पत्रकार गोपाल ठाकुर के मामले में काशी पत्रकार संघ की भयावह चुप्पी के मायने

: …दर्द से तेरे कोई न तड़पा आंख किसी की न रोयी :

पत्थर के सनम
पत्थर के खुदा
पत्थर के ही इंसा पाये है,
तुम शह-रे मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा के आये हैं…

जज्बात ही जब पत्थर के हो जायें तो खुले आसमान के नीचे भले ही कोई अपना यूं ही तन्हा मर जाए, किसी को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर को लेकर कुछ ऐसा ही हो रहा है। भड़ास पर खबर चलने के बाद भले ही शहर के बाहर के लोगों ने फोन कर उनके बारे में जानकारी चाही पर खुद उनका अपना बनारस शहर अब तक खामोश है। उनके चाहने वाले, मित्र, यार परिवार किसी को भी न तो उनके दर्द से मतलब है, फिर आखों में आंसू का तो सवाल ही नहीं उठता।

वैसे भी काशी पत्रकार संघ की खामोशी पर कोई मलाल नहीं होता क्योंकि पत्रकारों के हित से ज्यादा अपनों के बीच अपनों को ही छोटा-बड़ा साबित करने में ही इनका ज्यादतर समय गुजर जाता है। हां एक टीस सी जरूर होती है कि जिस काशी पत्रकार संघ की स्थापना में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर के पिता स्व. राम सुंदर सिंह की भी भूमिका रही है, और जो काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके है, उन्हीं के पुत्र और खुद काशी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष रहे गोपाल ठाकुर के मसले पर भी संघ के अन्दर कोई हलचल नहीं है। पत्रकारों के हितों के लिए सजग रहकर संघर्ष करने का इससे बेहतर नजर और नजरिया क्या हो सकता है।

बीते कल उनके हालात की जानकारी होने पर उंगली में गिनती के दो-तीन लोग वहां पहुंच उनकी हालात को देखने के बाद अपने साथ ले गये। इन्हीं लोगों ने इनके कपड़े भी बदलवाये, प्राथमिक चिकित्सा देने के साथ गोदौलिया स्थित पुरषोत्तम धर्मशाला में ले जाकर आश्रय भी दिलवाया। लेकिन आश्रय की ये मियाद शनिवार शाम तक ही रही क्योंकि धर्मशाला में देखरेख करने वालों ने उनके वहां अकेले रहने में असमर्थता जताते हुए उन्हें वहां से शनिवार की शाम को ले जाने को कहा है।

अब आगे गोपाल ठाकुर कहा जायेंगे, उनका अगला ठिकाना क्या होगा, इस बारे में अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। लाचार और बीमार गोपाल ठाकुर को चिकित्सा और संवेदना दोनों की ही बेहद जरूरत है। …  जब कि चिकित्सा पैसों के बिना मिलेगी नहीं और संवेदना अपनों के बिना। पर यहां तो उनके मामले को लेकर एक रिक्तता नजर आ रही है। इन सबके बीच धूमिल की कविता बार-बार कह रही है….

नहीं यहां अपना कोई मददगार नहीं
मैंने हर एक दरवाजे को खटखटाया
पर जिसकी पूंछ उठाया
उसको ही मादा पाया।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828


मूल खबर….

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *