संवाददाता समिति ने दी वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के परिजनों को 55 हजार की मदद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने लम्बे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के परिजनों से आज मुलाकात कर उनके इलाज के लिए 55 हजार की फौरी मदद प्रदान की। इसी के साथ समिति ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह श्री सिंह के इलाज के लिए दस लाख रूपये देने की उसकी मांग पर शीघ्र निर्णय करे।

समिति के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र व सचिव नीरज श्रीवास्तव के नेतृत्व में समिति के सदस्यों ने आज गोमती नगर स्थित वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के आवास पर जाकर यह राशि प्रदान की। श्री सिंह लम्बे समय तक हिन्दी दैनिक आज से जुड़े रहे। दो वर्ष पूर्व वे नर्व की लाइलाज बीमारी के शिकार हो गये। इस समय उनका 80 फीसदी अंग काम नहीं कर रहा है। समिति ने कुछ दिन पूर्व उनकी हालात से प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल को अवगत कराते हुए उनसे मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से दस लाख रूपये की आर्थिक सहायता दिलाने की मांग की थी।

अभी तक सहायता राशि न मिलने के कारण फौरी मदद के तौर पर समिति ने 55 हजार रूपये की राशि उनकी पत्नी पूनम सिंह को प्रदान की। इस राशि में राज्य मुख्यालय में मान्यता प्राप्त संवाददाता सदस्यों का 30 हजार रूपये का योगदान है। शेष राशि समिति के सदस्यों ने अपनी ओर से एकत्रित की है। इसी के साथ आज पुनः समिति ने सरकार से सुरेन्द्र सिंह को शीघ्र सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। सहायता राशि देने के प्रतिनिधिमण्डल में समिति के उपाध्यक्ष नरेन्द्र श्रीवास्तव, संजय शर्मा, संयुक्त सचिव अजय श्रीवास्तव, अमितेश श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष अशोक मिश्र तथा सदस्य मुदित माथुर,काजिम रजा,आशीष श्रीवास्तव व वरिष्ठ पत्रकार आनन्द सिन्हा शामिल थे।

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ईटीवी के पत्रकार ऋतुराज ने खून देकर आदिवासी भाई-बहन की जान बचायी

देवघर में ईटीवी बिहार के पत्रकार ऋतुराज सिन्हा ने रक्षाबंधन के दिन खून देकर आदिवासी भाई बहन की जान बचायी. प्राप्त सूचना के अनुसार देवघर के एक अस्पताल कुंडा सेवा सदन में एक आदिवासी भाई बहन जिनकी उम्र सात साल एवं नौ साल बतायी जा रही है, सेरेब्रल मलेरिया से ग्रसित होकर भर्ती थे. वहाँ उन बच्चों का हीमोग्लोबिन काफी नीचे गिर गया था. उन बच्चों की जान खून के अभाव में जा भी सकती थी. ईटीवी के पत्रकार ऋतुराज को इस संबंध में जानकारी मिली तो उन्होंने उन बच्चों को खून देने का निर्णय लिया.

अस्पताल के चिकित्सक डॉ संजय कुमार ने ऋतुराज के इस निर्णय और कार्य के लिए उन्हें बधाई दी. डा. संजय ने बताया कि अगर किसी को भी तेज बुखार आए तो उसे मलेरिया की जांच करानी चाहिए. फालसीपेरम मलेरिया उग्र रूप लेता है तो ब्रेन मलेरिया हो जाता है. डा. संजय के मुताबिक ऋतुराज द्वारा दोनों बच्चों को आधा-आधा यूनिट खून देने से बच्चों की स्थिति में सुधार हुआ है और दोनों बच्चे फिलहाल खतरे से बाहर हैं. दोनों का इलाज जारी रहेगा. उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन के दिन पत्रकार ने खून देकर एक आदिवासी भाई बहन की जान बचाई है, यह सराहनीय है.

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कोटा के बाद दैनिक भास्कर भीलवाड़ा में भी बगावत, प्रबंधन पीछे हटा

मजीठिया वेज बोर्ड के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने वाले कर्मियों को लगातार परेशान करने के कारण भास्कर ग्रुप में जगह-जगह विद्रोह शुरू हो गया है. अब तक प्रबंधन की मनमानी और शोषण चुपचाप सहने वाले कर्मियों ने आंखे दिखाना और प्रबंधन को औकात पर लाना शुरू कर दिया है. दैनिक भास्कर कोटा में कई कर्मियों को काम से रोके जाने के बाद लगभग चार दर्जन भास्कर कर्मियों ने एकजुटता दिखाते हुए हड़ताल कर दिया और आफिस से बाहर निकल गए.

