मीडिया दलाल है तो क्यों?

मीडिया दलाल है… मीडिया बिका हुआ है… आज इस तरह के आरोपों से मीडिया चौतरफा घिरा हुआ है। अब तो खबरिया चैनलों के एंकर भी बहस के दौरान इस बात का उलाहना देने लगे हैं कि “आप की निगाह में हम तो दलाल हैं ही”। ऐसा नहीं कि मीडिया (अखबारों) पर पहले कभी आरोप नहीं लगे। खबरों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का ठीकरा आज भी मीडिया पर फोड़ा जाता है और मीडिया झेलता रहा है। आज अतीत का रोना रोने का समय नहीं है। मीडिया के दलाल होने के आरोप पर तो किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाना और फरमान सुना देना संभव नहीं है फिर भी इस पर मंथन जरूरी है कि समाज के हर कोने से दलाल होने के आरोप लग रहे हैं तो क्यों?

एक कहावत है कि बिना आग के धुंआ नहीं उठता। अब मीडिया पर हर कोई यहां तक कि सोशल भी, आरोप लगा रहा है कि वह दलाल हो गया है, बिकाऊ हो गया है, बाजारू हो गया है। वर्तमान पर दृष्टि डाले तो उस पर लगने वाले आरोपों में दम नजर आता है। पहले कम पेज और एक ही संस्करण के बावजूद घपला, घोटाला और भ्रष्टाचार की खबरों से अखबार के पन्ने रंगे रहते थे। आज पन्ने और संस्करण बढ़ने के बावजूद ऐसी खबरें न के बराबर रहतीं हैं। आज विज्ञापन के बाद अखबार सूचनात्मक खबरों/विज्ञप्तियों से भरे रहते हैं। मीडिया के कार्पोरेट घराने के शिकंजे में आते ही उसका बाजारूकरण शुरू हो गया। पहले विज्ञापन संस्कृति ने उसे गिरफ्त में लिया अब पूरा अखबार ही विज्ञापन हो गया। इसका नंगा नाच होली- दीपावली के समय सामने आता है। एक कई पेज मुख पृष्ठ बन जाते हैं। ऐसे पेजों को अखबारी भाषा में जैकेट (पहले पेज जैसा दीखने वाला पेज) कहते हैं। रही-सही कसर परिशिष्ठ (शिक्षण संस्थाओं,पर्यटनों रीयल स्टेटों ने मार दी है। कोचिंगों-स्कूल-कालेजों,निजी अस्पतालों-नर्सिंग होमों के मालिकान मीडिया की “पार्टियां होते हैं। नया शैक्षिक सत्र शुरू होते ही अखबारों व खबरिया चैनलों पर विज्ञापनों की आंधी आ जाती है। कुछ नहीं तो आज से 10 साल पीछे का अखबार पलट लीजिए शायद ही किसी विश्वविद्यालय ने विज्ञापन दिया हो। पहले के विश्वविद्यालय-शिक्षण संस्थान ज्ञान देते थे आज के प्लेसमेंट की गारंटी।

जिस तरह से आज स्कूल-कालेज, अस्पताल आदि व्यवसाय हो गये हैं और मुनाफा ही उनका लक्ष्य है, ठीक उसी तरह से मीडिया (अखबार व खबर चैनल) भी पैसा बटोरने की मशीन बन चुका है। जैसे बड़े-बड़े उद्योगपतियों के होटलों की श्रृंखला होते हैं वैसे ही अखबारों खबरिया चैनलों की श्रृंखला। खबरिया चैनलों का विभिन्न भाषाओं में विभिन्न प्रदेशों से प्रसारण होता है तो अखबारों का प्रकाशन। जहां अखबारों के एक साथ कई शहरों से एक साथ प्रकाशन व एक ही प्रिटिंग स्टेशन से थोक में निकलने वाले संस्करणों ने खबरों की आत्मा मार दी वहीं बहुभाषी खबरिया चैनलों ने खबरों की अंत्येष्ठि कर दी। यह सब खबरों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए नहीं अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए किया जा रहा है और किया भी क्यों न जाए। पहले अखबार स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार व समाजसेवी निकाला करते थे आज चिटफंड कंपनीवाला, शराब का कारोबारी, खनन माफिया निकाल रहे हैं खबरिया चैनल भी ऐसे ही लोगों के हाथ में हैं।

