लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संतोष बाल्मीकि के पुत्र का जीवन मुश्किल में, आर्थिक मदद की जरूरत

Dinesh Pathak : कृपया मदद करें। शेयर करें। एक नौजवान के जीवन का सवाल है। हजार रुपए देने वाले सिर्फ 300, दो हजार देने वाले सिर्फ 150 या पाँच हजार देने वाले सिर्फ 60 दानवीरों की जरूरत है। मतलब सिर्फ तीन लाख रुपया। मैं जानता हूँ कि यह रकम बड़ी नहीं है लेकिन तब जब कुछ लोग हाथ बढ़ा दें। कठिन क्षण है। आप सबसे एक विनम्र दरख़्वास्त करने का दुस्साहस कर रहा हूँ। Continue reading

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भड़ास4मीडिया भ्रष्टाचारियों से समझौता करने की बजाय अपने पाठकों से मदद की अपील करना ज्यादा बेहतर समझता है.

भड़ास4मीडिया से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों शुभचिंतक त्वरित मदद कर संकट टालने का काम करते रहे हैं.

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एक गरीब बिटिया फूलवंती की शादी के लिए आर्थिक मदद जुटाने का भड़ासी अभियान हो रहा सफल

भड़ास के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर अपने जिले की एक गरीब बिटिया फूलवंती की शादी के लिए आर्थिक मदद जुटाने का अभियान शुरू किया और देखते ही देखते जो टारगेट था, पचास हजार रुपये इकट्ठा करने का, उसके करीब पहुंच रहे हैं. इसमें बीस हजार रुपये एक ऐसे शख्स ने दिए हैं जो आजकल एक मशहूर निजी विश्वविद्यालय का संचालन करते हैं. वे कभी समाजवादी योद्धा हुआ करते थे और जेल गए. बाद में उन लोगों की एक राज्य में सरकार बनी और उसमें वे मंत्री भी बने. उन्होंने अपने योगदान को गुप्त रखने के लिए कहा है, इसलिए उनका उल्लेख ज्यादा न किया जाएगा. इनके अलावा ढेरों साथियों ने एक सौ एक रुपये से लेकर दो हजार एक रुपये तक डाले हैं. फूलवंती की कहानी और उसके लिए मदद की जो अपील यशवंत ने फेसबुक पर की है, उसे पूरा का पूरा यहां भी पढ़ा जा सकता है…. आप अगर चाहें तो अब भी इस गरीब बिटिया के एकाउंट में एक टोकन एक सौ एक रुपये का धन डालकर ‘न्योता’ का धर्म निभा सकते हैं… Continue reading

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अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय की इस संवेदनशीलता को आप भी सलाम कहेंगे

आमतौर पर पुलिस महकमे से जुड़े लोगों को रुखा-सूखा और कठोर भाव-भंगिमाओं वाला आदमी माना जाता है. लेकिन इन्हीं के बीच बहुतेरे ऐसे शख्स पाए जाते हैं जिनके भीतर न सिर्फ भरपूर संवेदनशीलता होती है बल्कि वे अपने समय के साहित्य से लेकर कला और जनसरोकारों से बेहद नजदीक से जुड़े होते हैं. किसी जिले का पुलिस कप्तान वैसे तो अपने आप में दिन भर लूट हत्या मर्डर घेराव आग आदि तरह-तरह के नए पुराने अपराधों-केसों में उलझ कर रह जाने के लिए मजबूर होता है लेकिन वह इस सबके बीच अपने जिले की साहित्य की किसी बड़ी शख्सियत से इसलिए मिलने के लिए समय निकाल ले कि उनकी सेहत नासाज़ है तो यह प्रशंसनीय बात है.

गोपाल दास नीरज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. ”कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे….” रचने वाले गोपाल दास नीरज ने राजकपूर की ढेर सारी फिल्मों के गीत लिखे. मंच पर नीरज जी की सबसे ज्यादा डिमांड रही है. पद्म भूषण नीरज जी अलीगढ़ में निवास करते हैं. अलीगढ़ में एसएसपी के पद पर राजेश पांडेय हैं जो लखनऊ के भी एसएसपी रह चुके हैं. राजेश पांडेय को जब सूचना मिली कि नीरज जी की सेहत इन दिनों ठीक नहीं है तो वह फौरन वर्दी में ही उनसे मिलने उनके आवास की ओर चल पड़े.

परसों शाम करीब आठ बजे राजेश पांडे जब नीरज जी के आवास पर पहुंचते हैं तो उनकी सादगी देखकर दंग रह जाते हैं. नीरज जी के कमरे में कूलर चल रहा था. एसी नहीं है घर में. अलीगढ़ के एक डिग्री कालेज में प्रोफेसर रह चुके महाकवि पदमभूषण नीरज जी बेहद सरल सहज इंसान हैं. वे स्वास्थ्य कारणों से अब ह्वील चेयर पर चलते हैं. आठ बजे शाम पहुंचे एसएसपी राजेश पांडेय रात साढ़े दस बजे लौटे.

यह पहली बार नहीं जब राजेश पांडेय महाकवि नीरज जी के घर पहुंचे हों. करीब दो महीने पहले जब उन्हें पता चला कि नीरज जी की तबियत काफी बिगड़ गई है तो वो खुद एक नामचीन डाक्टर को साथ लेकर उनके यहां पहुंचे और इलाज में मदद की. राजेश पांडेय महीने में एक बार नीरज जी के यहां जाकर उनका हालचाल पूछ आते हैं. इस संवेदनशीलता को लेकर अलीगढ़ के लोग एसएसपी राजेश पांडेय की काफी सराहना करते हैं.

अलीगढ़ के युवा छात्रनेता जियाउर्ररहमान का कहना है कि हम सभी लोग पुलिस विभाग से लॉ एंड आर्डर बेहतर करने की तो उम्मीद करते हैं लेकिन कोई शख्स इससे आगे जाकर जब हमारे सुख-दुख में शरीक होने लगता है तो यकीनन अच्छा लगता है. पुलिस कप्तान राजेश पांडेय जी का यह बड़प्पन है जो अपने जिले अलीगढ़ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर शख्सियत गोपाल दास नीरज जी के इलाज में सक्रिय हिस्सेदारी लेते हैं और उन्हें स्वस्थ-प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं. उनके इस कदम से पुलिस विभाग के बाकी लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए और जो जिस इलाके में है, वहां की साहित्य, शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों की चर्चित हस्तियों को उचित मान-सम्मान और मदद करनी चाहिए.

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एम्स दिल्ली में एडमिट झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग को मानसिक और आर्थिक मदद की जरूरत

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग

झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग जी, दिल्ली के एम्स अस्पताल में किडनी रोग से पीड़ित अपने इलाज के लिए अकेले ज़िन्दगी की जंग लड़ रहे है। ये जानकारी मुझे संतोष मानव जी (पूर्व संपादक – हरिभूम एवं दैनिक भास्कर) के फेसबुक वाल से प्राप्त हुई। संतोष सर के द्वारा ये जानकारी पोस्ट करने के बाद हालाँकि कुछ ही देर बाद में देश के कई मीडियाकर्मियों तक पहुँच गयी लेकिन फिर भी शायद अभी तक यह खबर सही रूप से मीडियाकर्मियों उनके आन्दोलन के दिनों के साथियों तक नहीं पहुँच पाई है।

फैसल जी को  इस समय जहां अपने इलाज के लिए आर्थिक सहायता की ज़रूरत है। वहीं हजारों की भीड़ को संबोधित करने वाले क्रन्तिकारी कलमकार आज स्वयं को अकेला महसूस कर रहे हैं।  फैसल जी को जानने वाले जानते हैं कि उन्होंने हमेशा आदिवासी एवं अल्पसंख्यकों की आवाज़ को अपनी कलम के ज़रिये बल दिया है। आज उन्हें अपने नए पुराने साथियों की ज़रूरत है।  उनका मोबाइल नंबर यहाँ नीचे दे रहा हूं। अगर संभव हो सके तो एक बार उनसे संपर्क ज़रूर कीजिये। साथ ही एक तस्वीर में उनके बैंक अकाउंट की डिटेल भी है। कुछ बन सके तो ज़रूर मदद कीजिए। 

फैसल अनुराग जी का मोबाइल नंबर- 9431171442

नीचे वो पोस्ट भी जस की तस कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ जो संतोष सर ने अपने फेसबुक वाल पर कल लिखी थी। साथ ही रांची के एक अन्य पत्रकार आलोक के द्वारा लिखी मार्मिक पोस्ट भी जस की तस हीं कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ  