बाएं से दाएं : आंदोलनकारी मीडियाकर्मियों के साथ बात करते भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह, अजमेर के वरिष्ठ पत्रकार रजनीश रोहिल्ला और जर्नलिस्ट एसोसिएशन आफ राजस्थान (जार) के जिलाध्यक्ष हरि बल्लभ मेघवाल.

यह सब कोटा में चल ही रहा था कि बगल के भीलवाड़ा एडिशन से खबर आई कि वहां भी प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट जाने के कारण दो लोगों को काम पर जाने से रोका तो दर्जनों मीडियाकर्मियों ने एकजुट होकर आफिस जाने से मना कर दिया. इससे प्रबंधन के हाथ पांव फूल गए. इन्हें अंदाजा नहीं था कि किसी एक को रोकने से दर्जनों लोग काम पर न जाने का ऐलान कर देंगे. ऐसे में कोटा एडिशन की बगावत से निपट रहे भास्कर प्रबंधन ने फौरन पांव पीछे खींचना ही बेहतर समझा और सभी को काम पर जाने की अनुमति दे दी. इस तरह भास्कर प्रबंधन की रणनीति भीलवाड़ा में फेल हो गई.

भीलवाड़ा एडिशन में बगावत की खबर सुनकर कोटा पहुंचे भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भीलवाड़ा का रुख कर लिया और वहां पहुंचकर आंदोलित मीडियाकर्मियों के साथ बैठक की. उन्हें आगे की रणनीति और प्रबंधन से लड़ने-भिड़ने के तरीके समझाए. साथ ही स्थानीय लेबर आफिस में प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ शिकायत करने के लिए फार्मेट दिया. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ दैनिक भास्कर अजमेर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे और सुप्रीम कोर्ट जाकर मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना हिस्सा भास्कर प्रबंधन से छीन लेने में सफल रहे पत्रकार रजनीश रोहिल्ला भी दैनिक भास्कर कोटा और भीलवाड़ा के कर्मियों से मिलते जुलते रहे और लड़ने पर ही हक मिलने की बात समझाते रहे. उन्होंने बताया कि मीडिया के मालिकान सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से ही डरते हैं. वे लेबर आफिस से लेकर निचली अदालतों तक को मैनेज कर पाने में कामयाब हो चुके हैं. ये मालिकान डरा धमका कर किसी तरह सुप्रीम कोर्ट से केस वापस कराना चाहते हैं. जो इस वक्त डर गया, साइन कर गया, झुक गया, वह जीवन भर पछताएगा. यही वक्त है डटे रहने का. ये प्रबंधन आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

इस बीच, भास्कर प्रबंधन की तरफ से तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने भास्कर कर्मियों से अपील की कि वे प्रबंधन की बातों पर भरोसा न करें क्योंकि प्रबंधन की अंतिम कोशिश यही होगी कि किसी तरह झूठ बोलकर, बरगला कर, अफवाह फैला कर, डरा कर, धमका कर सुप्रीम कोर्ट जाने वालों से फर्जी कागजातों पर साइन करा लें. साथ ही मीडियाकर्मियों की एकजुटता को खत्म कर दें. यशवंत ने कहा कि एकजुटता और संगठन ही वो ताकत है जो मालिकों को घुटनों पर बिठाने में सफल हो सकेगा.

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कोयलांचल के पत्रकार वेद प्रकाश जिंदगी-मौत से जूझ रहे, मदद की जरूरत

कोयलांचल के जुझारू पत्रकार वेद प्रकाश आज जिंदगी और मौत से जब जूझ रहे हैं तो कोयलांचल के बहुत कम साथी हैं जिन्हें वह याद आते हैं. करीब दो दशक पहले भारतीय खनि विद्यापीठ की निबंध प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने के बाद धनबाद के एक स्थानीय दैनिक ने अपने यहां काम करने का अवसर दिया. और यहीं से शुरू हुई उसकी पत्रकारिता. दस साल पहले ‘प्रभात खबर’ के धनबाद संस्करण में काम करते हुए गिरिडीह राइफल लूट कांड, महेंद्र सिंह हत्याकांड और भेलवाघाटी उग्रवादी घटना की रिपोर्टिग के लिए काम निबटाकर रात तीन बजे धनबाद से गिरिडीह जाना हम साथी भूल नहीं सकते.

नक्सली वारदात की रिपोर्टिग के लिए गिरिडीह कूच करते समय किसी अंदेशा की बजाय तीर्थ की अनुभूति और एडवेंचर का रोमांच उसके चेहरे पर हम देखते थे. यह जज्बा और जुनून ही था कि घातक हादसे से उबरने के बाद वेद उसी पुराने जोशो-खरोश के साथ रिपोर्टिग के अपने पुराने काम में जुत गये थे. भीतर ही भीतर मधुमेह, गुरदा की परेशानी से टूट रहे वेद के चेहरे पर कभी किसी ने थकान या उदासी नहीं देखी. अपोलो और एम्स का चक्कर लगा रहा.

गैंग्रीन ने पीछा भी नहीं छोड़ा था कि फिर आ गये काम पर यह उम्मीद जताते हुए कि काम करते-करते सामान्य हो जायेंगे. पैर के अंगूठे का घाव सूखा भी नहीं था कि पट्टी बंधे पांव के साथ लंगड़ाते-लंगड़ाते धमक गये काम पर.  संपादक और दफ्तर के आग्रह के बावजूद यह हाल था. कभी हादसा तो कभी बीमारी के कारण बार-बार अस्पताल का चक्कर लगता रहा. हर बार थोड़ा ठीक होकर जिंदगी के लिए, हम सभी के लिए बची-खुची ऊर्जा जुटा कर और टूटती उम्मीद को छीन कर लाते रहे. लेकिन बार-बार किस्त-किस्त में बीमारियां भीतर ही भीतर उन्हें खाये जा रही थी. और हम थे कि खोखली होती उम्मीद से हौसला पा रहे थे कि हमारा वेद खुशी के सामानों के साथ लौट रहा है.

बिना किराये के कोई किसी मकान में कितने दिनों तक रह सकता है. लगभग यही हाल उसकी सेहत का होता रहा. शरीर अब सेहत का किराया देने में लगातार लाचार होता गया. कोयलांचल में जितनी मदद हो सकती थी मीडिया ने अलग-अलग क्षेत्रों से मदद जुटायी. उन्हें जिलाकर रखने में कोई कोताही नहीं की घर वालों ने. जहां इलाज में लाखों के मासिक खर्च आ रहे हों, वहां साजो-सामान जुटाने में उनके कुनबे, हमारे साथियों के दम टूटते जा रहे हैं. फिलहाल हमारा वेद कोलकाता के एक निजी अस्पताल सीएमआरआइ में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है. फिर भी हमें उम्मीद है कि हमदर्द साथी उसे छोड़ना नहीं चाहेंगे. उस जिंदादिल वेद को कौन यूं ही जाते देख सकता है. उम्मीद के जंगल में उस वेद को ढूंढ़ने की जी तोड़ कोशिश करें तो कुछ हो सकता है. वेद का हाल जानने के लिए उनकी पत्नी से 09431375334 पर संपर्क किया जा सकता है. अगर आप हमारे वेद प्रकाश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उनके लिए वेद के खाते का ब्योरा हम यहां दे रहे हैं :

बैंक का नाम : स्टेट बैंक आफ इंडिया
खाता सं. : 30030181623
आइएफएससी कोड : एसबीआइएन 0001641
एमआइसीआर कोड : 8260002006
ब्रांच कोड : 001641

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UP govt announces financial assistance to scribes’ families

Uttar Pradesh government today announced financial assistance to the families of the three journalists who passed away recently, a senior official said. Principal Secretary, Information, Navneet Sehgal said a financial assistance of Rs 20 lakh to the families of each of the scribes (Amresh Mishra-Hindustan, Manoj Srivastava-Amar Ujala and Tahir Abbas-Rashtriya Sahara) who passed away recently will be provided.

He said the decision has been taken by Chief Minister Akhilesh Yadav. President of UP Accredited Journalist Committee Hemant Tiwari has expressed gratitude towards the government for its gesture. He said this was the first time when the government has extended help to the bereaved families of the journalists.

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क्या दिल्ली में पाए जाने वाला सरोकारी संपादक नाम का जीव विलुप्त हो गया है?

सुना है कि देश की राजधानी दिल्ली में सरोकारी संपादक नाम का कोई जीव पाया जाता था. आजकल यह जीव विलुप्त हो गया है क्या? वैसे सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति के जीव मीडिया हाउसों को खोलने का ठेका खूब लेते हैं. मीडिया कर्मियों के हितों का ठेका लेने की डींगें भी इस प्रजाति के जीव हांकते पाये जाते हैं. लगता है सोशल मीडिया पर शेर की तरह दहाड़ने वाले बड़का सरोकारी संपादक लोग बेरोजगार मीडिया कर्मियों की दिहाडी में लगी आग से हाथ गरम कर रहे हैं. एक के बाद एक न्यूज टीवी चैनल बंद हो रहे हैं. जर्नलिस्ट और नॉन जर्नलिस्ट्स के साथ-साथ चैनलों में काम करने वाले सैकड़ो कर्मचारी बेरोजगार हो रहे हैं.

