दलित-मुस्लिम मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न की एक सच्ची कहानी…सुनेंगे तो रोंगेट खड़े हो जाएंगे…

…अंततः फर्जी केस से बरी हुये पत्रकार योगेंद्र सिंह और अब्दुल हमीद बागवान !

सत्य प्रताड़ित हुआ पर पराजित नहीं! 10 मार्च 2007 वह मनहूस दिन था , जब मेरे दो पत्रकार साथियों अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार को भीलवाड़ा पुलिस द्वारा कईं गंभीर धाराओं में दर्ज कराए गए एक मुकदमे में गिरफ्तार कर लिया। मुझे सुबह सुबह तत्कालीन जिला कलेक्टर से यह जानकारी मिली, यह हैरत करने वाली जानकारी थी, क्योंकि उस शाम तक मैं अपने दोनों साथियों के साथ ही था, मेरे निकलने के 1 घण्टे बाद ही यह घटनाक्रम घटित हो गया।
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आखिर औरतों के मामले में ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नींद क्यों टूटती है?

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे….

पाकिस्तान की एक लेखिका हैं तहमीना दुर्रानी…. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर गुलाम मुस्तफा खर से शादी और तलाक के बाद 1991 में उन्होंने एक उपन्यास लिखा था माय फ्यूडल लॉर्ड… यानी मेरे आका… यह उनकी आत्मकथा थी… इससे पाकिस्तान की सियासत में भूचाल आ गया था… इसके बाद उन्होंने ब्लास्फेमी लिखा… Continue reading

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मुसलमानों के मामले में मीडिया ने अपने सिद्धांत और अक्ल, दोनों बेच खाए हैं!

उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनाव नतीजों के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ। दस्तूर के मुताबिक सोशल मीडिया से यह वीडियो मेन-स्ट्रीम मीडिया के पास पहुंचा और पिछले कुछ वक्त से जो  हमेशा होता चला आ रहा है, वही हुआ। एक फर्जी वीडियो के सहारे एक विशेष तबके को देश विरोधी बताने की कोशिश हुई। हां, मैं वीडियो को फर्जी कह रहा हूं क्योंकि वह फर्जी ही है। वीडियो के ऑडियो और विजुअल लेवल में जो फर्क है उसे देख कोई बच्चा भी बता देगा कि वीडियो असली नहीं हो सकता। न्यूज पोर्टल Alt News ने तो इसकी पड़ताल भी की और वीडियो के फर्जी होने की तरफ इशारा भी किया। बाकी, फॉरेंसिक जांच में तो सच सामने आ ही जाएगा।

बहरहाल, मैं बात कर रहा था मेन-स्ट्रीम मीडिया की। यह पहली बार नहीं है जब मेन-स्ट्रीम मीडिया के कुछ संस्थानों, चाहे वह टीवी हो या डिजिटल, ने ऐसी गलती की है। एक गलती एक बार होती है, लेकिन एक ही गलती बार-बार क्यों हो रही है? कन्हैया कुमार का फर्जी वीडियो वाला मामला तो देशभर में मशहूर है। इसकी वजह से तो मीडिया की काफी लानत-मलानत हुई थी। आखिर मामला क्या है? मीडिया ने अक्ल बेच खाई है या सिद्धांत? किसके लिए काम कर रहे हैं ये?  इस वीडियो के मामले में दो लोग गिरफ्तार भी हो गए। अगर फॉरेंसिक जांच में वीडियो फर्जी निकला तब क्या होगा?

मेन-स्ट्रीम मीडिया का काम क्या है? यह उसके मालिक और मठाधीश अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से तय करते रहें। लेकिन सबसे खतरनाक बात है कि इस काम की आड़ में मीडिया के एक बुनियादी सिद्धांत की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बुनियादी सिद्धांत यानी सच!

ज़ी टीवी 2000 रुपये के नोट में  नैनो जीपीएस चिप लगे होने का दावा कर देता है! इंडिया न्यूज कन्हैया कुमार के फर्जी वीडियो चला देता है। इनके सूत्र क्या हैं? क्या ये सब असली गलतियां लगती हैं? क्या इसके पीछे कोई गलत मंशा नहीं? क्या ये सच में इतने मासूम हैं? हाल इतना बुरा है कि गलत खबर चलाने के बाद माफीनामा भी नहीं दिया जाता। मेन-स्ट्रीम मीडिया के ज्यादातर संस्थान किसके हित में काम कर रहे हैं? यह आप सब बखूबी जानते हैं।

इसी बीच फर्जीवाड़े की आड़ में एक और खतरनाक काम, वक्त-बेवक्त, जाने-अनजाने, मुसलमानों पर निशाना साधने का होता है। अररिया लोकसभा सीट से राजद उम्मीदवार सरफराज आलम की जीत पर “माननीय” गिरिराज सिंह कहते हैं कि अररिया अब आतंकवाद का गढ़ बन जाएगा। सिंह से पहले उपचुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के “प्रदेश अध्यक्ष”, ध्यान से पढ़िएगा- “प्रदेश अध्यक्ष” नित्यानंद राय ने सरफराज आलम के जीतने पर अररिया को ISI के लिए सुरक्षित स्थान बन जाने की बात कही थी। ऐसे बयान देकर यह कहना क्या चाहते हैं?

विवादित बयानों के माहौल के बीच एक वीडियो वायरल हो जाता है। टीवी के सामने बैठे दर्शक को परोसा जाता है कि अररिया के इस वीडियो में “पाकिस्तान जिंदाबाद” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे लगाए गए। वीडियो में नारे न तो ठीक से सुनाई ही देते हैं, न ही दिखाई देते हैं। इसके बावजूद आजतक और टाइम्स नाउ जैसे प्रमुख टीवी न्यूज चैनल इसका प्रसारण करते हैं। प्रसारण करने से पहले वे एक बार भी इसके सोर्स की पुष्टि करना जरूरी नहीं समझते। उन्हें वीडियो के ऑडियो-विजुअल लेवल्स में फर्क देखकर भी शक नहीं होता! ऐसे ही कासगंज का मामला पुराना नहीं है। यहां 26 जनवरी के मौके पर मुस्लिम बहुल इलाके में लोग तिरंगा फहरा रहे थे। बेवजह एक गुट तिरंगे के साथ भगवा झंडा लेकर पहुंच जाता है। फसाद होता है और एक नौजवान चंदन गुप्ता की मौत हो जाती है।

इस मामले की आजतक पर रोहित सरदाना इस तरह कवरेज करते हैं मानो मुस्लिम बहुल इलाके में तिरंगा नहीं, पाकिस्तान का झंडा फहराया जा रहा था। ऐसा करके वह एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय के लोगों के दिलों में कितनी नफरत भर रहे हैं, क्या इस बात का अंदाजा उन्हें नहीं है? ऐसे ही कई और मामले हैं जिनकी सूची बनने लगे तो शायद ही कभी खत्म हो पाए। मीडिया को यह हक नहीं कि वह एक कौम को जलील करता रहे। एक धर्म विशेष के लोगों पर बार-बार निशाना साधना गलत है। प्राथमिकताओं के लिए मीडिया को “एथिक्स” बेचने हैं तो बेचे, लेकिन मुसलमानों को देश का दुश्मन दिखाना बंद होना चाहिए।

नदीम अनवर
पत्रकार
nadeem.anwar7861@gmail.com

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इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़…

वाइज़, निकाह करने दे ‘बैंकवालों’ से चाह कर… या वो रक़म बता जिसमें ‘सूद’ शामिल न हो..

डॉ राकेश पाठक
चार दिन पहले दारुल-उलूम, देवबंद से फ़त्वा जारी हुआ है कि मुसलमान बैंक में बैंक में नौकरी करने वालों के यहां कोई नाते रिश्तेदारी, ब्याह,शादी करने से परहेज़ करें। फ़त्वे में कहां गया है कि बैंक ब्याज़ या सूद का कारोबार करते हैं इसलिए उसकी कमाई हराम है। इससे चलने वाले घर का व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता। इस फ़त्वा को मुसलमानों ने किस तरह लिया इस पर बात करने से पहले यह जान लेना मुनासिब होगा कि आखिर फ़त्वा है क्या बला..? इसकी शरिया में क्या हैसियत है और मुसलमान इसे कितनी तवज्जो देते हैं?
दरअसल फ़तवा उसे कहते हैं जो क़ुरान या हदीस के मुताबिक़ निर्देश या आदेश ज़ारी किया जाए।

फ़तवा कोई मुफ़्ती ही ज़ारी कर सकता है जिसे इस्लाम,शरिया कानून और हदीस की गहन जानकारी हो। कोई इमाम या मौलवी फ़त्वा जारी नहीं कर सकता। वैसे फ़त्वा हुकुम नहीं होता, राय या मशविरा होता है। दारुल उलूम के फ़त्वा विभाग “दारुल इफ्ता” ने एक शख्स के सवाल पर यह फ़तवा ज़ारी किया है कि बैंक में नौकरी करने वाले के यहां कोई शादी ब्याह न करें। बैंक ब्याज़ का कारोबार करते हैं और शरिया कानून में ब्याज़ के लिए रक़म लेना देना हराम है।

फ़त्वे में कहा गया कि हराम दौलत (बैंक की तनख्वाह) से चलने वाले घर का व्यक्ति सहज प्रवृत्ति और नैतिक रूप से अच्छा नहीं हो सकता। मुसलमानों को चाहिए कि वे किसी ‘पवित्र’ घर से ही रिश्ता जोड़ें। इस फ़तवे पर सवाल उठ रहे हैं। पहला तो यह कि आज कौन सा ऐसा कारोबार होगा जिसका बैंक में खाता नहीं होगा। खाता होगा तो ब्याज़ भी लगता ही होगा। तो कोई भी नौकरी ऐसे नहीं हो सकती जिसमें मिलने वाली तनख्वाह में इस तरह ब्याज़ की रक़म शामिल न हो। अगर कोई मुसलमान छोटा मोटा कारोबार। भी करता है तो उसका बैंक में खाता भी होगा ही, तब वो ब्याज़ से कैसे बच सकता है?

इसके अलावा गौरतलब यह भी है कि सरकारी नौकरी करने वालों को जो तनख्वाह मिलती है वह भी तो किसी न किसी रूप में ब्याज़ या सूद से जुड़ी होती है। सरकारें को पूरा कारोबार जिस रक़म से चलता है वह बिना बैंकिंग सिस्टम के सम्भव ही नहीं है। तब तो सरकारी नौकरी वाले हर आदमी के घर “हराम”की ही रक़म पहुंचती है। कुछ इस्लामिक देश ही हैं जहां बैंक ब्याज़ रहित बैंकिंग करते हैं बाक़ी कोई नहीं। इसके अलावा ऐसी कोई रक़म कैसे होगी जिसमें कहीं, किसी तरह का ब्याज़ शामिल न हो!

Saundarya naseem लिखतीं हैं कि “इस बचकानेपन से कब बाहर निकलेंगे वाइज़.. जितनी दिमागी कसरत फ़त्वा ज़ारी करने पर करते हैं उसकी आधी भी खातूने-खान और खातून-महफ़िल की तालीम पर करें तो दुनिया शायद जन्नत बन जाये।”

एक और फ़त्वा ज़ारी हुआ है जिसमें कहा गया है कि औरतें डिजायनर और तंग बुर्के पहनकर घर से बाहर न निकलें। इस पर सौंदर्या नसीम लिखतीं हैं कि ” मेरे ख़याल से हर पैरहन डिजायन का पाबंद है। जैसे ही कपड़े को सुई धागे या सिलाई मशीन के हवाले करते हैं, डिजायन का काम शुरू हो जाता है।” वे सवाल करतीं हैं कि..” फिर उस अल्लाह पर कौन सा फ़त्वा ज़ारी करेंगे जिसने कि दुनिया की सारी औरतों को ही बेलिबास और बिना बुर्क़ा के धरती पर भेज दिया।”

उधर शिक्षा विभाग से रिटायर अधिकारी आई यू खान कहते हैं कि- “ब्याज़ या सूद की रकम हराम मानी गयी है।बैंक में काम करने वाले के घर यह हराम की रकम तनख्वाह के रूप में आती है। मुसलमानों को चाहिए कि वे इस फ़तवे पर गौर ज़रूर करें। उन्होंने कहा कि वैसे देवबंद का फ़त्वा एक मशवरा ही है, कोई पाबंदी नहीं।”

लेखक डॉ राकेश पाठक “कर्मवीर” के प्रधान संपादक हैं. संपर्क : rakeshpathak0077@gmail.com

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ये मुस्लिम लड़की भी है ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ (देखें वीडियो)

हापुड़ की इस ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ से मिलिए… सपने थे फैशन डिजायनर बनने के, बन गई जज… आमिर खान की फिल्म ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में एक लड़की अपने मां के सपने पूरे करने और अपनी मंजिल पाने के लिए जीतोड़ प्रयास करती है और सफल हो जाती है. इसी किस्म की कहानी हापुड़ की इस ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ की है. यूपी के हापुड़ जिले की मुस्लिम लड़की जेबा रउफ जज बन गई है, मात्र 27 साल की उम्र में.

जेबा का ये पहला प्रयास था और उसने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा सिविल जज जूनियर डिविजन (पीसीएस-जे) में 35वी रैंक हासिल करने में कामयाबी पाई. जेबा रउफ फैशन डिजाइनर बनना चाहती थी लेकिन उसने अपने माता-पिता का सपना पूरा करने के लिए जज बनने का फैसला लिया. जेबा रउफ हापुड़ के सिटी कोतवाली क्षेत्र के आवास विकास के रहने वाले अब्दुल रउफ की बेटी है. 27 वर्षीय जेबा का सपना था फैशन डिजाइनर बनने का. पर माता पिता की इच्छा देख वह जज बनी.

जेबा ने डीयू से एलएलबी की है. फिर प्राइवेट कोचिंग ली. जेबा ने पीसीएस-जे 2016 की परीक्षा दी जिसमें सफल हुई. जेबा ने लड़कियों और महिलाओं को सन्देश दिया है कि वो पढ़ाई करें और अपने जीवन में कामयाबी प्राप्त करें।

देखें संबंधित वीडियो :

-हापुड़ से राहुल गौतम की रिपोर्ट.

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एक साल बाद भी ‘नजीब’ का पता नहीं, चुल्लू भर पानी में डूब मरें मुसलमान नेता!

–जियाउर्रहमान–

देश के इतिहास में सोमवार को ऐसा पहली बार हुआ है जब एक बेबस, लाचार मां अपने लाडले की बरामदगी के लिए सीबीआई मुख्य्यालय पर इन्साफ मांगने के लिए बैठी हो और पुलिस उसे इन्साफ देने की बजाय जबरन उठाकर गाडी में दाल देती है। एक पीडिता को इस तरह खींचा जाता है जैसे इस देश में इन्साफ माँगना भी गुनाह हो? खैर, देश में लोकतंत्र को खत्म करने की हर रोज साजिशें हो रही हैं, न्याय मांगने वालो को दबाया जा रहा है और विपक्ष खामोश है? विशेष बात यह है कि जहाँ भी पीड़ित मुस्लिम है वहां कथित सेक्युलर नेता भी बोलने से बाख रहे हैं।

मीडिया भी धार्मिक आधार पर ख़बरों का चयन कर रहा है और जांच एजेंसियां भी धार्मिक आधार पर जांच आगे बड़ा रही हैं। यह बात इसलिए कहनी पड़ रही है क्योंकि एक साल पहले देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू से एक छात्र नजीब गायब होता है और बाद में पता चलता है कि उसका अभाविप के नेताओं से विवाद हुआ था बस यही से पूरा मामला बदल जाता है। ऐसा लगता है कि गायब हुए नजीब का ‘नजीब’ होना अथार्त मुस्लिम होना गुनाह था? मीडिया के चैनल इस मामले पर मौन साधे हुए हैं और खुद को आधुनिक कहने वाली दिल्ली पुलिस भी आजतक कोई सुराग नहीं लगा सकी है। कोर्ट से मामला सीबीआई को दिया गया लेकिन पांच माह में भी सीबीआई कोई ठोस निर्णय नहीं ले सकी है। आखिर क्यों?

कुछ लोगों को मेरे यह सब कहने से आपत्ति हो सकती है लेकिन यह सच है कि नजीब का मुस्लिम होना आज के भारत में गुनाह है? देश में नजीब को लेकर अल्पसंख्यको और जेएनयू के छात्रों ने तमाम प्रदर्शन किये लेकिन किसी पर कोई असर नहीं हुआ। दिल्ली में बैठी मोदी सरकार और उसके नेता इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है। एक अजीब सी ख़ामोशी फिजाओं में हैं?

सभी को इस बात की चिंता तो है कि नजीब कहा है? लेकिन खुलकर विरोध करने , आवाज़ उठाने की जहमत कोई नहीं उठा पा रहा है। आज दिल्ली पुलिस ने एक वर्ष से अपने बेटे की तलाश में दर दर भटक रही मां को सीबीआई के मुख्यालय से जबरन उठाया और खींचकर गाड़ी में डाला तो ह्रदय काँप उठा? सवाल यही मन में आया कि यदि उन पुलिस वालो का बेटा या भाई एक वर्ष से लापता होता और उनकी मां ऐसे धरने पर इन्साफ के लिए होती और फिर पुलिस ऐसे खींचकर उठती तो क्या वह सह पाते?

खैर, पुलिस और सरकार तो हिंदुत्व के एजेंडे को बढ़ाने में लगी है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि चुनावी मौसम में नजर आने वाले कथित मुसलमानों के नेता कहा है? आज जब एक माँ अपने बेटे को ढूँढने की गुहार लगा रही है, इन्साफ मांग रही है तो वह नेता आगे आकर उसकी आवाज़ से आवाज़ क्यों नहीं मिलाते? क्या मुसलमानों के नेताओं को सिर्फ कौमपरस्ती चुनावो में ही नजर आती है? या फिर उनका जमीर मर चुका है। उनमे सच को सच कहने की हिम्मत नहीं बची है?