आजाद भारत के तुरंत बाद वाला पूंजीपति एक हद तक उदार था। टाटा, बिड़ला, गोयनका और टाइम्स घराना। हिंदुस्तान, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स समूह के मालिक अखबार को मात्र धंधा नहीं मानते थे। यह परंपरा स्वतंत्र भारत जयपुरिया से थापर समूह के आने तक कायम रही। दैनिक जागरण के संस्थापक पूर्णचंद गुप्ता, व आज अखबार के शिवप्रसाद गुप्त का जो पत्रकारिता के प्रति लगाव था वह न तो नरेंद्र मोहन में था ओर न शार्दुल विक्रम गुप्त में। यही हाल विदेश से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल करके आये विवेक गोयनका, समीर जैन व शोभना भरतिया का रहा।

टाइम्स समूह ने एक झटके में धर्मयुग, माधुरी, सारिका, दिनमान, दिनमान टाइम्स, पराग बंद की। ऐसा नहीं कि इनके प्रसार कम थे। दरअसल पत्रिकाओं को विज्ञापन कम मिलते थे और सारा खेल विज्ञापन का है विज्ञापन यानी धंधा। चूंकि हर धंधे का सीजन होता है और सीजन में ये जमकर कमाना चाहते हैं और कमाते भी हैं इसलिए मीडिया के भी कमाने के सीजन होते हैं इनमें से एक सीजन होता है चुनाव। आज पूरा का पूरा का पूरा मीडिया कमाने में लगा है और यही कमाऊपन उसे और उससे जुड़े कर्मचारियों खासकर पत्रकारों को दलाल बना रहा है। अन्य संस्थानों की तरह मीडिया में भी वो सारी प्रवृत्तियां पनप ही नहीं फल-फूल भी रहीं हैं। मसलन ठेका प्रवृत्ति, लक्ष्य निर्धारण प्रवृत्ति, विज्ञापन लाओ-धंधा बढ़ाओ प्रवृत्ति।

आज से लगभग 30 साल पहले की एक घटना है। वाराणसी के हिंदी दैनिक “”आज “” अखबार ने बिहार के एक कोयला माफिया सूरजदेव सिंह को पटना के लिए अपनी फ्रेंचायजी दी। उस वक्त हर किसी ने खूब छाती कूटी। आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इसे अपना रहा है। सेल्समैंन की तरह की तरह पत्रकार भी खुद को बेच रहे हैं। फाइनेंस कंपनियों के प्रमोटर की भांति ही विज्ञापन ला ही नहीं रहे है बल्कि धन भी उगाह रहे हैं, और खबरों के लक्ष्य के लिए भी दिन-रात एक किये रहते हैं। बहुत से अखबार पत्रकारों को इतना कम वेतन देते हैं कि वे दलाली को मजबूर करते हैं। वे इतनी कम तनख्वाह देते हैं कि वह दलाली करने, ब्लैकमेल करने, खबरें बेचने, विज्ञापन लाने को मजबूर होता है। आखिर खाने के लिए ख्याल तो पकायेगा नहीं।

कुमार कल्पित
देहरादून

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ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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खबर को लेकर मेरी दो बार मुठभेड़ मुख्‍तार अंसारी से हो चुकी है