पीएफ, ईएसआई का पैसा हड़पा जा रहा. दिन-रात बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के बाद महीने के आखिर में तनख्वाह के भी लाले पड़ रहे हैं. मगर, सरोकारी संपादक प्रजाति नाम के जीवों पर कोई असर नहीं है. अभी अभी किसी ने बताया कि सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति ‘मालिक और मालिक नुमा’ चिटफण्डियों-माफियाओं-बिल्डरों, भ्रष्ट अधिकारी-ठेकेदारों की चाटुकारिता में लगे हुए हैं. कागजी शेर सरोकारी संपादक नाम के ये जीव, रहनुमायी मीडिया कर्मियों की और दलाली मालिकों की करते हैं. ये लोग तर्क भी खूब देते हैं. दलाली से ही तो चैनलकी तनख्वाह का जुगाड़ होता है.

बात शुरु हुई है पी-7 न्यूज चैनल में कर्मचारियों के धरना-प्रदर्शन से. एक बार समझौता होने के बाद चैनल दुबारा शुरु हुआ और फिर अचानक बंद कर दिया गयाकर्मचारियों का बकाया दिये बगैर ही. पहली बार जब समझौता हुआ तो उसमें पुलिस-प्रशासन, लेबर कोर्ट सब शामिल हुए लेकिन सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति का कोई जीव नहीं था. एक महाशय थे भी तो वो ऐसे गायब हुए हैं जैसे गधे के सिर से सींग गायब हो गये. अपनी मेहनत का वाजिब पैसा और हक मांगने वाले मीडिया कर्मियों के साथ खड़े होने की हिम्मत सरोकारी संपादक प्रजाति का कोई भी जीव अभी तक नहीं जुटा पाया है.

आईबीएन 7 से एक झटके में सैकड़ों मीडिया कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति उस वक्त भी मजे लेती रही. जब महुआ चैनल को अचानक बंद किया गया उस वक्त भी सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति की मोटी चमड़ी पर कोई असर नहीं हुआ. कुछ पहले के सालों पर निगाह डालें तो वीओआई ने सैकड़ों लोगों के भविष्य से खिलबाड़ किया, सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति की नींद नहीं टूटी. एस वन, आजाद, जनसंदेश और अभी हाल में भास्कर चैनल में कर्मचारियों के भविष्य की ऐसी-तैसी कर दी, मगर सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति कभी भी टस से मस नहीं हुई. इस प्रजाति के किसी जीव ने मीडिया कर्मियों के भविष्य को सुरक्षित करने का जोखिम उठाना मुनासिब नहीं समझा है. लायजनिंग, दलाली और कमीशन का टांका खत्म हो जाने का डर सताता है क्या?

पी-7 के कर्मचारी पूस की रातों में हाड़ कपां देने वाली सर्दी के बीच धरने पर बैठे हैं. हमारे कागजी शेर-सरोकारी संपादक प्रजाति के जीव रजाइयों और ब्लोअर से बदन गरम कर रहे हैं. सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति के जीव चिटफण्डियों-माफियाओं-बिल्डरों, भ्रष्ट अधिकारी-ठेकेदारों को सिलवर स्क्रीन के गोल्डन ड्रीम्स खूब दिखाते हैं. इनमें से कुछ  न्यूज चैनल शुरु करवाने के नाम पर तो कुछ चलचित्र, वृत्त चित्र के नाम पर अपने शो रूम लॉंच कर देते हैं. कुछ को तो कमीशन ही इतना मोटा आ जाता है कि तनख्वाह की जरूरत ही नहीं रहती तो कुछ सरोकारी संपादक शेयर होल्डर बन जाते हैं. कथित घाटे और मंदी की बेदी पर बलि मीडिया कर्मियों की ही दीजाती है.