बहुत सारे सवाल मुस्लिम नेताओं से मन में है। कथित मुसलमानों के ठेकेदारों की चुप्पी का ही परिणाम है कि बेबस मां यूपी से आकर देश की राजधानी में भटक रही है। गैरत अगर मुस्लिम नेताओं में बची हो तो राजनैतिक दलों की गुलामी और चापलूसी से भी ऊपर उठकर आगे आयें। दिल्ली को ताकत का एहसास कराएँ। हाँ अगर ऐसा न कर सके तो झूठी और ढोंगी कौमपरस्ती छोड़कर चुल्लूभर पानी में डूबकर मर जाएँ।

लेखक जियाउर्रहमान अलीगढ़ से प्रकाशित मैग्जीन व्यवस्था दर्पण के संपादक और राष्ट्रीय लोकदल के वरिष्ठ नेता हैं.

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मुसलमानों के इस छोटे वाले आसाराम बापू से मिलिए!

Shamshad Elahee Shams : इस बकरमुंह से मिलिए. नाम है इसका हाजी सादिक. उम्र ८१ साल. ये मुसलमानों का छोटा वाला आसाराम बापू है.

इंग्लैण्ड में कार्डिफ मस्जिद का इमाम भी रहा है और कुरआन पढ़ाने का पेशा भी करता था. १३ साल से कम उम्र की ४ बच्चियों के यौन शोषण के मामले में इसे १३ बरस की जेल हुई है. पश्चिम में अक्सर इसाई मुल्लेह, बाल यौन शोषण की ख़बरों में सुर्खियाँ बनाते हैं. ऐसा इसलिए है कि पश्चिमी समाज में वह सामाजिक दिक्कते नहीं कि पीड़ित अपने दुःख को छिपा जाए.

यदि ये सामाजिक दबाव एशिया के समाजो से नदारद हो जाए तो मुल्लाह बिरादरी को इतनी सजाएँ मिले कि जेले कम पड़ जाएँ. अव्वल दर्जे के हरामखोर, बेगैरत और बच्चेबाज़ नस्ल के कीड़े होते है. सिर्फ सडा हुआ समाज ही इनकी परवरिश कर सकता है. लोग मज़हबी अकीदे के चलते इन्हें घर पर बुलाकर अपने बच्चे पढवाते और ये ..
एक अदद अच्छा मौलवी -हाफिज ढूँढना इतना ही मुश्किल है जैसे भूसे के ढेर में सूईं को टटोलना.

मेरठ में पढ़े-लिखे और इन दिनों कनाडा में रहने वाले कामरेड शमशाद एल्ही शम्स की एफबी वॉल से.

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भटके मुस्लिम युवकों को सुधारने के लिए यूपी एटीएस का ‘डी-रेडिक्लाइजेशन’ अभियान!

संजय सक्सेना, लखनऊ

युवा अवस्था में भटकाव लाजिमी है। कभी गलत संगत तो कभी बिगड़ी सोच के कारण युवा अपने मार्ग से भटक जाता है। ऐसा नहीं है कि पूरा युवा समाज ही भटकाव से जूझ रहा हो, ऐसे युवा भी हैं जो अपनी स्पष्ट और लक्ष्य भेदी सोच के कारण सही राह पर चलते हुए अपने कुल और देश का नाम रोशन करते हैं, लेकिन इससे इत्तर कड़वी सच्चाई तो यही है कि भटकने वाले युवाओं का ग्राफ काफी ऊपर है। शायद ही कोई ऐसा युवा होगा जो दावे के साथ कह सके कि उसकी जिंदगी में भटकाव वाला मोड़ कभी नहीं आया। हॉ,सच्चाई यह भी है कि समय के साथ परिपक्त होने पर कुछ युवा संभल जाते हैं और जो नहीं संभल पाते हैं, उनके पास ठोकरे खाने के अलावा कुछ नहीं बचता है। ऐसे भटके हुए युवा घर-परिवार के लिये तो मुश्किलें पैदा करते ही हैं समाज को भी इनसे खतरा रहता है। समाज में जो अपराध बढ़ रहा है उसके पीछे ऐसे ही भटके हुए युवा हैं, जिस देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा हो, अगर वह गलत रास्ते पर चल पड़े तो उस देश को कोई बचा नहीं सकता है। यह बात हम-आप सोचते और समझते तो हैं, लेकिन इससे निपटने के लिये कभी उपाय नहीं तलाशे गये। अगर तलाशे भी गये तो वह सीमित  और कमजोर थे।

कल के भारत का भविष्य 20 से 30 वर्ष के जिन युवाओं के हाथ में हैं युवा आज हताश होकर घूम रहा है तो कल का भारत सशक्त हो ही नहीं सकता है। इसी हताशा में उसे कभी मोदी में आशा दिखती है तो कभी योगी में विश्वास नजर आता है। कभी अरविंद केजरीवाल अपना आईकॉन लगते है तो कभी नीतीश कुमार सुशासन बाबू नजर आते है। यहां तक तो सही रहता है, लेकिन जब इन युवाओं को बगदादी, बुरहावानी, अफजल गुरू, लादेन, जुनैद मुट्टू जैसे आतंकवादी आदर्श लगने लगते हैं तो फिर खतरा सामने खड़ा नजर आता है। ऐसे भटके युवा कभी धर्म के नाम पर बंदूक उठा लेते  है, तो कभी दूसरे धर्म का उपहास उड़ाते हैं। इनमें तमाम युवा ऐसे होेते हैं जिनको अपनी मंजिल तो पता होती है, परंतु उनका ब्रेनवाश करके आतंक के रास्ते पर भेज दिया जाता है। फिर तो इन्हें न अपने लक्ष्य की चिंता रहती है और न ही समाज के प्रति अपने दायित्व की। मगर ऐसे युवाओं को उनके हाल पर छोड़ देना भी तो सही नहीं है। यह बात पूर्ववर्ती सरकारों को भले ही न समझ में आई हों,लेकिन योगी सरकार को यह बात सौ दिनों के अंदर ही समझ में आ गई कि बिगड़े युवाओं को अगर सही राह पर ढकेल दिया जाये तो यह समाज और देश के लिये बेशकीमती हो सकते हैं। योगी सरकार ने इसके लिये एक रोड मैप तैयार किया है ताकि आतंकवाद की तरफ मुड़ गये युवाओं की घर वापसी हो सके।

योगी सरकार सैद्वातिक रूप से आतंकी मानसिकता से ग्रसित युवकों को सही रास्ते पर वापस लाने के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के ‘डी-रेडिक्लाइजेशन’ (कट्टरता से बाहर निकालना) अभियान को कानूनी मान्यता देकर अल्पसंख्यकों को एक बड़ा तोहफा प्रदान करने जा रही है। दरअसल, खुफिया जांच एजेंसियों द्वारा समय-समय पर आतंक की राह पकड़ चुके कई युवाओं से पूंछताछ में यह बाज जाहिर हुई थी,कुछ युवाओं को अपनी करनी पर पछतावा था। कच्ची उम्र और अनुवभवहीनता के कारण यह युवा धर्म के ठेकेदारों और कट्टरपंथियों के हाथ की कठपुतली बन गये थे,जिसका इन्हें पछतावा भी हो रहा था। एटीएफ ने पूछताछ में यह भी पाया कि आतंकी संगठनों के गुर्गे आर्थिक रूप से कमजोर, भटके युवकों को कट्टर बनाने का प्रयास करते हैं। उनके अंदर नफरत के बीज बोकर आतंकी भावना भरने का प्रयास करते हैं। हाल ही में यूपी एटीएस ने ऐसे युवकों को वारदात में शामिल होने से पहले उनकी पहचान कर उनको सही राह पर लाने का अभियान शुरू किया था।

गौरतलब हो, पिछले पांच महीनों में तमाम प्रदेशों की पुलिस ने साझा अभियान चलाकरं चार आतंकियों के साथ संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होने के इल्जाम में छह युवकों को हिरासत में लिया था। पूछताछ में युवकों को पथभ्रष्ट किए जाने की साजिश का पर्दाफाश हुआ था। मगर वे अपराध, आतंकी गतिविधि में शामिल नहीं पाए गए थे। इस पर एटीएस अधिकारियों ने युवकों पर निगरानी बनाए रखने के साथ छोड़ दिया। उसी समय एटीएस के आइजी असीम अरुण ने कहा था कि ‘युवकों के कट्टरता की जद में आने, राह भटकने के कारणों की पड़ताल कर उन्हें सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया जाएगा। अपराधी, आतंकी पकड़ने में इनका इस्तेमाल नहीं होगा।’ एटीएस ने इस दिशा में प्रयास तेज किया। युवकों के परिवार, उनके मित्र और धर्म गुरुओं की मदद से उनकी काउंसिलिंग शुरू कराई जिसका नतीजा काफी सार्थक निकला।

‘डी-रेडिक्लाइजेशन’ यानी कट्टरता से बाहर निकालने के लिये ऐसे युवाओं को चिह्न्ति करकेे एटीएस अधिकारी लगातार संपर्क में रहते हैं। कुछ दिनों तक संबंधित को एटीएस कार्यालय बुलाकर बातचीत होती है। फिर बातचीत को साप्ताहिक और पाक्षिक में तब्दील किया जाता है। इस प्रक्रिया को गोपनीय रखा जाता है। एक साल तक संपर्क के बाद मुलाकात सीमित की जाती है। रोजगार का इंतजाम व विवाह के बाद माना जा सकता है कि वह कट्टरता के प्रभाव से बाहर निकल गया है। आईजी ने बताया कि पिछले दो महीने में 125 से अधिक लोग उनसे सम्पर्क कर चुके है। अभी तक सात परिवारों के किसी न किस सदस्य को मुख्य धारा से जोड़ा जा चुका।

आईजी एटीएस कहते है कि अगर किसी युवक के गुमराह होने की खबर मिलती है या उसकी गातिविधियां संदिग्ध दिखाई देती है तो उसकी उनके परिवार, मित्र, धर्मगुरूओं के साथ मिल कर काउंसलिंग कराई जाती है। कभी-कभी परिवार के लोग यह मानने को तैयार नहीं होते है कि उनका बेटा गलत रास्ते पर जा रहा है। ऐसे परिवारों को इसके लिए सुबूत दिखाए जाते हैैं ताकि परिवार उसे सही रास्ते पर लाने के लिए प्रेरित कर सके।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Central government passed bill just before Ramzan to cause problems to Muslims!

Supreme court, President of India do Justice to Save India… Bismillah ir Rahman ir Rahim. One Country, two slaughter laws, Based on Religion is Pakistani Mentality, not Indian. Central gov passed a law that Cows and Buffallo cannot be traded for slaughter or transportation. Ok, MS Maneka Gandhi, if Central gov passed law which forbids sale or transportation of Cows and Buffallos for slaughter, then why are the 10 big butcher houses of india, which are owned by hindus, are slaughtering Lakhs  of Buffallo daily and sending  the beef to foreign countries.

Central gov passed this bill just before Ramzan to cause Problems to Muslims. But mr Modi, we Muslims wont die if we wont eat cow or Buffallo’s beef. I call upon the President of India, supreme court to Immediately order the closure of Butcher houses located in Mumbai, Up and rest of central and north India, which slaughter Buffallo and send beef to foreign country, if Indian laws are not bigotry.

Supreme court, if in UP or Mh or Rj someone possess 100 gms of beef, he would get 7 years of prison or mob lynching, under government’s supervision. But anyone in these same states should also get 7 years imprisonment, for using belt, Bags, purses, sofa covers, car seats made up of cow or buffalo Skin.

Supreme court ban leather industry in India which relies on Cow or Buffallo skin, Because according to Indian gov, cow or buffallo cant be slaughtered, then how can leather industry use their Skin to make bags, purses, belts, car seats etc etc.

MR President sir, honourable Supreme court, implement central gov law by banning Leather industry in India completely. This is India, this is not Bangladesh, that there should be two eating  laws for Muslims and hindus. Judges and gov of bangladesh are slaves of rich Bangladeshi businessmen.

But judges, courts and President of India are not slaves of rich indian businessmen , nor do they take bribe from rich businessmen, nor are they communally bigot, like bangladeshi  institutioons. Our Indian courts, judges, President are sincere, free from all sorts of bribes, influences and communal Fanaticism.

So my request our Country’s Courts and President to ban all big slaughter houses which send beef to foreign countries Immediately, plus ban leather industry in India Completely which relies on Cow or Buffallo skin. I also call upon Supreme court and President of India, National Human rights commission, to give rs 10 crore compensation per family per person killed ,  of all those Muslims who were Moblynched since bjp gov came to power in india. Why is Supreme court, Judiciary and President of India silent over Mob lynching of Muslim minority Men, why? I hope the reason is not dirty communal biase.

Jai hind. 

MD Rizwan S

mdrizwans.engineer@gmail.com

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तीन तलाक से मुक्ति के लिए हनुमानजी की शरण में मुस्लिम महिलाएं

तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के लिए किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रहा। मुस्लिम समाज में जब जब तीन तलाक अमल में आया है तब तब एक महिला बेसहारा और बेघर हुई है। मुस्लिम समाज में तीन तलाक पुरुषों नें अपने सहूलियत के हिसाब से बनाया है। लेकिन अब देश में इस बेरहम मुस्लिम कानून के खिलाफ आवाज़ें बुलंद हो गयी हैं। अब मुस्लिम महिलाएं खुद ही तीन तलाक के विरोध में आगे आ रही हैं।

इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में तीन तलाक के संकट से मुक्ति पाने के लिए मुस्लिम महिलाएं संकटमोचन हनुमान जी की शरण में पहुंच गई हैं। मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी के नेतृत्व में सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं ने बनारस के पातालपुरी मठ में 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ किया। मुस्लिम महिलाओं ने भगवान श्रीराम, मइया सीता, चारों भाईयों सहित संकटमोचन हनुमान की विधिवत् हवन पूजन कर हनुमान चालीसा पाठ की शुरुआत की।

मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने कहा आज के ही दिन 10 मई 1857 को देश में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हुई। इस घटना के ठीक 160 साल बाद तीन तलाक जैसी सामाजिक कुप्रथाओं से मुक्ति के लिए संघर्ष की शुरुआत हुई है।

नाजनीन ने कहा 11 मई को सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ में तीन तलाक पर सुनवाई होनी है। इस तीन तलाक प्रथा से देशभर की मुस्लिम महिलाओं में बेचैनी है और सबकी निगाह सुप्रीम कोर्ट पर लगी हुई है। इसलिए सुनवाई से एक दिन पूर्व तुलसीदास जी द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा के पाठ का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक अमानवीय है। इससे सबसे ज्यादा बच्चे प्रभावित हो रहे है। नाजनीन अंसारी ने कहा कि तीन तलाक देकर बेघर करने वाले धर्म का हवाला न दें।

विकास यादव
वाराणसी
vikasyadavapn@gmail.com

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दलाल और धार्मिक माफियाओं का संगठित गिरोह है ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’!

इसको बर्खास्त कर आयोग का हो गठन… तलाकशुदा महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों एवम उनको मुख्य धारा में लाने के अधिकारों की आवाज़ बुलंद कर रहे हुदैबिया कमेटी के नेशनल कन्वेनर डॉ. एस.ई.हुदा ने एक बयान जारी कर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर जाम कर निशाना साधा। डॉ. हुदा ने कहा कि मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं की बदहाली और नरकीय ज़िंदगी का पूरी तरह से ज़िम्मेदार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है।

डॉ हुदा ने मुखर होते हुए कहा कि कुछ तथाकथित क़ौम के रहनुमाओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये “अल्लाह के क़ानून” को ही हाई जैक कर लिया है।पर्सनल लॉ बोर्ड अब दलाल और धार्मिक माफियाओं की हाथ की कठपुतली बन चुका है और ये दलाल “अल्लाह के कानून” का सहारा लेकर अपने ज़ाती मफाद के लिए सूबे व मरकज़ी हुक़ूमत को सालों से ब्लैकमेल करने का काम करते आरहे हैं।

डॉ हुदा ने जफरयाब जिलानी पर हमला बोलते हुए कहा कि जब जिलानी जैसे क़ौम के दलाल मुसलमानो के ज़ज्बात से खेलने वाले और सूबे की पिछली सरकारों में क़ौम की दलाली करके ऐश इशरत की ज़िंदगी बसर करने बड़ी-बड़ी गाड़ियों में और एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर क़ौम का मुस्तक़बिल तै करने लगेंगे तो मुसलमान ख्वातीनो को मुस्तक़बिल में इससे ज़्यादा बुरे हालात से दो चार होना पड़ेगा। डॉ हुदा ने कहा कि मुस्लिम समाज मे “मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड” का कोई वुजूद नही है ये सिर्फ़ कुछ दलालो और जिलानी जैसे माफियाओं के एक संगठन है जो 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गांधी ने मुसलमानो की समस्याओं को देखते हुए बनवा कर इसका पंजीकरण कराया था…इन्द्रजी की इसके पीछे सियासी मंशा क्या रही होगी इस पर मैं कोई टिप्पणी नही करना चाहता।

डॉ हुदा ने आगे कहा कि सूबे की हुक़ूमत को चहिए की फौरी तौर से ऐसे संगठित और दलाल और माफियाओं के गिरोह को प्रतिबंधित करके मुस्लिम मोआशरे की फ़लाह के लिए एक आयोग का गठन करे जो तलाक़ शुदा मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक और शैक्षिक हालात का मुताला कर हुक़ूमत के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करे ताकि इन मज़लूम बेसहारा औरतो को इंसाफ़ मिल सके और समाज मे इज़्ज़त के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़र बसर कर सकें।

पेट की भूख और बच्चो की परवरिश के लिए ये बेसहारा औरते अगर ग़ैर सामाजिक कामों में लिप्त हो रही हैं तो उसके पीछे इन्ही स्वम्भू धार्मिक ठेकेदारों का हाथ है जिन्होंने आज तक इनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दशा सुधारने की कोई सुध न ली बल्कि इससे इतर “शरिया कानून” का हवाला दे कर डराते धमकाते रहे और हुकुमतों को ब्लैकमेल करके मलाई खाते रहे। मगर अब अवाम के सामने इस माफियाओं के असली चेहरा बेनक़ाब हो चुका है।

आयोग का गठन हो जाने से जब सही तस्वीर हुक़ूमत और अवाम के सामने पेश होगी तो जिलानी जैसे माफ़िया मुँह दिखाने लायक़ नही बचेंगे। डॉ हुदा ने कहा कि मैंने ट्वीट के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी जी से आयोग बनाने की पुरज़ोर अपील की है और दरख़्वास्त की है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भंग करके एक ऐसे आयोग का गठन हो जिसने अवकाश प्राप्त हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज साहेबान, अवकाश प्राप्त IAS, IPS, शिक्षा, सामाजिक एवम पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी हस्तियां, मुफ़्ती हज़रात, अलीमे दीन हज़रात को रखा जाए जिससे शरीयत की सही तस्वीर अवाम और व्याख्या अवाम और हुक़ूमत तक पहुँचे।

डॉ. एस.ई. हुदा
नेशनल कन्वेनर
हुदैबिया कमेटी
बरेली

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क्या अब किसी भी डेमोक्रेटिक-सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है?