संतोष मानव : Sri रघुवर दास ; Sri CPSingh ; Sri सरयू राय Sri Arjun Munda Sri हेमंत सोरेन ; Sri सुबोधकांत सहाय और झारखंड के तमाम मंतरी-संतरी ; नेता -अभिनेता। मीडिया के लोग। ढाई करोड़ जनता जनारदन। Sri फैसल अनुराग झारखंड की शान हैं। मेहनतकशों की आवाज हैं। सौ फीसदी सच्चे और अच्छे कलमकार हैं। मैंने अब तक के जीवन में ऐसे सच्चे लोग कम देखे हैं। वे एम्स दिल्ली में एडमिट हैं। जीवन के लिए लड़ रहे हैं। इस लड़ाई में उनको जीतना ही चाहिए। यह हम सब की जिम्मेदारी हैं। देखिए कौन क्या कर सकता है? फैसल जी सचेत हैं। उन्हें लग रहा है कि वे भरी दुनिया में अकेले हैं। यह सोच हमारे लिए ठीक नहीं है। आप सभी कम से कम फोन करके कहिये कि आप उनके साथ हैं। आप उनसे नहीं मिलें, तब भी कहिए कि आप अकेले नहीं है। यह भी असरकारी दवा होगी उनके लिए। 

आलोक रांची : फैसल जी को डर है कि लोग उन्हें छोड़ कर चले गये हैं. वो बार बार ये बात कह रहे हैं. ये सब कुछ उनके मानसिक पटल पर समा गया है. मैं फैसल जी के सभी साथियों, आंदोलनकारी, क्रांतिकारी, बुद्धिजीवी, पुराने पत्रकार साथी सामाजिक संगठन, राजनीतिक दोस्त, जेपी आन्दोलन के साथियों से विशेष आग्रह कर रही हूँ  कि आप उनसे सम्पर्क करें और आंदोलनों के बारे में बाते करें. यही उनका इलाज है. उनसे खूब बात करें, मैसेज करें, ताकि वो अपने संतुलन में आ सके.

लेखक विकास से संपर्क vikash.makkar@yahoo.com या 9818868890 के जरिए किया जा सकता है.

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आयरलैंड में प्रोफेसर ने भारतीय छात्र को जबरन मनोरोगी बता बंधक बनवाया

आयरलैंड में एक भारतीय पीएच डी छात्र का कहना है कि उसे अपने गाइड के गलत बातों का विरोध करने की सजा मिल रही है. लखनऊ निवासी आईआईटी कानपुर के बी टेक स्नातक गोकरण शुक्ला ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन (आयरलैंड) में डॉ स्तेफानो संवितोस के अन्दर फिजिक्स में टनेलिंग मैग्नेटो रेजिस्टेंस (टीएमआर) विषय पर पीएच डी कर रहे हैं, जहाँ वे ज़िरकोनियम ऑक्साइड, कैल्शियम नाइट्राइड, एल्युमीनियम नाइट्राइड जैसी वस्तुओं पर असर का अध्ययन कर रहे हैं.

20 मार्च 2017 को उन्होंने यूपी कैडर आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर से फोन पर संपर्क कर कहा कि उनके गाइड डॉ संवितोस ने उनके अध्ययन हेतु पूरी तरह फर्जी मॉडल सामने रखा है जो पूरे अकादमिक संसार के साथ धोखा है, जिसका श्री शुक्ला ने खुला विरोध किया.

श्री शुक्ला के अनुसार डॉ संवितोस इस बात से इस कदर खफा हो गए हैं कि उन्होंने अन्य लोगों के साथ मिलकर उन्हें पैरानॉयड घोषित करा कर संत विन्सेंट अस्पताल, डबलिन के मनोविज्ञान विभाग में भर्ती करा दिया है, जहाँ वे बंधक अवस्था में रखे जा रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है. उनका कहना था कि वे किसी प्रकार से मनोरोगी नहीं हैं और किसी भी भौतिकी विशेषज्ञ के सामने अपनी बात स्थापित कर सकते हैं.

श्री ठाकुर ने आज विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और आयरलैंड में भारतीय एम्बेसी को इन तथ्यों से अवगत कराते हुए इन्हें सत्यापित कराये जाने और आवश्यकतानुसार श्री शुक्ला को विधिक और मानवीय आधार पर सहायता किये जाने हेतु अनुरोध किया है. 

Indian Student in Ireland under distress for exposing his Prof?

A Ph D student in Ireland claims he is being allegedly harassed for having exposed his Guide’s wrongdoings.  Gokaran Shukla, an IIT Kanpur Graduate, belonging to Lucknow (UP), is pursuing his Ph D in Physics at Trinity College, Dublin (Ireland) under Dr Stephano Sanvitos, on Tunneling Magneto Resistance (TMR), where he is working on effect of materials like Zirconium Oxide, Calcium Nitride, Aluminum Nitride and Silicon Oxide.

On 20 March 2017, he contacted UP Cadre IPS officer Amitabh Thakur on phone saying that his Guide Dr Sanvitos proposed a completely fallacious model for this study which is a cheating in the academic world, which Mr Shukla vehemently opposed.

Mr Shukla said that an infuriated Dr Sanvitos has colluded with other persons to get him declared as a Paranoid patient and got him admitted in Saint Vincent Hospital, Dublin where he is being held captive and is being hugely ill treated. He said he is not mentally diseased in any manner and can easily prove his stand before any Physicist.

Based on these facts, Mr Thakur today wrote to External Affairs Minister Sushma Swaraj and the Indian Embassy in Ireland requesting them to get the facts verified and to help and assist Mr Shukla through possible legal and humanitarian measures.

Phone No of Sri Gokaran Shukla- +353899634857
Contact details of Prof Stephano Sanvito-  +353 1 896 3065, sanvitos@tcd.ie

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कैंसर पीड़ित देवघर के वरिष्ठ पत्रकार आलोक संतोषी को मदद की जरूरत

झारखण्ड के देवघर जिला के एक वरिष्ठ पत्रकार आलोक संतोषी गंभीर रूप से बीमार हैं। कैंसर से पीड़ित हैं। साल भर पहले पैंक्रियाज कैंसर की सर्जरी हुई थी। उसके बाद रिकवर कर रहे थे। फिर यकायक बीमार ही गए। लखनऊ के पीजीआई में साल भर से ईलाज करा रहे आलोक संतोषी अब टूटने लगे हैं, हारने लगे है। अपनी उदासी और बेबसी को उन्होंने अपने फेसबुक के माध्यम से उकेरा है। साथ ही इस बुरे दौर में पत्रकारों के साथ नहीं देने का दुःख भी प्रकट किया है।

आलोक संतोषी की इस पीड़ा से किसी भी संवेदनशील आदमी की रूह कांप उठेगी। आलोक अपने परिवार के साथ अकेले संघर्ष कर रहे है। कैंसर के दर्द के कांटो के चुभन सिर्फ वो और उनके परिवार को पीड़ा दे रहा है। माहौल बिलकुल निराशाजनक है। देवघर के चंद लोगों ने उनका साथ दिया है, पर पत्रकारों ने उनका हाल पूछने की जहमत तक नहीं उठायी। आलोक की इस पीड़ा से उठे तकलीफ पर उन्हें अकेले छोड़ा नहीं जा सकता है।

आलोक जी हम पत्रकार भड़वे हैं, दलाल हैं, सत्ताधारियों के पिछलग्गू है। हमें आपकी पीड़ा नहीं दिख रही है। हमने अपने इमोशन पर तेजाब डाल लिया है। हमें आपकी परेशानी से क्या? आप ना सांसद हैं, ना विधायक हैं और ना ही कोई धन्नासेठ सो हमें आपकी बीमारी से क्या? आलोक जी, आप तो अख़बार में पूरे पन्ने का विज्ञापन भी नहीं दे सकते और ना ही किसी चैनल का टाइम स्लॉट खरीद सकते हैं। आप तो पत्रकार ठहरे वो भी छोटी जगह के।

आप रांची और दिल्ली के भी तो पत्रकार नहीं हैं जो सत्ता के बैकडोर का फायदा किसी को दिला देंगे। आपकी बीमारी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया जाने वाला गिफ्ट नहीं है और ना ही किसी अधिकारी द्वारा दिया जाने वाला गिफ्ट, जिसे लेने के लिए हम लोहालोट हुए जायेंगे। रही बात प्रेस क्लब और पत्रकारों के संगठन की तो प्रेस क्लब के नाम पर की जाने वाली वसूली शराबखोरी के लिए होती है। आपको मदद करने से पत्रकार को क्या फायदा? आलोक जी हमें माफ़ कर दीजिए। सत्ता के सुख भोगने के आदी हम पत्रकारों को आपकी पीड़ा नहीं दिख रही है। आलोक जी आप तो बहादुर हैं, अकेले इस पीड़ा से लड़ रहे हैं। भगवान से प्रार्थना है कि आप जल्द स्वस्थ होकर वापस लौटें ताकि हम अपनी सच्चाई को देख सकें।

अगर आप में से कोई आलोक संतोषी से, जो अभी पीजीआई लखनऊ में जीवन से संघर्ष कर रहे है, बात करना चाहते हैं या किसी प्रकार की मदद पहुंचाना चाहते हैं तो उनसे उनके मोबाइल नंबर +919431157961 पर सीधे संपर्क कर सकते हैं.

आपका भाई
अनंत झा
पत्रकार
anantkumarjha@gmail.com

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इलाहाबाद के फोटो जर्नलिस्ट वसीमुल हक़ को मदद की जरूरत

इलाहाबाद में अस्सी साल के बुजुर्ग पत्रकार / प्रेस फोटोग्राफर वसीमुल हक़ इन दिनों काफी परेशान हैं। वह पिछले कई महीनों से गंभीर रूप से बीमार हैं। उन्हें दो महीने तक नली लगी हुई थी और दस दिन पहले उनके दो आपरेशन हुए हैं। उनका एक आपरेशन और होना है। वह पिछले दो हफ्ते से एक प्राइवेट अस्पताल (आलम हास्पिटल, नूरउल्ला रोड बैरियर तिराहा) में भर्ती हैं। उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब है और पास में अब फूटी कौड़ी भी नहीं बची है।

परिवार में पत्नी के अलावा कोई नहीं है। हाईकोर्ट के वकील बख्तियार यूसुफ़, प्रेस क्लब व कुछ अन्य लोगों के सहयोग से दो आपरेशन तो हो गए हैं। अस्पताल ने काफी रियायत भी कर दी है, फिर भी अभी पंद्रह हजार रूपये का बिल बकाया है। वसीमुल हक़ तकरीबन पचास सालों से मीडिया में हैं। वह चर्चित पत्रिका माया के फोटोग्राफर रहे। कई अखबारों में लेख लिखते रहे और इन दिनों साइकिल से चलकर एक उर्दू अखबार के लिए फोटोग्राफर का काम करते थे। पैसे न होने की वजह से एक आपरेशन न होने के बिना भी वह हास्पिटल से डिस्चार्ज नहीं हो पा रहे हैं। पैसों के अभाव में इलाज न करा पाने की वजह से इसी साल फरवरी महीने में उनके जवान बेटे की मौत हो चुकी है।

आप सभी से गुजारिश है कि कृपया इस मुश्किल वक्त में यथासंभव उनकी आर्थिक मदद करें। आपका पचास रूपये का योगदान भी उनके लिए बेहद अहम साबित होगा, क्योंकि पंद्रह हजार की उधारी चुकता करने के बाद उनका एक आपरेशन और होना है, साथ ही अभी वह अगले तीन महीनों तक साइकिल चलाने की हालत में नहीं रहेंगे तो उन्हें अपना व पत्नी का खर्च भी मैनेज करना होगा। वसीमुल हक़ फिलहाल अस्पताल में ही हैं और उनका मोबाइल नंबर 9839018555 है। वह करेली में पालकी गेस्ट हाउस के पास लाल कालोनी (लेबर कालोनी) में नगर निगम स्कूल के बगल में रहते हैं।

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ट्रांसफर-टर्मिनेशन से कानूनी बचाव के लिए एडवोकेट उमेश शर्मा ने जारी किया फार्मेट

इसे सभी लोग अपने अनुसार सुधार / संशोधित कर संबंधित श्रम अधिकारी को दें….

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में देश भर के पत्रकारों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने आज एक और फार्मेट जारी किया है। जिन मीडिया कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत प्रबंधन के खिलाफ लेबर विभाग में 17 (1) का क्लेम लगाया है, वे सभी लोग इस फार्मेट को भरकर तत्काल अपने-अपने लेबर विभाग में जमा करा दें। इस फार्मेट के बाद अगर आपका प्रबंधन आपका ट्रांसफर या टर्मिनेशन या सस्पेंशन करता है तो आगे की कानूनी लड़ाई में यह काम आयेगा। यही नहीं, इससे मीडियाकर्मियों का प्रबंधन द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न पर भी काफी हद तक रोक लगेगी।

दोस्तों, आप सबसे एक बात और शेयर करूँगा। उमेश सर पिछले कई माह से मेरे कहने पर उन साथियों की मदद भी करते आ रहे हैं जो उनके क्लाइंट नहीं हैं। उमेश शर्मा सर ने नि:शुल्क कई साथियों को 17 (1) का भी क्लेम फार्मेट दिया जिसे बाद में देश भर के पत्रकारों ने भरा और अब भी उसी 17(1) के फार्मेट पर क्लेम किया जा रहा है। आप सबसे निवेदन है कि आप सब उनका सम्मान करते हुए अगर कुछ उनसे जानना पूछना बताना है तो उन्हें सीधे फोन करने की जगह उन्हें उनकी मेल आईडी LegalHelpLineindia@gmail.com पर मेल कर दिया करें। फिलहाल आप सब अभी तो उत्पीड़न या ट्रांसफर टर्मिनेशन रोकने के लिए तुरंत इस फार्मेट को भर कर लेबर विभाग में जमा करें और उसकी प्रति सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को भी जरूर भेजें। उमेश शर्मा सर द्वारा दिया गया नया फार्मेट ये है…

To ……………………..

Date……………………

Sub: Protest against harassment by the officials of the management-violation of the orders of Supreme Court of India and violation of Section 16 A of the WJ Act.

Sir,

I am constrained to protest against the illegal, unconstitutional and vindictive acts of the officials of the management in threatening and intimidating me just  because I have asserted my rights and filed the application under Section 17(1 ) of the Working Journalist Act for claiming my benefits under Majithia Wage Board Award. Earlier I had filed the CCP No. 129/2015 before the Supreme Court of India against the act of non-compliance of the directions issued by the Supreme Court of India in WP (C) No. 246/1011 on 7/2/2014.

Now, the  officials of the management  has started threatening and coercing me to withdraw the proceedings  and have  warned me that if I do not withdraw my CCP and the application under Section 17 (1) of the WJ Act, they will force me to resign from my services. I am being gunned down for my forthright stand in asserting my legal rights.

The abovesaid act of the officials of the management is illegal on the face of it as it is prohibited under Section 16 of the WJ Act . The said act is also contempt of the Supreme Court as the said officials are trying to overreach the proceedings pending before the Supreme Court by intimidating me under the threat of my services. I shall be forced to file Contempt of Court proceedings against the  officials of the management making them personally liable  before the Supreme Court besides invoking the powers contemplated under Section 16 A of the WJ Act if the threats being extended by the said officials is not withdrawn and I am allowed to perform my duties properly.

I once again request you to release the benefits arising out of the Majithia Wage Board to me in terms of the directions issued by the Supreme Court in its orders dated 7/2/2014 in WP (C) No. 246/2011.

Yours
………………
…………….
………………

Copy forwarded for information and action to:

Registrar, Supreme Court of India w.r.t. CCP No. 129/2015 titled as “Yashwant Singh Vs Mahendra Mohan Gupta & Ors” – with a prayer to place the present letter before the Bench alongiwith the file of the CCP for directions.

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पत्रकार एसपी भाटिया का जीवन खतरे में, आर्थिक मदद की अपील

मैं जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा हूँ. अभी कितने दिन और लड़ सकता हूं मौत से, मालूम नहीं. वैंटिलेटर पर कार्डियोलोजी आईसीयू पीजीआई में मुझे रखा गया था, जहां सिर्फ़ मौत के सिवा मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया. कल देर शाम मुझे डिस्चार्ज किया गया. डॉक्टर ने यह कहा कि अगर हृदय का दर्द रुक गया, बीपी नार्मल हुया और इन्फेक्शन के साथ साथ हृदय व चेस्ट की इन्फेक्शन नियंत्रित हो गयी तो एक माह देखने के बाद मेरी ऑपन हार्ट सर्जरी कर देंगे वरना मौत के सफ़र की तैयारी शुरू हो गयी है.

मुझे अफ़सोस कि मेरी सहायता के लिए, मेरी जिंदगी बचाने में किसी ने सहयोग नहीं दिया. हाँ, जिन्होंने साथ दिया वे मेरे परिवार के साथ हर क्षण बहुत ही संपर्क में रहे और उन्होंने अपनी हैसियत से अधिक सहयोग भी दिया. मैं सभी शुभचिंतकों का आभारी हूँ. कुछ पत्रकारों ने तो हरियाणा सरकार की चापलूसी शुरू कर दी. झूठी खबरें छाप कर वाहवाही लूटनी शुरू कर दी. मेरा किसी भी पत्रकार संगठन से कोई सरोकार नहीं और किसी अभी तक किसी से कोई मदद नहीं मिली और ना मैंने मांगी.. सिर्फ मेरे मित्रों, पत्रकार भाइयों जिनसे मेरे निजी संबंध भी हैं ने और उन शुभचिंतकों ने ही मदद की जिनसे मुझे और मेरे परिवार को उम्मीद थी.

गलती के लिए क्षमा.

मेरा बैंक एकाउंट डिटेल…

S. P. Bhatia
Punjab National Bank
Acc. No. 0521000100181506
Model Town, Ambala City
IFSC Code 0052100
पंजाब नेशनल बैंक
मोडल टाउन
अंबाला सिटी
IFSC Code 0052100

आप सभी का हार्दिक आभार.

एसपी भाटिया

अंबाला

Contact : +91-94 682 95 682

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किडनी ट्रांसप्लांट के बाद वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर आर्थिक संकट में, करें मदद

कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके और इन दिनों न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं. वे किडनी की बीमारी से पीड़ित हैं और कई वर्षों से डायलिसिस के जरिए जिंदा रहकर पत्रकारिता कर रहे हैं. हाल फिलहाल उनका किडनी ट्रांसप्लांट एम्स में किया गया लेकिन आपरेशन के बाद सेहत संबंधी कई समस्याएं सामने आ रही हैं. अनूप भटनागर अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य हैं. वे डायलसिसि के बावजूद पीटीआई में नौकरी करते रहे.

अनूप देश के वरिष्ठ लॉ रिपोर्टरों में से एक हैं. एक जमाने में वह आलोक मेहता के साथ नई दुनिया और नेशनल दुनिया में वरिष्ठ लॉ एडिटर के रूप में कार्यरत थे. वे सुप्रीम कोर्ट समेत न्याय और अदालत की सभी बड़ी खबरों का कवरेज करते कराते रहे हैं. आलोक मेहता ने जब देखा कि अनूप भटनागर को सेहत संबंधी दिक्कत है और किडनी ठीक रखने के लिए हर हफ्ते डायलिसिस पर जाना पड़ रहा है तो उन्होंने अनूप भटनागर से किनारा कर लिया. संकट की घड़ी में नौकरी से जबरन कार्यमुक्त किए जाने के झटके से अनूप टूटे नहीं. उन्होंने खुद को संभाला और अपने प्रयासों से कई मीडिया हाउसों के लिए काम जारी रखा. बाद में समाचार एजेंसी पीटीआई भाषा के हिस्से हो गए.

इन दिनों प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से अनूप भटनागर की आर्थिक मदद के लिए एक अभियान चलाया गया है. पीटीआई के मीडियाकर्मियों ने भी मिलजुल कर करीब ढाई लाख रुपये अनूप भटनागर के लिए इकट्ठा कर दिया है. संकट की इस घड़ी में हर मीडियाकर्मी को कम या ज्यादा आर्थिक मदद अनूप भटनागर के लिए करने का प्रयास करना चाहिए. उपर वो अपील प्रकाशित है जो प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से सभी मीडियाकर्मियों के लिए जारी की गई है. अनूप भटनागर का मोबाइल नंबर 9810871279 है. प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव नदीम अहमद काजमी का मोबाइल नंबर 9560053626 है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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पत्रकार धीरेंद्र मिश्रा की बेटी कोमा में, मदद की जरूरत

Sharad Tripathi : अगर हम एकजुट हो सकें तो किसी भी बुरे वक़्त का सामना करने की शक्ति मिलती है। हमारे मेहनती, लोकप्रिय, मृदुभाषी, प्रतिभावान, साफ़ सुथरी छवि के पत्रकार Dhirendra Mishra को शायद आज हम सबके सहयोग की ज़रूरत है। करीब 15 दिन पूर्व उनकी 11 वर्षीय बेटी अचानक बेहोश हो गयी थी और कोमा में चली गयी थी। तब से वेअपोलो अस्पताल दिल्ली में वेंटीलेटर पर आश्रित थी। करीब दो दिन पहले हताश माँ-पिता को उम्मीद की झलक मिली है जब बिटिया मुस्कुराई। भगवान् बिटिया को शीघ्र स्वस्थ करे।

धीरेन्द्र मिश्राजी एक ईमानदार निष्पक्ष पत्रकार रहे हैं। सिमित आय में गुज़ारा किया है। हम समझ सकते हैं उनकी दिक्कत। अप्पोलो में रोज़ाना का खर्च उठाना उनकी हिम्मत को बयां करता है। हम लोग बिटिया के सही इलाज के लिए कुछ धनराशि एकत्रित कर रहे हैं। आप सब से अपील है की सहयोग करें। आप चेक अथवा कैश दे सकते हैं। आप हमें हमारे फ़ोन 8392900570, या 8650033022 (मयंक अग्रवाल) को फ़ोन कर सकते हैं। धीरेन्द्र जी कभी मांगेगे नहीं। पहल हमें ही करनी पड़ेगी।

कई मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके मेरठ निवासी शरद त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.

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संवाददाता समिति ने दी वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के परिजनों को 55 हजार की मदद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने लम्बे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के परिजनों से आज मुलाकात कर उनके इलाज के लिए 55 हजार की फौरी मदद प्रदान की। इसी के साथ समिति ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह श्री सिंह के इलाज के लिए दस लाख रूपये देने की उसकी मांग पर शीघ्र निर्णय करे।

समिति के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र व सचिव नीरज श्रीवास्तव के नेतृत्व में समिति के सदस्यों ने आज गोमती नगर स्थित वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह के आवास पर जाकर यह राशि प्रदान की। श्री सिंह लम्बे समय तक हिन्दी दैनिक आज से जुड़े रहे। दो वर्ष पूर्व वे नर्व की लाइलाज बीमारी के शिकार हो गये। इस समय उनका 80 फीसदी अंग काम नहीं कर रहा है। समिति ने कुछ दिन पूर्व उनकी हालात से प्रमुख सचिव सूचना नवनीत सहगल को अवगत कराते हुए उनसे मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से दस लाख रूपये की आर्थिक सहायता दिलाने की मांग की थी।

अभी तक सहायता राशि न मिलने के कारण फौरी मदद के तौर पर समिति ने 55 हजार रूपये की राशि उनकी पत्नी पूनम सिंह को प्रदान की। इस राशि में राज्य मुख्यालय में मान्यता प्राप्त संवाददाता सदस्यों का 30 हजार रूपये का योगदान है। शेष राशि समिति के सदस्यों ने अपनी ओर से एकत्रित की है। इसी के साथ आज पुनः समिति ने सरकार से सुरेन्द्र सिंह को शीघ्र सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है। सहायता राशि देने के प्रतिनिधिमण्डल में समिति के उपाध्यक्ष नरेन्द्र श्रीवास्तव, संजय शर्मा, संयुक्त सचिव अजय श्रीवास्तव, अमितेश श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष अशोक मिश्र तथा सदस्य मुदित माथुर,काजिम रजा,आशीष श्रीवास्तव व वरिष्ठ पत्रकार आनन्द सिन्हा शामिल थे।

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ईटीवी के पत्रकार ऋतुराज ने खून देकर आदिवासी भाई-बहन की जान बचायी

देवघर में ईटीवी बिहार के पत्रकार ऋतुराज सिन्हा ने रक्षाबंधन के दिन खून देकर आदिवासी भाई बहन की जान बचायी. प्राप्त सूचना के अनुसार देवघर के एक अस्पताल कुंडा सेवा सदन में एक आदिवासी भाई बहन जिनकी उम्र सात साल एवं नौ साल बतायी जा रही है, सेरेब्रल मलेरिया से ग्रसित होकर भर्ती थे. वहाँ उन बच्चों का हीमोग्लोबिन काफी नीचे गिर गया था. उन बच्चों की जान खून के अभाव में जा भी सकती थी. ईटीवी के पत्रकार ऋतुराज को इस संबंध में जानकारी मिली तो उन्होंने उन बच्चों को खून देने का निर्णय लिया.

अस्पताल के चिकित्सक डॉ संजय कुमार ने ऋतुराज के इस निर्णय और कार्य के लिए उन्हें बधाई दी. डा. संजय ने बताया कि अगर किसी को भी तेज बुखार आए तो उसे मलेरिया की जांच करानी चाहिए. फालसीपेरम मलेरिया उग्र रूप लेता है तो ब्रेन मलेरिया हो जाता है. डा. संजय के मुताबिक ऋतुराज द्वारा दोनों बच्चों को आधा-आधा यूनिट खून देने से बच्चों की स्थिति में सुधार हुआ है और दोनों बच्चे फिलहाल खतरे से बाहर हैं. दोनों का इलाज जारी रहेगा. उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन के दिन पत्रकार ने खून देकर एक आदिवासी भाई बहन की जान बचाई है, यह सराहनीय है.

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मृत पत्रकार के परिवार को आर्थिक मदद मंजूर, भुगतान शीघ्र

वाराणसी : समाज कल्याण अधिकारी से सूचना के मुताबिक पिछली जाड़ा के दिनों में मृत पत्रकार मदन पाण्डेय के परिवार के लिए आर्थिक सहायता मंज़ूर हो गई है। धनराशि एक सप्ताह में पत्रकार की विधवा के खाते में ट्रांसफर हो जाएगी। 

बताया गया है कि इसके पीछे काशी वार्ता के वरिष्ठ पत्रकार आलोक श्रीवास्तव का प्रयास रहा है। उन्होंने इस सम्बन्ध में आल इंडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन को भी अवगत करवाया और एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता तारिक़ आज़मी को मृतक पत्रकार की विधवा ने पत्र प्रेषित कर इस सम्बन्ध में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। संगठन की ओर से तारिक़ आज़मी, ज़ीशान अहमद और राजेंद्र कुमार गुप्त ने प्रयास किया। 

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लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव की दोनों किडनी खराब, ट्रांसप्लांट का खर्च 15 लाख रुपये, आइए मदद करें

Yashwant Singh : अभी-अभी मेरी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव जी से उनके मोबाइल नंबर 09415754483 पर बात हुई. उनकी सेहत और बीमारी के बाबत चर्चा हुई. वे बता रहे थे कि कानपुर से संचालित यूपी केंद्रित रीजनल न्यूज चैनल ”के. न्यूज” ने उनकी बामारी को लेकर एक पैनल डिस्कशन का आयोजन किया था जिसका विषय कुछ यूं था कि सरोकारों की पत्रकारिता करने वाले इमानदार पत्रकारों के साथ उनके मुश्किल वक्त में यूपी की अखिलेश यादव की सरकार क्यों नहीं खड़ी होती. यह सरकार हमेशा दलाल पत्रकारों को ही क्यों बढ़ावा देती है और उन्हें तरह-तरह से उपकृत करती-रहती है. इसी बहस में कानपुर के विधायक सत्यदेव पचौरी भी मौजूद थे. उन्होंने कार्यक्रम के दौरान लाइव ही बीस हजार रुपये देने की घोषणा की और अगले दिन संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) जाकर डायलिसीस करा रहे वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव को पैसा दे भी आए.


(उदय यादव)

(‘k news’ चैनल पर हुई परिचर्चा: ”वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव की दोनों किडनी फेल… मदद की अपील के साथ पत्रकारों की दशा पर चिंता…”)


उदय की दोनों किडनियां खराब हैं. अब तक इनका सात लाख रुपया खर्च हो गया है. डायलिसिस पर चल रहे हैं. आए दिन डायलिसीस करानी पड़ती है. इनका आखिरी इलाज किडनी ट्रांसप्लांट ही है. इसमें करीब 15 लाख रुपये लगेंगे. बकौल उदय यादव- ”इतने पैसे कोई इमानदार पत्रकार कैसे इकट्ठे कर सकता है”. मैंने जब अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत लखनऊ में की थी तो उन दिनों कई लोगों के साथ-साथ उदय यादव जी के भी संपर्क में आया. बेहद शांत, सरल, ईमानदार और समझ वाले पत्रकार हैं ये. किसी भी तरह का कोई नशा इन्होंने कभी नहीं किया. सुर्ती सिगरेट गुटखा दारू… कुछ नहीं छुआ. मैं खुद गवाह हूं कि हम लोगों ने जाने कितनी दफे उन्हें सुर्ती या पान या सिगरेट या गुटखा या मदिरा चखने का प्रस्ताव किया पर उन्होंने हंसते हुए हमेशा इनकार किया. ऐसे शख्स को जब बीमार देखता हूं तो कष्ट होता है. हम जैसे मुस्टंडे जो तरह तरह की बुरी आदतों खराब लतों के शिकार हैं, अभ्यस्त हैं, कभी कुछ होता ही नहीं, होता भी है तो एकाध दिन बाद चंगा. पर उदय यादव सर जैसे लोगों के साथ इतनी गंभीर बीमारी जुड़ा देखता हूं तो अजीब सा कष्ट होता है.

बातों बातों में उदय जी बताने लगे कि यूपी सरकार को उन्होंने अप्लीकेशन दिया हुआ है और उनके मीडिया प्रभारी हफ्ते दस दिन में मदद राशि मिलने की बात कहते रहते हैं पर यह उनका यह कहना भी सुनते सुनते हफ्ते दस दिन से ज्यादा हो गए.

सोचिए आप. ये कैसी है कथित वंचितवादी, कथित समाजवादी सरकार जिसके पास उदय यादव सरीखे लखनऊ के ईमानदार और वरिष्ठ पत्रकारों के लिए कोई मदद नहीं है लेकिन लुटेरे दलाल चोर उचक्के कारपोरेट भ्रष्टाचारी रोजाना सरकार के नजदीक बैठ गलबहियां कर मिल रहे हैं. थू है ऐसे समाजवाद पर, थू है ऐसी सरकार पर और थू है ऐसे सरकार के पेड एजेंटों पर जो सोशल मीडिया पर साइकिल व सरकार की जयगान करने में कलम तोड़ दिया करते हैं…

भाइयों, उदय यादव जी की किडनी ट्रांसप्लांट की मुहिम को हमको और आपको मिलकर सफल बनाना है. मैंने उनसे उनका एकाउंट नंबर लिया है. यहां दे रहा हूं. जिससे जो संभव हो उसे इसमें डाले और इस पोस्ट को शेयर करे-कराए ताकि सोशल मीडिया की मुहिम से एक ईमानदार पत्रकार को उचित इलाज मिल सके जिससे उनकी ज़िंदगी के दिन लंबे हो सकें.

Udai Yadav
Saving bank account no. 0302010107956
United Bank of India
branch- Hazratganj
Lucknow
IFSC code- UTBIOHZ509

उदय यादव के घर का पता और मोबाइल नंबर यूं है…

उदय यादव
105/303
फूलबाग, हुसैनगंज
नजदीक गायत्री ज्वेलर्स
लखनऊ-226001

मोबाइल नंबर- 09415754483 और 09451568410

—-

अगर आप उदय यादव को किसी किस्म से मदद पहुंचाते हैं तो उसका उल्लेख करते हुए भड़ास को एक मेल कर दें, bhadas4media@gmail.com पर, ताकि आपकी अच्छी पहल के बारे में दूसरों को बताकर उन्हें भी मदद के लिए आगे आने को प्रेरित किया जा सके.

ध्यान रखें… इस पोस्ट को आप का एक शेयर एक ईमानदार और वरिष्ठ पत्रकार की जि़ंदगी के दिन बढ़ाने में मददगार हो सकता है… इस पोस्ट को आप का एक शेयर यूपी में जंगल राज, कुशासन, भ्रष्टाचार कायम करने वाली अखिलेश सरकार को झकझोर सकता है जिससे दबाव में यह आत्ममुग्ध और अहंकारी प्रदेश सरकार शायद ईमानदार पत्रकार को मदद राशि जारी कर सकती है, इसका ध्यान रखें…

विशेष अनुरोध लखनऊ के पत्रकारों से है जिनके पास सत्ता के करीब होने का मौका मिलता है, अफसरों नेताओं मंत्रियों से रोज टकराते बतियाते हैं.. ये लोग मिल जुल कर सरकार पर दबाव बनाएं कि वह उदय यादव के लिए पैसे तत्काल रिलीज करे. साथ ही ये लखनउवा पत्रकार लोग खुद भी आपस में चंदा करके उदय यादव की मदद करें.

