सैकड़ों लोगों को संस्थान से बाहर कर दिया. इन्हें और इनके परिजनों को भूखों मरने को मजबूर कर दिया. लगता है ईश्वर ने बदला लेने का मौका जागरण के उन पूर्व कर्मियों को दे दिया है जिनके पेट पर संजय गुप्ता ने लात मारा था. इन सभी साथियों को चुनाव आयोग को लेटर लिख कर एग्जिट पोल छापने के मुख्य अभियुक्त संजय गुप्ता को फौरन अरेस्ट करने की मांग करनी चाहिए.

लगातार चिट्ठी मेल भेजे जाने से चुनाव आयोग पर असर पड़ेगा. संजय गुप्ता बाहर क्यों? संजय गुप्ता को तो जेल में होना चाहिए. संजय गुप्ता दिखा रहा चुनाव आयोग को ठेंगा. गिरफ्तारी से बचने के लिए संजय गुप्ता ने पुलिस प्रशासन और सिस्टम को अपने अनुकूल किया. ऐसे वाक्य लिख लिख कर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को मेल करिए. लोहा गरम है. एक हथौड़ा भी काम कर सकता है. तो देर न करिए दोस्तों. चूकिए नहीं. फौरन आगे बढ़िए और शाम तक सौ पचास मेल तो करा ही दीजिए.

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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संपादक तो फ़िज़ूल में गिरफ़्तार हो गया, गिरफ़्तारी गुप्ता बंधुओं की होनी चाहिये : देवेंद्र सुरजन

Devendra Surjan : एक्ज़िट पोल छापने वाले जागरण परिवार की पूर्व पीढ़ी के दो और सदस्य सांसद रह चुके हैं. गुरुदेव गुप्ता और नरेन्द्र मोहन. यह परिवार सत्ता की दलाली हमेशा से करता आ रहा है. वर्तमान में जागरण भाजपा का मुखपत्र बना हुआ है. सत्ताधीशों का धन इसमें लगा होने की पूरी सम्भावना है. हर राज्य में किसी न किसी नाम से और किसी न किसी रूप में संस्करण निकाल कर सरकार के क़रीबी बना रहना इस परिवार को ख़ूब आता है. एक्ज़िट पोल छाप कर सम्पादक तो फ़िज़ूल में गिरफ़्तार हो गया जबकि गिरफ़्तारी गुप्ता बंधुओं की होनी चाहिये थी.

Arun Maheshwari : यह भारतीय पत्रकारिता का संभवत: सबसे काला दौर है। अख़बारों और मीडिया की मिल्कियत का संकेंद्रण, हर पत्रकार पर छटनी की लटकती तलवार और ट्रौल का तांडव – इसने डर और आतंक के एक ऐसे साये में पत्रकारिता को ले लिया है, जिसके तले इसके स्वस्थ आचरण की सारी संभावनाएँ ख़त्म हो रही हैं। सोशल मीडिया तक को नहीं बख़्शा जा रहा है। हमारे देश का संभवत: अब तक का सबसे जघन्य घोटाला व्यापमं, जिसमें सत्ता के घिनौने चरित्र का हर पहलू अपने चरम रूप में उजागर हुआ है, उस पर न सिर्फ सरकारी जाँच एजेंसियाँ कुंडली मार कर बैठी हुई है, बल्कि अबखबारों में भी इसकी कोई चर्चा नहीं है। बीच-बीच में सुप्रीम कोर्ट की तरह की संस्थाओं के फैसले भी इसको चर्चा में लाने में असमर्थ रह रहे हैं। चारों और एक अजीब सा संतुलन करके चलने का भाव पसरा हुआ है। इसमें जो लोग मोदी जी को अपने को सौंप दे रहे हैं, उनके सिवाय बाक़ी सभी तनाव में रह रहे हैं । ऐसा तो शायद आंतरिक आपातकाल के दौरान भी इतने लंबे काल तक नहीं हुआ था। यह भारतीय पत्रकारिता को पूरी तरह से विकलांग बना देने का दौर चल रहा है।

Urmilesh इस परिवार के एक सेठ को मुलायम सिंह यादव ने राज्य सभा में भेजा था।

Indra Mani Upadhyay ‘महेंद्र मोहन गुप्त’ को सपा ने राज्यसभा में भेजा था।

Om Thanvi इस बार इनकार कर दिया।

Situ Sharma आपने तो पोस्ट में बीजेपी का जिक्र किया है! फिर इनकार से सपा का क्या ताल्लुक..? सर

