Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

वेब-सिनेमा

डिजिटल मीडिया पर सरकार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिए नियंत्रण के संकेत!

डिजिटल मीडिया की आज़ादी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के लिए नए नियंत्रण और “ऑटोनॉमस बॉडी” की जरूरत पर संकेत दिया है, जिससे मीडिया जगत में सेंसरशिप की आशंका गहराने लगी है। सरकार के पहले से कड़े कानूनों के बीच अदालत की यह टिप्पणी डिजिटल पत्रकारिता पर नया दबाव बढ़ाने वाली मानी जा रही है।

अजय शुक्ला-

झूठ और नफरत फैलाने वालों से नहीं आजाद सच्ची आवाज से मोदी सरकार के बाद डरने लगा सुप्रीम कोर्ट भी, सेंसरशिप की तैयारी!

लंबे वक्त से Narendra Modi सरकार डिजिटल चैनल्स को कैद में रखने के लिए साजिश रच रही थी। उसने इसके लिए डेटा प्रोटक्शन कानून भी बनाया। कई नियामक नियंत्रण किये गये। अब सुप्रीम कोर्ट भी इस दिशा में आगे बढ़ गया है।

सुप्रीम कोर्ट देश को सरकार में बैठे नेताओं अफसरों के नफरती भाषण नहीं नजर आते हैं। उसे मोदी गैंग की वह नीति लागू करवानी है जिससे डिजिटल चैनल्स और डिजिटल क्रिएटर्स डरकर रहें। यह बात दुर्भाग्य से चीफ जस्टिस सूर्यकांत मानते हैं। उनका मानना है कि ऑनलाइन इंटरमीडियरी के लिए तथाकथित “सेल्फ-रेगुलेटरी” मैकेनिज्म काफी नहीं हैं।

हालांकि, जो मोदी चैनल उससे ज्यादा बुरे हालात कर रहे हैं। झूठ फैलाकर इस्लामाबाद पर कब्जा करा देते हैं। सेना को कहना पड़ता है कि उनके झूठ से भी लड़ रहे थे तो दूसरी तरफ रोजाना जाति-धर्म के नाम पर नफरत फैलाने का धंधा चल रहा है, वह चीफ जस्टिस को नहीं दिखता। तो क्या हमें टीवी चैनलों के हेड पर भी “एक ऑटोनॉमस बॉडी, जो किसी असर से आज़ाद हो” बैठने की इजाज़त देनी चाहिए? और यह बॉडी कौन बनाएगा? फरिश्ते?

साथ ही, अगर संविधान से सबसे ज़्यादा अधिकार और सुरक्षा पाने वाली संस्था—भारत का सुप्रीम कोर्ट—असर, पॉलिटिकल प्रेशर, सोच पर कब्ज़ा और चुनिंदा एक्शन से आज़ाद नहीं रह पा रही है, तो कोर्ट किस “इंडिपेंडेंट” कानूनी संस्था के वजूद की कल्पना कर रहा है? कोई नहीं है! और मौजूदा पॉलिटिकल-इंस्टीट्यूशनल माहौल में कोई हो भी नहीं सकता। बुरी स्पीच का एकमात्र कानूनी जवाब हमेशा ज़्यादा स्पीच रहा है—न कि सरकार द्वारा ऑथराइज़्ड सैनिटाइजेशन!

कोर्ट को इस लालच से बचना चाहिए कि सरकार को “रेगुलेशन” या “सही पाबंदियों” की आड़ में बोलने की आज़ादी पर रोक लगाने के लिए और भी ज़्यादा सेंसरशिप वाला सिस्टम दिया जाए। यह भरोसा कि कोर्ट यह पक्का करेगा कि इन नई शक्तियों का गलत इस्तेमाल न हो, मनगढ़ंत है—या इससे भी बुरा, एक सरासर झूठ है।

सुप्रीम कोर्ट रोज़ाना ऐसे वादे को लागू नहीं कर सकता, और बोलने की आज़ादी के कानून का इतिहास दिखाता है कि जब सरकार इन फ्रेमवर्क को हथियार बनाती है, तो उसके पास दखल देने की इंस्टीट्यूशनल इच्छाशक्ति नहीं होती। साथ ही, अगर भारत के चीफ जस्टिस का कोर्टरूम किसी ज्यूडिशियल ऑर्डर के ज़रिए ऐसे किसी प्रोविज़न को सही ठहराता है, तो क्या होगा जब भविष्य में कोई कानून/प्रोविज़न को गैर-संवैधानिक होने के आधार पर चुनौती देगा? चीफ जस्टिस कांत क्या सोच रहे हैं!?

अदालतें उन मामलों में सबसे ज्यादा सुस्त हैं, जिनमें सच में न्यायिक अर्जेंसी की ज़रूरत होती है। प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के पास जादुई छड़ी नहीं है। बिहार में नई सरकार बन गई मगर जानलेवा एसआईआर पर तारीख पर तारीख पड़ रही है। दिल्ली दंगों के मामले में झूठे फंसाये गये युवाओं की जिंदगी जेल में गुजर रही है। सत्ता हर पल संविधान का कत्ल कर रही है मगर सुप्रीम कोर्ट की ये प्राथमिकता नहीं है।

ऐसे समय में जब “डेमोक्रेटिक स्पेस” कम हो रहा है, सुप्रीम कोर्ट को अपनी संवैधानिक भूमिका का कड़ाई से पालन करना चाहिए, तो वह गुलामी वाली सेंसरशिप का डिज़ाइनर बनने को बेताब है, सत्ता के चारण के लिए! जय हिंद, वंदेमातरम्!

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन