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उत्तर प्रदेश

गौर ग्रीन अपार्टमेंट अग्निकांड: अजीत अंजुम ने आपदा में अवसर खोजा और जोर शोर से आत्मप्रचार किया!

नवेद शिकोह-

आग बुझाएं या कवरेज करें! चर्चित पत्रकार अजित अंजुम जी ने अपने अपार्टमेंट में अग्नि कांड के दौरान लाइव कवरेज की, इसपर तमाम लोग अपनी राय रख रहे हैं। ऐसे में मुझे अपनी पत्रकारिता के सफर के दो पुराने किस्से याद आ गए-

पहला क़िस्सा-

लखनऊ के एक बड़े अखबार के वरिष्ठ छायाकार ने नामचीन संपादक को अपनी एक्सक्लूसिव तस्वीर दिखाई और उम्मीद की कि संपादक शाबाशी देंगे। तस्वीर लाइव आत्मदाह की थी। मंजीत नामक व्यक्ति द्वारा पुलिस के उत्पीड़न से परेशान होकर विधानसभा के सामने खुद में आग लगा ली थी और वो मर गया था।

संपादक ने छायाकार को डाटा और कहा कि इंसानियत और पत्रकारिता का तकाजा था कि तुम फोटो खींचने के बजाय मंजीत को बचाते। संपादक ने उस दिन सम्पादकीय लेख में छायाकारों को नसीहत दी कि ऐसी स्थिति में पत्रकारिता का पहला फ़र्ज़ ज़िन्दगी बचाना है।

दूसरा किस्सा-

हम एक टीवी चैनल में न्यूज बेस कार्यक्रम तैयार करने के लिए मेडिकल नेगलिजेंस की कहानियों पर काम कर रहा था। मेरी रिसर्च टीम ने एक स्टोरी दी थी कि केजीएमयू (मेडिकल कॉलेज) मे ग़लत इलाज और चिकित्सकों की लापरवाही से राजाजीपुरम निवासी आठ वर्ष के बच्चे का एक हाथ काटना पड़ा।

स्टोरी को इमोशनल बनाने की कोशिश करते हुए हमने ऐसे सवाल पूछे कि बच्चे के माता-पिता के आंखों में आंसू आ गए। इन आंसुओं को शूट करके मैंने बड़े गर्व से अपने बॉस को फुटेज दिखाए। देखकर बॉस भावुक हो गए और हमारे ऊपर टूट पड़े।

उन्होंने कहा कि किसी के जख्मों पर नमक मिर्च छिड़कर अपनी खबर में धार पैदा करना पत्रकारिता नहीं। पत्रकारिता छोड़कर क़साई बन जाओ!


सूत्र- पत्रकार की आग बुझाई का सच!
एक ‘कथित’ पत्रकार महोदय की आग बुझाई की असली कहानी सन्न कर देगी।
उस रोज़ जितनी तेज़ी से उन फ्लैट्स में आग भड़क रही थी, संभवत: उससे दूनी तेज़ी से इनके कलेजे से आत्मप्रचार का ज्वालामुखी फूट रहा था।
कालिदास के कालजयी गीतकाव्य ‘मेघदूत’ के यक्ष भी इतनी तेज़ी से नहीं उड़ते होंगे, जितनी तेज़ी से ये महानुभाव अपने पत्रकार मित्रों को फोन करके ‘मेरी ख़बर चलाओ, मुझसे बात कराओ’, का हाहाकार कर रहे थे।
अगर कोई उस रोज़ इनके मोबाइल के मैसेज और कॉल डिटेल चेक कर ले, तो वो बेगूसराय के काली स्थान के पास से पत्थर उठाकर अपना सर फोड़ ले।
अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों के मुताबिक, गांव की बारात में अधिक खा लेने के चलते हुई बदहजमी के कारण जिस तेजी से बाराती लोटा लेकर खेत की ओर दौड़ते हैं, उससे भी दुगनी रफ्तार से ये महाशय जलती आग का सीन कैच करने और उस पर कमेंट्री करने की खातिर सीढ़ियों की ओर भाग रहे थे।
न तो आग में जल रहे अपने पड़ोसियों के घरों का कोई दर्द था, न कोई फ़िक्र!
आग की लाइव कवरेज को थोड़ा और जीवंत बनाने के लिए इन्होंने पानी की एक पाइप को उसी तरह से अपनी खोपड़ी के ऊपर उठा रखा था, जैसे भरे बाज़ार पाजामे का नाड़ा टूट जाने से घबराया आदमी घर पहुंचने तक पाजामे को दोनों हाथों से पेट की नाभि तक उठाए रखता है।
आग बुझाने की इस पूरी कमेंट्री के दौरान भी उनका ध्यान, आग पर कम और सामने चल रहे मोबाइल कैमरे के फोकस पर ज्यादा था।
एक बार जब उन्हें लगा कि कैमरे का फोकस उनसे हट रहा है, तो उन्होंने कैमरामैन को उसी तरह जलती आंखों से घूरकर देखा जैसे धुरंधर फिल्म में रहमान डकैत की आंखे अरशद पप्पू को घूरती हैं।
इनके बारे में मशहूर है कि अवसरवादिता ने जब गले में पत्थर और कमर में दो बोरी सीमेंट बांधकर कुएं में छलांग लगाई होगी, तब जाकर इनका जन्म हुआ होगा।
आज भी सरकार के लोग पूछते हैं कि ये तो वही हैं जो कुछ ही साल पहले देश के नाम पर आधारित एक चैनल में नेतृत्व की बागडोर संभालते हुए, दिन रात सरकार के गुणगान की झकाझोर बाइट्स मंगाया करते थे और चलवा-चलवाकर ऊपर भिजवाया करते थे।
उस दौरान इनके दौर में सरकार की जयजयकार की जो कवरेज हुई है, वो सब इंटरनेट पर ऑन रिकार्ड है।
आप अगर उसे देख लेंगे तो एक झटके में घोरी से अघोरी, गृहस्थ से सन्यासी और आस्तिक से नास्तिक हो जाएंगे।
बाद में रेटिंग न ला सकने के चलते ये उस चैनल से रूखसत कर दिए गए।
वही दिन इनके बुद्धत्व की प्राप्ति का दिन था।
नौकरी जाने के अगले ही रोज़ इन्होंने काकोरी की मिट्टी को अपने माथे और चौरीचौरा की धूल को पैंट में पोता, और जलियावालां बाग के ठीक बगल की मार्केट से खरीदी कंघी से अपना बाल झाड़कर एकाएक क्रांतिकारी हो गए।
तबसे ये लगातार उसी क्रांति की अवस्था में “मुझे देखो, मुझे सुनो, मेरे बारे में बातें करो” की अनंत चीत्कार किए जा रहे हैं, और “मैं-मैं-मैं सिर्फ मैं” के तारकोल में लोट लोटकर हाहाकार किए जा रहे हैं!! -अभिषेक उपाध्याय


आशीष कुमार अंशु-

पत्रकारिता के नाम पर आजकल जो कुछ चल रहा है, उसमें आपदा सबसे बड़ा अवसर बन गई है। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में गौर ग्रीन एवेन्यू, अभय खंड की उस सोसायटी में आग लगी, जहां अजित अंजुम रहते हैं। आठ-दस फ्लैट जलकर खाक हो गए। जिन परिवारों की जिंदगी भर की कमाई, यादें, सामान और सपने राख में तब्दील हो गए, उनकी मनःस्थिति की कल्पना आसान नहीं है। वे खाली हाथ भागे, कपड़े तक नहीं बचे। नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा-महीनों, शायद सालों की जद्दोजहद। लेकिन अजित अंजुम की पोस्ट पढ़िए तो लगता है मानो आपदा उनके ही घर के इर्द-गिर्द घूम रही थी।

