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धनतेरस : भारत में सोने की चमक अब भी कम नहीं

डॉ. अशोक कुमार गदिया-

सोने की चमक भारत एवं विश्व में हमेशा रही है और रहेगी। जब भी विश्व की आर्थिक स्थिति गड़बड़ होती है सोने के दाम बढ़ जाते हैं, क्योंकि आम धारणा यह है कि सोने का निवेश मुश्किल समय में हमेशा काम आयेगा, इसलिये हर व्यक्ति अपने मुश्किल समय के लिए सोने में निवेश करता है। सोना बेहद मूल्यवान धातु है। जिस देश के पास भी उसके गोल्ड रिजर्व में इस धातु की मात्रा ज्यादा है उस देश की आर्थिक स्थिति उतनी ही मजबूत होगी। भारत में केंद्रीय बैंकों के पास सोने का भंडार है और वे इस भंडार के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस सोने से ये सेंट्रल बैंक रुपए की वैल्यू को अधिक बनाए रखने में स्पोर्ट करते हैं। सरकार सोने के भंडार को ज्यादा महत्व देती है। देश में जब-जब महंगाई बढ़ने लगती है तो सरकार महंगाई को कम करने के लिए बड़ी मात्रा में सोने को विदेशों से खरीदती है ताकि रुपए की वैल्यू बढ़े और विदेशों से सामान सस्ता खरीद सकें ताकि महंगाई पर लगाम लग सके। भारत के सन्दर्भ में देखा जाए तो हम यह पायेंगे कि आम भारतीय चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो परन्तु सोने में थोड़ा-बहुत निवेश अवश्य करता है। विशेष रूप से महिलाएँ।

हमारे भारत की हर महिला के पास थोड़ा या ज्यादा सोना अवश्य मिलेगा। वह इसे अपने मुश्किल समय का साथी मानती है। वैसे भी भारतीयों का सोने के प्रति लगाव विश्व में सबसे ज्यादा है। शायद इसीलिये इस देश को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा है। एक अनुमान के अनुसार भारत में विश्व का सबसे अधिक सोना आज भी है। हमारे यहाँ लाखों टन सोना मंदिरों एवं आम लोगों के घरों में उपलब्ध है। इस हिसाब से देखा जाए तो आज भी भारत विश्व का सबसे अधिक धनी देश है।
किस देश के पास कितना सोना है

देश गोल्ड रिजर्व (टन) विदेशी मुद्रा भंडार में शेयर
अमेरिका 8133.5 78.7 फीसदी
जर्मनी 3362.4 76.1 फीसदी
इटली 2451.8 70.7 फीसदी
फ्रांस 2436.2 66.0 फीसदी
रुस 2298.5 23.7 फीसदी
चीन 1948.3 3.5 फीसदी
स्विटजरलैंड 1040.0 6.1 फीसदी
जापान 765.2 3.3 फीसदी
भारत 676.6 7.0 फीसदी
नीदरलैंड 612.5 6.90 फीसदी

आँकडे़ बताते हैं कि भारत में हर वर्ष लगभग 1500 टन सोना आयात होता है। इसके मुकाबले निर्यात बहुत कम होता है। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि भारत कितना धनवान देश है। हम हमेशा धनवान एवं समृद्ध देश थे, हैं और रहेंगे। लेकिन हमारा खान-पान एवं रहन-सहन एक दम सादा था, इसलिए विश्व समुदाय ने अपनी झेंप मिटाने के लिये हमें अविकसित देश कह कर हममें हीन भावना भर दी। वरना हमारा ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद, संस्कार जीवन पद्धति, आध्यात्म, अध्ययन, अध्यापन, जीवनशैली, कृषि, कुटीर उद्योग सभी हमारी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये पर्याप्त हैं। हमारा ‘सादा जीवन एवं उच्च विचार’ और ‘जिओ और जीने दो’ का सिद्धान्त विश्वभर के लिये आज भी रामबाण है। हम बिना बात ही विश्व बाजार की चकाचौंध में भटक रहे हैं। हमें हमारी पुरातन संस्कृति को नूतन परिवेश में लागू करते हुए विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिये।

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