हम अपराधियों की हरकतों के खिलाफ युद्ध करें, उनके धंधे में भागीदारी क्‍यों

लखनऊ : यह कोई 13 साल पहले का हादसा है। मैं जौनपुर में हिन्‍दुस्‍तान अखबार का ब्‍यूरो प्रमुख था। खबर को लेकर दो बार मेरी मुठभेड़ मुख्‍तार अंसारी से हो गयी। एक बार एक ट्रैक्‍टर व्‍यवसायी आईबी सिंह के घर और दूसरी बार मोहम्‍मद हसन कालेज के प्रिंसिपल के यहां। तब मुख्‍तार अंसारी समाजवादी पार्टी के चहेते हुए करते थे। दोनों ही बार आयोजकों ने मुख्‍तार से मेरा परिचय कराया और मैंने सवाल पूछने शुरू किये।

मुख्‍तार के आसपास करीब दो दर्जन राइफलधारी अंगरक्षक थे, जो मुख्‍तार की भृकुटि देखते ही अपने असलहे इस अंदाज में चमकाते थे कि अब बस गोली मार ही देंगे। लेकिन मैं बेफिक्र था। मुख्‍तार ने दोनों ही बार मुझे मेरे सवालों का जवाब देने के बजाय अपने पैर पर पैर चढ़ाते हुए लुंगी सम्‍भाली और केवल इतना कहा:- तुम्‍हरी तौ हम कौउनो बात के जवाबै नाय देबै, जावौ। दूसरा प्रकरण। पूर्वांचल का दुर्दांत भगोड़ा हत्‍यारा था परशुराम यादव उर्फ परसू यादव। कई हत्‍याओं में वांछित था, एक बार मैंने अदालत के एक वारंट पर खबर लिख डाली कि:- दुर्दान्‍त हत्‍यारे परसू का हालपता ललई यादव राज्‍यमंत्री का सरकारी आवास।

इस पर खूब मचा हंगामा। मेरे खिलाफ मानहानि की नोटिसें भी आयीं। मुझे डराया भी गया कि परसू से भिड़ना खतरनाक है। यह भय तब भी दिखाया गया जब मैंने मुख्‍तार से सवाल पूछे थे। तब भी बवाल हुआ था जब मैंने कल्‍पू हत्‍याकांड पर बड़े नेताओं के खुलासे किया थे। तब भी मुझे डराया गया था, जब मैंने धनन्‍जय सिंह पर लिखना शुरू किया था। आज भी मुझे इशारा किया जा रहा है कि मैं कुकुर्मों के आरोपी स्‍वामी चिन्‍मयानन्‍द पर लिख रहा हूं। तब भी डराया गया था, जब मैं शाहजहांपुर वाले जागेंद्र सिंह हत्‍याकांड पर प्रदेश सरकार के मंत्री राम सिंह वर्मा को सीधे-सीधे जागेंद्र की हत्‍या का षडयंत्र करने वाला करार दे दिया था।

इसके और पहले भी मुझे डराया गया। लेकिन मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ा। क्‍योंकि वह मेरा निजी काम नहीं था। वह मेरा व्‍यावसायिक दायित्‍व था। अपराधियों और बेईमानों के साथ मेरे घनिष्‍ठ रिश्‍ते हैं और हमेशा रहेंगे। लेकिन वह रिश्‍ते उनकी करतूतों के खिलाफ युद्ध के होंगे। न कि मैंने उनके पाप-कर्मों के साथ कोई रिश्‍ते रखूंगा। हमारी दोस्‍ती उनसे जुड़ी खबरों को लेकर रहेगी, उन व्‍यक्तियों की करतूतों से हर्गिज नहीं।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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हेमन्त तिवारी जैसों को नहीं पहचाना तो फिर अगला नम्बर आपका होगा

न खुद दलाली कीजिए और न दलालों को अपने आसपास फटकने दीजिए

लखनऊ : चाहे वह सीवान का काण्‍ड हो या फिर चतरा का, पत्रकारों की मौत के असल कारणों का खुलासा तो बाद में ही हो पायेगा, लेकिन अब तक इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में उन लोगों की खास भूमिका रहती है, जो खुद को पत्रकार कहलाते हैं और असल पत्रकार जाने-अनजाने उनके पाले में पहुंच कर अपनी बरबादी का सामान जुटा लेता है। कम से कम, चालीस साल का जिन्दा इतिहास तो मुझे खूब याद है, जिसमें किसी पत्रकार की मौत के कारणों में से एक रहे हैं जो ऐसे पत्रकारों के करीबी बन कर असल वारदात को अंजाम दिला देते हैं।

