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मुस्लिम होना गुनाह है क्या?

विकिपीडिया पर जवाहर लाल नेहरू को मुस्लिम लिख देने से कांग्रेसी भड़के हुए नजर आ रहे हैं। हंगामे के चलते नेहरू-गांधी खानदान के अतीत को जानने की लोगों में एक बार फिर उत्सुकता नजर आ रही है, इसलिए इस खानदान के अतीत पर एक नजर डालते हैं। लोकप्रियता एक सीमा लांघ जाये, तो फिर लोकप्रिय व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत कुछ नहीं रहता। जनता सब कुछ जानना चाहती है और अगर, जनता को सटीक जानकारी न दी जाये, तो तमाम तरह की भ्रांतियां जन्म ले लेती हैं। नेहरू-गांधी खानदान के संबंध में भी ऐसा ही कुछ है। इस खानदान के व्यक्तियों से जुड़ी घटनायें सार्वजनिक न होने से कई तरह की अफवाहें हमेशा उड़ती रहती हैं। चूँकि भारतीय राजनीति में यह खानदान आज़ादी के समय से ही महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है और लगातार बना हुआ है, इसलिए अफवाहें भी लगातार बनी रहती हैं। अफवाहों के आधार पर एक वर्ग इस खानदान के व्यक्तियों को त्यागी और महापुरुष सिद्ध करता रहा है, तो दूसरा पक्ष ऐसी अफवाहें फैलाता रहता है, जिससे इस खानदान के व्यक्तियों का सम्मान क्षीण हो जाये।

<p>विकिपीडिया पर जवाहर लाल नेहरू को मुस्लिम लिख देने से कांग्रेसी भड़के हुए नजर आ रहे हैं। हंगामे के चलते नेहरू-गांधी खानदान के अतीत को जानने की लोगों में एक बार फिर उत्सुकता नजर आ रही है, इसलिए इस खानदान के अतीत पर एक नजर डालते हैं। लोकप्रियता एक सीमा लांघ जाये, तो फिर लोकप्रिय व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत कुछ नहीं रहता। जनता सब कुछ जानना चाहती है और अगर, जनता को सटीक जानकारी न दी जाये, तो तमाम तरह की भ्रांतियां जन्म ले लेती हैं। नेहरू-गांधी खानदान के संबंध में भी ऐसा ही कुछ है। इस खानदान के व्यक्तियों से जुड़ी घटनायें सार्वजनिक न होने से कई तरह की अफवाहें हमेशा उड़ती रहती हैं। चूँकि भारतीय राजनीति में यह खानदान आज़ादी के समय से ही महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है और लगातार बना हुआ है, इसलिए अफवाहें भी लगातार बनी रहती हैं। अफवाहों के आधार पर एक वर्ग इस खानदान के व्यक्तियों को त्यागी और महापुरुष सिद्ध करता रहा है, तो दूसरा पक्ष ऐसी अफवाहें फैलाता रहता है, जिससे इस खानदान के व्यक्तियों का सम्मान क्षीण हो जाये।</p>

विकिपीडिया पर जवाहर लाल नेहरू को मुस्लिम लिख देने से कांग्रेसी भड़के हुए नजर आ रहे हैं। हंगामे के चलते नेहरू-गांधी खानदान के अतीत को जानने की लोगों में एक बार फिर उत्सुकता नजर आ रही है, इसलिए इस खानदान के अतीत पर एक नजर डालते हैं। लोकप्रियता एक सीमा लांघ जाये, तो फिर लोकप्रिय व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत कुछ नहीं रहता। जनता सब कुछ जानना चाहती है और अगर, जनता को सटीक जानकारी न दी जाये, तो तमाम तरह की भ्रांतियां जन्म ले लेती हैं। नेहरू-गांधी खानदान के संबंध में भी ऐसा ही कुछ है। इस खानदान के व्यक्तियों से जुड़ी घटनायें सार्वजनिक न होने से कई तरह की अफवाहें हमेशा उड़ती रहती हैं। चूँकि भारतीय राजनीति में यह खानदान आज़ादी के समय से ही महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है और लगातार बना हुआ है, इसलिए अफवाहें भी लगातार बनी रहती हैं। अफवाहों के आधार पर एक वर्ग इस खानदान के व्यक्तियों को त्यागी और महापुरुष सिद्ध करता रहा है, तो दूसरा पक्ष ऐसी अफवाहें फैलाता रहता है, जिससे इस खानदान के व्यक्तियों का सम्मान क्षीण हो जाये।

