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मीडिया दलाल है तो क्यों?

मीडिया दलाल है… मीडिया बिका हुआ है… आज इस तरह के आरोपों से मीडिया चौतरफा घिरा हुआ है। अब तो खबरिया चैनलों के एंकर भी बहस के दौरान इस बात का उलाहना देने लगे हैं कि “आप की निगाह में हम तो दलाल हैं ही”। ऐसा नहीं कि मीडिया (अखबारों) पर पहले कभी आरोप नहीं लगे। खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का ठीकरा आज भी मीडिया पर फोड़ा जाता है और मीडिया झेलता रहा है। आज अतीत का रोना रोने का समय नहीं है। मीडिया के दलाल होने के आरोप पर तो किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाना और फरमान सुना देना संभव नहीं है फिर भी इस पर मंथन जरूरी है कि समाज के हर कोने से दलाल होने के आरोप लग रहे हैं तो क्यों?

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मीडिया दलाल है… मीडिया बिका हुआ है… आज इस तरह के आरोपों से मीडिया चौतरफा घिरा हुआ है। अब तो खबरिया चैनलों के एंकर भी बहस के दौरान इस बात का उलाहना देने लगे हैं कि “आप की निगाह में हम तो दलाल हैं ही”। ऐसा नहीं कि मीडिया (अखबारों) पर पहले कभी आरोप नहीं लगे। खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का ठीकरा आज भी मीडिया पर फोड़ा जाता है और मीडिया झेलता रहा है। आज अतीत का रोना रोने का समय नहीं है। मीडिया के दलाल होने के आरोप पर तो किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाना और फरमान सुना देना संभव नहीं है फिर भी इस पर मंथन जरूरी है कि समाज के हर कोने से दलाल होने के आरोप लग रहे हैं तो क्यों?

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एक कहावत है कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। अब मीडिया पर हर कोई यहां तक कि सोशल भी, आरोप लगा रहा है कि वह दलाल हो गया है, बिकाऊ हो गया है, बाजारू हो गया है। वर्तमान पर दृष्टि डाले तो उस पर लगने वाले आरोपों में दम नजर आता है। पहले कम पेज और एक ही संस्करण के बावजूद घपला, घोटाला और भ्रष्टाचार की खबरों से अखबार के पन्ने रंगे रहते थे। आज पन्ने और संस्करण बढ़ने के बावजूद ऐसी खबरें न के बराबर रहतीं हैं। आज विज्ञापन के बाद अखबार सूचनात्मक खबरों/विज्ञप्तियों से भरे रहते हैं। मीडिया के कार्पोरेट घराने के शिकंजे में आते ही उसका बाजारूकरण शुरू हो गया। पहले विज्ञापन संस्कृति ने उसे गिरफ्त में लिया अब पूरा अखबार ही विज्ञापन हो गया। इसका नंगा नाच होली- दीपावली के समय सामने आता है। एक कई पेज मुख पृष्ठ बन जाते हैं। ऐसे पेजों को अखबारी भाषा में जैकेट (पहले पेज जैसा दीखने वाला पेज) कहते हैं। रही-सही कसर परिशिष्ठ (शिक्षण संस्थाओं,पर्यटनों रीयल स्टेटों ने मार दी है। कोचिंगों-स्कूल-कालेजों,निजी अस्पतालों-नर्सिंग होमों के मालिकान मीडिया की “पार्टियां होते हैं। नया शैक्षिक सत्र शुरू होते ही अखबारों व खबरिया चैनलों पर विज्ञापनों की आंधी आ जाती है। कुछ नहीं तो आज से 10 साल पीछे का अखबार पलट लीजिए शायद ही किसी विश्वविद्यालय ने विज्ञापन दिया हो। पहले के विश्वविद्यालय-शिक्षण संस्थान ज्ञान देते थे आज के प्लेसमेंट की गारंटी।