Om Thanvi ताल्लुक़ बहुत साफ़ है। सपा ने मना किया तो उन्हें फ़र्ज़ी पोल से सबक़ दिया जाएगा, भाजपा ख़ुश होगी, आगे भला करेगी जैसे अतीत में किया था।

Aneesh Rai दोबारा नहीं भेजा, इसीलिए तो नाराज हैं ।

Atul Tiwari अवसरवादी बिजनेसमैन हैं।

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र सुरजन, अरुण माहेश्वरी, उर्मिलेश आदि के ये कमेंट जिस फेसबुक पोस्ट पर आए हैं, उसे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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जागरण का मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने पेड न्यूज करने के धंधे को कुबूल कर लिया

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में जागरण के सम्पादक-मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने कहा है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान से पहले जागरण द्वारा शाया किया गया एग्ज़िट पोल उनके विज्ञापन विभाग का काम था, जो वेबसाइट पर शाया हुआ। (“Carried by the advertising department on our website”) माने साफ़-साफ़ पेड सर्वे!

दूसरे शब्दों में जागरण ने पैसा लिया (अगर लिया; किससे, यह बस समझने की बात है) और कथित मत-संग्रह किसी अज्ञातकुलशील संस्था से करवा कर शाया कर दिया कि चुनाव में भाजपा की हवा चल रही है। जैसा कि स्वाभाविक था, इस फ़र्ज़ी एग्ज़िट पोल को भाजपा समर्थकों-प्रचारकों ने सोशल मीडिया पर हाथों-हाथ लिया और अगले चरण के चुनाव क्षेत्रों में दूर-दूर तक पहुँचा दिया। सोशल मीडिया पर ही इसकी निंदा और चुनाव आयोग की हेठी न हुई होती तो कौन जाने कल के मतदान से पहले यह बनावटी हवा का हल्ला अख़बार में भी छपा मिलता!

उस सम्पादक से सहानुभूति होती है, जिसे बलि का बकरा बनाया गया है। व्यवहार में विज्ञापन विभाग मालिक/प्रबंधन के मातहत काम करता है। वैसे भी ऐसे सर्वे, एग्ज़िट पोल आदि पर बहुत धन व्यय होता है, “कमाई” भी होती है – इस सबसे सम्पादकीय विभाग का क्या वास्ता? यह वास्तव मालिकों-प्रबंधकों का गोरखधंधा है, जो बचे ही नहीं रहेंगे संसद में भी पहुँच जाएँगे (क्योंकि सच्चरित्र लोगों को संसद में भरने का मोदीजी का वादा है!)। वैसे भी जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता ख़ुद हैं। उनके पिता मेरे परिचित थे और पड़ोसी भी। उन्हें भाजपा ने राज्यसभा में भेजा था। पर असल सवाल यह है कि इस पोल की पोल खुल जाने के बाद भाजपा की “हवा” का क्या होगा? रही-सही हवा भी निकल नहीं जाएगी?

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे जाने माने पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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दैनिक जागरण प्रबंधन ने अपने सभी संपादको को भूमिगत होने का निर्देश दिया!

खोज खोज कर जागरण सम्पादकों को पकड़ रही है पुलिस… चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में देश की सर्वोच्च चुनावी अथॉरिटी चुनाव आयोग द्वारा दैनिक जागरण के 15 जिलों के संपादकों सहित प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश का अनुपालन करते हुए यूपी पुलिस संपादकों को गिरफ्तार करने में जुट गई है. शेखर त्रिपाठी को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में उन्हें जमानत मिल गई.

दैनिक जागरण में आज इस बात की भी चर्चा रही कि शेखर त्रिपाठी सिर्फ एक मोहरा मात्र हैं जिन्हें गाजियाबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार कराकर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक संजय गुप्ता अपने बचने का एक रास्ता खोज रहे हैं. सूत्रों का तो यहाँ तक कहना है कि सोमवार की रात जागरण कार्यालय में वकीलों की भारी भरकम एक टीम भी पहुंची थी तथा प्रबंधन द्वारा दैनिक जागरण के सभी संपादकों को भूमिगत होने का निर्देश दिया गया है.