नेहरू-गांधी खानदान का इतिहास उनके नजदीकियों द्वारा लिखी गई पुस्तकों और उनके समय के लेखों से ही अधिक मिलता है। सरकार का प्रयास इतिहास को दबाना ही रहा है, इसलिए इस खानदान के संबंध में जानकारी एकत्रित करने के लिए उनके समय के और उनसे जुड़े साहित्य को ही पढ़ना पढ़ता है। जातिगत दृष्टि से यही सिद्ध होता है कि यह वंश मुस्लिम है और बाद में स्वयं को कश्मीरी पंडित कहने लगा, साथ ही नहर के किनारे रहने के कारण नेहरू सरनेम संयोग से पड़ गया। मोती लाल नेहरू से पहले के इतिहास को लेकर बड़ा घालमेल है और उसको लेकर विवाद की स्थिति है। हालाँकि पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की पिछले दिनों एक पुस्तक आई है। “Profile and Letters” में मुगलों के प्रति इंदिरा गांधी के आदर का रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा है कि जब 1968 में प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी अफगानिस्तान की आधिकारिक यात्रा पर गईं, तो नटवर सिंह उनके साथ एक आई.एफ़. एस. अधिकारी के तौर पर गए हुए थे।

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इंदिरा गाँधी सैर के लिए जाना चाहती थी। इंदिरा गाँधी ने बाबर की दरगाह को देखने की इच्छा जाहिर की, जो उनके कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थी, इसीलिए अफगानी सुरक्षा अधिकारियों ने भी इंदिरा को ऐसा न करने की सलाह दी, लेकिन इंदिरा अपनी बात पर अड़ी रहीं और अंत में इंदिरा उस जगह पर गईं। यह एक सुनसान जगह थी, वह वहां कुछ देर तक अपना सिर श्रद्धा में झुकाए खड़ी रहीं। नटवर सिंह पीछे ही खड़े थे और इंदिरा गाँधी ने मुड़ कर नटवर सिंह से कहा कि आज वो अपने इतिहास से मिल के आई हैं। पुस्तक के इस अंश से यही सिद्ध होता है कि नेहरू-गांधी वंश मूल रूप से मुस्लिम ही है। 

इस सब पर विवाद है, लेकिन जवाहर लाल नेहरू के बाद की घटनायें सटीक और प्रमाणित कही जा सकती हैं। इस खानदान के व्यक्तियों द्वारा किये गये राजनैतिक कार्यों की जानकारी अधिकांश लोगों को है ही, इसलिए कुछ व्यक्तिगत घटनाओं का उल्लेख करते हैं। जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद के जिस मोहल्ले में हुआ, वो मोहल्ला वेश्याओं का था और आज भी है, जिससे तंग आकर मोती लाल नेहरू ने मोहल्ला छोड़ दिया। बाद में मोती लाल नेहरू ने ‘इशरत मंजिल’ नाम का भवन खरीदा, जिसे आज आनंद भवन के नाम से जाना जाता है। शिक्षा के बाद जवाहर लाल नेहरू आज़ादी के आंदोलन से जुड़े, लेकिन आज़ादी के आंदोलन में जवाहर लाल नेहरू का बहुत बड़ा और प्रभावी योगदान नहीं था, लेकिन महात्मा गाँधी और अंग्रेजों से नजदीकी संबंध होने के कारण जवाहर लाल नेहरू भारतीय राजनीति के सिरमौर बन गये।