Rajeev Mishra : किसी भी डेमोक्रेटिक सेक्युलर समाज में इस्लाम को accomodate करने की जगह नहीं है… क्यों? जानने के लिए इतिहास का यह सबक फिर से पढ़ें. मूर्तिभंजक इस्लामिक समाज का एक बहुत बड़ा विरोधाभास है – ईरान में तेरहवीं शताब्दी के एक यहूदी विद्वान् राशिद-उद-दिन की एक विशालकाय मूर्ति. राशिद-उद-दिन ने मंगोल सभ्यता का इतिहास लिखा, और उनका अपना जीवन काल समकालीन इतिहास की एक कहानी बताता है जो भारत के लिए एक बहुत जरुरी सबक है.

मंगोलों ने चंगेज़ खान के समय पूरे एशिया से लेकर यूरोप तक अपना दबदबा बनाया, और मध्य पूर्व एशिया में अपना शासन कायम किया. मंगोल मुख्यतः तांत्रिक धर्म (मंत्रायण) का पालन करते थे जो मूलतः भारत से निकल कर तिब्बत, चीन, जापान और पूरे मध्य एशिया में फैला था. मगोलों ने विश्व का पहला सच्चा धर्म निरपेक्ष राज्य बनाया (भारत के Pseudo Secular राजनीतिक तंत्र जैसा नहीं), जहाँ सभी धर्मों के लोगों को न सिर्फ अपना धर्म मानने की आज़ादी थी, बल्कि सबके बीच स्वस्थ संवाद स्थापित करने का प्रयत्न किया गया. मंगोलों की इस धार्मिक उदारता का सनातन धर्मियों, मंगोल-तुर्क के अदि सभ्यता के लोगों और यहूदियों ने स्वागत किया. इसाई इसके बारे में मिला जुला भाव रखते थे, जबकि मध्य-पूर्व के मुस्लिम इनसे बहुत घृणा करते थे.

इस दौरान चंगेज़ खान के वंशज (परपोते) आरगुन खान ने एक यहूदी डॉक्टर शाद-उद-दौला को अपना वजीर बनाया. शाद-उद-दौला बहुत कुशल और प्रतिभावान था. उसके समय में आरगुन खान ने बगदाद और तिबरिज़ में कई मंदिर बनवाए और मक्का पर कब्ज़ा करने की योजना बनायीं. उसी समय आरगुन खान बुरी तरह बीमार पड़ा, और मौका देख कर मुस्लिमों ने शाद-उद-दौला की हत्या कर दी. शाद-उद-दौला ने अपने समय में अन्य कई यहूदियों को प्रशासन में स्थान दिया था, उन्ही में से एक थे राशिद-उद-दीन, जो बाद में आरगुन खान के उत्तराधिकारी महमूद गजान के वजीर बने.

आरगुन की मृत्यु के बाद मुस्लिम और मंगोलों के बीच लगातार संघर्ष चला, और मुस्लिमों ने मंगोल अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए बाज़ार को नकली नोटों और सिक्कों से भर दिया – यह तरकीब जो आज भी भारत के विरुद्ध प्रयोग की जा रही है.

गजान खान के समय राशिद-उद-दीन ने स्थिति को अंततः नियंत्रण में लिया, अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाया, टैक्स-सुधार किये, और समृद्धि वापस लौटी. लेकिन मुस्लिमों से संघर्ष चलता रहा और और मुसलमान लगातार गजान खान पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाये रहे. अन्तः में स्थिति को शांत करने के लिए गजान खान और राशिद-उद-दीन ने ऊपरी तौर पर इस्लाम स्वीकार कर लिया, और गजान को अमीर-उल-मोमिन घोषित किया गया. अब मुसलमान गजान खान पर दबाव बनाने लगे की वह मंदिरों, चर्चों, और सिनागोग (यहूदि धर्म स्थल) को तोड़े और दूसरे लोगों को भी इस्लाम स्वीकार करने को बाध्य करे.

राशिद-उद-दीन के वजीर रहते गजान खान, और उसके भाई ओल्जितु का शासन लगभग शांति और स्थिरता से गुजर गया. राशिद स्वयं को अरस्तु और गजान को अपना Alexander कहता था. राशिद ने दुनिया के कोने कोने से धर्म-गुरुओं और विद्वानों को बगदाद के दरबार में जगह दी. हालाँकि इस्लामिक गुट ने राशिद-उद-दीन पर लगातार आरोप लगाया कि उसने अपना मूल यहूदी धर्म अभी भी नहीं छोड़ा था.

फिर इल्खानेत वंश के तेरहवें राजा ओल्जितु (धर्म परिवर्तन के बाद मोहम्मद खुदाबन्द) की मृत्यु के बाद इस्लामिक गुट का पूरा नियंत्रण हो गया. राशिद-उद-दीन पर ओल्जितु की हत्या का आरोप लगाया गया और छुप कर अन्दर ही अन्दर यहूदी धर्म से सहानुभूति रखने का आरोप लगाया गया. उसे कैद कर लिया गया, उसकी आँखों के सामने उसके बेटे का सर काट दिया गया. फिर राशिद का सर काट कर उसके कटे सर को तिबरिज़ की सडकों पर घुमाया गया. इतने से ही राशिद-उद-दीन के प्रति उनकी घृणा ख़त्म नहीं हुई. पंद्रहवीं शताब्दी में तैमुर-लंग के बेटे मिरान शाह ने राशिद-उद-दीन की कब्र खुदवा कर उसकी सर कटी लाश पास के यहूदी कब्रिस्तान में फिंकवा दी.

यह था सेक्युलरिज्म का अंत और इस्लाम के प्रति नरम रवैया रखने का परिणाम.

हमारे लिए इस कहानी से यही शिक्षा है की एक धर्म निरपेक्ष राज्य इस्लाम का सामना नहीं कर सकता है. अगर एक सेक्युलर राज्य की सीमाओं के बीच बड़ी मुस्लिम संख्या रहेगी तो धीरे-धीरे ये लोग शासन तंत्र पर हावी हो ही जायेंगे. आज हमारे जो नेता इफ्तार पार्टियों में हरी पगड़ी और गोल टोपी लगाये घूम रहे हैं, कल उन्हें कलमा पढना होगा और सुन्नत करवानी होगी. फिर उन्हें अपने भाई बंधुओं पर तलवार उठाने को कहा जायेगा, और अंत में उनका और उनके बच्चों का वही हाल होगा जो राशिद-उद-दीन का हुआ.
क्या मुलायम सिंह यादव की आँख के आगे यही मुल्ले एक दिन अखिलेश सिंह का सर नहीं काटेंगे? पर इन हिन्दुओं को यह कौन समझाये…..

लंदन निवासी और भाजपा की विचारधारा से जुड़े राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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गंभीर रूप ले रहा मुस्लिमों के खिलाफ बन रहा माहौल

बहुत संवेदनशील मुद्दे पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं। आज की तारीख में यह लिखना बनता भी है। मैं बात कर रहा हूं पुरे विश्व में मुस्लिमों के खिलाफ बन रहे माहौल की। चाहे अमरीका हो, रूस हो, फ्रांस हो, नेपाल हो या फिर भारत या फिर गैर मुस्लिम अन्य कोई देश लगभग सभी देशों में मुस्लिमों के खिलाफ एक अजब सा माहौल बनता जा रहा है। यहां तक कि मुस्लिमों का साथ देते आ रहे चीन में भी। जो मुस्लिम देश हैं या तो वे दूसरे समुदायों से भिड़ रहे हैं या फिर आतंकवाद से जूझ रहे हैं। कहना गलत न होगा कि मुस्लिम समाज पर एक आफत सी आ गई है।

मैं इस माहौल का बड़ा कारण मुस्लिम समाज में पनपे आतंकवादी संगठनों को मानता हूं। चाहे आईएसआईएस हो, लस्कर ए तैयबा हो। या फिर अन्य कोई संगठन। लगभग सभी आतंकी संगठन किसी न किसी रूप में मुस्लिम समाज से संबंध रखते हैं। यही वजह है कि जब भी आतंकवाद पर कोई बड़ी बहस होती है तो मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा किया जाता है। आतंकवाद मुद्दे पर मुस्लिम समाज की चुप्पी से गलत संदेश जा रहा है।

मुस्लिमों को समझना होगा कि आतंकवाद मुद्दे पर मुस्लिम देश के रूप में पहचान बना चुपे पाकिस्तान की खुलकर पैरवी करने वाले चीन में भी मुस्लिमों के लिए अच्छी खबर नहीं आ रही हैं। हाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद की पैरवी करने तथा आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का साथ न देने वाले चीन में इन दिनों इस्लाम-विरोधी माहौल बन रहा है। हाल ही में केंद्रीय चीन स्थित शहर नांगांग में जब एक मस्जिद बनने का प्रस्ताव पारित हुआ तो स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर मुस्लिम-विरोधी संदेश पोस्ट करने लगे।

मुस्लिम बहुल शिनजांग प्रांत में चीन ने दाढ़ी रखने-बुर्का पहनने पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही धार्मिक तरीके से शादी करने पर रोक लगा दी गई।  विश्व की बड़ी शक्ति माने जाने वाले अमरीका के राष्ट्रपति डोलाल्ड ट्रंप मुस्लिमों को लेकर कोर्ट से भी टकराने को तैयार हैं। सबसे महफूज जगह भारत में भी मुस्लिमों के खिलाफ बड़ा भयानक माहौल बना हुआ है।
अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज को इन सब पर मंथन करना होगा। एक देश समझ में आ सकता है। एक समाज समझ में आ सकता है। पूरे विश्व में यदि मुस्लिमों के खिलाफ माहौल बना है तो यह निश्चित रूप से बड़ी बहस का मुद्दा है।

मुस्लिम समाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंथन करना होगा कि आखिर उनके समाज में ऐसी क्या-क्या कमियां आ गईं कि सभी के सभी उनके पीछे पड़ गए। उनको संदेह की दृष्टि से देखने वाले लोगों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए मुस्लिम आतंकवाद के खिलाफ सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे है? क्यों नहीं उन लोगों का विरोध करते जो आतंकवाद के मुद्दे पर पूरे के पूरे मुस्लिम समाज को घसीट लेते हैं।

मुझे लगता है कि आज फिर मुस्लिम समाज को उस भाईचारे को लेकर अभियान की जरूरत है, जिसके लिए इस समाज ने समय-समय पर लोकप्रियता बटोरी है। जो आतंकवाद पूरी मानव जाति का दुश्मन बना हुआ है, उसके खिलाफ मुस्लिम समाज को ही मोर्चा संभालना होगा। जो राजनीतिक दल वोटबैंक के रूप में उनका इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें मुंह तोड़ जवाब देना होगा। भटके बच्चों को हथियार और कलम का अंतर समझाना होगा। मुस्लिम समाज से हो रही नफरत को बड़ी चुनौती के रूप में लेना होगा। मुस्लिम समाज के प्रतीक माने जाने वाले दाढ़ी, बुर्के को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर जो संदेह व्यक्त किया जा रहा है उस पर बड़े स्तर पर मंथन की जरूरत है।

मुस्लिम समाज के साथ ही अन्य समाज के गणमान्य लोगों को भी आगे आकर पूरे विश्व में बने रहे घृणा, नफरत के माहौल को समाप्त कर भाईचारे के माहौल को बनाने की पहल करनी होगी। बात मुस्लिम समाज की ही नहीं है, पूरे विश्व में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि हर देश में नस्लीय हमले बढ़े हैं। जिससे विभिन्न देशों में रह रहे विभिन्न देशों के युवाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है। इस सब के लिए कौन जिम्मेदार हैं ? कौन हैं इस तरह का माहौल बनाने वाले लोग ? कौन लोग हैं जो इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं ? इन सब लोगों को बेनकाब करना होगा।

चरण सिंह राजपूत
राष्ट्रीय अध्यक्ष फाइट फॉर राइट
charansraj12@gmail.com

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मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 30 वर्ष रहने के बाद स्वीडन की पूर्व सांसद नलिन पेकगुल इलाका क्यों छोड़ गईं?

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इस्लामी फासीवाद- दोनों जनता के दुश्मन हैं…. नलिन पेकगुल स्टाकहोम (स्वीडन) के सबअर्ब हस्बी टेंस्टा वाले मुस्लिम बहुल इलाके में 30 साल रहने के बाद किसी दूसरे शहर में चली गयी हैं. नलिन पेकगुल कुर्दिश मूल की सोशल डेमोक्रेट नेता हैं और सांसद भी रही हैं वर्ष 1994 से 2002 तक. उनके इलाके में प्रवासी मुसलमानों ने सामाजिक स्पेस को लगभग नियंत्रण में ले लिया है. ऐसे में वह खुद को महफूज़ नहीं समझतीं. पेकगुल स्त्री विमर्श में स्वीडन का जाना पहचाना नाम है.

(नलिन पेकगुल)

कमोबेश यही हालत जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन के उन इलाकों की है जहाँ मुसलमानों की आबादी का घनत्व अधिक है. इनका सबसे पहला शिकार मुस्लिम लड़कियाँ होती हैं. माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि बुर्का और हिजाब पहनना स्वत: अनिवार्य हो जाता है. पश्चिम में अक्सर प्रगतिशील ताकते इस्लामोफोबिया को ही एजेंडे पर रखती हैं. बात भी सही है. अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में पिछले 25 सालों में हिंसा और विध्वंस का नंगा नाच जिस तरह मध्य पूर्व में हुआ है उसका निशाना मुस्लिम जगत ही है जिसके फलसवरूप इस्लामी आतंकवाद का जन्म हुआ. इसके जन्म और पालन पोषण में अमेरिका की सहायक भूमि को कौन नकार सकता है कम्युनिस्ट होने के नाते पीड़ित के पक्ष में खड़ा होना मानव धर्म है. इसे हम न करेंगे तो कौन करेगा?

1970-80 के दशकों में प्रगतिशील मुसलमानों का एक वैकल्पिक रास्ता मुस्लिम आवाम के पास था. मुल्लाह वाणी के बरअक्स नौजवान मुसलमान जार्ज हब्बाश, लैला खालिद, यासिर अराफात को अपना आदर्श समझता था. तमाम मुस्लिम देशों में कमाल पाशा से लेकर सद्दाम हुसैन, अनवर सादात, कर्नल गद्दाफी अपना असर रखते थे. भारत पाक में प्रगतिशील शायरों और लेखकों के बड़े बड़े कद इस बात के सबूत हैं कि उनके समाज में उनकी कद्र थी. 1991 में सोवियत संघ के टूट जाने के बाद इस वैकल्पिक चिंतन धारा को पहला झटका लगा, इस विचार शून्यता को सबसे पहले पहल लेकर भरने की कोशिश इस्लामी ताकतों ने की, इरान की इस्लामी क्रांति ने इसे ठोस वैचारिक आधार दिया, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में मुजाहीदीन संघर्ष सुन्नी विकल्प दे रहा था. 9/11 की घटना के आते आते मुसलमान आवाम के सामने से वाम विकल्प लगभग सिरे से गायब हो गया, जो संघर्ष वाली ताकते थी, विकल्पहीनता के कारण उग्र इस्लामी भंवर में समा गयी और दूसरी तरफ इस समुह की प्रगतिशील ताकते पस्त होकर निष्क्रिय हो गयी.

युद्ध की मार झेलता हुआ मुसलमानों का यही तबका 2000 के दशक के बाद यूरोप और अमेरिका में हिजरत कर गया जिसके पास साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने का वैकल्पिक हथियार सिर्फ और सिर्फ इस्लाम बचा था. सऊदी धन की निर्बाध आपूर्ति से यूरोप और अमेरिका में मस्जिदों का नेट वर्क इन्हें अपनी गिरफ्त में लेने के लिए तैयार हुआ जिसमे सुन्नी जुझारू तबको को समाहित किया दूसरी तरफ इरानी इस्लामी क्रांति में जान पड़ जाने ने शिया मुसलमानों को एक दूसरा प्लेटफार्म मुहैय्या करा दिया. इन ऐतिहासिक परिस्थितियों में समाज का सबसे पीड़ित तबका प्रगतिशील ताकतों के साथ खड़ा न होकर खुद प्रतिक्रियावादी फासीवादी ताकतों का इंधन बन गया . यूरोप से पांच हजार मुसलमान नौजवानों का सीरिया में जाकर आइसिस का समर्थन करना इसका सबसे बड़ा सबूत है.