दूरदर्शन को छोड़ दें तो भी हिंदुस्तान का इलैक्ट्रॉनिक मीडिया लगभग 20 साल पुराना हो चुका है. दो दशक बीत जाने के बाद भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के कर्मचारियों के लिए कोई नियम-कानून नहीं बना है. भारतीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जर्नलिस्ट्स, भारत के वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का कोई लाभ हासिल नहीं कर सकते. सरोकारी संपादक नाम की प्रजाति के बहुत सारे जीव प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में खूब दिखते-छपते हैं. गांव गली से लेकर दुनिया जहान के हित पर चीखते-चिल्लाते भी दिखेंगे. कम्युनल और नॉन कम्युनल पर व्याख्यानों का तो कोई जबाब नहीं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का मुद्दा हो तो गला फाड़ कर बोलेंगे और कलम तोड़ कर लिखेंगे. आदिवासी और नक्सली के विषय पर पूरी रिसर्च, अपनी पुरानी एक रिपोर्ट के सहारे, घर के कमरे में ही कर डालेंगे. आंखों के सामने- नाक के नीचे सैकड़ों मीडिया कर्मियों के भविष्य से हो रहे खिलबाड़ पर न तो दो कदम निकलते है, न दो शब्द जुबान से फूटते हैं और न दो शब्द कलम से निकलते हैं! क्या हो गया है, कहां गये हमारे सरोकारी संपादक !!! 

लेखक राजीव शर्मा कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क rajeev@bhadas4media.com के जरिए कर सकते हैं.

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Zee News की HR policy की तारीफ़ करनी होगी, बीमा के जरिए रिपोर्टर शिवम की जान की कीमत 25 लाख आंकी गई

Vinod Kapri : शिवम् भट्ट। इस बच्चे को मैं जानता नहीं हूँ। ना कभी मिला। पर जब से शिवम् की मृत्यु का समाचार पढ़ा और सुना-मन बेहद उदास है। शिवम् का ज़िक्र आते ही टीवी के वो सैकड़ों शिवम् आँखो के सामने से गुज़रने लगते हैं जो दिन रात , सूखा बरसात , गर्मी सर्दी देखे बिना ख़बर की खोज में लग जाते हैं। मुंबई हमला हो , केदारनाथ त्रासदी हो या कश्मीर की बाढ़ हो – हर मैदान में रिपोर्टर या कैमरामैन बस बिना कुछ परवाह किए कूद पड़ते हैं। ऐसी हर कवरेज के दौरान मुझे इन लोगों की हमेशा सबसे ज़्यादा फ़िक्र रही। ना जाने कितने लोग इसके गवाह होंगे।

शिवम् के बहाने आज फिर अपने दोस्तों से अपील करना चाहूँगा। कवरेज कितनी ही ज़रूरी क्यों ना हो , ड्राइवर पर बिलकुल दबाव मत डालो कि वो तेज़ चलाए। दफ़्तर से दबाव कितना ही हो – कवरेज के दौरान रिस्क मत लो। मैं जानता हूँ कि बीसियों बार अपने रिपोर्टर से कुछ ख़ास करने के लिए मैंने भी कहा होगा पर साथ ही आख़िरी में एक बात हमेशा जोड़ी कि किसी भी क़ीमत मे रिस्क नहीं। खाने पाने का ख़्याल रखो। बीमार हो जाओ तो तुरंत इलाज कराओ। हो सकता है कुछ लोगों को अजीब लग रहा हो पर आज शिवम् के बहाने इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों में आपके जाने के बाद आपके परिवार को पूछने वाला एक व्यक्ति भी नहीं होता।

Zee News की HR policy की तारीफ़ करनी होगी कि बीमा के ज़रिए एक रिपोर्टर की जान की क़ीमत 25 लाख तो आँकी गई पर दुर्भाग्य ये है कि ज़्यादातर संस्थानों , नब्बे फ़ीसदी चैनलों मे एक रिपोर्टर की जान की क़ीमत 2 लाख भी नहीं है। साथी-दोस्त उसके बाद अपनी एक एक दिन की सैलरी देकर कुछ कर दें तो ठीक है वर्ना संस्थान से उम्मीद बेमानी है।

इसलिए दोस्तों !! ख़ासतौर पर फ़ील्ड मे जाने वाले सभी दोस्तों – फ़ील्ड मे आप लोग सबसे पहले अपना ख़्याल रखिए। ख़बर अहम होती है , होनी भी चाहिए पर जान की क़ीमत पर नहीं। शोले का वो संवाद याद आ रहा है – जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा दुख क्या होता है ? बाप के कंधे पर जवान बेटे का जनाजा। आप सब भी जवान हो। माता पिता की उम्मीदें हो। सपने हो। सबकुछ करो पर जान की क़ीमत पर कुछ नहीं !!