अजित अंजुम ने एक्स पर जो लिखा, उसमें ‘मेरे ठीक सामने’, ‘मेरा घर आग की चपेट में आते-आते बचा’, ‘हम लोग हिम्मत करके डटे रहे’, ‘मैंने पानी मारा’, ‘मेरा मेंटल ट्रॉमा’ जैसे शब्द बार-बार आए। सामने वाली टावर की नौवीं मंजिल पर आग लगी, उन्होंने वीडियो बनाया, लोगों को टैग किया, फिर खुद नीचे भागे, फिर ऊपर गए, पांच लोग मिलकर पानी डाला-सब कुछ उनके इर्द-गिर्द। सोसायटी के अन्य लोग अलग-अलग फ्लोर से पानी मार रहे थे, फायर ब्रिगेड आई लेकिन शुरू में हेल्पलेस थी क्योंकि हाइड्रोलिक सीढ़ी नहीं थी। दो फ्लैटों में चार लोग फंसे रहे, उन्हें बालकनी से बचाया गया। “ऊपर वाले की मेहरबानी से सबकी जान बच गई” -यह लाइन जरूर लिखी, लेकिन पीड़ित परिवारों के नाम, उनकी कहानी, उनकी क्षति का विस्तार? शून्य।

यह दोहरा चरित्र है। एक तरफ ‘निष्पक्ष पत्रकार’ होने का दावा, दूसरी तरफ आपदा को अपने एंगल से सेल्फ-प्रमोशन में बदल देना। जिनके घर पूरी तरह जल गए, वे कौन हैं? उनके परिवार कहां शिफ्ट हुए? उनकी आर्थिक क्षति कितनी भारी है? एक-एक फ्लैट की कीमत गौर ग्रीन एवेन्यू में आज एक करोड़ से ढाई करोड़ रुपये के आसपास है। जिनके घर राख हुए, उनकी पूंजी लाखों-करोड़ों में स्वाहा हो गई। लेकिन अजित अंजुम ने यह नहीं बताया। आग कैसे लगी-एसी कंप्रेसर का ब्लास्ट या कोई और वजह-इसकी भी सही पड़ताल नहीं।

उनके मित्र रवीश कुमार ने लिखा“सात-आठ फ्लैट एक सिरे से जले हैं। बगल में अजीत जी का घर है। लपटें वहां तक भी पहुंच रही थीं।” मतलब आग पड़ोस में लगी, अजित का घर बाल-बाल बचा, लेकिन पोस्ट का केंद्र “अजीत अंजुम का घर बचाना” बन गया। वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर ने भी यही टोन अपनाई-अजित का फ्लोर, उनकी स्थिति। पीड़ित परिवारों की चिंता गौण। कवयित्री स्वाति खुशबू ने ठीक पकड़ा: ग्रीन गौर में अच्छी-खासी आग लगी, दस फ्लैट लपेटे में आ गए, उसकी चिंता नहीं, मगर ‘अजीत अंजुम के यहां आग पहुंच सकती है’ की चिंता है। कहीं यह “सच की आवाज दबाने की साजिश” न घोषित कर दी जाए!

यह पैटर्न नया नहीं। अजित अंजुम, रवीश कुमार समेत कुछ यू-ट्यूबर पत्रकार सामाजिक होने का दिखावा करते हैं। लेकिन जब असली पीड़ा उनके घर के ठीक बगल में हो रही हो, तो भी रिपोर्टिंग ‘मैं, मेरा, हमारा’ पर अटक जाती है। एक भी पीड़ित परिवार की आवाज उनकी पोस्ट में नहीं आई। न उनके विस्थापन की, न आर्थिक तबाही की, न भविष्य की अनिश्चितता की। फ्लैट की कीमत, अजित ने अपना घर कब खरीदा, अब उसकी वैल्यू कितनी है-ये जानकारियां भी दर्शक ही मांग रहे हैं, क्योंकि पत्रकार ने नहीं दीं।