ऐसा कदापि नहीं कि यूरोप अमेरिका में बसे मुसलमान समुदाय में प्रगतिशील तबके की लौ बुझ गयी हो, ठीक इसी दौर में आप देखें की मुसलमानों में महिला विमर्श और इस्लाम के औरत विरोधी स्वरूप पर इन्ही इलाकों से मजबूत स्वर फूटे हैं, आयान हिसरी, इरशाद मंजी, तस्लीमा नसरीन, नलिन पेकगुल जैसे सशक्त हस्ताक्षर इसी युग की उपज है, वक्त की विडंबना यह है कि इन प्रगतिशील महिला कार्यकर्ताओं लेखिकाओं को कभी किसी वाम शक्ति का समर्थन नहीं मिला. तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हुकूमत रहते हुए वहां से निष्कासन झेलना पड़ता है, बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रगतिशील लेखको राजनीतिज्ञों की हत्याओं का प्रश्न वाम एजेंडे पर आ ही नहीं पाता है और न कोई मजबूत विरोध सड़क पर देखने को मिलता है .

खासकर पश्चिम के वाम जगत में इस प्रश्न को लेकर एक बुनियादी वैचारिक त्रुटी यह है कि वह धर्म की आज़ादी के सवाल पर नकाब के समर्थन में सड़क पर उतर जाते है और यह भूल जाते हैं कि इस्लाम सिर्फ एक धर्म नहीं एक मुकम्मिल राजनीति भी है. धर्म की आजादी उन्हें पश्चिम में बसे हिज्बोल्लाह, हमास जैसी इस्लामी राजनीतिक ताकतों के साथ खड़ा कर देती है और उनकी नासमझी धर्म का अधिकार और फासीवादी इस्लामी राजनीति में फर्क नहीं देखती.

आज नकाब की वकालत धार्मिक स्वतन्त्रता के नाम पर करने वाले कल टोरोंटो की सडकों पर लंदन जैसा प्रदर्शन ‘शरिया लागू करो’ नहीं करेंगे इस नतीजे पर पहुंचना राजनीतिक आत्महत्या होगी. दो वर्ष पूर्व कनाडा के ओंटेरियो प्रान्त में सैक्स शिक्षा को नए स्वरूप में राज्य सरकार द्वारा लागू करने पर दक्षिणी एशियाई समाज के कुछ तत्वों द्वारा बेहद तीव्र विरोध का सामना हुआ. कनेडियन कम्युनिस्ट पार्टी ने सैक्स शिक्षा का समर्थन किया था और उसके नेताओं को अपने समुदायों में इस प्रश्न को लेकर बेहद प्रतिक्रियावादी विरोध को झेलना पड़ा था. ये वही तबका है जो नकाब और पगड़ी का समर्थक है, यह वही तबका है जो भारतीय जातिवादी विचार को अपने जीवन में सात समंदर पार भी अमल में लाता है, यह वही तबका है जो अपने परिवारों में प्रेम विवाह के विरोध में आनर किलिंग तक कर देता है.

कम्युनिस्टों के एक युवा उत्साही तबके को एक गलत फहमी और है, नकाब के पक्ष में, गाजा पर हमले के विरोध में, इसराइल के विरोध जैसे भावनात्मक प्रश्नों पर प्रदर्शन, विचार गोष्ठियां आयोजित करके उमड़ी भीड़ को वह अपनी ताकत समझ लेता है. यह बुनियादी गलती है जो उन्हें वर्ग संघर्ष के रास्ते से भटकाव की तरफ ले जाती है. कम्युनिस्टों की असल ताकत वह हैं जो बुनियादी प्रश्नों पर सड़कों पर संघर्ष में उतरते हैं. बिजली घरों के निजीकरण, कनाडा पोस्ट के निजीकरण, पूर्व हार्पर सरकार के जनविरोधी बिलों पर उसके संघर्षों में जो ताकत उसके पास थी वही उसकी असल ताकत है. नकाब, फलस्तीन, इस्लामोफोबिया जैसे भावनात्मक मुद्दों पर आने वाले चेहरे हमारे उन कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शनों से गायब रहते हैं जब हम सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध मोर्चा संभालते हैं. इस्लामोफोबिया के विरोध में आयोजनकर्ता लैला खालिद, जार्ज हब्बाश, कुर्दिश शहीद महिला आसिया रमजान अंतार, हिकमत , महमूद दरवेश, फैज़ अहमद फैज़ की फोटो भी हाथ में उठायें तब उन्हें अहसास होगा कि वह किन ताकतों के साथ खड़े हैं.

ये अजब इत्तेफाक है कि आज जब स्वीडन से नलिन पेकगुल की यह झकझोर देने वाली खबर आयी कि वह कथित मुस्लिम बहुल इलाके में तीस वर्ष रहने के बाद इलाका छोड़ा रही है. ठीक इसी समय कम्युनिस्ट पार्टी आफ कनाडा के नेतृत्व में टोरोंटों में इस्लामोफोबिया के विरोध में एक प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है और इन पक्तियों का लेखक ठीक इसी समय यह आलेख लिख कर अपना विरोध साम्राज्यवाद और इस्लामी ताकतों के विरुद्ध दर्ज कर रहा है. इस नाजुक दौर में मुझे यह कहने, सोचने और लिखने में कोई आपत्ति नहीं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोध भी उतना ही जरूरी है जितना फासीवादी इस्लामी राजनीति का, क्योकि मूलत: दोनों मानव विरोधी हैं.

भारतीय मूल के शमशाद एल्ही शम्स इन दिनों कनाडा में पदस्थ हैं और अपने बेबाक-प्रगतिशील विचारों को मुखरता के साथ सोशल मीडिया पर दर्ज कराने के लिए चर्चित हैं. उनसे संपर्क shamshad66@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है. शमशाद का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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टीओआई के राजशेखर झा बताएं, किसके कहने पर नजीब-आईएस वाली ख़बर प्‍लांट की थी?

जेएनयू के लापता छात्र नजीब के बारे में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में इसके पत्रकार राजशेखर झा ने फर्जी खबर प्‍लांट की. इस खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने जांच में पाया है कि नजीम यूट्यूब और गूगल पर आईएस (इस्लामिक स्टेट) के बारे में वीडियो आदि खोज देखा करता था, साथ ही वह आईएस की कार्यप्रणाली, विचारधारा, भर्ती आदि के बारे में अध्ययन करता था. खबर में बताया गया कि दिल्ली पुलिस ने नजीब की लैपटाप के जांच के बाद यह जानकारी हासिल की है. उधर, इस खबर के छपने के बाद दिल्ली पुलिस ने खंडन भेज दिया कि उसने ऐसी कोई जांच लैपटाप की नहीं की और न ही ऐसा कोई नतीजा निकला है.

फर्जी खबर की सच्‍चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया में टीओआई के राजशेखर झा के खिलाफ अभियान चला. फिर भी इस शख्स ने माफी नहीं मांगी. हां, जो उससे सवाल पूछता था उसे वह ट्विटर पर ब्‍लॉक किए जा रहा था. बाद में राजशेखर झा ने अपना फेसबुक एकाउंट बंद कर दिया. अपने ट्विटर एकाउंट की सेटिंग ऐसी कर ली कि केवल वेरिफाइड यूजर्स ही उसके एकाउंट तक पहुंच सकते थे.

नजीब को पुलिस अब तक खोज नहीं पाई है. पुलिस को खुद टाइम्‍स ऑफ इंडिया की खबर का खंडन देना पड़ा है. मान लीजिए कि नजीब (कोई और नाम सुविधा के लिए चुन सकते हैं) अगर मौजूद होता और इस अखबार में बिलकुल 21 मार्च वाली खबर छपती कि वह इस्‍लामिक स्‍टेट के बारे में गूगल और यूट्यूब पर खोजता था और उसके नेताओं के भाषण सुनता था, तब कैसा नज़ारा होता? दिल्‍ली पुलिस को उसे गिरफ्तार करने में घंटा भर भी नहीं लगता. उसके खिलाफ़ साक्ष्‍य गढ़ लिए जाते. एक खबर दूसरी खबरों का आधार बन जाती और बड़े-बड़े हर्फों में करार दिया जाता कि आइएस का दिल्‍ली मॉड्यूल जेएनयू से ऑपरेट करता था.

यह कितना खतरनाक हो सकता है, उसे बताने की ज़रूरत नहीं. हम दिल्‍ली के कश्‍मीरी पत्रकार इफ्तिखार गीलानी का हश्र देख चुके हैं जिस मामले में कई पत्रकारों ने गलत रिपोर्टिंग कर के आतंक के मामले में उन्‍हें जेल की हवा खिलवा दी थी. नीता शर्मा ने पुलिस की थ्यूरी के हिसाब से खबर प्‍लांट कर गीलानी को दोषी बना दिया था, जिसकी थर्ड डिग्री सज़ा गीलानी को भुगतनी पडी. इस पत्रकारिता जगत में गीलानी आज भी दिल्‍ली के आइएनएस बिल्डिंग वाले रुफी मार्ग इलाके में दिन-भर दौड़भाग करते पाए जाते हैं जबकि नीता शर्मा सर्वश्रेष्‍ठ रिपोर्टर का तमगा हासिल कर के अपने पाप से मुक्‍त हो चुकी हैं.

चकोलेबाज़ के नाम से एक ट्वीट आया है जिसमें गरीब मुसलमानों की जिंदगी बरबाद करने का आरोप कुछ पत्रकारों पर लगाया गया है. नीता शर्मा का भी उसमें नाम है. नीता शर्मा ने गीलानी की जिंदगी बरबाद की तो नजीब के मामले में टाइम्‍स ऑफ इंडिया के राजशेखर झा ने बहुत गंदा काम किया है.

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हिन्दू और मुसलमान दोनों पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हैं

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन १७६१ में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन ११वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और १८वीं-१९वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में १७६१ में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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किसी हिंदू की मौत पर ‘RIP’ लिखना गलत, जानिए क्या कहा जाना चाहिए

Sarjana Sharama : What is Rest in Peace ( ‪#‎RIP‬) ये “रिप-रिप-रिप-रिप” क्या है? आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIP लिखने का “फैशन” चल पड़ा है, ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं… RIP शब्द का अर्थ होता है “Rest in Peace” (शान्ति से आराम करो), यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो, क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी “जजमेंट डे” अथवा “क़यामत का दिन” आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे…

अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में “शान्ति से आराम करो” ! लेकिन हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके “Rest in Peace” का सवाल ही नहीं उठता ! हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/ काया/शरीर/नवजात में प्रवेश कर जाती है… उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं !

अतःकिसी हिन्दू मृतात्मा हेतु “विनम्र श्रद्धांजलि”, “श्रद्धांजलि”, “आत्मा को सदगति प्रदान करें” ” भगवान् , आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे ” जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए, जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु पर उनके लिए RIP लिखा जा सकता है… होता यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी “शॉर्टकट अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दूमृत्यु पर भी “RIP” ठोंक आते हैं… यह विशुद्ध “अज्ञान और जल्दबाजी” है, इसके अलावा कुछ नहीं…

अतः कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो, एवं हम लोग *”दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि”* प्रदान करें… ना कि उसे ~RIP~ करें !

पत्रकार सर्जना शर्मा की एफबी वॉल से.

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रसूल को मुहम्मद लिखने पर लखनऊ नदवा के एक मौलाना ने मुझे जान से मारने की धमकी दी थी :

Tabish Siddiqui : अमजद साबरी, पाकिस्तान के क़व्वाल, जिनकी कल गोली मार कर ह्त्या कर दी गयी थी, उन पर पहले से एक ईशनिंदा का केस चल रहा था.. ईशनिंदा इस वजह से उन पर लगाई गयी थी क्यूँ कि उन्होंने पाकिस्तान के Geo टीवी पर सुबह के वक़्त आने वाले एक प्रोग्राम में क़व्वाली गायी.. और उस क़व्वाली में पैग़म्बर मुहम्मद के चचेरे भाई अली और बेटी फ़ातिमा की शादी का ज़िक्र था.. ज़िक्र कुछ ज़्यादा डिटेल में था जो कि मौलानाओं को पसंद नहीं आया.. और Geo टीवी समेत अमजद साबरी पर ईशनिंदा का मुक़दमा कर दिया गया.. और फिर एक आशिक़-ए-रसूल ने अदालत से पहले अपना फैसला दे दिया क्यूंकि उनके हिसाब से ईशनिंदा की सज़ा सिर्फ मौत थी जो पाकिस्तान की अदालत शायद ही देती एक क़व्वाली के लिए किसी को…

ये ईशनिंदा और बेअदबी का इलज़ाम लगाने वाले हमारे आस पास बहुत हैं.. मगर इस तरह की मानसिकता को जहाँ सपोर्ट मिल जाता है वहां ये अपने सबसे घिनौने रूप में दिखाई देते हैं.. कल एक दोस्त के कमेंट पर मैंने ख़लीफ़ा “उमर” को “उमर” लिखे बिना आगे “हज़रत” लगाए तो वहां कुछ लोग इतना ज़्यादा मुझ से नाराज़ हो गए कि मुझ से सीधे ये कहा कि आप “उमर” को गाली दे रहे हैं.. मैंने जब इस्लाम का इतिहास लिखना शुरू किया था जिसमे मैं पैग़म्बर मुहम्मद को हमेशा “मुहम्मद” ही लिखता था तो इतने बड़े बड़े सेक्युलर और मॉडरेट मुसलमानों ने मुझे सिर्फ इसलिए गाली दी और मुझे ब्लाक कर दिया क्यूंकि इतिहास लिखने में मैं “मुहम्मद” के बाद “सलल्लाहो अलैह वसल्लम” नहीं लगाता था..

मैंने कितनों को समझाने की कोशिश की कि जितनी भी इस्लामिक इतिहास की किताब मेरे पास हैं अंग्रेजी में सब में “मुहम्मद” को मुहम्मद ही कहा गया है क्यूंकि इतिहास की किताबें हर किसी धर्म के लिए होती हैं मगर जिनको नहीं मानना था उन्होंने नहीं माना.. क्योंकिं इनके हिसाब से ये सब ईशनिंदा है और इस्लामिक रूल होता तो अब तक मेरे खिलाफ केस कर चुके होते या इतनी ही बात के लिए मार चुके होते…

आज के इस्लामिक संस्करण में सब कुछ ईशनिंदा है, रोज़ेदार के सामने आप कुछ खा लें (पाकिस्तान में अभी एक पुलिस वाले ने इसी बात को लेकर मारा था एक शख्स को), जिसको गाना बजाना न पसंद हो उसके आगे आप गा बज लें, मतलब अगर इस्लामिक एस्टेट ऐसा सख्त रूल हो कहीं तो ईशनिंदा का आरोप किसी भी तरह से कहीं से भी घुमा के लगाया जा सकता है.. क्यूंकि जिस “सच्चे” मुसलमान को कुछ भी न पसंद हो और आप वो कर दें तो वो ईशनिंदा होती है.. पाकिस्तानी लिबरल लोग इसके खिलाफ खड़े हो रहे हैं क्यूंकि सबसे ज़्यादा इसी क़ानून का दुरूपयोग होता है वहां…

ईशनिंदा का सबसे पहला कांसेप्ट “ख़लीफ़ा उमर” का था.. मगर अभी इस इतिहास और इस से जुडी जानकारियां लिख दूं तो अच्छे से अच्छा मुसलमान नाराज़ हो जाएगा.. और ये ईशनिंदा वाले बहुसंख्यक हैं.. यहाँ भी और पाकिस्तान में भी.. ये सारे क़व्वाली और मज़ार पर जाने को ईशनिंदा ही बोलते हैं मगर अमजद साबरी से जुडी पोस्टों पर ख़ूब घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं कल से.. मगर जिसने गोली मारी है उसने इनके दिल का ही काम किया है और ये अंदर से इसे बख़ूबी जानते और मानते हैं…

रही भारत की बात तो भारत को इस्लामिक राज्य बना दीजिये फिर देखिये… वही पाकिस्तान वाला इस्लाम यहां भी आपको मिलेगा.. यहां भी वही सब हैं जो वहां पाकिस्तान में हैं.. बस उन्हें यहां मौक़ा नहीं मिल पा रहा है.. किसी मुगालते में मत रहिए… रसूल को मुहम्मद लिखने पर यहीं लखनऊ नदवा के एक मौलाना ने मुझे जान से मारने की धमकी दी थी.. वो तो कहिये जब उसे लगा कि मेरी हैसियत उस से निपटने की है तब जाके चुप हुवा वो.. पाकिस्तान तो यहीं से लोग गए हैं.. यहां कानून का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि हम लोग सलामत हैं… इस्लाम लपेटे में न आता तो आज न अहमदिया अलग होते, सूफी अलग होते, शिया अलग होते और न कोई और.. सैकड़ों पंथ बना के लोगों ने खुद को आज के इस इस्लाम से अलग कर लिया है मगर इन लोगों को अभी नहीं समझ आ रहा है कि गलती कहाँ है.. इनके हिसाब से आज के इस्लाम को गलत कहना पैग़म्बर को गलत कहना हो गया क्यूंकि मौलाना यही सिखाते और समझाते हैं इन्हें…

इस एफबी पोस्ट के लेखक ताबिश सिद्दीकी से संपर्क https://www.facebook.com/delhidude के जरिए किया जा सकता है.