चाहे वह सन-77 में दैनिक स्वतंत्र भारत के मुख्य उप सम्पासदक जिया सिद्दीकी रहे हों या फिर बीस साल पहले लखनऊ में मारा गया पारितोष पाण्डेय। शाहजहांपुर का जागेंद्र सिंह भी ऐसे लोगों की साजिशों के चलते मौत के घाट उतारा गया था। सिद्दीकी हत्याकांड में एक वकील का नाम आया था जो बाद में अपनी वकालत छोड़कर एक चौपतिया अखबार निकालने लगा। उस हत्या में असली हत्यारे के तौर पर नाम आया था एमपी सिंह। बाद में उसने अपने लाल अखबार को नवरात्र साप्ताहिक के तौर पर प्रकाशित करना शुरू किया, और उसकी प्रतियां केवल बड़े पुलिस अफसरों तक पहुंचने लगी। एमपी सिंह का धंधा आज भी बदस्तूबर चल रहा है।

पारितोष एक तेज-तर्रार पत्रकार था, लेकिन उसकी हत्य के बाद पता चला कि उसकी संगत ही बुरी थी। इस का पूरा प्रकरण तो बाद में आपको अगले अंक में बताऊंगा, लेकिन इतना जरूर है कि अपने तथाकथित पत्रकार-साथियों की साजिशों के चलते पारितोष की मौत हुई थी। जागेंद्र सिंह तो अभी एक साल पुराना मामला है। शाहजहांपुर का वह जोशीला पत्रकार था। कई अखबारों में उसने काम किया, लेकिन हर जगह उसका शोषण ही हुआ। नतीजा उसने अपनी नयी तर्ज की पत्रकारिता फेसबुक पर शुरू की। नाम रखा शाहजहांपुर समाचार। बहुत मेहनती आदमी था जागेंद्र सिंह। लेकिन खबरों को लेकर एक बार उसकी यूपी सरकार के मौजूदा मंत्री रामसिंह वर्मा से ठन गयी। जागेंद्र सिंह ने ऐलानिया कर दिया था कि रामसिंह वर्मा और उसका करीबी कोतवाल प्रकाश राय उनकी हत्या पर आमादा है।

जागेंद्र लगातार आर्तनाद करता रहा। चिल्लाता रहा कि उसकी हत्या हो जाएगी। लेकिन न जिलाधिकारी शुभ्र सक्सेना की कान में जूं रेंगी, न पुलिस का। अधिकांश पत्रकार तो सिरे से ही बिके हुए थे। आखिरकार भांड़ पत्रकारों को अपनी ओर मिला कर हत्यारों ने जागेंद्र सिंह की हत्या कर डाली। उसमें सबसे प्रमुख हत्यारा-षडयंत्रकर्ता था, उसका नाम था अमितेश सिंह। हत्या के बाद उसने अपने कई मित्रों और खुद मुझे भी फोन करके इस बारे में पूरी बात बता दी। अभी तीन महीना पहले ही उस युवक की हत्या उरई में हो गयी है।