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जवाहर लाल नेहरू कई महिलाओं के प्रति आकर्षित रहे हैं, जिनमें माउंटबेटन एडविना के साथ उनके संबंध चर्चा में रहते हैं। हालांकि एडविना के वंशजों ने प्रेम संबंध को आध्यात्मिक मानते हुए शारीरिक संबंधों को नकार दिया है, लेकिन यह सच नहीं है। तथ्य यही कहते हैं कि उनके बीच शारीरिक संबंध भी थे। जवाहर लाल नेहरू का स्त्रियों के प्रति आकर्षण ही उनकी पत्नी कमला नेहरू से दूरी का कारण बना और अंततः साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे के लिए अंजान से हो गये। बाद में इंदिरा गाँधी भी आपत्ति दर्ज कराने लगीं। वे स्वयं इस मुददे पर बात नहीं कर सकती थीं, इसलिए वे अक्सर अपने पिता जवाहर लाल नेहरु को समझाने के लिए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का सहारा लेती थीं। एक जगह ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि जवाहर लाल नेहरू के तेजी नाम की लड़की से संबंध थे। तेजी नाम की लड़की इंदिरा की पक्की सहेली थी, जो आनंद भवन में इंदिरा के साथ खेलने आती थी, इसके प्रति जवाहर लाल नेहरू आकर्षित हो गये। कई वर्ष चले संबंधों के बाद जवाहर लाल नेहरू ने अपने एक शिष्य हरिवंश राय बच्चन से तेजी का विवाह करा दिया और विवाह के बाद हरिवंश राय बच्चन को शोध के लिए विदेश भेज दिया, जो दस साल के बाद लौटे, इस बीच तेजी जवाहर लाल नेहरू के साथ ही प्रधानमंत्री आवास में रहती थीं।

जवाहर लाल नेहरू के सरोजिनी नायडू की पुत्री पद्मजा नायडू से भी संबंध थे और वे उनकी फोटो अपने कमरे में लगा कर रखते थे, जिसे इंदिरा गाँधी अक्सर हटा दिया करती थीं। जवाहर लाल नेहरु का संबंध शारदा नाम की बनारस की एक सन्यासिन से भी था, जिसके संबंध में प्रमाण मिलता है कि वह अत्यधिक आकर्षक होने के साथ प्राचीन भारतीय शास्त्रों और पुराणों की ज्ञाता थी, साथ ही उसने गर्भवती होने पर विवाह का दबाव बनाया, तो जवाहर लाल नेहरू ने उससे किनारा कर लिया। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि उस सन्यासिन के एक बेटा पैदा हुआ था, जिसे एक ईसाई मिशनरी के बोर्डिंग स्कूल में छुड़वा दिया गया। 

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इस बच्चे का जन्म 30 मई 1949 को बताया गया है, लेकिन स्कूल में जाने के बाद इस बच्चे के प्रमाण नहीं मिलते। जवाहर लाल नेहरू के कई महिलाओं से संबंध होने के कारण सिफलिस नाम की बीमारी हो गई, जिससे उनका निधन हो गया।

जवाहरलाल नेहरू की एक बहन विजय लक्ष्मी के संबंध में प्रमाण मिलते हैं कि अपने पिता के कर्मचारी सयुद हुसैन से उनके संबंध थे और वे उसके साथ भाग गईं, तो मोती लाल नेहरू किसी तरह उन्हें वापस लाये और फिर एक रंजीत पंडित नाम के व्यक्ति से शादी करा दी। जवाहर लाल नेहरू की बेटी का नाम इंदिरा नेहरू था, लेकिन शांति निकेतन विश्व विद्यालय में पढ़ने गईं, तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इंदिरा प्रियदर्शिनी नाम रख दिया। इंदिरा प्रियदर्शिनी को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भी भेजा गया, जहां वे सफल नहीं हो पाईं। कहीं-कहीं ऐसा भी प्रमाण मिलता है कि शांति निकेतन के अनुरूप व्यवहार न होने के कारण उन्हें वहां से भी निकाला गया था, जिसके बाद उन्हें ऑक्सफोर्ड भेजा गया। माँ कमला नेहरू तपेदिक से ग्रस्त थीं। पिता जवाहर लाल नेहरू राजनीति से बचा समय महिलाओं के बीच गुजारते और बुआओं से भी अच्छे संबंध न होने के कारण इंदिरा प्रियदर्शिनी का पारिवारिक वातावरण उनके अनुकूल बिल्कुल भी नहीं था। इस बीच कमला नेहरू की हालत और गंभीर हुई, तो फ़िरोज़ खान नाम का युवक उनके संपर्क में आ गया, जिसने कमला नेहरू की सेवा करते हुए इंदिरा प्रियदर्शिनी को भी संभाला। मोती लाल नेहरु की हवेली में काम करने वाले एक पारसी नवाब खान के बेटे फिरोज खान की सेवा और सहानुभूति इंदिरा प्रियदर्शिनी को भा गई और उन्होंने समर्पण कर दिया। दोनों ने लंदन स्थित एक मस्जिद में निकाह कर लिया और धर्म बदलने पर इंदिरा प्रियदर्शिनी को नाम दिया गया मैमुना बेगम।