आपदा में अवसर तलाशना पुराना खेल है। पहले टीआरपी के लिए, अब व्यूज, लाइक्स, फॉलोअर्स और ‘मैंने बचाया’ वाले नैरेटिव के लिए। अजित अंजुम ने सामने वाली टावर की आग को रिपोर्ट नहीं किया, उसे अपने मेंटल ट्रॉमा और हिम्मत की कहानी में बदल दिया। रवीश कुमार और मिलिंद खांडेकर जैसे लोग भी उसी सुर में सुर मिला रहे हैं। सामाजिक होने का दावा करने वाले ये लोग, जब असली समाज उनके सामने जल रहा हो, तो भी खुद को केंद्र में रख लेते हैं।

सच तो यह है कि पत्रकारिता के वेश में आज कई ज़ॉम्बी घूम रहे हैं-अभिसार, साक्षी, विनोद कापरी, आशुतोष गुप्ता और इसी लाइन के अन्य नाम हैं। आज उनका दोहरा चरित्र बहुत से लोगों को समझ में नहीं आता, लेकिन जब कोई ईमानदारी से इनके कामों की समीक्षा करेगा, तो एक-एक करके एक्सपोज होंगे। आपदा पीड़ितों की मदद करने वाले असली लोग चुपचाप काम करते हैं। ये लोग कैमरा और पोस्ट के लिए हिम्मत दिखाते हैं।

गौर ग्रीन एवेन्यू की आग सिर्फ फ्लैट नहीं, कुछ पत्रकारों के चरित्र को भी जला कर राख कर गई है। लेकिन वे उस राख से भी नया अवसर निकाल लेंगे-शायद अगली पोस्ट में ‘मैंने कैसे सामना किया’ या ‘सिस्टम की नाकामी’ के नाम पर।

पीड़ित परिवार उसी वक्त नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद में लगे रहेंगे, बिना किसी ‘निष्पक्ष’ पत्रकार की आवाज के।


कैमरामैन इनसे कम उम्र का ही रहा होगा…जवान, फुर्तीला और दमदार भी…जाहिर है वो अच्छे से आग बुझाने में मदद कर सकता था इनकी तुलना में…

लेकिन उसके हाथों में पाइप न देकर…अपनी वीडियो बनवाने के लिए खुद ही पाइप उठा लिए…गौर से देखेंगे तो पानी के फोर्स के कारण पाइप इनसे ठीक से संभल भी नहीं रही…उपर से बेचारे कैमरामैन को डांटा वो अलग!

-आर्या तिवारी

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2 Comments

2 Comments

  1. desh ka sipahi

    May 1, 2026 at 10:42 pm

    kash ye bhadwa dalla pattalkaar ka ghar kal poora awaha ho jata to desh ko ek acchi khabar milti….iske bure karmo ka fal is bhadwey maulana ajit khan anjum ko jaldi mile aisi thakurji se prarthna hai….

  2. Vivaan

    May 16, 2026 at 10:42 am

    यह पोस्ट बेहद चर्चा में रहने वाले विषय पर आधारित है और इसमें गौर ग्रीन में लगी आग और अजीत अंजुम के प्रचार से जुड़े घटनाक्रम का विश्लेषण किया गया है। आज के समय में मीडिया, पत्रकारिता और इस तरह की ट्रेंडिंग खबरों पर सोशल मीडिया एंगेजमेंट और रियल ऑडियंस को आकर्षित करना बहुत प्रभावी होता है। अपनी प्रोफाइल रीच को तेजी से बूस्ट करने और एक्टिव फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए टॉपफॉलो (TopFollow) जैसी ट्रिक भी काफी मददगार साबित हो सकती है। धन्यवाद।

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