अब जरा देखिये, जागेंद्र सिंह की हत्या को लेकर भी खूब खरीद-फरोख्त  हुई। खुद को बडा पत्रकार कहलाने वाले हेमन्त तिवारी ने इस मामले में प्रशासन की ओर से खूब पैरवी की। ऐसा लगा कि जैसे हेमन्त पत्रकार नहीं, बल्कि कोई धाकड़ दलाल है, जो पूरी मामले में दांव लगा रहा था। इसके पहले भी रवि वर्मा आदि दो अन्य पत्रकारों की मौत के बाद जब मैंने 187 पत्रकारों के हस्ताक्षर से यूपी सरकार को एक पत्रकार तैयार किया कि उनके परिजनों को आर्थिक राहत मिल जाए, उस पत्र को हेमन्त तिवारी ने मुझ से लेकर फाड़ दिया। यह तर्क देते हुए कि हिसाम सिद्दीकी जैसो लोग इस पत्र को बेच लेंगे, और हिसाम के हटने के बाद मैं खुद अफसरों से मिल कर उन पत्रकारों को राहत पहुंचा दूंगा। लेकिन हेमन्त ने ऐसा कभी भी नहीं किया।

इतना ही नहीं, हेमन्त तिवारी ने तो दलाल, बलात्कारियों, चोरों, धोखेबाजों और घटिया लोगों को वरिष्ठ पत्रकार का ओहदा दिलाने की फैक्ट्री ही खुलवा दी थी। जौनपुर के रतनलाल शर्मा को अपने साथ हेमन्त तिवारी ने वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर पोस्टर छपवा दिया था। इसके बाद ही शर्मा को पुलिस ने पांच लाख रूपया और एक महिला के साथ लखनऊ में बलात्कार का आरोप लग गया। शराब के नशे में अक्सर पिट जाने वाले हेमन्त तिवारी ने उस रतनलाल शर्मा को बचाने के लिए हरचंद कोशिशें कीं। यह हालत है पत्रकारों और पत्रकारिता का। जाहिर है कि जब तक हेमन्त तिवारी जैसे लोग पत्रकारिता में मौजूद हैं, पत्रकारों और पत्रकारिता पर हमेशा ही खतरनाक हमले होते ही रहेंगे।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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छह माह पहले स्टिंग कर चुके अशोक पांडेय सौदेबाजी करने के लिए सीडी दबाए बैठे रहे?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात आईएएस मोहम्मद शाहिद का खुफिया कैमरों से स्टिंग आपरेशन कर सुर्खियां में आए अशोक पांडेय भी सवालों को घेरे में हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस तरह इस सीडी के सामने आने के बाद जांच कराने से ही बचने की कोशिश की, वह उनको तो कठघरे में खड़ा करता ही है, लेकिन भाजपाई और मीडिया का एक हिस्सा पांडेय के निर्माणाधीन भवन को गिराने को लेकर जिस तरह हायतौबा मचा रहा है, वह इस पूरे प्रकरण से खड़े सवालों को नेपथ्य में धकेल रहा है। पहली बात तो यह कि इस सीडी के सामने आने से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे नौकरशाह किस तहर दलाली का खेल खेल रहे हैं, सबके सामने आ गया। दूसरे सवालों को थोड़ी देर के लिए किनारे रख दें तो इस सीडी का यह एक उजला पक्ष है। लेकिन इस उजले पक्ष के पीछे जो भी अंधेरा है उस पर भी रोशनी डाली जानी चाहिए।

पहला सवाल तो यही कि जब छह माह पहले ये स्टिंग कर दिया गया था तो इतना समय क्यों इसे बाहर आने में लगा? क्या स्टिंगबाजों ने मोहम्मद शाहिद से इस सीडी को दबाए रखने के लिए कोई सौदेबाजी की थी? अशोक पांडेय नाम के पत्रकार की 18 जून की मुख्यमंत्री के साथ सीएम आवास की जो तस्वीरें सामने आई थी, वह इस सवाल को पुख्ता करती हैं। इन तस्वीरों में एक में वे हरीश रावत को अपनी पत्रिका भेंट कर रहे हैं, तो दूसरी में वे एक पत्र में सीएम से मंजूरी लेते दिख रहे हैं। यह कैसे हो सकता है कि जो शख्स सीएम के सचिव की सीडी दबाकर बैठा हो और वही मुख्यमंत्री के साथ सीएम आवास में कुछ इस तरह खिलखिला रहा हो, मानों वह कोई पत्रकार न होकर सीएम का ही दत्तक पुत्र हो!

दूसरा यह कि सरकार जांच के सवाल पर लगातार इस बात का रोना रो रही है कि उसके पास जब तक फारेंसिक जांच के लिए आरजिनल सीडी नहीं मिलती तब तक वह जांच को आगे नहीं बढ़ा सकती। ऐसे में क्या अशोक पांडेय की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे सरकार को सीडी की मूल कापी उपलब्ध कराएं। प़त्रकारिता की कौन सी आचार संहिता उन्हें ऐसा करने से रोकती है? तीसरा सवाल यह है कि एक पत्रकार को एक एनजीओ के बैनर तले अपने स्टिंग आपरेशन का खुलासा करने की जरूरत क्यों पड़ी? और पांडेय को इस सवाल का भी जवाब देना चाहिए कि क्या उत्तराखंड के एक शातिर नेता ने सीडी को सार्वजनिक करने को लेकर भाजपा हाईकमान के साथ उनकी डील कराई थी या नहीं?

देहरादून से युवा और बेबाक पत्रकार दीपक आजाद की रिपोर्ट.

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किसान मर रहे हैं, मोदी सपने दिखाते जा रहे हैं, मीडिया के पास सत्ता की दलाली से फुर्सत नहीं

Deepak Singh :  प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बाद कौन सुध लेता हैं किसानों की? महाराष्ट्र में और केंद्र में दोनों जगह भाजपा की सरकार पर हालत जस के तस। यह हाल तब हैं जब नरेंद्र मोदी को किसानों का मसीहा बता कर प्रचार किया गया। आखिर क्यों नई सरकार जो दावा कर रही हैं की दुनिया में देश का डंका बज रहा हैं पर उस डंके की गूंज गाँव में बैठे और कर्ज के तले दबे गरीब और हताश किसान तक नहीं पहुँच पाई? क्यों यह किसान आत्महत्या करने से पहले अपनी राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं कर पाया की सरकार आगे आएगी और कुछ मदद करेगी?

क्या यह सरकार की नाकामी नहीं हैं? क्या मोदी सरकार से नहीं पूछा जाना चाहिए पूंजीपतियों पर करोड़ों रुपये फूंकने से पहले हमारे अन्नदाता किसान की सुध क्यों नहीं ली जाती? क्या यह मीडिया के लिए शर्मनाक नहीं हैं? खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जो सुबह-शाम सिर्फ एक दल विशेष के प्रचार तंत्र की तरह काम करने लगा हैं? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सेंसेक्स का ऊपर जाना ही मतलब रखता हैं, किसान आत्महत्या कर ऊपर जाए तो मीडिया के दलालों को अब क्या फर्क पड़ता हैं। अब ऐसी खबर किसी रद्दी के कोने में छप मात्र जाती हैं तो कुछ एक-दो लोग जान पाते हैं। अब किसान की मौत पर न्यूज़ चैनल पर बहस नहीं होती, अब बहस होती हैं की कौन रामजादा हैं तो कौन हरामजादा!! शर्मनाक!! बेहद शर्मनाक !!

दीपक सिंह के फेसबुक वॉल से.

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वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और इसके एंकर रोहित सरदाना को लाइव ही धो डाला

जी न्यूज, इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज जैसे न्यूज चैनलों की भाजपा परस्ती और मोदी स्तुति किसी से छिपी नहीं है. इसी कारण इन तीनों न्यूज चैनलों का आम आदमी पार्टी के प्रति भयंकर घृणा भी जग जाहिर है. ये तीनों न्यूज चैनल समय-समय पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए फर्जी स्टिंग से लेकर फर्जी न्यूज एंगल और फर्जी प्रोग्राम तक बनाने पेश करने से नहीं चूकते. इसी क्रम में जी न्यूज ने अभी बीते कुछ दिनों पहले केजरीवाल को निशाने पर लिया. चूंकि अब दिल्ली में विधानसभा चुनाव नजदीक है इसलिए सारे भाजपा पोषित न्यूज चैनल केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने में जुट गए हैं.