इस मामले की मूल खबर ये है, क्लिक करें : http://goo.gl/cZ1Ky7

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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बेटी की हत्या से मर्माहत दरभंगा जिले के जयकुमार झा का खुला पत्र… कृपया इनकी मदद करें…

Sub: Seeking your immediate attention towards the brutal murder of my daughter by her own husband

Respected Sir,

As I have taken a pen in my hand to convey the magnitude of my anguish to you, I am observing that my fingers are trembling and the rivulets of tears are gushing forth, drenching my whole face. Sir, I am a helpless father whose daughter had been hacked to death by her husband Dharmendra Jha purportedly on 2nd of March 2015. My daughter Puja Kumari was barely of 25 years old when the ugly clutches of death had taken her away from us. Uglier still, the murderer Dharmendra Jha still remains at large till date despite police conducting ostensible raids to trace him and other members of his family.

Further, the heart rending part of the saga is this: Puja Kumari had left behind a son Kehav Jha, who is of six years old and a daughter Sharda, who is of three years old–both have been taken away by their murdered father to an unknown destination, leading to a speculation about their well being in the hands of their own father who had killed their mother and perhaps might even be thinking of getting rid of his children.

Sir, I married my daughter Puja Kumari in the year 2007 with Dharmendra Jha, son of Ashok Jha of the village Hari nagar in the district Darbhanga,Kushesharsthan in Bihar. After her marriage, Puja Kumari started living with her husband in Harinagar; however, after a while, due to a constant torture of her husband and in- laws who were constantly asking her to bring more dowry from her father–I would like to bring to your kind attention that I had paid Rs 1, 50,000, jwellery Rs. 1,50,000,  furniture  Rs. 50,000 and  pan Rs. 35,000  by way of dowry for fixing her marriage in the beginning–she stood devastated.. On getting a whiff of her  continuous torture, I had brought her to Delhi and got her admitted in a vocational institute for imbibing the craftsmanship skills which would have enabled her to stand on her own feet. She had by then already become a mother of two kids–a baby boy and a baby girl. In the meantime, Dharmendra Jha, came over to Delhi  and began exerting pressure on Puja Kumari to return to Harinagar. However, when Puja Kumari refused to go with him, he stealthily took his children away, leading her to return on the basis of assurance given by her husband Dharmendra Jha and his father Ashok Jha  and  his mother buchchi day devi that she would no longer be subjected to further harassment.

Reprehensively, they had no intention of mending their ways. Soon, they resumed their torture . I was informed on 2nd of March 2015 that my daughter Puja Kumari had died due to a prolonged illness. i instantly asked them to keep her corpse in tact till I reached the spot. However, I discovered on reaching Harinagar that she was secretly buried and the whole family had fled away.  I immediately filed an FIR with the Kusheshwarsthan police station and requested the police to conduct a detailed investigation into the whole incident and to trace out the fugitives who absconded after committing the gory crime. The police has conducted some half hearted raids but to no avail–the murderer Dharmendra Jha continues to remain still at large along with his parents and his two children.  Our biggest worry now is this: how could the children remain safe with their murderer father who had no qualms in killing their mother?

Sir, I am working as a priest in Delhi with little or no influence. Yet I have been running from pillar to post to ensure the unraveling of the whole gory episode. I went to meet the SP of the district Darbhanga in Janta Durbar to press upon the issue of bringing the murderer to justice. Nonetheless, nothing consequential has happened thus far. I have lost my own daughter, but the nation too had lost a daughter especially when the gigantic efforts are underway to preserve the daughters –‘Beti bachao, desh bachao’. campaign has gained so much currency in the contemporary times. I am bemused to see that how the police has been exhibiting its impotency by allowing the murderer to still remain at large after committing such a brutal crime. In this backdrop, I left with no option but to appeal to the highest constitutional office of the land to ensure justice for me–a father who has been deprived of his daughter by a marauding criminal in the disguise of her husband who, not only deprived  me of my daughter, but also deprived  the small children of their motherly love and affection.  Dharmendra Jha deserves an exemplary punishment to deter the prospective criminals from going ahead with the brutal crimes.

Sir, with almost a fortnight gone and the police is yet to show even a vestige of efficiency, I am rendered more helpless. I know not what course of action should I choose. I have the fullest faith in the wheels of divine justice; and, also on the criminal jurisprudence of our nation. While the divine justice will take its own turn, our criminal justice system must appear to be efficient and accessible to one and all. Ironically, I am observing that our so called robust criminal justice system is not coming to me as a sort of reprieve to an aggrieved person like me. If the law of the land does not provide me with any reprieve by ensuring that the murderer of my daughter, Dharmendra Jha is immediately arrested with his parents and tried under the law of the land for his gruesome murder of his wife. On the contrary, if the police continues to play a hide and seek game by enabling Dharmendra Jha to remain at large, perhaps it would eternally stigmatize our police force for being selectively prejudiced and our entire justice system losing its credibility. Hence, i take this last recourse to appeal to the highest constitutional authority of  the land —our beloved people’s president–to ensure that the justice is meted out to a daughter of this country whose life was cut short in her prime. I am fully banking on your support for justice as a last ray of hope. I am further enclosing the FIR copy and other important documents to bolster my submission before your esteemed self.

Thanking you in anticipation.
Kind regards,
Jay kumar Jha
an aggrieved father
07079747408
District – Darbhanga, Bihar

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पत्रकार चंचल भट्टाचार्य को सीएम राहत कोष से एक लाख की सहायता

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राँची एक्सप्रेस के वरीय खेल पत्रकार एवं फुटबाल के ख्याति प्राप्त खिलाड़ी और पत्रकार चंचल भट्टाचार्या के स्वास्थ्य की जानकारी लेने उनके आवास गए। वे विगत लगभग एक साल से बीमार हैं और अब चलने में भी लाचार हैं।

चंचल भट्टाचार्या भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान एमएस धोनी के गुरु के रुप में भी जाने जाते हैं। इन्होंने महेंद्र सिंह धोनी को क्रिकेट के लिए आरम्भिक प्रशिक्षण दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि चंचल भट्टाचार्या की बेहतर चिकित्सा के लिए उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष से एक लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। चंचल भट्टाचार्या के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुये मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि यदि किसी मदद की आवश्यकता हो तो वे व्यक्तिगत तौर पर भी उनकी मदद को तत्पर रहेंगे।

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कोयलांचल के पत्रकार वेद प्रकाश जिंदगी-मौत से जूझ रहे, मदद की जरूरत

कोयलांचल के जुझारू पत्रकार वेद प्रकाश आज जिंदगी और मौत से जब जूझ रहे हैं तो कोयलांचल के बहुत कम साथी हैं जिन्हें वह याद आते हैं. करीब दो दशक पहले भारतीय खनि विद्यापीठ की निबंध प्रतियोगिता में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने के बाद धनबाद के एक स्थानीय दैनिक ने अपने यहां काम करने का अवसर दिया. और यहीं से शुरू हुई उसकी पत्रकारिता. दस साल पहले ‘प्रभात खबर’ के धनबाद संस्करण में काम करते हुए गिरिडीह राइफल लूट कांड, महेंद्र सिंह हत्याकांड और भेलवाघाटी उग्रवादी घटना की रिपोर्टिग के लिए काम निबटाकर रात तीन बजे धनबाद से गिरिडीह जाना हम साथी भूल नहीं सकते.

नक्सली वारदात की रिपोर्टिग के लिए गिरिडीह कूच करते समय किसी अंदेशा की बजाय तीर्थ की अनुभूति और एडवेंचर का रोमांच उसके चेहरे पर हम देखते थे. यह जज्बा और जुनून ही था कि घातक हादसे से उबरने के बाद वेद उसी पुराने जोशो-खरोश के साथ रिपोर्टिग के अपने पुराने काम में जुत गये थे. भीतर ही भीतर मधुमेह, गुरदा की परेशानी से टूट रहे वेद के चेहरे पर कभी किसी ने थकान या उदासी नहीं देखी. अपोलो और एम्स का चक्कर लगा रहा.