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मुसलमानों ने मस्जिद के अंदर योग करके प्रतिमान कायम किया (देखें वीडियो)

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर यूपी के हाथरस जिले के गांव अल्हैपुर चुरसैन के मुलमानों ने मस्जिद के अंदर योग करके उन लोगों को आइना दिखाया है जो ओम उच्चारण और सूर्य नमस्कार का बहाना बनाकर योग को धर्म से जोड़ने का काम कर रहे हैं। साथ ही यह संदेश भी दिया है कि योग से धर्म का कोई लेना देना नहीं है और भागदौड़ की जिंदगी में शरीर की हिफाजत के लिए योग की महत्वपूर्ण भूमिका है।

सुनकर आपको यकीन न हो रहा हो तो यूपी के हाथरस जिले के गांव अल्हैपुर चुरसैन की मस्जिद के अंदर के इन दृश्यों को देखिये। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर मस्जिद में मुसलमान पूरे मनोयोग से योग कर रहे है। योग करने में सभी आयु वर्ग के लोग शामिल है। देश दुनिया से जैसे भी आवाजें उठें उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है। वे तो अपने शरीर को निरोगी बनाने के लिए योगक्रिया में तल्लीन है। योगासन करने में मस्जिद के मौलाना डॉ वली मोहम्म्द भी आगे है। उनका कहना है कि योग से काया निरोग रहती है। शरीर के अंदर पूरे दिन फुर्ती रहती है। हाथ पैरों में जान आती है। खून का सर्कुलेशन बढ़ता है। आँखों की रोशनी बढ़ती है। पेट की खराबियां दूर होती है और नर्वस सिस्टम सही रहता है।

उनका कहना तो यह भी है कि योग से धर्म का कोई लेना देना नहीं है यह तो शरीर की हिफाजत के लिए है। देश दुनिया में ओम उच्चारण और सूर्य नमस्कार का बहना बनाकर योग को भले ही धर्म से जोड़ा जा रहा हो लेकिन हाथरस के गांव अल्हैपुर चुरसैन की मस्जिद के मौलाना डॉ वली मोहम्म्द कहते है कि जरूरी नहीं कि ओम कहा जाय ओम न कहकर अल्लाह कह लें। रही बात सूर्य नमस्कार की तो मौलाना कहते है कि सूर्य की तरफ मुंह करने से एनर्जी मिलती है। मौलाना कहते है कि यह हमारा देश है और इसे हम हरा भरा देखना चाहते हैं।

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

मस्जिद में योग करते हुए 1 https://youtu.be/R8l_8ttB1iA

मस्जिद में योग करते हुए 2 https://youtu.be/Z0pImHkECyc

मस्जिद में योग करते हुए 3 https://youtu.be/GBgUjZ2QoMc

योग कराने वाले मस्जिद के मौलाना से बातचीत  https://youtu.be/oaPoZQmpzW0

हाथरस से वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल की रिपोर्ट. संपर्क: 9837061661

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मूर्ख पत्रकार अवनींद्र कमल ने मुस्तकीम को रोजे में चाय पीते हुए बताया और इसे दैनिक जागरण ने छाप दिया!

Wasim Akram Tyagi : दैनिक जागरण का एक पत्रकार अवनीन्द्र कमल कैराना पहुंचा. लौटकर अपने हिसाब से ‘बेहतरीन’ रिपोर्ताज लिखा. शीर्षक है- ”फिलहाल कलेजा थामकर बैठा है कैराना”. यह रिपोर्ताज जागरण के 20 जून के शामली संस्करण में प्रकाशित भी हो गया. अब जरा इन महोदय की लफ्फाजी देखिये…

”दोपहर की चिलचिलाती धूप में पानीपत रोड पर लकड़ी की गुमटी में अपने कुतुबखाने के सामने बैठे मियां मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हैं। पलायन प्रकरण को लेकर उनके जेहन में खदबदाहट है। चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिंताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की।”

यह रिपोर्ट पूरी तरह फर्जी प्रतीत हो रही है क्योंकि मुस्तकीम मियां को जागरण संवाददाता ने रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बता दिया है. कैराना मामले में पलायन की खबरों में उतनी ही सच्चाई है जितनी जागरण के संवाददाता ने मुस्तकीम को रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बताया है. बात का बतंगड़ बनाकर पेश करने वाले जागरण के पत्रकार इस कदर बेसुध हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं कि रोजे में खान पान पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है. सह कहा जाता है कि हिन्दी पत्रकारिता वेंटीलेटर पर है.

सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकार वसीम अकरम त्यागी के एफबी वॉल से.

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आजतक में कार्यरत शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर और शादाब मुज्तबा की फेसबुक पर क्यों हो रही है तारीफ, आप भी पढ़िए

Vikas Mishra : मेरे दफ्तर में शम्स ताहिर खान, रेहान अब्बास, मुहम्मद अनस जुबैर, शादाब मुज्तबा हैं, उच्च पदों पर हैं ये लोग, बेहद जहीन। जानते हैं कि इनमें एक समानता क्या है, इन सभी की एक ही संतान है और वो भी बेटी। वजह क्या है, वजह है इनकी तालीम, इनकी शिक्षा। क्योंकि इन्हें पता है कि जिस संतान के दुनिया में आने के ये जरिया बने हैं, उसके पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। इन्हें नहीं रटाना है कम संतान-सुखी इंसान।

मेरे गांव में मेरे हमउम्र दयाराम के आठ बच्चे हैं। मेरे खुद दो सगे भाई और तीन बहनें हैं। मेरे लखनऊ के एक साथी पत्रकार के 11 मामा और चार मौसियां हैं। सुभाष चंद्र बोस अपने पिता की नौवीं संतान थे। इसके बाद भी प्रोडक्शन जारी था, 14 भाई बहन थे। तो दूसरे की संतानों की तादाद गिनने से पहले जरा अपना भी इतिहास देख लेना चाहिए। अभी हाल में मैंने एक चुटकुला पढ़ा था कि एक कलेक्टर साहब गांव में नसबंदी के लाभ बताने पहुंचे थे। एक ग्रामीण ने पूछा-साहब आपने नसबंदी करवाई है? साहब बोले-नहीं, हम पढ़े-लिखे हैं। ग्रामीण बोला-तो साहब हमें भी पढ़ाओ-लिखाओ, नसबंदी करवाने क्यों आ गए।

फेसबुक पर लिखने वाले तमाम लोग विद्वान हैं, जानकार हैं, लेकिन अपनी विद्या का इस्तेमाल नफरत फैलाने में ज्यादा कर रहे हैं। हिंदू हो या मुस्लिम, दोनों समुदाय की मूल समस्या है शिक्षा। जो पढ़कर आगे बढ़ गए, वो भी शिक्षा के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि अपने ही समुदाय के उन लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है और जो सोशल मीडिया पर फेंका उनका कचरा उठाकर अपने दिमाग में डालने के लिए अभिशप्त हैं। दो समुदाय जो इंसानियत के तकाजे से एक-दूसरे के करीब आ सकते हैं, उन्हें बरबस ये दूर करना चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय के अच्छे लिखने वाले अपने ही सहधर्मियों को बरगला रहे हैं। उनके अपने घर में अपनी बेटी तो डॉक्टरी-इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है। लेकिन फेसबुक पर वो ‘मोदी की डियर’ पर मौज ले रहे हैं।

कोई मुस्लिम अगर इस्लाम या कट्टरता के खिलाफ अगर कोई पोस्ट लिखता है तो उसमें कमेंट करने वालों में हिंदू लोगों की भरमार होती है, जो उस पोस्ट का स्वागत करते नजर आते हैं। उस पोस्ट के कमेंट्स में मुस्लिमों की तादाद भी होती है। या तो वो अपने उस साथी को गालियां दे रहे होते हैं या फिर कुछ ऐसे भी होते हैं जो पोस्ट का समर्थन कर रहे होते हैं। ठीक इसी तरह, जब कोई हिंदू कट्टर हिंदुत्व और धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास के विरोध में कुछ लिखता है तो उस पोस्ट पर मुस्लिम साथियों के कमेंट थोड़े से आते हैं, अगर पोस्ट पब्लिक है तो फिर उस पर हिंदू धर्म वालों की गालियां पड़नी तय है। मेरी फ्रेंडलिस्ट में भी ऐसे साथी हैं, जिनमें से कुछ कभी परशुराम के भक्त बन जाते हैं, तो कभी देखते ही शेयर करें वाली तस्वीरें भेजते हैं, बेवजह मोदी-मोदी करते रहते हैं।

व्हाट्सएप के ग्रुप में तो कई मूर्खतापूर्ण मैसेज चलते रहते हैं। और हां, फेसबुक पर कई मुस्लिम मित्र जान बूझकर बड़े शातिराना तरीके से पोस्ट लिखते हैं। आरएसएस पर हमला करने की आड़ में हिंदुओं की ‘बहन-महतारी’ करते हैं। कई लोग मुझसे फोन करके कह चुके हैं कि ये आदमी आपकी फ्रेंडलिस्ट में क्यों है ? दरअसल ऐसी पोस्ट का अंजाम क्या होता है, मैं बताता हूं। उसमें एक मुसलमान लिखता है, बाकी मुसलमान पढ़ते हैं, वाह-वाह करते हैं, कई हिंदू पढ़कर कुढ़कर रह जाते हैं, कुछ से रहा नहीं जाता तो पोस्ट पर पहुंचकर तर्क-वितर्क करना शुरू करते हैं, तो वहीं कुछ सीधे ‘मां-बहन’ पर उतारू होते हैं। ‘मां-बहन’ करने वाले दोनों तरफ हैं। कोई डायरेक्ट परखनली से पैदा नहीं हुआ है, सबके घर में मां-बहन हैं।

दरअसल सोशल मीडिया को कई लोग अपने अपने तरीके से यूज कर रहे हैं। असली मुद्दे पर कोई आना नहीं चाहता। अपने मजहब वाले सही बात नहीं सिखा रहे हैं, सिर्फ डरा रहे हैं। दूसरे मजहब वालों से वो सीखना-पढ़ना चाहेंगे नहीं। खासतौर पर ये मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ ज्यादा हो रहा है, यही वजह है कि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मुसलमान उनका सर्वमान्य नेता नहीं बन पाया। क्षेत्रीय स्तर पर आजम, ओवैसी उभरे, लेकिन इन्होंने भी तो मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल ही किया है।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से यह मैटर कापी कर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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खाड़ी देशों की मजबूरी थी औरतों को ढंकना, गलती से बिना ढंकी स्त्री दिख जाती तो वो कामोत्तेजक हो जाते

Tabish Siddiqui : पहले हमारे यहाँ ब्लैक एंड वाइट टीवी होता था “बेलटेक” कंपनी का जिसमे लकड़ी का शटर लगा होता था जिसे टीवी देखने के बाद बंद कर दिया जाता था.. चार फ़ीट के लकड़ी के बक्से में होता था वो छोटा टीवी.. शटर बंद करने के बाद उसके ऊपर से एक पर्दा और डाला जाता था क्रोशिया से बुना हुवा.. लोगों के यहाँ फ्रिज टीवी और हर उस क़ीमती चीज़ पर पर्दा डाल के रखा जाता था जो उन्हें लगता था कि धूल और गर्मी से खराब हो जाएगा.. बाद में जब बिना शटर के टीवी आया तो वो मुझे बहुत अजीब सा नंगा नंगा दिखता था.. क्यूंकि मुझे उसी शटर में बंद टीवी की आदात थी.. फ्रीज़ से कपड़ा हट जाता तो वो भी नंगा दिखने लगता था…

खाड़ी देशों की मजबूरी थी अपनी सुंदर औरतों को ढांकना.. क्यूंकि अगर ढंकते न तो जानलेवा धूप और गर्मी से उनकी त्वचा झुलस जाती.. औरतें भी अपनी सुंदरता को बचाने के लिए अपनी त्वचा और पूरे बदन को लपेट कर ही बाहर निकलती थीं.. बहार लपेटकर निकलने का मतलब ही होता है कि आप धूप और धूल से बचाव कर रहे हो अपने आपका.. समय के साथ साथ उनके मर्दों की आदत पड़ गयी ढकी हुई स्त्रियों को देखना और अगर कोई उन्हें गलती से बिना ढकी स्त्री दिखा जाती तो वो कामोत्तेजक हो जाते थे.. सभी नहीं.. मगर ज़्यादातर…

ये ढंकना उनकी संस्कृति बन गयी धीरे धीरे और औरतें भी एक कवच के बिना खुद को नंगा महसूस करने लगीं.. इसी तरह का ओढ़ना मिस्र से लेकर सीरिया तक भी चलन में था.. मगर जब समय बदला और घर और सार्वजनिक स्थान वातानुकूलित होने लगे तो अपने आपको इतना ढंकना समझदार लोगों को बेवकूफ़ी लगने लगा.. मिस्र से लेकर अन्य खाड़ी के देशों में औरतों ने इस ढंकने का विद्रोह करना शुरू किया.. और मर्दों को समझाना शुरू किया कि जिस “तम्बू” को आप लोगों ने संस्कृति समझना शुरू कर दिया था वो दरअसल एक बचाव था हमारी त्वचा और सेहत का.. मगर अब हम विकसित हैं.. हमारे पास पुलिस है, सेना है, क़ानून है हमारी हिफाज़त के लिए.. त्वचा के लिए “सन स्क्रीन लोशन”… जिस बुर्के को आप लोगों ने हमारी हिफाज़त समझ के रखा था अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं है.. ये सातवी शताब्दी नहीं ये इक्कीसवीं शताब्दी है…

मिस्री लेखक लायला अहमद और उन जैसी अन्य ने पूरा अभियान चलाया अपने मर्दों को समझाने के लिए कि जिस “तम्बू” को तुम इस्लाम समझ कर हम औरतों पर लपेटते हो वो दरअसल वहां की संस्कृति है.. क्यूंकि अरब के उस दौर में ग़ुलाम भी होते थे, गुलामों की मंडियां लगती थी, गुलाम औरतें अपने स्तन खोलकर चलती थीं घरों में अपने मालिक और उनके मिलने जुलने वालों के सामने.. कुरआन इसीलिए “हिजाब” वाली आयत में “स्तन” ढंकने को बोल रहा है.. लायला अहमद और उन जैसी अन्य क्रांतिकारी स्त्रियों की बात धीरे धीरे वहां के मर्द समझने लगे और बहुत हद तक औरतों को आज़ादी मिलनी शुरू हुई…

जिनके यहाँ दुपट्टा ओढ़ा जाता है उन्हें टी शर्ट पहने हुवे औरत “अजीब” और भौंडी दिखती है.. जिनके यहाँ घूंघट का रिवाज है उन्हें बिना घूंघट की औरतें बेशर्म दिखती हैं.. अरबों और उन जैसे अन्य को जो औरत “लबादा” न ओढ़े नंगी दिखती है.. मगर भारत के लोगों की क्या मजबूरी है? उनकी संस्कृति अपना लो और मर्द भी चोगा पहनना शुरू कर दें तो कुछ दिन बाद बिना चोगे के नंगा और भौंडा महसूस करने लगेंगे.. जो लोग कुछ दिन दाढ़ी रख के कटवा देते हैं वो भी शरमाते हुवे घुमते हैं क्यूंकि दूसरों को “अजीब” लगता है उनका लुक…

अब LED का ज़माना है.. वातानिकूलित और ऐसे घर होते हैं हमारे जहाँ धूल और धुप का इतना असर नहीं होता है और अब LED और वातुनुकूलित घरों में ढँक के रखने की कोई ज़रूरत नहीं है.. क़ानून भी अब मज़बूत है जहाँ आपको ये भी सोचने की ज़रूरत नहीं है कि किसी गलत निगाह वाले “चोर” ने हमारा टीवी देख लिया तो उठा ले जाएगा.. पहले लोग कंप्यूटर रूम में भी जूता चप्पल उतार के जाते थे ताकि खराब न हो जाए.. क्या वहां जूता चप्पल उतार के जाना धर्म का हिस्सा था? संस्कृति और धर्म में अंतर करना समझिये.. समझदार बनिए…

फेसबुक के चर्चित लेखक ताबिश सिद्दीकी के वॉल से.

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पैगम्बर के घर पर बुलडोजर क्यों चला?