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इस निकाह के विरुद्ध जवाहर लाल नेहरू भी थे, लेकिन कमला नेहरू ने सब से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि कमला नेहरू के मुबारक अली से संबंध थे और उनसे ही इंदिरा का जन्म हुआ, साथ ही कमला नेहरू के संबंध फ़िरोज़ खान से भी रहे, इसीलिए वे फ़िरोज़ खान और इंदिरा के निकाह करने से बिफर गई थीं, लेकिन इंदिरा के सामने किसी की नहीं चली और अंत में महात्मा गांधी ने बीच में आकर सब कुछ संभाला। उन्होंने फिरोज खान का नाम परिवर्तित करा कर दोनों का वैदिक रीती से विवाह कराया, जिससे फिरोज खान हो गये फिरोज गाँधी और इंदिरा प्रियदर्शिनी से मैमुना बेगम बनी इंदिरा गाँधी हो गईं, लेकिन उस समय के कानून के अनुसार यह विवाह अवैध था। बाद में इंदिरा गाँधी के संबंध फिरोज खान से बिगड़ गये। शारीरिक संबंध पूरी तरह बिच्छेद हो जाने के बाद फिरोज गांधी दूसरी शादी के बारे में सोच रहे थे, इस बीच उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन मृत्यु से पूर्व वे खुल कर विरोध करने लगे थे। 1956 में फिरोज गांधी ने सरकार के बेहद करीबी माने जाने वाले देश के सबसे अमीर लोगों में एक रामकिशन डालमिया का घोटाला उजागर किया था, जिसमें डालमिया को दो साल की सज़ा मिली, इसी तरह 1958 में उन्होंने चर्चित हरिदास मूंदड़ा घोटाले का खुलासा किया, जिसमें समूची सरकार की फजीहत हुई। मूंदड़ा जेल गये थे, वहीं उस समय के वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी को त्याग पत्र देना पड़ा था। फिरोज गांधी की 8 सितंबर 1960 को मृत्यु हुई, तो इंदिरा अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के साथ एक विदेशी दौरे पर गयीं थीं।

सक्रीय राजनीति में आने के बाद इंदिरा का नाम कई अन्य पुरुषों के साथ जुड़ता रहा, जिसके उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में मिलते हैं। केथरीन फ्रेंक की एक किताब “The Life of Indira Nehru Gandhi” में इंदिरा गाँधी के अन्य संबंधों के बारे में बहुत कुछ मिलता है। इंदिरा गाँधी का सबसे पहला संबंध अपने जर्मन अध्यापक से था। पिता जवाहर लाल नेहरू के सेक्रेट्री एम्. ओ. मैथई के साथ भी उनका प्रेम संबंध रहा। योग के अध्यापक धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से भी उनके संबंध रहे, बाद में विदेश मंत्री दिनेश सिंह के साथ उनके संबंध चर्चा का विषय बने।

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इंदिरा गाँधी के दो बेटे हुए, जिनमें एक का नाम राजीव गांधी और दूसरे का नाम संजय गाँधी था। एक जगह प्रमाण मिलता है कि संजय गाँधी का नाम पहले संजीव गाँधी था, लेकिन ब्रिटेन में एक घटना के बाद उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, तो तत्कालीन राजदूत कृष्णा मेनन ने संजय गाँधी नाम का एक और पासपोर्ट जारी करा दिया, जिसके बाद उनका नाम संजय गाँधी ही हो गया। “The Nehru Dynasty” में जे. एन. राव ने लिखा है कि इंदिरा गाँधी का दूसरा बेटा संजय गाँधी फिरोज गांधी की सन्तान नहीं थे, साथ ही लिखा है कि संजय का जन्म मोहम्मद युनुस के साथ अवैध संबंधों से हुआ था। युनुस की लिखी किताब “Persons, Passions & Politics” से पता चलता है कि बचपन में संजय गाँधी का मुस्लिम रीती-रिवाज के अनुसार खतना भी किया गया था। 