गैंग्रीन ने पीछा भी नहीं छोड़ा था कि फिर आ गये काम पर यह उम्मीद जताते हुए कि काम करते-करते सामान्य हो जायेंगे. पैर के अंगूठे का घाव सूखा भी नहीं था कि पट्टी बंधे पांव के साथ लंगड़ाते-लंगड़ाते धमक गये काम पर.  संपादक और दफ्तर के आग्रह के बावजूद यह हाल था. कभी हादसा तो कभी बीमारी के कारण बार-बार अस्पताल का चक्कर लगता रहा. हर बार थोड़ा ठीक होकर जिंदगी के लिए, हम सभी के लिए बची-खुची ऊर्जा जुटा कर और टूटती उम्मीद को छीन कर लाते रहे. लेकिन बार-बार किस्त-किस्त में बीमारियां भीतर ही भीतर उन्हें खाये जा रही थी. और हम थे कि खोखली होती उम्मीद से हौसला पा रहे थे कि हमारा वेद खुशी के सामानों के साथ लौट रहा है.

बिना किराये के कोई किसी मकान में कितने दिनों तक रह सकता है. लगभग यही हाल उसकी सेहत का होता रहा. शरीर अब सेहत का किराया देने में लगातार लाचार होता गया. कोयलांचल में जितनी मदद हो सकती थी मीडिया ने अलग-अलग क्षेत्रों से मदद जुटायी. उन्हें जिलाकर रखने में कोई कोताही नहीं की घर वालों ने. जहां इलाज में लाखों के मासिक खर्च आ रहे हों, वहां साजो-सामान जुटाने में उनके कुनबे, हमारे साथियों के दम टूटते जा रहे हैं. फिलहाल हमारा वेद कोलकाता के एक निजी अस्पताल सीएमआरआइ में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है. फिर भी हमें उम्मीद है कि हमदर्द साथी उसे छोड़ना नहीं चाहेंगे. उस जिंदादिल वेद को कौन यूं ही जाते देख सकता है. उम्मीद के जंगल में उस वेद को ढूंढ़ने की जी तोड़ कोशिश करें तो कुछ हो सकता है. वेद का हाल जानने के लिए उनकी पत्नी से 09431375334 पर संपर्क किया जा सकता है. अगर आप हमारे वेद प्रकाश के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उनके लिए वेद के खाते का ब्योरा हम यहां दे रहे हैं :

बैंक का नाम : स्टेट बैंक आफ इंडिया
खाता सं. : 30030181623
आइएफएससी कोड : एसबीआइएन 0001641
एमआइसीआर कोड : 8260002006
ब्रांच कोड : 001641

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UP govt announces financial assistance to scribes’ families

Uttar Pradesh government today announced financial assistance to the families of the three journalists who passed away recently, a senior official said. Principal Secretary, Information, Navneet Sehgal said a financial assistance of Rs 20 lakh to the families of each of the scribes (Amresh Mishra-Hindustan, Manoj Srivastava-Amar Ujala and Tahir Abbas-Rashtriya Sahara) who passed away recently will be provided.

He said the decision has been taken by Chief Minister Akhilesh Yadav. President of UP Accredited Journalist Committee Hemant Tiwari has expressed gratitude towards the government for its gesture. He said this was the first time when the government has extended help to the bereaved families of the journalists.

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समाचार प्लस के सीईओ उमेश कुमार ने एक दुखी परिवार को हर माह पांच हजार रुपये देने का वादा किया

समाचार प्लस के सीईओ उमेश कुमार ने एक लाचार, बेसहारा और आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार की मदद के लिए हर महीने पांच हजार रुपये देने का वादा किया है. उन्होंने शुरुआत पांच हजार रुपये देकर कर दी है. इस परिवार के खाते में उन्होंने पांच हजार रुपए डाल दिए. उन्होंने प्रतिमाह इस परिवार को पांच हजार रुपए देने की बात कही है. असहाय महिला राजी देवी का कहना है कि उमेश जी का शुक्रिया अदा करने के लिए उनके पास शब्द नहीं है. इस आर्थिक मदद से अब उनके परिवार को दो वक्त की रोटी मिल पाएगी.  उमेश इससे पूर्व विकलांग जगदीश की भी मदद कर चुके हैं. इस परिवार की भी उमेश जी पांच हजार रुपए प्रतिमाह मदद कर रहे हैं.

रुद्रप्रयाग के सुनई (मुसाढुंग) गांव की राजी देवी का पति पिछले 28 साल से घर नहीं लौटा है. अब तो शायद ही पति कभी घर लौट पाए. इसके बाद भी मन नहीं मानता. 28 साल का वक्त कम नहीं होता है. बेटी के पैदा होने के बाद से पति का सुराग तक नहीं है. सोचा था कि बेटी उसका सहारा बनेगी. लेकिन आज वह स्वयं बेटी का सहारा बनी हुई है. बेटी बचपन से शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग है. कुछ बोल नहीं पाती. चल नहीं पाती. पति की राह देखते-देखते आज राजी देवी 59 वर्ष की हो चुकी है. राजी की हर सुबह उम्मीद की किरण के साथ होती है. उम्मीद पति के घर वापस लौटने की.

राजी की बेटी पैदाइश विकलांग है. बेटी के पैदा होने के बाद से पति की सूरत नहीं देखी है. बेटी को मिलने वाली विकलांग पेंशन से ही दो वक्त की रोटी नसीब हो रही है. शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बेटी घुटनों के बल चलती है. न बोल पाती है और न सुन सकती है. बस इशारों की बातें समझ पाती है. उसका न तो कोई साथी है और न हमदर्द. मन ही मन मुस्कुराकर अपनी पीड़ा छुपा लेती है. घर की देहरी से बाहर शायद ही उसने कभी कदम रखा हो. राजी देवी के पास एक अदद घरोंदा भी नहीं है. वह अपनी विकलांग बेटी के साथ गौशाला में रहकर जिंदगी के एक-एक पल को काट रही है. आपदा में जमीन धंसने के कारण खेती-बाड़ी का साधन भी नहीं रहा. राजी देवी चाहती है कि उसे विधवा पेंशन मिले लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना विधवा पेंशन मिलना संभव नहीं है.

मोहित डिमरी के फेसबुक वाल से.

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पत्रकार गोपाल ठाकुर के मामले में काशी पत्रकार संघ की भयावह चुप्पी के मायने

: …दर्द से तेरे कोई न तड़पा आंख किसी की न रोयी :

पत्थर के सनम
पत्थर के खुदा
पत्थर के ही इंसा पाये है,
तुम शह-रे मोहब्बत कहते हो
हम जान बचा के आये हैं…

जज्बात ही जब पत्थर के हो जायें तो खुले आसमान के नीचे भले ही कोई अपना यूं ही तन्हा मर जाए, किसी को कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर को लेकर कुछ ऐसा ही हो रहा है। भड़ास पर खबर चलने के बाद भले ही शहर के बाहर के लोगों ने फोन कर उनके बारे में जानकारी चाही पर खुद उनका अपना बनारस शहर अब तक खामोश है। उनके चाहने वाले, मित्र, यार परिवार किसी को भी न तो उनके दर्द से मतलब है, फिर आखों में आंसू का तो सवाल ही नहीं उठता।

वैसे भी काशी पत्रकार संघ की खामोशी पर कोई मलाल नहीं होता क्योंकि पत्रकारों के हित से ज्यादा अपनों के बीच अपनों को ही छोटा-बड़ा साबित करने में ही इनका ज्यादतर समय गुजर जाता है। हां एक टीस सी जरूर होती है कि जिस काशी पत्रकार संघ की स्थापना में वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर के पिता स्व. राम सुंदर सिंह की भी भूमिका रही है, और जो काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके है, उन्हीं के पुत्र और खुद काशी पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष रहे गोपाल ठाकुर के मसले पर भी संघ के अन्दर कोई हलचल नहीं है। पत्रकारों के हितों के लिए सजग रहकर संघर्ष करने का इससे बेहतर नजर और नजरिया क्या हो सकता है।

बीते कल उनके हालात की जानकारी होने पर उंगली में गिनती के दो-तीन लोग वहां पहुंच उनकी हालात को देखने के बाद अपने साथ ले गये। इन्हीं लोगों ने इनके कपड़े भी बदलवाये, प्राथमिक चिकित्सा देने के साथ गोदौलिया स्थित पुरषोत्तम धर्मशाला में ले जाकर आश्रय भी दिलवाया। लेकिन आश्रय की ये मियाद शनिवार शाम तक ही रही क्योंकि धर्मशाला में देखरेख करने वालों ने उनके वहां अकेले रहने में असमर्थता जताते हुए उन्हें वहां से शनिवार की शाम को ले जाने को कहा है।

अब आगे गोपाल ठाकुर कहा जायेंगे, उनका अगला ठिकाना क्या होगा, इस बारे में अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। लाचार और बीमार गोपाल ठाकुर को चिकित्सा और संवेदना दोनों की ही बेहद जरूरत है। …  जब कि चिकित्सा पैसों के बिना मिलेगी नहीं और संवेदना अपनों के बिना। पर यहां तो उनके मामले को लेकर एक रिक्तता नजर आ रही है। इन सबके बीच धूमिल की कविता बार-बार कह रही है….