मजेदार यह रहा कि जी न्यूज पर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए जिस प्रोग्राम / डिबेट को आयोजित किया गया, उसमें वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे ने जी न्यूज और एंकर रोहित सरदाना को ऐसा धोया कि सब सकते में रह गए. अभय दुबे खरी खरी और जनता की बात कहने के लिए जाने जाते हैं. इस पूरे प्रकरण पर फेसबुक पर Sarvapriya Sangwan ने जो लिखा है, उसे पढ़िए और उसके बाद दिए गए वीडियो लिंक को क्लिक करके वीडियो चलने के पांच मिनट बाद के टाइम से शुरू करिए.

Sarvapriya Sangwan : अभय दुबे, एंकर रोहित सरदाना से : “हर आदमी एक बौद्धिक प्लेट सजाता है अपनी। आपने जो प्लेट सजा रखी है, जिस तरह से आप इंट्रो देते हैं अपना, वो प्लेट एकतरफा है। इसलिए आपके कार्यक्रम में आम आदमी पार्टी का प्रतिनिधि नहीं आता। अपनी आलोचना किसी को पसंद नहीं आती है। आपकी आलोचना मैं कर रहा हूँ। मैं चौथी पांचवी बार आपके इस कार्यक्रम में आया हूँ। आप जिस तरह से इस कार्यक्रम को बनाते हैं, उसमे आप लोगों की कोशिश ये होती है कि भई आते ही हम सबसे पहले भाजपा को इस देश की सर्वश्रेष्ठ पार्टी घोषित कर दें और दिल्ली की राजनीति को जीता हुआ घोषित कर दें। नंबर २, आम आदमी पार्टी देश की सबसे घटिया पार्टी है उसे ज़मीन खोद कर दफ़न कर देना चाहिए। आपको पूरा अधिकार है की आप भाजपा को सबसे अच्छी पार्टी मानें। आपको पूरा अधिकार है की आप मानें कि आम आदमी पार्टी एक ख़राब पार्टी है। लेकिन इन दोनों मान्यताओं को प्रोसेस करने के कुछ journalistic ethics हैं। आप कुछ तो लाज शर्म रखिये, कुछ तो ऐसा कीजिये कि लगे कि आप निष्पक्ष हैं। आम आदमी पार्टी की साख बाद में गिरेगी, पहले आप की गिरी जा रही है। आपने इनका पूरा परिचय नहीं दिया। आप भाजपा के सदस्य को आम आदमी पार्टी का संस्थापक बता रहे हैं। आप ये नहीं बता रहे कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली है अब।”

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https://www.youtube.com/watch?v=0sGAslVGCgI

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कुछ मीडिया घराने बीजेपी के दलाल बन गए हैं : ममता बनर्जी

दुर्गापुर। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ बेबुनियाद खबरें दिखाने को लेकर मीडिया पर हमला किया। एक रैली में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष बनर्जी ने कहा कि जिस तरह खाने की सामग्री बेची जाती है, उसी तरह मेरी सरकार के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण गलत खबरें बेचना एक नया व्यापार बन गया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह अच्छी और नकली दवाइयां होती हैं। उसी तरह अच्छा और गलत मीडिया भी होता है। कुछ मीडिया घराने बीजेपी के दलाल बन गए हैं। बनर्जी ने ये भी कहा कि हमने दुर्गापुर में हेलीकॉप्टर सेवा शुरू की है लेकिन कुछ मीडिया घरानों को इस बारे में कोई सूचना नहीं है। साथ ही बनर्जी ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर हम चाहें तो हम अनुचित कार्यों में लिप्त मीडियाकर्मियों का पर्दाफाश भी कर सकते हैं। वहीं उन्होंने केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति कुछ लोगों को कभी कभी मूर्ख बना सकता है लेकिन एक व्यक्ति हर बार मूर्ख नहीं बना सकता।

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