शिवम् भी सिर्फ़ 24 साल का था। बताया गया कि अभी 3 या 4 दिसंबर को वो 25 का हो जाता। उसके परिवार का दर्द हम समझ ही नहीं सकते। ये भी सुना है कि उसने अपनी आख़िरी स्टोरी का स्लग दिया था – Shivam Final input !!! तब कौन जानता था कि उसके लिखे को हम आज इस रूप में पढ़ रहे होंगे। शिवम् को मेरी श्रद्धांजलि और आप सबसे फिर अपील- अपना ख़्याल रखिएगा।

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समाचार प्लस के सीईओ उमेश कुमार ने एक दुखी परिवार को हर माह पांच हजार रुपये देने का वादा किया

समाचार प्लस के सीईओ उमेश कुमार ने एक लाचार, बेसहारा और आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार की मदद के लिए हर महीने पांच हजार रुपये देने का वादा किया है. उन्होंने शुरुआत पांच हजार रुपये देकर कर दी है. इस परिवार के खाते में उन्होंने पांच हजार रुपए डाल दिए. उन्होंने प्रतिमाह इस परिवार को पांच हजार रुपए देने की बात कही है. असहाय महिला राजी देवी का कहना है कि उमेश जी का शुक्रिया अदा करने के लिए उनके पास शब्द नहीं है. इस आर्थिक मदद से अब उनके परिवार को दो वक्त की रोटी मिल पाएगी.  उमेश इससे पूर्व विकलांग जगदीश की भी मदद कर चुके हैं. इस परिवार की भी उमेश जी पांच हजार रुपए प्रतिमाह मदद कर रहे हैं.

रुद्रप्रयाग के सुनई (मुसाढुंग) गांव की राजी देवी का पति पिछले 28 साल से घर नहीं लौटा है. अब तो शायद ही पति कभी घर लौट पाए. इसके बाद भी मन नहीं मानता. 28 साल का वक्त कम नहीं होता है. बेटी के पैदा होने के बाद से पति का सुराग तक नहीं है. सोचा था कि बेटी उसका सहारा बनेगी. लेकिन आज वह स्वयं बेटी का सहारा बनी हुई है. बेटी बचपन से शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग है. कुछ बोल नहीं पाती. चल नहीं पाती. पति की राह देखते-देखते आज राजी देवी 59 वर्ष की हो चुकी है. राजी की हर सुबह उम्मीद की किरण के साथ होती है. उम्मीद पति के घर वापस लौटने की.

राजी की बेटी पैदाइश विकलांग है. बेटी के पैदा होने के बाद से पति की सूरत नहीं देखी है. बेटी को मिलने वाली विकलांग पेंशन से ही दो वक्त की रोटी नसीब हो रही है. शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बेटी घुटनों के बल चलती है. न बोल पाती है और न सुन सकती है. बस इशारों की बातें समझ पाती है. उसका न तो कोई साथी है और न हमदर्द. मन ही मन मुस्कुराकर अपनी पीड़ा छुपा लेती है. घर की देहरी से बाहर शायद ही उसने कभी कदम रखा हो. राजी देवी के पास एक अदद घरोंदा भी नहीं है. वह अपनी विकलांग बेटी के साथ गौशाला में रहकर जिंदगी के एक-एक पल को काट रही है. आपदा में जमीन धंसने के कारण खेती-बाड़ी का साधन भी नहीं रहा. राजी देवी चाहती है कि उसे विधवा पेंशन मिले लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना विधवा पेंशन मिलना संभव नहीं है.

मोहित डिमरी के फेसबुक वाल से.

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पत्रकार गोपाल ठाकुर के मामले में काशी पत्रकार संघ की भयावह चुप्पी के मायने

: …दर्द से तेरे कोई न तड़पा आंख किसी की न रोयी :

पत्थर के सनम
पत्थर के खुदा
पत्थर के ही इंसा पाये है,
तुम शह-रे मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा के आये हैं…

जज्बात ही जब पत्थर के हो जायें तो खुले आसमान के नीचे भले ही कोई अपना यूं ही तन्हा मर जाए, किसी को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर को लेकर कुछ ऐसा ही हो रहा है। भड़ास पर खबर चलने के बाद भले ही शहर के बाहर के लोगों ने फोन कर उनके बारे में जानकारी चाही पर खुद उनका अपना बनारस शहर अब तक खामोश है। उनके चाहने वाले, मित्र, यार परिवार किसी को भी न तो उनके दर्द से मतलब है, फिर आखों में आंसू का तो सवाल ही नहीं उठता।