संजय गाँधी भी अपने नाना की तरह महिलाओं की ओर आकर्षित होने वाले व्यक्ति थे। उस वक्त मेनका का ग्लैमर की दुनिया का चमकता हुआ नाम था। 17 साल की मेनका बॉम्बे डाईंग के तौलिये के एक विज्ञापन से चर्चा में आई थीं। मेनका गर्भवती हो गईं थीं, तो मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने दबाव बना कर संजय को शादी करने के लिए मजबूर कर दिया था। संजय और मेनका की शादी मोहम्मद युनुस के ही घर पर हुई थी। इंदिरा गांधी को मेनका नाम पसंद नहीं था, इसलिए बदल कर मानेका नाम रखा गया था। तमाम राजनैतिक घटना क्रमों के बाद 23 जून 1980 को दिल्ली में एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई, जिसके बाद मेनका अपनी सास इंदिरा गांधी से अलग हो गईं और बेटे वरुण के साथ रहने लगीं। फिलहाल मेनका गांधी भाजपा सरकार में मंत्री हैं और उनके बेटे वरुण गांधी भी सांसद हैं।

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1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई, तो राजनीति से पूरी तरह अनिभिज्ञ राजीव गांधी ने कमान संभाल ली और राज करने लगे, लेकिन 21 मई 1991 को श्रीपेरुंबदूर की एक सभा में काल ने राजीव गांधी का कतरा-कतरा मिटटी में मिला दिया, लेकिन इससे पहले उन्होंने भी इश्क किया। के.एन. राव अपनी पुस्तक “The Nehru Dynasty” में लिखते हैं कि राजीव गांधी शादी करने के लिए एक कैथोलिक बन गये थे और नाम रखा गया रॉबर्टो। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी पुस्तक “Assassination Of Rajiv Gandhi-Unasked Questions and Unanswered Queries” में लिखा है कि सोनिया गाँधी का असली नाम अन्तोनिया मायनो था, इनके पिता फासिस्ट थे और उन्होंने रूस में पांच साल के कारावास की सज़ा काटी थी। सोनिया कैम्ब्रिज के एक होटल में वेट्रेस का काम करती थीं। इंग्लैंड में सोनिया गाँधी की माधव राव सिंधिया के साथ गहरी दोस्ती थी, जो शादी के बाद तक जारी रही। 1982 में आई.आई.टी. दिल्ली मेन गेट के पास कार दुर्घटना ग्रस्त होने के कारण रात को 2 बजे के करीब दोनों एक ही कार में साथ-साथ पकड़े गए थे। 1992 में सोनिया गांधी ने अपनी इटालियन नागरिकता को बनाये रखने के लिए उसे रिन्यू करा लिया है। इटली के कानून के अनुसार इटालियन माँ सोनियां गांधी के चलते राहुल और प्रियंका भी एक इटालियन नागरिक हैं।

नेहरू-गांधी परिवार की प्रेम कहानी अभी जारी है। राजीव गाँधी व सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका ने रॉबर्ट वाड्रा से विवाह किया है। इन दोनों के बीच प्रेम संबंध ही थे, जो 13-14 वर्ष तक चले। बताते हैं कि रॉबर्ट और प्रियंका की मुलाकात दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी, जहां से दोनों एक-दूसरे के करीब आते चले गये। राहुल गांधी के संबंध में भी तमाम तरह की चर्चायें चलती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि अभी तक राहुल ने स्वयं इस संबंध में कुछ नहीं कहा है और न ही उनके प्रेम संबंध को लेकर कोई प्रमाण है।

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खैर, हर किसी को अपना जीवन जीने की आजादी संविधान ने दे रखी है। सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से किसी के व्यक्तिगत जीवन को नहीं देखना चाहिये, पर ताजा प्रकरण पर कांग्रेसियों का आक्रोशित होना भी जायज नहीं ठहरा सकते, क्योंकि किसी धर्म में नेहरू कोई जाति नहीं होती। नेहरू सरनेम लगे होने से इस वंश के लोगों के सम्मान में कोई कमी नहीं आई। बाद में गाँधी सरनेम जुड़ गया, तो भी सम्मान में कोई कमी नहीं आई, ऐसे में अगर, यह सिद्ध भी हो जाता है कि नेहरू वंश के पूर्वज मुस्लिम थे, तो भी क्या अंतर पड़ेगा। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धर्म और जाति के कोई मायने ही नहीं बचते हैं। 

कांग्रेसियों को शांत रहना चाहिए, वरना उन्हें यह भी बताना चाहिए कि मुस्लिम होना गुनाह है क्या, और हिंदू बने रहना श्रेष्ठ क्यूं है? धर्म, या जाति बदलने से व्यक्ति और उसके कार्य नहीं बदल जाते। 

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लेखक बी.पी. गौतम से संपर्क : bpgautam99@gmail.com

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