अभी हाल में सऊदी अरब का दौरा करके लौटे हैं। सुना है उन्होंने अरब के बादशाह सलमान बिन अब्दुल अजीज को एक गजब का तोहफा दिया। वह केरल में दुनिया में अरब के बाहर बनी दुनिया की पहली मस्जिद की प्रतिकृति थी। इस मस्जिद को केरल के एक हिंदू राजा ने मुहम्मद साहेब के जीवनकाल में ही 629 ईसवी में बनवाया था। 14वीं सदी में मशहूर यात्री इब्नाबतूता वहां गया था और उसने लिखा कि मुसलमान वहां कितने सम्मानित हैं।

इस तोहफे को पाकर अरब के शाह कितने खुश हुए होंगे इसका अंदाजा मैं कतई नहीं लगा सकता। क्योंकि पिछले कुछ सालों में सऊदी सरकार ने वह तमाम ऐतिहासिक निशानियां मिटा दीं जो पैगम्बर मुहम्मद साहेब से जुड़ी थीं। मेरे एक मित्र पिछले साल हज से लौटे तो वह बहुत दुखी थे। उन्होंने बताया जहां कल तक पैगम्बर साहब के शुरूआती साथियों की कब्रें थीं वे अब नजर नहीं आतीं। कई ऐतिहासिक मस्जिदें जिन्हें हम पवित्र मानते थे वहां अब बिजनेस सेंटर या शाही परिवार का महल नजर आता है। कहीं-कहीं तो इन प्राचीन इमारतों को तोड़ कर भव्य पार्किंग बना दी गई।

राम का जन्म अयोध्या में हुआ इसके अब तक कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं क्योंकि यह हजारों साल पुरानी घटना है जिसके प्रमाण मिल पाना तकरीबन नामुकिन है। लेकिन मक्का में हजरत मोहम्मद पैगम्बर साहब का जन्म जिस घर में हुआ उसके तमाम पुरातात्विक प्रमाण मौजूद हैं। क्योंकि यह घटना बहुत पुरानी नहीं। मोहम्मद साहेब का जन्म 570 ईसवी में हुआ था। इसमें कोई विवाद भी नहीं है। बाद में उसे लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया गया था। उस घर को गिरा दिया गया।

हजरत के दौर की कई मस्जिदें और इमारतें मक्का में अभी दो चार साल पहले तक मौजूद थीं जिन पर अरब के बादशाह ने बुलडोजर चला कर जमींदोज कर दिया। इसमें पैगम्बर की पहली नेकदिल बेगम खदीजा का घर भी शामिल था। इसमें इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर भी शामिल है जहां आज होटल हिलटन खड़ा है। जिस ऊंची पहाड़ी की चोटी “फारान” से हजरत मोहम्मद साहब ने अपने पैगम्बर होने की घोषणा की थी, आज वहां सऊदी शाह ने अपना आलीशान महल बनवा दिया है। मक्का से लौटे अपने दोस्त की इस बात पर मुझे यकीन नहीं हुआ। मैंने अपने दूसरे हिन्दुस्तानी मुस्लिम दोस्तों से इस बारे में पूछा तो जैसी की उम्मीद थी उनका कहना था कि ये गप्प है बकवास है। मैंने नेट खंखाला तो उसमें इस तरह की कई सूचनाएं थीं। फिर भी मुझे यकीन नहीं हुआ तो मैंने सऊदी में रहने वाले अपने दोस्त रेहान भाई को फोन लगाया। उन्होंने मुझसे कहा ये सच है। मेरा दिल बैठ गया।

नेट पर ही मैंने सऊदी सरकार का इस पर बयान पढ़ा कि पैगम्बर साहब का मकान इन भव्य इमारतों के पास पार्किंग के स्थान में अवरोध पैदा करता था। इस मकान के कारण रास्ता तंग हो गया और वाहनों के आने-जाने में लगातार बाधा होती थी। इसलिए इस घर को ध्वस्त करना जरूरी हो गया था। हैरत की बात है कि पैगम्बर साहब का घर तोड़ते वक्त विरोध की एक भी आवाज दुनिया के किसी कोने से नहीं सुनाई दी। इस्लामिक जगत में ऐसी चुप्पी और खामोशी अजब है। मैंने अपने एक मुसलमान दोस्त से पूछा तो उनका जवाब था-किस मुसलमान में हिम्मत है कि वह अरब के शाह के खिलाफ आवाज उठाए। जो उठाएगा वह दोजख में जाएगा। उसकी आने वाली नस्लों का हज पर जाना बंद हो जाएगा। फिर आगे वह बोले कि वैसे इसमें गलत क्या है? पैगम्बर का पुश्तैनी घर, उनकी बेगमों के घर, पुरानी मस्जिदें, ये सब इमारतें हाजियों की सुविधा के लिए गिराई गईं। इस्लाम प्रतीक पूजा की इजाजत नहीं देता। हम मुसलमानों की श्रद्धा हज यात्रा में है प्रतीकों में नहीं।

मैंने सिर्फ तर्क के लिए कहा-फिर बाबरी मस्जिद के ढहाने पर पूरी दुनिया का इस्लाम नाराज क्यों है? उसके नाम पर क्यों दंगे हुए? कुछ उन्मादियों की हरकत के बदले सड़क पर दोनों तरफ के लोगों के खून क्यों बहाए गए? (हालांकि निजी तौर पर उसके ढहाए जाने को गैर अखलकी कदम मानता हूं क्योंकि हमारा संविधान इसकी इजाजत नहीं देता) वे जवाब नहीं दे पाए। मैं अपने अन्य मुस्लिम और कम्युनिस्ट दोस्तों से इस सवाल का जवाब मांगता हूं। इस्लाम की निशानियां मिटाने का विरोध क्यों नहीं होना चाहिए? अरब के ऐसे शाह का हाथ क्यों चूमा जाए जिसने इन पवित्र स्‍थानों को नेस्तानबूद कर दिया? उम्मीद है मुझे तर्कपूर्ण जवाब मिलेगा।

लेखक दयाशंकर शुक्ल सागर अमर उजाला अखबार के शिमला संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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विवाद के बाद बंद हुए ‘उर्दू टाइम्स मुंबई’ अखबार को ‘मुम्बई उर्दू न्यूज़’ नाम से लाने की तैयारी!

मुम्बई । उर्दू टाइम्स मुंबई का पिछले 3 महीने से प्रकाशन बन्द हो गया है। इसकी वजह चाचा भतीजे के बीच पारिवारिक सम्पत्ति का बटवारा बताया जा रहा है। सईद अहमद और इम्तेयाज के बीच चल रहे विवाद में मुम्बई का एक पुराना उर्दू अखबार लगभग 3 महीना पहले से पूरी तरह बन्द हो गया है। अभी तक दोनों फरीक किसी नतीजे पर नही पहुँचे है। अब उर्दू टाइम्स के पार्टनर सईद अहमद के भतीजे इम्तेयाज मुम्बई उर्दू न्यूज़ नामक अखबार लाने की जुगत में हैं।

कहा तो यह भी जा रहा है कि इम्तेयाज ने उर्दू टाइम्स के नाम से मिलता जुलता नाम रजिस्टर्ड कराने की पूरी कोशिश किया मगर नाकामी हाथ लगी जिसके बाद वह 2010 में साप्ताहिक के तौर पर रजिस्टर्ड मुम्बई उर्दू न्यूज़ नामक अखबार को दैनिक कर उर्दू टाइम्स की मार्किट पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहते है। मगर अभी तक रजिस्ट्रार आफ न्यूज़ पेपर आफ इण्डिया की वेबसाइट पर मुम्बई उर्दू न्यूज़ साप्ताहिक के तौर पर ही दर्ज है।

सूत्रों की मानें तो उर्दू टाइम्स के पुराना स्टाफ इम्तेयाज अहमद के साथ है इसी बल पर इम्तेयाज उर्दू टाइम्स की मार्केट पर कब्ज़ा ज़माने का सपना देख रहे हैं। लगभग 3 महीने से मुम्बई की मार्किट से गायब अखबार को पाठक पचा पाएंगे, यह अब भी एक बड़ा सवाल है। जहां तक उर्दू पाठकों की बात है तो उर्दू टाइम्स विवाद का सबसे बड़ा फायदा जागरण समूह के रोज़नामा इंक़लाब को मिला है और उसके ज़्यादातर पाठको ने इंक़लाब को अपना लिया, इसलिए इम्तेयाज के लिए आज के समय में यह नया तजरबा कितना कारगर साबित होगा, वह अखबार के मार्केट में आने के बाद साफ़ हो पायेगा मगर इतना तो है मुंबई उर्दू न्यूज़ का जो नाम है उसको उर्दू टाइम्स की तरह हूबहू नकल किया गया है।

सूत्रों के अनुसार इस अखबार का विमोचन देश के किसी बड़े मुस्लिम राजनेता से कराने की तैयारी चल रही है। मगर उर्दू टाइम्स का इतिहास और अतीत मुम्बई के पाठक वर्ग से लेकर हर किसी की ज़ुबान पर है। ऐसे में इस अखबार के लिए मुम्बई में पैठ बनाना आसान नहीं होगा। वैसे इस पारवारिक झड़गे की मुख्य वजह पेड न्यूज़ से मिले माल और एक पेज पर दो दलों को हराना जिताना बताया जा रहा है। इम्तेयाज अहमद इन सब मुद्दों पर महज़ यह कहकर निकल गए कि जल्द ही सब कुछ साफ़ हो जाएगा। फिलहाल मुम्बई उर्दू न्यूज़ का प्रचार पम्पलेट के ज़रिये तेज़ी से किया जा रहा है। वैसे उर्दू टाइम्स ने भी मुम्बई विश्व प्रहरी टाइम्स के नाम से एक तजरबा 12 साल पहले किया था मगर नाकामी हाथ लगी। अब देखना यह होगा कि उर्दू नाम से यह प्रयोग कितना सफल होता है।

मुंबई से दानिश आजमी की रिपोर्ट. संपर्क: danishazmireporter@gmail.com

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देश के मुसलमानों को दलितों से सीखना चाहिए राजनीति का सबक

इमामुद्दीन अलीग

इतिहास के अनुसार देश के दलित वर्ग ने सांप्रदायिक शोषक शक्तियों के अत्याचार और दमन को लगभग 5000 वर्षों झेला है और इस इतिहासिक शोषण और भीषण हिंसा को झेलने के बाद अनपढ़, गरीब और दबे कुचले दलितों को यह बात समझ में आ गई कि अत्याचार, शोषण,सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि राजनीतिक रूप से सशक्त बना जाए। देश की स्वतन्त्रता के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई तो दलितों ने इसे  अपने लिए एक बहुत बड़ी नेमत समझा। इस शुभ अवसर का लाभ उठाते  हुए पूरे के पूरे दलित वर्ग ने सांप्रदायिक ताकतों के डर अपने दिल व दिमाग से उतारकर और परिणाम बेपरवाह होकर अपने नेतृत्व का साथ दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनसंख्या के आधार 18-20% यानी अल्पसंख्यक में होने के बावजूद भी उन्होंने कई बार सरकार बनाई और एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दलितों के चिर प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पार्टी भाजपा को भी दलित नेतृत्व के सामने गठबंधन के लिए सिर झुकाना पड़ा।

देश के मुसलमानों के सामने अपनी स्थिति को बदलने के लिए यह एक जीता जागता और स्पष्ट उदाहरण है। अगर दलितों ने भी मुसलमानों की तरह सांप्रदायिक शोषक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने की चिंता पाल ली होती और वह भी अपने नेतृत्व की स्थापना करने के बजाय अन्य राजनीतिक दलों की पूंछ पकड़ कर बैठे रहते तो आज दलितों का भी वही हाल होता जो मुसलमानों का है। जबकि दलितों ने दूरदृष्टि से काम लिया, आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के खौफ से बेपरवा होकर उन्होंने अपने नेतृत्व का साथ दिया और आज इसका नतीजा सब के सामने है। लोकतांत्रिक भारत में मुसलमानों के पास भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इससे हटकर कोई दूसरा रास्ता नहीं है कि वे अपने नेतृत्व को मजबूत करें और सभी कठिनाइयों, संदेह, और शिकायतों को पीछे छोड़ कर अपने नेतृत्व का साथ दें। राजनीतिक रूप से सशक्त होने से ही देश के मुसलमानों अनगिनत समस्याओं का समाधान निकल सकता है। दलितों की तरह मुसलमानों को भी अपने सभी मतभेदों को भूलकर और अपने दिल व दिमाग से सांप्रदायिक ताकतों के डर का बोझ उतार कर अपने टूटे फूटे नेतृत्व को मजबूत करना होगा। वैसे देखा जाए तो मुसलमानों ने दलितों की तुलना में साम्प्रदायिक शक्तियों की बर्बरता का एक हिस्सा भी नहीं झेला है। दलित वर्ग तो आज भी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के जहर को पी रहा है। ऐसे में जब दलित सांप्रदायिक ताकतों के डर को अपने मन से उतार कर अपना नेतृत्व स्थापित कर सकते हैं तो फिर मुसलमान क्यों नहीं?

अगर दूरदृष्टि से काम लिया जाए और आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के डर से ऊपर उठकर सोचा जाए तो यह बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमानों के पास राजनीतिक दिवालियापन से बाहर निकलने का एकमात्र यही रास्ता है कि जो भी थोड़ा बहुत प्रभावी मुस्लिम नेतृत्व और मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों के बीच मौजूद हैं, उन्हीं को मजबूत किया जाए। अन्य समुदायों के नेतृत्व पर भरोसा करने या उनकी राजनीतिक गुलामी करने से मुसलमानों का राजनीतिक दिवालियापन दूर होने से रहा। वैसे भी मुसलमानों ने अपनी राजनीतिक पार्टियों को मजबूत करने के अलावा अन्य सभी विकल्पों को आजमा कर देख लिया है। इन विकल्पों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों से लेकर दलित व पिछड़े नेतृत्व सहित सभी क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं, जिन्हें मुसलमानों ने कई कई बार अपना एकमुश्त वोट देकर सफल किया मगर सत्ता प्राप्त करने के बाद उन सभी ने मुसलमानों की समस्याओं को हल करने के बजाय मुसलमानों को अपना राजनीतिक गुलाम बनाए रखने के लिए दिन रात एक कर दिया और सांप्रदायिक ताकतों के अनजाने भय में डाल कर मुसलमानों को हमेशा ही उभरते मुस्लिम नेतृत्व से शंकित करने का काम किया जिसका परिणाम  यह निकला कि मुसलमान राजनीतिक रूप से विकलांग होकर रह गए।

मुसलमानों को यह बात समझनी होगी कि इस दावे में कोई दम नहीं है कि मुसलमानों के एकजुट होने और अपनी पार्टी बनाने से हिंदू समुदाय एकजुट हो जाएगा और सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत होंगी। अगर इस धारणा को मान भी लिया जाए तो इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, कोई भी उतार चढ़ाव हमेशा के लिए नहीं होता है बल्कि सब कुछ क्षणिक (वक़्ती) होता है। वैसे तो मुसलमानों के एकजुट होने से पहले तो हिंदू समुदाय के एकजुट होने की संभावना बहुत कम है लेकिन अगर हो भी जाए तो यह भी एक वक़्ती बात होगी, क्योंकि कि बसपा, सपा, कांग्रेस और वामपंथी दलों सहित अन्य कई पार्टियां मुसलमानों के चिंता में अपने अस्तित्व (वजूद) से समझौता नहीं करेंगी। यह तो केवल देश के मुसलमानों की विशेषता रही है कि वह सांप्रदायिक शक्तियों की चिंता में अपने राजनीतिक अस्तित्व से समझौता करके बैठ गए और देश की आजादी के बाद से अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करने और दूसरों के नेतृत्व की राजनीतिक गुलामी करने अलावा उन्हें और कुछ सुझाई नहीं दे रहा है।

बहरहाल मुस्लिम नेतृत्व की चिंता में देश की अन्य सभी पार्टियां सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला कर अपने अस्तित्व को मिटाने का खतरा नहीं मोल ले सकती हैं बल्कि इसके विपरीत यही पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने की खातिर मुस्लिम नेतृत्व से गठबंधन करने के लिए खुद आगे आएंगी और तब मुसलमान अपने शर्तों पर इन पार्टियों को झुकने के लिए मजबूर कर सकेंगे। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि देश के अधिकतर पार्टियां अवसरवादी हैं। जब दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी बसपा और भाजपा सत्ता के लिए गठबंधन कर सकते हैं तो आगे चलकर अन्य दलों का मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन क्यों नहीं हो सकता? और अगर आगे चलकर कोई भी पार्टी मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार न हो तब भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुसलमान अपनी 20-22 प्रतिशत आबादी के दमखम पर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में होंगे और अपने खिलाफ वाली किसी भी आवाज़ या कार्रवाई का जोरदार तरीके से विरोध कर सकेंगे और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की स्थिति में होंगे।

लेकिन याद रखें, यह सब तभी संभव है जब मुसलमान अपने नेतृत्व और अपनी राजनीतिक दलों को मजबूत कर लें और उनका लगातार साथ दें, इसी एक तरीके से मुसलमानों को राजनीति में हिस्सेदारी मिल सकती है। मुस्लिम नेतृत्व स्थापित होने से पहले न तो मुसलमानों को राजनीति में हिस्सा मिल सकता है और न ही इससे पहले कोई प्रभावी प्रेशर ग्रुप बनने की संभावना है। अगर कोई प्रेशर ग्रुप बना भी लिया गया तो भी वह किसी काम का नहीं होगा,  कोई पार्टी मुसलमानों की एक न सुनेगी और न ही उनकी समस्याओं को हल करने के लिए गंभीर होगी, मुसलमान चाहे जितना चीख़ते चिल्लाते और विरोध करते रहें…..।

जब देश के सात आठ प्रतिशत आबादी वाले वर्गों से लेकर दो ढाई प्रतिशत आबादी वाले वर्ग भी अपना नेतृत्व स्थापित कर और एकजुट होकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर 15 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते?  जबकि कई राज्यों और क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 30-40 और कहीं कहीं तो उस से भी ऊपर है। मुसलमानों को इस विषय में गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।

लेखक इमामुद्दीन अलीग Imamuddin Alig युवा और स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 8744875157 के जरिए किया जा सकता है.

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मुस्लिम लड़के से प्यार में धोखा खाई तो मरने के पहले पूरे कौम को कमीना बता गई (पढ़ें पत्र)

Sanjay Tiwari : वह दलित होकर भी वेमुला नहीं थी। न ही अखलाक हो पायी थी। आनंदी होती तो टीवी रोता। सोशल मीडिया भी निंदा ही करता लेकिन उसका दुर्भाग्य यह था कि वह न रोहित थी, न टीवी की आनंदी, इसलिए बिहार के एक जिले में सिंगल कॉलम की खबर बनकर रह गयी। लेकिन पूनम भारती की मौत का एक संदेश है। उसी तरह का संदेश जैसे रोहित वेमुला की मौत में एक संदेश था। पूनम भारती एक ऐसे झूठे फरेब का शिकार हुई जिससे वह प्यार के आवेग में बच नहीं पायी।

बिहार में जहानाबाद की पूनम भारती जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने जाती थी वहां जाल बिछाये एक बहेलिये ने उसे फंसा लिया। “प्यार” के इस फंदे में फंसकर पूनम वहां तक चली गयी जहां कोई लड़की शादी से पहले जाने से बचती है। लेकिन जहांगीर ने तो उसे अपनी पत्नी बता ही दिया था लिहाजा जहांगीर ने उसे बिना शादी के “पेट” से कर दिया। यहां से आगे का रास्ता पूनम के लिए या तो जहांगीर के साथ जाता था, नहीं तो फिर कहीं नहीं जाता था। पूनम ने घर में कुछ भी नहीं बताया था कि वह एक ऐसे लड़के के प्यार में पड़ चुकी है जो उसकी जाति और धर्म का नहीं था। पेट का बच्चा गिराकर जहांगीर उसका साथ पहले ही छोड़ चुका था। इसके बाद वह कहां जाती? उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और पटना गया रेलवे लाइन को अपनी जिन्दगी का आखिरी मुकाम बना लिया।

उसने जो चिट्ठी लिखी है उसमें एक पूरी कौम को कसूरवार ठहराया है। “मियां जात कमीना होता है। इसकी जुबान पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।” रोहित वेमूला की तरह पूनम दलित होकर भी किसी ब्राह्मणवाद का शिकार नहीं हुई है। वह एक और वाद का शिकार हुई है जिसकी बुनियाद में ऐसे मौलवी और उनकी मानसिक संतान बैठे हुए हैं जो एक खास किस्म के “जिहाद” पर है। यह “जिहाद” एक मुशरिक को “पाक” बनाने की प्रक्रिया है। पूनम भारती शायद इसी मानसिकता का शिकार हो गयी। अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी बात वह कभी न लिखती कि “मियां जात” पर कभी भरोसा मत करना।

लेकिन पूनम भारती की मौत पर सवाल के सारे दरवाजे हमारी बौद्धिक दुनिया ने “लव जिहाद का झूठा प्रलाप” बताकर पहले ही बंद कर दिया है। हमारे समय की त्रासदी यही है कि हमने धोखा, फरेब और मौत का भी मजहबीकरण कर दिया है। ऐसे हालात में पूनमों के हिस्से में भले ही मौत हो लेकिन जहांगीरों के हिस्से में पूरी आजादी है। वे जो चाहें कर सकते हैं उसको बौद्धिक संरक्षण देनेवाले लोग दो मिनट का मौन तो रखेंगे लेकिन श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं बल्कि चुप्पी साधने के लिए।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shahnawaz Malik : दिल्ली में हर दिन शादी का झांसा देकर रेप और ख़ुदकुशी की कहानी छपती है। आरोपी सारे तिवारी शर्मा होते हैं। ख़ैर नफ़रत कम फैलाएं वरना इतिहास में नफ़रत फ़ैलाने वालों में.