वैसे भी काशी पत्रकार संघ की खामोशी पर कोई मलाल नहीं होता क्योंकि पत्रकारों के हित से ज्यादा अपनों के बीच अपनों को ही छोटा-बड़ा साबित करने में ही इनका ज्यादतर समय गुजर जाता है। हां एक टीस सी जरूर होती है कि जिस काशी पत्रकार संघ की स्थापना में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर के पिता स्व. राम सुंदर सिंह की भी भूमिका रही है, और जो काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके है, उन्हीं के पुत्र और खुद काशी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष रहे गोपाल ठाकुर के मसले पर भी संघ के अन्दर कोई हलचल नहीं है। पत्रकारों के हितों के लिए सजग रहकर संघर्ष करने का इससे बेहतर नजर और नजरिया क्या हो सकता है।

बीते कल उनके हालात की जानकारी होने पर उंगली में गिनती के दो-तीन लोग वहां पहुंच उनकी हालात को देखने के बाद अपने साथ ले गये। इन्हीं लोगों ने इनके कपड़े भी बदलवाये, प्राथमिक चिकित्सा देने के साथ गोदौलिया स्थित पुरषोत्तम धर्मशाला में ले जाकर आश्रय भी दिलवाया। लेकिन आश्रय की ये मियाद शनिवार शाम तक ही रही क्योंकि धर्मशाला में देखरेख करने वालों ने उनके वहां अकेले रहने में असमर्थता जताते हुए उन्हें वहां से शनिवार की शाम को ले जाने को कहा है।

अब आगे गोपाल ठाकुर कहा जायेंगे, उनका अगला ठिकाना क्या होगा, इस बारे में अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। लाचार और बीमार गोपाल ठाकुर को चिकित्सा और संवेदना दोनों की ही बेहद जरूरत है। …  जब कि चिकित्सा पैसों के बिना मिलेगी नहीं और संवेदना अपनों के बिना। पर यहां तो उनके मामले को लेकर एक रिक्तता नजर आ रही है। इन सबके बीच धूमिल की कविता बार-बार कह रही है….

नहीं यहां अपना कोई मददगार नहीं
मैंने हर एक दरवाजे को खटखटाया
पर जिसकी पूंछ उठाया
उसको ही मादा पाया।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828


मूल खबर….

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

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शूट के दौरान जिया न्यूज की पत्रकार स्नेहल पटरियों पर गिरीं, दोनों पैर कटे, चैनल की तरफ से कोई मदद नहीं

कल एक फेसबुक मित्र से हाय हैलो हुयी. पहले वो रियल4न्यूज मे काम करती थीं. उसके बाद कल हालचाल पूछा तो पता चला कि जिया न्यूज में है. मैंने पूछा किस स्टोरी पर क़ाम चल रहा है तो बोलीं- फिलहाल रेस्ट पर हूं. मैंने कहा- कब तक. बोलीं- पता नही. मजाक में मैंने कहा- आफिसियल हालीडे. वो बोलीं- नो. मैंने कहा- शादी या प्रेग्नेन्सी. बोलीं- नहीं. फिर दिलचस्पी ली. एक और कयास लगाया की शूट के दौरान घायल? उसने कहा- हां.

मैंने कहा कब तक बेड रेस्ट. बोलीं- उम्र भर. माथा ठनका और सीरियसली पूछा तो पता चला की मेहसाना (अहमदाबाद) में ट्रेन पर शूट के दौरान पटरियों पर गिर गयीं थीं और दोनों टांगें कट गयी. चार महीने से घर पर हैं. सात-आठ लाख रुपये खर्च हो चुके हैं मगर आज तक आफिस ने एक रुपया नहीं दिया. रेलवे प्रशासन भी टाल मटोल कर रहा है. मां-बाप की इकलौती सहारा हैं इसलिये कुछ लिख पढ़ कर काम चला रही हैं.

समाचार चैनल से पंगा नही ले रहीं कि शायद उन चैनल वालों का दिल पसीज जाय. रातों को दर्द के मारे सो नहीं पातीं. ये खबर क्या किसी ने किसी समाचार पत्र या चैनल में पढ़ा / सुना है? क्या दूसरों के लिये न्याय का भोंपू बजाने वाला हमारा किन्नर समाज इस दिशा में कुछ कर सकता है? युवा पत्रकार की उम्र महज 27 साल है और नाम उसकी सहमति से उजागर कर रहा हूं. उनका नाम है Snehal Vaghela. मित्रों, अगर कुछ मदद हो सकती है हक की लडाई में तो साथ जरूर दें. मैं आर्थिक मदद की अपील करके अपने धंधे को और उनके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता.