नहीं यहां अपना कोई मददगार नहीं
मैंने हर एक दरवाजे को खटखटाया
पर जिसकी पूंछ उठाया
उसको ही मादा पाया।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828


मूल खबर….

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

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शूट के दौरान जिया न्यूज की पत्रकार स्नेहल पटरियों पर गिरीं, दोनों पैर कटे, चैनल की तरफ से कोई मदद नहीं

कल एक फेसबुक मित्र से हाय हैलो हुयी. पहले वो रियल4न्यूज मे काम करती थीं. उसके बाद कल हालचाल पूछा तो पता चला कि जिया न्यूज में है. मैंने पूछा किस स्टोरी पर क़ाम चल रहा है तो बोलीं- फिलहाल रेस्ट पर हूं. मैंने कहा- कब तक. बोलीं- पता नही. मजाक में मैंने कहा- आफिसियल हालीडे. वो बोलीं- नो. मैंने कहा- शादी या प्रेग्नेन्सी. बोलीं- नहीं. फिर दिलचस्पी ली. एक और कयास लगाया की शूट के दौरान घायल? उसने कहा- हां.

मैंने कहा कब तक बेड रेस्ट. बोलीं- उम्र भर. माथा ठनका और सीरियसली पूछा तो पता चला की मेहसाना (अहमदाबाद) में ट्रेन पर शूट के दौरान पटरियों पर गिर गयीं थीं और दोनों टांगें कट गयी. चार महीने से घर पर हैं. सात-आठ लाख रुपये खर्च हो चुके हैं मगर आज तक आफिस ने एक रुपया नहीं दिया. रेलवे प्रशासन भी टाल मटोल कर रहा है. मां-बाप की इकलौती सहारा हैं इसलिये कुछ लिख पढ़ कर काम चला रही हैं.

समाचार चैनल से पंगा नही ले रहीं कि शायद उन चैनल वालों का दिल पसीज जाय. रातों को दर्द के मारे सो नहीं पातीं. ये खबर क्या किसी ने किसी समाचार पत्र या चैनल में पढ़ा / सुना है? क्या दूसरों के लिये न्याय का भोंपू बजाने वाला हमारा किन्नर समाज इस दिशा में कुछ कर सकता है? युवा पत्रकार की उम्र महज 27 साल है और नाम उसकी सहमति से उजागर कर रहा हूं. उनका नाम है Snehal Vaghela. मित्रों, अगर कुछ मदद हो सकती है हक की लडाई में तो साथ जरूर दें. मैं आर्थिक मदद की अपील करके अपने धंधे को और उनके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता.

सिद्धार्थ झा के फेसबुक वॉल से.

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बनारस के वरिष्ठ पत्रकार गोपाल ठाकुर खुले आसमान के नीचे मौत का कर रहे हैं इंतजार…

क्या पता कब मारेगी
कहां से मारेगी
कि जिदंगी से डरता हूं
मौत का क्या, वो तो
बस एक रोज मारेगी

कभी धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे बुर्जुग पत्रकार गोपाल ठाकुर को जिदंगी रोज मार रही है, फिर भी जिंदा हैं… सिर पर छत फिलहाल नहीं है…. जो अपने थे, वक्त के बदलते रौ में वो अपने नहीं रहे… बेबसी, बेकारी हालात के शिकार गोपाल जी का नया ठिकाना फिलहाल रविन्द्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम आश्रम का चबूतरा है, जहां लेट कर आसमान को निहारते हाथों को ऐसे ही हिलाकर शायद अपने गुजरे वक्त का हिसाब-किताब करते मिले… लेकिन इतने बुरे वक्त में भी उनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी…

मिले तो उसी अंदाज में हंस दिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं है… कुछ पूछने से पहले ही खुद ही बोल उठे… सब ठीक है यार… पर छलछलाती आखें और चेहरे के अन्दर का चेहरा जैसे सारे राज खोल कर चुगली कर गया- ‘सब एक नजर फेर कर बढ़ गये हैं आगे, मैं वक्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूं।’

गोपाल ठाकुर को मैं तब से जानता हूं जब वो बनारस में ही पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से जुड़ कर हिन्दी पुस्तकों का सम्पादन किया करते थे… दिल के साफ पर स्वभाव के अक्खड़ गोपाल जी का पत्रकारिता से पुराना रिश्ता रहा है… तब बम्बई और अब की मुंबई में वो 1976 से लेकर 1984 तक धर्मयुग जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़े रहे… बाद में बनारस लौटे तो दैनिक जागरण, आज, सन्मार्ग जैसे कई अखबारों से जुड़कर उन्होंने पत्रकारिता ही की… बाद में पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग से लम्बे समय तक जुड़े रहे…

सुनने में आया था कि वहां भी उनकी भारत सरकार के किसी सेवानृवित अधिकारी के लिखे किताब की प्रूफ रीडिंग को लेकर विवाद हो गया था, जैसा की होता रहा है… प्रभावशाली सेवानिवृत अधिकारी ने मालिक पर दबाव बना उनको माफी मांगने के लिए मजबूर किया तो अधिकारी की ऐसी-तैसी कर नौकरी को लात मारकर सड़क पर खड़े हो गये… बाद में जब भी मिले तो इस बात का जिक्र उन्होंने कभी मुझ जैसे उनसे उम्र में काफी छोटे लोगो से नहीं किया… जब भी मिले तो पत्रकारिता के वैचारिक पहलुओं पर ही बातें की…

अस्सी से लेकर सोनारपुरा के कई चाय की अड़िया उनके अड्डेबाजी के केन्द्र हुआ करती थी, जहां वो अपने हम उम्र दोस्तों, जानने-पहचानने वालों के साथ घंटों गुजारते थे… लेकिन न तो आज वो दोस्त कहीं नजर आ रहे हैं, न उन्हें जानने-पहचानने वाले… आज गोपाल जी खुले आकाश के नीचे तन्हा जिंदगी के अंत का इन्तजार कर रहे हैं… रोज एक धीमी मौत मर रहे हैं…. कह रहे हैं- ये देश हुआ बेगाना… वैसे भी नजरों से ओझल होते ही भुला देने की शानदार परम्परा हमारी रवायत रही है… हम डूबने वालों के साथ कभी खड़े नहीं होते ये जानते हुए कि हम में हर कोई एक रोज डूबती किश्ती में सवार होगा…

शराब की लत और उनकी बर्बादी के कई किस्से सुनने के बाद भी न जाने क्यों लगता है कि, ऐसे किसी को मरने के लिए छोड़ देना दरअसल कहीं न कहीं हमारे मृत होते जा रहे वजूद की तरफ ही उंगली उठाता है… मौजूदा हालात में साथ वालों की थोड़ी सी मदद, थोड़ा सा साथ और हौसला उन्हें इस हालात से बाहर लाकर जिदंगी से जोड़ सकता है… नहीं तो किसी रोज जिदंगी भर खबर लिखने वाला ये शख्स खबरों की इस दुनिया को छोड़ चलेगा और ये खबर कहीं नहीं लिखी जायेगी कि एक था गोपाल ठाकुर ….और कहना पड़ेगा ….. कोई किसी का नहीं है, झूठे नाते हैं, नातों का क्या।

बनारस से युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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अमर उजाला के पत्रकार दिलीप का लीवर ट्रांसप्लांट होगा, 25 लाख लगेंगे, मदद की अपील

अमर उजाला ग्रेटर नोएडा के ब्यूरो ऑफिस में तैनात मुख्य उपसंपादक दिलीप कुमार चतुर्वेदी लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। लम्बे उपचार के बाद भी उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार न देखकर अब डॉक्टरों ने उन्हें नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में लीवर प्रत्यारोपण की सलाह दी है। इसमें लगभग 25 लाख रुपए का खर्च आएगा।

उपचार के इस भारी खर्च को वहन कर सकने में श्री चतुर्वेदी असमर्थ हैं। जरूरत की इस घड़ी में अपने सहयोगी की मदद को हमसब आगे आएं। सभी सहयोगियों से अनुरोध है कि इस नेक काम के लिए स्वेच्छा से अंशदान करें। आप अपने अंशदान के लिए विकास गौड़ से +91 9873427170) या vgaur@del.amarujala.com के जरिए संपर्क कर सकते हैं।

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