पुलिस अब 15 जिलों के संपादकों / ब्यूरो चीफों को गिरफ्तार करने की तैयारी में है. चुनाव आयोग के आदेश के बाद दैनिक जागरण के संपादकों और प्रबंध निदेशक की अकल ठिकाने आ गयी है. पुलिस ने लखनऊ और दिल्‍ली में दैनिक जागरण के कई संपादकों के ठिकानों पर छापेमारी की. पुलिस ने जागरण न्‍यू मीडिया की सीईओ सुकीर्ति गुप्‍ता, जागरण इंग्लिश ऑनलाइन के डिप्‍टी एडिटर वरुण शर्मा और डिजीटल हैड पूजा सेठी के घरों पर भी छापे मारे.

इससे पहले चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस ने शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के कार्यालय और सर्वे करने वाली संस्‍था आरडीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. इनके खिलाफ उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित करने का आरोप है. बताते हैं कि चुनाव आयोग ने पहले चरण के 15 जिला निर्वाचन अधिकारियों को सर्वे करने वाली संस्‍था ‘रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड और दैनिक जागरण के प्रबंध सम्पादक, संपादक या मुख्य संपादक  के खिलाफ तत्‍काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया था.

शशिकान्त सिंह

पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट

मुंबई

9322411335

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दैनिक जागरण के सम्पादक शेखर त्रिपाठी को मिली जमानत

चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में देश की सर्वोच्च चुनावी अथॉरिटी चुनाव आयोग द्वारा दैनिक जागरण के 15 जिलों के संपादकों सहित प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के बाद दैनिक जागरण के संपादकों और प्रबंध निदेशक की अकल ठिकाने आ गयी है। खबर है कि दैनिक जागरण अखबार के ऑनलाइन सम्पादक शेखर त्रिपाठी को आचार संहिता का उल्‍लंघन करने पर गिरफ्तार किया गया। बाद में गाजियाबाद की जिला अदालत ने शेखर त्रिपाठी को जमानत दे दिया।

गाजियाबाद पुलिस ने सोमवार की रात उन्‍हें गिरफ्तार किया था। साथ ही लखनऊ और दिल्‍ली में भी दैनिक जागरण के कई संपादकों के ठिकानों पर छापेमारी भी की गयी। पुलिस ने जागरण न्‍यू मीडिया की सीईओ सुकीर्ति गुप्‍ता, जागरण इंग्लिश ऑनलाइन के डिप्‍टी एडिटर वरुण शर्मा और डिजीटल हैड पूजा सेठी के घरों पर भी छापे मारे। इससे पहले चुनाव आयोग के आदेश पर पुलिस ने शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के कार्यालय और सर्वे करने वाली संस्‍था आरडीआई के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इनके खिलाफ उत्‍तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव के बाद एग्जिट पोल प्रकाशित करने का आरोप है।

बताते हैं कि चुनाव आयोग ने पहले चरण के 15 जिला निर्वाचन अधिकारियों को सर्वे करने वाली संस्‍था ‘रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ और दैनिक जागरण के प्रबंध सम्पादक, संपादक के खिलाफ तत्‍काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया था। आयोग के प्रवक्ता ने कहा कि रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल के मतदान बाद किये गये सर्वेक्षण के नतीजे का एक हिंदी दैनिक द्वारा प्रकाशन करना ”जन प्रतिनिधित्व कानून” की धारा अनुच्छेद 126ए और बी का स्पष्ट उल्लंघन है और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत चुनाव आयोग के कानून संबंधी निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं करना है।

उधर दैनिक जागरण में आज इस बात की भी चर्चा रही कि शेखर त्रिपाठी सिर्फ एक मोहरा मात्र हैं जिन्हें गाजियाबाद स्थित उनके घर से गिरफ्तार कराकर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक संजय गुप्ता ने अपने बचने का एक रास्ता खोज लिया है। सूत्रों का तो यहाँ तक कहना है कि सोमवार की रात जागरण कार्यालय में वकीलों की भारी भरकम एक टीम भी पहुंची थी। शेखर त्रिपाठी की कभी उत्तर प्रदेश में तूती बोलती थी मगर कुछ बड़े आरोप लगने के बाद उन्हें जागरण ने डिजिटल से जोड़ दिया और इनके पावर को कम कर दिया गया था।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335

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