सिद्धार्थ झा के फेसबुक वॉल से.

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बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

क्या पता कब मारेगी
कहां से मारेगी
कि जिदंगी से डरता हूं
मौत का क्या, वो तो
बस एक रोज मारेगी

कभी धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे बुर्जुग पत्रकार गोपाल ठाकुर को जिदंगी रोज मार रही है, फिर भी जिंदा हैं… सिर पर छत फिलहाल नहीं है…. जो अपने थे, वक्त के बदलते रौ में वो अपने नहीं रहे… बेबसी, बेकारी हालात के शिकार गोपाल जी का नया ठिकाना फिलहाल रविन्द्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम आश्रम का चबूतरा है, जहां लेट कर आसमान को निहारते हाथों को ऐसे ही हिलाकर शायद अपने गुजरे वक्त का हिसाब-किताब करते मिले… लेकिन इतने बुरे वक्त में भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी…

मिले तो उसी अंदाज में हंस दिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं है… कुछ पूछने से पहले ही खुद ही बोल उठे… सब ठीक है यार… पर छलछलाती आखें और चेहरे के अन्दर का चेहरा जैसे सारे राज खोल कर चुगली कर गया- ‘सब एक नजर फेर कर बढ़ गये हैं आगे, मैं वक्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूं।’

गोपाल ठाकुर को मैं तब से जानता हूं जब वो बनारस में ही पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से जुड़ कर हिन्दी पुस्तकों का सम्पादन किया करते थे… दिल के साफ पर स्वभाव के अक्खड़ गोपाल जी का पत्रकारिता से पुराना रिश्ता रहा है… तब बम्बई और अब की मुंबई में वो 1976 से लेकर 1984 तक धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे… बाद में बनारस लौटे तो दैनिक जागरण, आज, सन्मार्ग जैसे कई अखबारों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता ही की… बाद में पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से लम्बे समय तक जुड़े रहे…

सुनने में आया था कि वहां भी उनकी भारत सरकार के किसी सेवानृवित अधिकारी के लिखे किताब की प्रूफ रीडिंग को लेकर विवाद हो गया था, जैसा की होता रहा है… प्रभावशाली सेवानिवृत अधिकारी ने मालिक पर दबाव बना उनको माफी मांगने के लिए मजबूर किया तो अधिकारी की ऐसी-तैसी कर नौकरी को लात मारकर सड़क पर खड़े हो गये… बाद में जब भी मिले तो इस बात का जिक्र उन्होंने कभी मुझ जैसे उनसे उम्र में काफी छोटे लोगो से नहीं किया… जब भी मिले तो पत्रकारिता के वैचारिक पहलुओं पर ही बातें की…

अस्सी से लेकर सोनारपुरा के कई चाय की अड़िया उनके अड्डेबाजी के केन्द्र हुआ करती थी, जहां वो अपने हम उम्र दोस्तों, जानने-पहचानने वालों के साथ घंटों गुजारते थे… लेकिन न तो आज वो दोस्त कहीं नजर आ रहे हैं, न उन्हें जानने-पहचानने वाले… आज गोपाल जी खुले आकाश के नीचे तन्हा जिंदगी के अंत का इन्तजार कर रहे हैं… रोज एक धीमी मौत मर रहे हैं…. कह रहे हैं- ये देश हुआ बेगाना… वैसे भी नजरों से ओझल होते ही भुला देने की शानदार परम्परा हमारी रवायत रही है… हम डूबने वालों के साथ कभी खड़े नहीं होते ये जानते हुए कि हम में हर कोई एक रोज डूबती किश्ती में सवार होगा…

शराब की लत और उनकी बर्बादी के कई किस्से सुनने के बाद भी न जाने क्यों लगता है कि, ऐसे किसी को मरने के लिए छोड़ देना दरअसल कहीं न कहीं हमारे मृत होते जा रहे वजूद की तरफ ही उंगली उठाता है… मौजूदा हालात में साथ वालों की थोड़ी सी मदद, थोड़ा सा साथ और हौसला उन्हें इस हालात से बाहर लाकर जिदंगी से जोड़ सकता है… नहीं तो किसी रोज जिदंगी भर खबर लिखने वाला ये शख्स खबरों की इस दुनिया को छोड़ चलेगा और ये खबर कहीं नहीं लिखी जायेगी कि एक था गोपाल ठाकुर ….और कहना पड़ेगा ….. कोई किसी का नहीं है, झूठे नाते हैं, नातों का क्या।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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