जिस तरह से आज स्कूल-कालेज, अस्पताल आदि व्यवसाय हो गये हैं और मुनाफा ही उनका लक्ष्य है, ठीक उसी तरह से मीडिया (अखबार व खबर चैनल) भी पैसा बटोरने की मशीन बन चुका है। जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों के होटलों की श्रृंखला होते हैं वैसे ही अखबारों खबरिया चैनलों की श्रृंखला। खबरिया चैनलों का विभिन्न भाषाओं में विभिन्न प्रदेशों से प्रसारण होता है तो अखबारों का प्रकाशन। जहां अखबारों के एक साथ कई शहरों से एक साथ प्रकाशन व एक ही प्रिटिंग स्टेशन से थोक में निकलने वाले संस्करणों ने खबरों की आत्मा मार दी वहीं बहुभाषी खबरिया चैनलों ने खबरों की अंत्येष्ठि कर दी। यह सब खबरों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए नहीं अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए किया जा रहा है और किया भी क्यों न जाए। पहले अखबार स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार व समाजसेवी निकाला करते थे आज चिटफंड कंपनीवाला, शराब का कारोबारी, खनन माफिया निकाल रहे हैं खबरिया चैनल भी ऐसे ही लोगों के हाथ में हैं।

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आजाद भारत के तुरंत बाद वाला पूंजीपति एक हद तक उदार था। टाटा, बिड़ला, गोयनका और टाइम्स घराना। हिंदुस्तान, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स समूह के मालिक अखबार को मात्र धंधा नहीं मानते थे। यह परंपरा स्वतंत्र भारत जयपुरिया से थापर समूह के आने तक कायम रही। दैनिक जागरण के संस्थापक पूर्णचंद गुप्ता, व आज अखबार के शिवप्रसाद गुप्त का जो पत्रकारिता के प्रति लगाव था वह न तो नरेंद्र मोहन में था ओर न शार्दुल विक्रम गुप्त में। यही हाल विदेश से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करके आये विवेक गोयनका, समीर जैन व शोभना भरतिया का रहा।

टाइम्स समूह ने एक झटके में धर्मयुग, माधुरी, सारिका, दिनमान, दिनमान टाइम्स, पराग बंद की। ऐसा नहीं कि इनके प्रसार कम थे। दरअसल पत्रिकाओं को विज्ञापन कम मिलते थे और सारा खेल विज्ञापन का है विज्ञापन यानी धंधा। चूंकि हर धंधे का सीजन होता है और सीजन में ये जमकर कमाना चाहते हैं और कमाते भी हैं इसलिए मीडिया के भी कमाने के सीजन होते हैं इनमें से एक सीजन होता है चुनाव। आज पूरा का पूरा का पूरा मीडिया कमाने में लगा है और यही कमाऊपन उसे और उससे जुड़े कर्मचारियों खासकर पत्रकारों को दलाल बना रहा है। अन्य संस्थानों की तरह मीडिया में भी वो सारी प्रवृत्तियां पनप ही नहीं फल-फूल भी रहीं हैं। मसलन ठेका प्रवृत्ति, लक्ष्य निर्धारण प्रवृत्ति, विज्ञापन लाओ-धंधा बढ़ाओ प्रवृत्ति।

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आज से लगभग 30 साल पहले की एक घटना है। वाराणसी के हिंदी दैनिक “”आज “” अखबार ने बिहार के एक कोयला माफिया सूरजदेव सिंह को पटना के लिए अपनी फ्रेंचायजी दी। उस वक्त हर किसी ने खूब छाती कूटी। आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इसे अपना रहा है। सेल्समैंन की तरह की तरह पत्रकार भी खुद को बेच रहे हैं। फाइनेंस कंपनियों के प्रमोटर की भांति ही विज्ञापन ला ही नहीं रहे है बल्कि धन भी उगाह रहे हैं, और खबरों के लक्ष्य के लिए भी दिन-रात एक किये रहते हैं। बहुत से अखबार पत्रकारों को इतना कम वेतन देते हैं कि वे दलाली को मजबूर करते हैं। वे इतनी कम तनख्वाह देते हैं कि वह दलाली करने, ब्लैकमेल करने, खबरें बेचने, विज्ञापन लाने को मजबूर होता है। आखिर खाने के लिए ख्याल तो पकायेगा नहीं।

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कुमार कल्पित
देहरादून

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