Gaurav Sharma : Shehnawaj ji Delhi main Ek bhi crime ki khabar dikhao Jis main koi musalman na ho.

Shahnawaz Malik : शर्माजी…या तो रिकॉर्ड खंगालिए या फिर योगा करिए

Saurabh Dwivedi : इतिहास में नफरत फ़िलहाल एक ही कौम फैलाती आई और फैलाती रहेगी. रोज़ हज़ारो लाखो मासूमो को अपना निशाना बना कर कभी सुसाइड बॉम्बर बन के तो कभी आतंकवादी हमले करके उससे भी जी नहीं भरा तो लव जिहाद पे उतारू है

Shahnawaz Malik : तिवारीजी की वाल पर ट्रैफिक का स्टैंडर्ड काफी लो है। रेटोरिक कब तक करेंगे।

राकेश कुमार मिश्रा : कोई आवाज़ नहीं उठेगी कहीं से। अगर कोई विरोध करेगा भी तो उसे सेक्यूलर लोग संघी कह कर दो समुदायों में दरार पैदा करने की साज़िश कह कर ख़ारिज कर देंगे। वैसे मुझे इस लड़की के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। अवैध सम्बन्ध बनाते समय तो इसने कुछ नहीं सोचा अपने माँ बाप और परिवार की इज़्ज़त के बारे में और लेटर में लेक्चर झाड़ रही है।

Yusuf Ansari : संजय भाई, आपने पूनम की आवाज बुलंद करके अच्छाी काम किया है। मरने वाले का बयान सच्चा माना जाता है। मैं भी चाहता हूं कि पूनम को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले को सज़ा मिले। मैं भी आपकी पोस्ट शेयर कर रहा हूं।

Shahnawaz Malik : यूसुफ़ साब…दिल्ली समेत पूरे देश में हर दिन इसी तरह के रेप और मर्डर के मामले होते हैं, आप उसे क्यूं नहीं शेयर करते?

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, मैं न्याय के पक्ष में हूं और अन्याय के ख़िलाफ़। मेरा मानना है कि सबको इंसाफ़ मिलनमा चाहिए। बग़ौर घार्मिक और जातीय भेदभाव के। मैंने पहले भी ऐसी कई पोस्ट शेयर की हैं। आगे भी करूंगा। आपने याद दिलाया है तो और ज़्यादा ध्यान रखूंगा।

Shahnawaz Malik : न्याय के पक्ष में कौन नहीं है। तिवारी की इस पोस्ट में घृणा है और तर्क सारे खोखले। रोहित या अख़लाक़ अपनी पहचान की वजह से मारे गए, जबकि इस मामले में ऐसा नहीं है। रेप और मर्डर के सामान्य केस में जाति और धर्म जोड़ने से न्याय होगा या नहीं लेकिन अन्याय ज़रूर होगा।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, आपकी बात सही है। लेकिन क्या सिर्फ़ इसी वजह से हम इंसाफ के लिए आवाज़ छोड़ देें। पूनम को प्यार में धोखा मिला है। ये धोखा उसे जहंगीर की जगह कोई जसबीर भई दे सकता था। उसके साथ नाइंसाफ़ी तो ङुई है।

Shahnawaz Malik : ये एक नॉर्मल क्राइम है जो दिल्ली और देश के हर कोने में हर दिन होता है। आप आवाज़ उठाएंगे तो मैं पूछूँगा कि बाक़ियों के लिए क्यों नहीं उठाया। तिवारी का तो मकसद समझ आता है क्योंकि इसमें आरोपी मुस्लिम है। ये लोग दिनभर यही करते हैं।

Yusuf Ansari : भाई Shahnawaz Malik, सबके लिए इंसा की आवाज उठनी ही चाहिए। हम हिंदू और मुसलमान छोड़कर इंसान की बात करें तो बेहतर है।

Shahnawaz Malik : काश आप जैसा तिवारी महाशय भी सोचते। मैं इस लड़की के लिए आवाज़ फिर भी उठा सकता हूँ लेकिन ये पोस्ट नहीं शेयर करूँगा।

Yusuf Ansari : हमें शुरुआत अपने से करनी चाहिए। हमने शुरुआत कर दी है। इंशाल्लाह नतीजे अच्छे ही होंगे। Shahnawaz Malik भाई, कोई बात नहीं आप आवाज़ उठाइए। पोस्ट शेयर मत कीजिए। आपकी आवाज़ यहीं से दूक तर जाएगी।

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धार्मिक जनगणना के डाटा पर टीओआई और द हिंदू के इन शीर्षकों को गौर से पढ़िए

See how two of India’s leading newspapers have today reported the same data (of the latest Census)

Nadim S. Akhter : इसे देखिए, पढ़िए और समझिए. देश के दो प्रतिष्ठित अखबारों निष्ठा. किसकी निष्ठा पत्रकारिता के साथ है और किसकी चमचई में घुली जा रही है, खबर की हेडिंग पढ़ के समझा जा सकता है. मैंने कल ही फेसबुक की अपनी पोस्ट में लिखा था कि अलग-अलग चम्पादक, माफ कीजिए सम्पादक धार्मिक जनगणना के इस डाटा का अपने अपने हिसाब से इंटरप्रिटेशन करेंगे. आज फेसबुक पर एक ही खबर के दो एंगल, बिलकुल जुदा एंगल तैरता हुआ देखा तो आपसे साझा कर रहा हूं.

एक The Times of India नामक का देश का सबसे बड़ा अखबार है तो एक The Hindu नाम का प्रतिष्ठित अखबार. चूंकि टाइम्स ग्रुप में 6 साल नौकरी की है. Times Building में ही तो पता है कि वहां हेडिंग लगाने में कितनी मेहनत होती है. कितना इस पे विचारा और सोचा जाता है. नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी पत्रकार इसमें involve होते हैं. और अंत में हेडिंग सम्पादक-मुख्य सम्पादक को भी बताई जाती है. सो benefit of doubt के आधार पर Times of India को ये छूट नहीं दी जा सकती कि news editor या page one incharge यानी night editor टाइप की कोई चीज ने ये किया हो और ऊपर के लोगों को इसके बारे में पता ही ना हो. वो भी तब, जब अंग्रेजी वाले अखबार यानी Times of India पर विनीत जैन और समीर जैन की सीधी नजर होती है. मैं ये नहीं कह रहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग गलत है. बस अखबार ने सरकारी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से कर दिया है.

The Hindu अखबार ने उसी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से किया है लेकिन हेडिंग पढ़कर पाठकों को लगेगा कि दोनों अखबार परस्पर विरोधाभासी हैं. कोई एक अखबार गलत सूचना दे रहा है. लेकिन ऐसा है नहीं. यही तो डाटा इंटरप्रिटेशन का कमाल है. चुनाव के वक्त ऐसे ही थोड़े सेफोलॉजिस्ट बैठकर मनमाफिक पार्टी को टीवी पर जितवा देते हैं. सब डाटा का ही तो कमाल होता है. अपने हिसाब से रिजल्ट निकाल लो. बहरहाल. पत्रकारिता के छात्रों के लिए ये खबर और दोनों अखबारों की हेडिंग एक केस स्टडी है. और भारतीय लोकतंत्र तथा चौथे खंभे के लिए आईना. अब ये आप है कि आप इन दोनों में से कौन सा अखबार रोज पढ़ना चाहेंगे. क्योंकि -दैनिक जागरण- पढ़ने वालों को -हिन्दुस्तान- अखबार रास नहीं आएगा. मेरी खुशकिस्मती कि मैंने इन दोनों अखबारी ग्रुप में भी काम किया है. घोषित तौर पर कुछ नहीं होता, बहुत कुछ अघोषित होता है.

Nietzsche ने सच ही कहा है- “There are no facts, only interpretations!”

कुछ समझे !!! लोकतंत्र का चौथा खंभा डोल रहा है. मन डोले-तन डोले. और धन तो सबकुछ डोलावे रे. पैसा खुदा तो नहीं पर उससे कम भी नहीं. जूदेव बाबू यूं ही नहीं कहे थे ये बात. अखबारों और टीवी चैनलों का अर्थशास्त्र समझे बिना पत्रकारिता के चौथे स्तम्भ की हकीकत कहां समझ पाएंगे आप !!! मैं ये नहीं कह रहा कि सबकुछ गंदा है, पर जो कुछ बचा है, उतना ही बचा रह जाए आगे तो ये इस लोकतंत्र के लिए शुभ होगा. जय हो!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


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नकली मुसलमान

हरियाणा के भगाना नामक गांव में एक अजीबो-गरीब घटना घटी। इस गांव के लगभग डेढ़ सौ दलितों ने अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया। वे हिंदू से मुसलमान बन गए। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि पिछले तीन साल से वे बहुत दुखी थे। उनके गांव की ऊंची जातियों के लोगों ने उनकी ज़मीनों पर कब्ज कर लिया था। उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार करते थे। उन्हें कुएं से पानी नहीं भरने देते थे और लगभग ढाई-सौ दलितों को गांव-निकाला दे दिया था। 

ये दलित लोग चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री से मिल चुके थे। इन्होंने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई लेकिन इनको न्याय मिलने की बजाय गिरफ्तारी और पिटाई मिली। जबब ये जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे, केंद्र सरकार और अन्य राजनेताओं ने भी इनकी उपेक्षा की तो इन्होंने मजबूर होकर इस्लाम कबूल कर लिया। एक मौलाना ने इन्हें कलमा पढ़ा दिया।

यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है और सिर्फ आज की नहीं है। यह पूरे हिंदुस्तान की है और सदियों से चली आ रही है। हिंदुत्व की ध्वजा फहरानेवाले लोगों के पास इस रोग का कोई इलाज नहीं है। वे हिंदुओं को संगठित करने पर जोर देते हैं, जो ठीक है लेकिन उनके पास कोई तरकीब नहीं है कि वे हिंदुओं को सुधारें। उनमें समता और बंधुता पैदा करें। छुआछूत खत्म करें। जातिवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ें। रोटी और बेटी का रिश्ता सब लोगों के बीच खुला हो। जब तक इस तरह की सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति का कोई तेजस्वी आंदोलन शुरु नहीं होगा, धर्म-परिवर्तन होता रहेगा। उसे कोई भी रोक नहीं पाएगा। 

लेकिन जिन्होंने अपना धर्म-परिवर्तन किया है और जिन्होंने वह करवाया है, उनसे भी मुझे कुछ कहना है। गुस्से में आकर आपने अचानक धर्म-परिवर्तन कर लिया तो उससे क्या फर्क पड़ गया? क्या अब आपको भगाना गांव की ऊंची जातियां वहां वापस रहने देंगी? अब आप दुगुने अछूत हो जाएंगे। क्या भारत के मुसलमान आपके साथ रोटी और बेटी का व्यवहार खुलकर करेंगे? बिल्कुल नहीं करेंगे! जातिवाद के जहर ने भारत के इस्लाम को भी डस रखा है। जिस मौलवी ने इन दलितों को कलमा पढ़ाया है, उसने क्या नकली मुसलमानों की संख्या नहीं बढ़ाई है? यह इस्लाम का सम्मान हुआ है या अपमान? अच्छा तो यह होता कि राज्य और केंद्र की सरकारें भगाना के इन दलितों को तुरंत न्याय दिलाती और ये दलित लोग इस्लाम की ओट में छिपने की बजाय अपने अधिकार और सम्मान के लिए जी-जान से लड़ते।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक से संपर्क : dr.vaidik@gmail.com

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अपने आप से संवाद : काश आप जैसे सभी मुसलमान हो जाएँ

मुसलमान अनपढ़ और जाहिल होते हैं. लेकिन मैं ऍम.ए, पी-एच.डी हूँ. मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं. मेरा तो एक ही बेटा है. मुसलमान देश का नहीं, पाकिस्तान का झंडा फहराते हैं. मैंने पाकिस्तान पर किताब लिखी है. आप उसे पढ़ लें. समझ लेंगे कि मैं किसका झंडा फहराता हूँ.  मुसलमान टैक्स नहीं देते. टैक्स तो मेरे वेतन से कटा करता था. रिटायर होने के बाद पेंशन से कटता है. मुसलमान आतंकवादी होते हैं. मैं हर तरह के आतंक का विरोधी हूँ.

मुसलमान भारतीय संस्कृति से प्रेम नहीं करते. मैंने जीवन भर देश, विदेश में हिंदी पढ़ाई हैं. बीस से अधिक किताबें हिन्दी में लिखी हैं. काश आप जैसे सभी मुसलमान हो जाएँ. क्यों नहीं हो सकते. उन्हें शिक्षा मिले, रोज़गार मिले, सुरक्षा मिले, सम्मान मिले तो सभी मुसलमान मेरे जैसे हो सकते हैं… 

देखो..मेरी पोस्ट को करीब डेढ़ हज़ार लोगों ने ‘लाइक’ किया है… १०-१५ ने घोर असहमति दर्ज कराई है…. बातचीत आगे बढाने का काम तो हो ही सकता है. याद है मुसलमान औरतों के परदे पर जब तुमने लिखा था तो कुछ मुस्लिम संगठनों ने तुम्हें मुसलमान मानने से इनकार कर दिया था… तुम फिर से मुसलमान हो गए हो.. बधाई हो…

ज़हिदे-तंग नज़र( संकुचित द्रष्टिकोण वाले मुल्ला) ने मुझे काफ़िर समझा . और काफ़िर ये समझता है मुसलमा ( मुसलमान ) हूँ मैं. वो सब छोड़ो…. यार मेरी आँखें खुल गयी है कुछ भाई लोगों के कमेंट्स पढ़ कर. क्या? हमारे देश में शिक्षा सब के लिए उपलब्ध है… जो चाहे पढ़ ले … नौकरियां कम्पटीशन से मिलती हैं…जो पास हो जाये कर ले.. हमारे देश में सब सुरक्षित हैं… हर सांप्रदायिक दंगे की शुरुआत मुसलमान करते है…(ताकि अच्छी तरह पिट सकें).. इस्लाम के मूल में हिंसा है (पूरा कुरान शरीफ और हदीस उन्होंने पढ़ा है)… मुसलमान पूरी दुनिया को मुसलमान बनाना चाहते हैं…. हर मुसलमान मदरसों में पढ़ना चाहता हैं… जो उवैसी कहता है वही सब मुसलमान कहते हैं…जो ओसामा बिन लादेन करना चाहता था वही सभी मुसलमान करना चाहते हैं… इसलिए सभी मुसलमान घ्रणा के पात्र है…

– ये सब बातें इन लोगों को कौन बताता , समझाता है… कि ये लोग इतने बढे- बढ़े ‘फतवे’ कैसे दे देते हैं…आज हमारे देश में हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के कट्टरपंथी… राजनीति में सफलता पाने के इच्छुक….हर तरह की नफरत,हिंसा और द्वेष फैला रहे हैं… इन्हें देश ,समाज, मानवता से कोइ मतलब नहीं है…ये केवल सत्ता चाहते है..किसी भी कीमत पर… ये कुछ सोचना, समझना भी नहीं चाहते… क्योंकि उनका एजेंडा साफ़ है… फूट डालो, लड़वाओ और राज करो…

फिर किया क्या जाए… शांति,दोस्ती, प्रेम, सद्भाव और सहयोग पर विश्वास करने वाले हिन्दू मुसलमान साथ आयें…ग़ैर धार्मिक गैर राजनीतिक शुरुआत हो… मोहल्ला स्तर पर… जिला स्तर पर …।

प्रसिद्ध लेखक असगर वजाहत के एफबी वाल से

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मुस्लिम होना गुनाह है क्या?

विकिपीडिया पर जवाहर लाल नेहरू को मुस्लिम लिख देने से कांग्रेसी भड़के हुए नजर आ रहे हैं। हंगामे के चलते नेहरू-गांधी खानदान के अतीत को जानने की लोगों में एक बार फिर उत्सुकता नजर आ रही है, इसलिए इस खानदान के अतीत पर एक नजर डालते हैं। लोकप्रियता एक सीमा लांघ जाये, तो फिर लोकप्रिय व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत कुछ नहीं रहता। जनता सब कुछ जानना चाहती है और अगर, जनता को सटीक जानकारी न दी जाये, तो तमाम तरह की भ्रांतियां जन्म ले लेती हैं। नेहरू-गांधी खानदान के संबंध में भी ऐसा ही कुछ है। इस खानदान के व्यक्तियों से जुड़ी घटनायें सार्वजनिक न होने से कई तरह की अफवाहें हमेशा उड़ती रहती हैं। चूँकि भारतीय राजनीति में यह खानदान आज़ादी के समय से ही महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है और लगातार बना हुआ है, इसलिए अफवाहें भी लगातार बनी रहती हैं। अफवाहों के आधार पर एक वर्ग इस खानदान के व्यक्तियों को त्यागी और महापुरुष सिद्ध करता रहा है, तो दूसरा पक्ष ऐसी अफवाहें फैलाता रहता है, जिससे इस खानदान के व्यक्तियों का सम्मान क्षीण हो जाये।

नेहरू-गांधी खानदान का इतिहास उनके नजदीकियों द्वारा लिखी गई पुस्तकों और उनके समय के लेखों से ही अधिक मिलता है। सरकार का प्रयास इतिहास को दबाना ही रहा है, इसलिए इस खानदान के संबंध में जानकारी एकत्रित करने के लिए उनके समय के और उनसे जुड़े साहित्य को ही पढ़ना पढ़ता है। जातिगत दृष्टि से यही सिद्ध होता है कि यह वंश मुस्लिम है और बाद में स्वयं को कश्मीरी पंडित कहने लगा, साथ ही नहर के किनारे रहने के कारण नेहरू सरनेम संयोग से पड़ गया। मोती लाल नेहरू से पहले के इतिहास को लेकर बड़ा घालमेल है और उसको लेकर विवाद की स्थिति है। हालाँकि पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की पिछले दिनों एक पुस्तक आई है। “Profile and Letters” में मुगलों के प्रति इंदिरा गांधी के आदर का रहस्योद्घाटन करते हुए लिखा है कि जब 1968 में प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी अफगानिस्तान की आधिकारिक यात्रा पर गईं, तो नटवर सिंह उनके साथ एक आई.एफ़. एस. अधिकारी के तौर पर गए हुए थे।

इंदिरा गाँधी सैर के लिए जाना चाहती थी। इंदिरा गाँधी ने बाबर की दरगाह को देखने की इच्छा जाहिर की, जो उनके कार्यक्रम का हिस्सा नहीं थी, इसीलिए अफगानी सुरक्षा अधिकारियों ने भी इंदिरा को ऐसा न करने की सलाह दी, लेकिन इंदिरा अपनी बात पर अड़ी रहीं और अंत में इंदिरा उस जगह पर गईं। यह एक सुनसान जगह थी, वह वहां कुछ देर तक अपना सिर श्रद्धा में झुकाए खड़ी रहीं। नटवर सिंह पीछे ही खड़े थे और इंदिरा गाँधी ने मुड़ कर नटवर सिंह से कहा कि आज वो अपने इतिहास से मिल के आई हैं। पुस्तक के इस अंश से यही सिद्ध होता है कि नेहरू-गांधी वंश मूल रूप से मुस्लिम ही है। 

इस सब पर विवाद है, लेकिन जवाहर लाल नेहरू के बाद की घटनायें सटीक और प्रमाणित कही जा सकती हैं। इस खानदान के व्यक्तियों द्वारा किये गये राजनैतिक कार्यों की जानकारी अधिकांश लोगों को है ही, इसलिए कुछ व्यक्तिगत घटनाओं का उल्लेख करते हैं। जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद के जिस मोहल्ले में हुआ, वो मोहल्ला वेश्याओं का था और आज भी है, जिससे तंग आकर मोती लाल नेहरू ने मोहल्ला छोड़ दिया। बाद में मोती लाल नेहरू ने ‘इशरत मंजिल’ नाम का भवन खरीदा, जिसे आज आनंद भवन के नाम से जाना जाता है। शिक्षा के बाद जवाहर लाल नेहरू आज़ादी के आंदोलन से जुड़े, लेकिन आज़ादी के आंदोलन में जवाहर लाल नेहरू का बहुत बड़ा और प्रभावी योगदान नहीं था, लेकिन महात्मा गाँधी और अंग्रेजों से नजदीकी संबंध होने के कारण जवाहर लाल नेहरू भारतीय राजनीति के सिरमौर बन गये।

जवाहर लाल नेहरू कई महिलाओं के प्रति आकर्षित रहे हैं, जिनमें माउंटबेटन एडविना के साथ उनके संबंध चर्चा में रहते हैं। हालांकि एडविना के वंशजों ने प्रेम संबंध को आध्यात्मिक मानते हुए शारीरिक संबंधों को नकार दिया है, लेकिन यह सच नहीं है। तथ्य यही कहते हैं कि उनके बीच शारीरिक संबंध भी थे। जवाहर लाल नेहरू का स्त्रियों के प्रति आकर्षण ही उनकी पत्नी कमला नेहरू से दूरी का कारण बना और अंततः साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे के लिए अंजान से हो गये। बाद में इंदिरा गाँधी भी आपत्ति दर्ज कराने लगीं। वे स्वयं इस मुददे पर बात नहीं कर सकती थीं, इसलिए वे अक्सर अपने पिता जवाहर लाल नेहरु को समझाने के लिए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का सहारा लेती थीं। एक जगह ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि जवाहर लाल नेहरू के तेजी नाम की लड़की से संबंध थे। तेजी नाम की लड़की इंदिरा की पक्की सहेली थी, जो आनंद भवन में इंदिरा के साथ खेलने आती थी, इसके प्रति जवाहर लाल नेहरू आकर्षित हो गये। कई वर्ष चले संबंधों के बाद जवाहर लाल नेहरू ने अपने एक शिष्य हरिवंश राय बच्चन से तेजी का विवाह करा दिया और विवाह के बाद हरिवंश राय बच्चन को शोध के लिए विदेश भेज दिया, जो दस साल के बाद लौटे, इस बीच तेजी जवाहर लाल नेहरू के साथ ही प्रधानमंत्री आवास में रहती थीं।

जवाहर लाल नेहरू के सरोजिनी नायडू की पुत्री पद्मजा नायडू से भी संबंध थे और वे उनकी फोटो अपने कमरे में लगा कर रखते थे, जिसे इंदिरा गाँधी अक्सर हटा दिया करती थीं। जवाहर लाल नेहरु का संबंध शारदा नाम की बनारस की एक सन्यासिन से भी था, जिसके संबंध में प्रमाण मिलता है कि वह अत्यधिक आकर्षक होने के साथ प्राचीन भारतीय शास्त्रों और पुराणों की ज्ञाता थी, साथ ही उसने गर्भवती होने पर विवाह का दबाव बनाया, तो जवाहर लाल नेहरू ने उससे किनारा कर लिया। ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं कि उस सन्यासिन के एक बेटा पैदा हुआ था, जिसे एक ईसाई मिशनरी के बोर्डिंग स्कूल में छुड़वा दिया गया। 

इस बच्चे का जन्म 30 मई 1949 को बताया गया है, लेकिन स्कूल में जाने के बाद इस बच्चे के प्रमाण नहीं मिलते। जवाहर लाल नेहरू के कई महिलाओं से संबंध होने के कारण सिफलिस नाम की बीमारी हो गई, जिससे उनका निधन हो गया।

जवाहरलाल नेहरू की एक बहन विजय लक्ष्मी के संबंध में प्रमाण मिलते हैं कि अपने पिता के कर्मचारी सयुद हुसैन से उनके संबंध थे और वे उसके साथ भाग गईं, तो मोती लाल नेहरू किसी तरह उन्हें वापस लाये और फिर एक रंजीत पंडित नाम के व्यक्ति से शादी करा दी। जवाहर लाल नेहरू की बेटी का नाम इंदिरा नेहरू था, लेकिन शांति निकेतन विश्व विद्यालय में पढ़ने गईं, तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इंदिरा प्रियदर्शिनी नाम रख दिया। इंदिरा प्रियदर्शिनी को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भी भेजा गया, जहां वे सफल नहीं हो पाईं। कहीं-कहीं ऐसा भी प्रमाण मिलता है कि शांति निकेतन के अनुरूप व्यवहार न होने के कारण उन्हें वहां से भी निकाला गया था, जिसके बाद उन्हें ऑक्सफोर्ड भेजा गया। माँ कमला नेहरू तपेदिक से ग्रस्त थीं। पिता जवाहर लाल नेहरू राजनीति से बचा समय महिलाओं के बीच गुजारते और बुआओं से भी अच्छे संबंध न होने के कारण इंदिरा प्रियदर्शिनी का पारिवारिक वातावरण उनके अनुकूल बिल्कुल भी नहीं था। इस बीच कमला नेहरू की हालत और गंभीर हुई, तो फ़िरोज़ खान नाम का युवक उनके संपर्क में आ गया, जिसने कमला नेहरू की सेवा करते हुए इंदिरा प्रियदर्शिनी को भी संभाला। मोती लाल नेहरु की हवेली में काम करने वाले एक पारसी नवाब खान के बेटे फिरोज खान की सेवा और सहानुभूति इंदिरा प्रियदर्शिनी को भा गई और उन्होंने समर्पण कर दिया। दोनों ने लंदन स्थित एक मस्जिद में निकाह कर लिया और धर्म बदलने पर इंदिरा प्रियदर्शिनी को नाम दिया गया मैमुना बेगम।

इस निकाह के विरुद्ध जवाहर लाल नेहरू भी थे, लेकिन कमला नेहरू ने सब से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि कमला नेहरू के मुबारक अली से संबंध थे और उनसे ही इंदिरा का जन्म हुआ, साथ ही कमला नेहरू के संबंध फ़िरोज़ खान से भी रहे, इसीलिए वे फ़िरोज़ खान और इंदिरा के निकाह करने से बिफर गई थीं, लेकिन इंदिरा के सामने किसी की नहीं चली और अंत में महात्मा गांधी ने बीच में आकर सब कुछ संभाला। उन्होंने फिरोज खान का नाम परिवर्तित करा कर दोनों का वैदिक रीती से विवाह कराया, जिससे फिरोज खान हो गये फिरोज गाँधी और इंदिरा प्रियदर्शिनी से मैमुना बेगम बनी इंदिरा गाँधी हो गईं, लेकिन उस समय के कानून के अनुसार यह विवाह अवैध था। बाद में इंदिरा गाँधी के संबंध फिरोज खान से बिगड़ गये। शारीरिक संबंध पूरी तरह बिच्छेद हो जाने के बाद फिरोज गांधी दूसरी शादी के बारे में सोच रहे थे, इस बीच उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन मृत्यु से पूर्व वे खुल कर विरोध करने लगे थे। 1956 में फिरोज गांधी ने सरकार के बेहद करीबी माने जाने वाले देश के सबसे अमीर लोगों में एक रामकिशन डालमिया का घोटाला उजागर किया था, जिसमें डालमिया को दो साल की सज़ा मिली, इसी तरह 1958 में उन्होंने चर्चित हरिदास मूंदड़ा घोटाले का खुलासा किया, जिसमें समूची सरकार की फजीहत हुई। मूंदड़ा जेल गये थे, वहीं उस समय के वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी को त्याग पत्र देना पड़ा था। फिरोज गांधी की 8 सितंबर 1960 को मृत्यु हुई, तो इंदिरा अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के साथ एक विदेशी दौरे पर गयीं थीं।

सक्रीय राजनीति में आने के बाद इंदिरा का नाम कई अन्य पुरुषों के साथ जुड़ता रहा, जिसके उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में मिलते हैं। केथरीन फ्रेंक की एक किताब “The Life of Indira Nehru Gandhi” में इंदिरा गाँधी के अन्य संबंधों के बारे में बहुत कुछ मिलता है। इंदिरा गाँधी का सबसे पहला संबंध अपने जर्मन अध्यापक से था। पिता जवाहर लाल नेहरू के सेक्रेट्री एम्. ओ. मैथई के साथ भी उनका प्रेम संबंध रहा। योग के अध्यापक धीरेन्द्र ब्रह्मचारी से भी उनके संबंध रहे, बाद में विदेश मंत्री दिनेश सिंह के साथ उनके संबंध चर्चा का विषय बने।

इंदिरा गाँधी के दो बेटे हुए, जिनमें एक का नाम राजीव गांधी और दूसरे का नाम संजय गाँधी था। एक जगह प्रमाण मिलता है कि संजय गाँधी का नाम पहले संजीव गाँधी था, लेकिन ब्रिटेन में एक घटना के बाद उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, तो तत्कालीन राजदूत कृष्णा मेनन ने संजय गाँधी नाम का एक और पासपोर्ट जारी करा दिया, जिसके बाद उनका नाम संजय गाँधी ही हो गया। “The Nehru Dynasty” में जे. एन. राव ने लिखा है कि इंदिरा गाँधी का दूसरा बेटा संजय गाँधी फिरोज गांधी की सन्तान नहीं थे, साथ ही लिखा है कि संजय का जन्म मोहम्मद युनुस के साथ अवैध संबंधों से हुआ था। युनुस की लिखी किताब “Persons, Passions & Politics” से पता चलता है कि बचपन में संजय गाँधी का मुस्लिम रीती-रिवाज के अनुसार खतना भी किया गया था। 

संजय गाँधी भी अपने नाना की तरह महिलाओं की ओर आकर्षित होने वाले व्यक्ति थे। उस वक्त मेनका का ग्लैमर की दुनिया का चमकता हुआ नाम था। 17 साल की मेनका बॉम्बे डाईंग के तौलिये के एक विज्ञापन से चर्चा में आई थीं। मेनका गर्भवती हो गईं थीं, तो मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने दबाव बना कर संजय को शादी करने के लिए मजबूर कर दिया था। संजय और मेनका की शादी मोहम्मद युनुस के ही घर पर हुई थी। इंदिरा गांधी को मेनका नाम पसंद नहीं था, इसलिए बदल कर मानेका नाम रखा गया था। तमाम राजनैतिक घटना क्रमों के बाद 23 जून 1980 को दिल्ली में एक विमान हादसे में संजय गांधी की मौत हो गई, जिसके बाद मेनका अपनी सास इंदिरा गांधी से अलग हो गईं और बेटे वरुण के साथ रहने लगीं। फिलहाल मेनका गांधी भाजपा सरकार में मंत्री हैं और उनके बेटे वरुण गांधी भी सांसद हैं।

1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई, तो राजनीति से पूरी तरह अनिभिज्ञ राजीव गांधी ने कमान संभाल ली और राज करने लगे, लेकिन 21 मई 1991 को श्रीपेरुंबदूर की एक सभा में काल ने राजीव गांधी का कतरा-कतरा मिटटी में मिला दिया, लेकिन इससे पहले उन्होंने भी इश्क किया। के.एन. राव अपनी पुस्तक “The Nehru Dynasty” में लिखते हैं कि राजीव गांधी शादी करने के लिए एक कैथोलिक बन गये थे और नाम रखा गया रॉबर्टो। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी पुस्तक “Assassination Of Rajiv Gandhi-Unasked Questions and Unanswered Queries” में लिखा है कि सोनिया गाँधी का असली नाम अन्तोनिया मायनो था, इनके पिता फासिस्ट थे और उन्होंने रूस में पांच साल के कारावास की सज़ा काटी थी। सोनिया कैम्ब्रिज के एक होटल में वेट्रेस का काम करती थीं। इंग्लैंड में सोनिया गाँधी की माधव राव सिंधिया के साथ गहरी दोस्ती थी, जो शादी के बाद तक जारी रही। 1982 में आई.आई.टी. दिल्ली मेन गेट के पास कार दुर्घटना ग्रस्त होने के कारण रात को 2 बजे के करीब दोनों एक ही कार में साथ-साथ पकड़े गए थे। 1992 में सोनिया गांधी ने अपनी इटालियन नागरिकता को बनाये रखने के लिए उसे रिन्यू करा लिया है। इटली के कानून के अनुसार इटालियन माँ सोनियां गांधी के चलते राहुल और प्रियंका भी एक इटालियन नागरिक हैं।

नेहरू-गांधी परिवार की प्रेम कहानी अभी जारी है। राजीव गाँधी व सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका ने रॉबर्ट वाड्रा से विवाह किया है। इन दोनों के बीच प्रेम संबंध ही थे, जो 13-14 वर्ष तक चले। बताते हैं कि रॉबर्ट और प्रियंका की मुलाकात दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी, जहां से दोनों एक-दूसरे के करीब आते चले गये। राहुल गांधी के संबंध में भी तमाम तरह की चर्चायें चलती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि अभी तक राहुल ने स्वयं इस संबंध में कुछ नहीं कहा है और न ही उनके प्रेम संबंध को लेकर कोई प्रमाण है।

खैर, हर किसी को अपना जीवन जीने की आजादी संविधान ने दे रखी है। सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से किसी के व्यक्तिगत जीवन को नहीं देखना चाहिये, पर ताजा प्रकरण पर कांग्रेसियों का आक्रोशित होना भी जायज नहीं ठहरा सकते, क्योंकि किसी धर्म में नेहरू कोई जाति नहीं होती। नेहरू सरनेम लगे होने से इस वंश के लोगों के सम्मान में कोई कमी नहीं आई। बाद में गाँधी सरनेम जुड़ गया, तो भी सम्मान में कोई कमी नहीं आई, ऐसे में अगर, यह सिद्ध भी हो जाता है कि नेहरू वंश के पूर्वज मुस्लिम थे, तो भी क्या अंतर पड़ेगा। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में धर्म और जाति के कोई मायने ही नहीं बचते हैं। 

कांग्रेसियों को शांत रहना चाहिए, वरना उन्हें यह भी बताना चाहिए कि मुस्लिम होना गुनाह है क्या, और हिंदू बने रहना श्रेष्ठ क्यूं है? धर्म, या जाति बदलने से व्यक्ति और उसके कार्य नहीं बदल जाते। 

लेखक बी.पी. गौतम से संपर्क : bpgautam99@gmail.com

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