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सुख-दुख

क्या दिलीप मंडल ने बहुत सस्ते में डील कर ली?

नवनीत चतुर्वेदी-

बहुत सस्ते में डील कर ली साहब ने आख़िर इतना भी क्या उतावलापन था। या, यूँ कहें कि बीजेपी ने सस्ते में ही हैंडल कर लिया!

एक मंत्रालय में मीडिया एडवाइज़र होना बहुत मामूली पद है
शायद बहुत हुआ तो लाख सवा लाख रुपया महीना सैलरी और कुछ अन्य छिटपुट Perks Allowence Thats it और इतने सस्ते में अपने गले में पट्टा बांध कर घूमना क़तई समझदारी का सौदा मेरी नज़र में तो बिलकुल भी नहीं है।

उनसे कई मुद्दों पर असहमति रहती है लेकिन फिर भी मैं उनके टैलेंट की कद्र करता हूँ और अब मुझे अफ़सोस के साथ साथ उन पर तरस भी आ रहा है

अफ़सोस इस बात का है कि बहुजन दलित पिछड़े लोगों का जो लोग बौद्धिक नेतृत्व कर रहे हैं वो बहुत हल्के और सस्ते में डील कर जा रहे है इससे एक बहुत बड़े वर्ग को लॉस होगा जो इन जैसे लोगों को अपना आदर्श या पथप्रदर्शक मान लेते है।

प्रेम प्रकाश- कौन सा टैलेंट नवनीत भाई! लिखना आता है ये टैलेंट? कलम का बिक जाना टैलेंट है? विचार को बेच देना टैलेंट है? अपनी वैचारिकी पर 180 डिग्री घूम जाना टैलेंट है? हद्द पोलिटिकल बयान है ये आपका! थोड़ा सा हममें भी बने रहिये, इल्तिजा!

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