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सियासत

अमेरिका में H1B वीज़ा पर काम कर रहे 3.20 लाख से ज्यादा भारतीय अपने देश लौटकर करेंगे क्या?

सौमित्र रॉय-

अमेरिका में H1B वीज़ा पर काम कर रहे 3.20 लाख से ज्यादा भारतीय में से कई अगले महीने से भारत लौटना शुरू कर देंगे।

इनमें से कई डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और आईटी सेक्टर के लोग हैं। इनमें कुछ तो टैलेंट रहा होगा कि उन्हें वहां नौकरी मिली।

कल से उन्हें नौकरी देने वालों को 100 गुना ज्यादा, यानी एक लाख डॉलर की वीज़ा फीस देनी होगी।

जहां H1B वीज़ा धारकों की प्रतिमाह औसत आय 55 हजार डॉलर हो, वहां कोई नियोक्ता 1 लाख डॉलर की वीज़ा फीस क्यों देगा?

अब ये भारतीय वतन लौटकर क्या करेंगे? नौकरी मिलेगी? अगर वीज़ा रद्द हो गया तो क्या गारंटी है कि उन्हें बेड़ियों में बांधकर नहीं भेजा जाएगा?

जी20 शेरपा अमिताभ कांत ने अभी ट्वीट किया कि अमेरिका भारतीय टैलेंट को खो रहा है।

इस दल्ले को यही समझ नहीं आया कि अगर भारत में इनके टैलेंट्स की कद्र होती तो वे अमेरिका क्यों जाते?

भारत में क्या हो रहा है? दुनिया ड्राइवरलेस, AI से चलने वाली, उड़ने वाली कार बना रही है और यहां मारुति ने कल एक ऐसी कार का ट्रायल किया, जो गड्ढों वाली सड़क पर चल सके।

अब इंडस्ट्री ने भी मान लिया है कि सड़कों के गड्ढे खत्म नहीं हो सकते।

यही हाल मेरा है। जब भी मैं किसी चीनी या रूसी तकनीकी प्रगति की वीडियो या न्यूज पोस्ट करता हूं तो उम्मीद रहती है कि कोई भारत से उसकी तुलना करेगा। सवाल उठाएगा।

लेकिन आस टूटती गई और मैंने भी मारुति कंपनी की तरह मान लिया कि लोग सुधर नहीं सकते।

बेंगलुरु में 10 हजार करोड़ की कंपनी सड़क के गड्ढों से परेशान होकर अपना दफ्तर बंद कर भाग गई।

अब जब ऐसे मुद्दों पर लोग बात नहीं करना चाहते, बहस नहीं चाहते तो फिर फेसबुक में रहने का फायदा ही क्या?

लोग जानें, जागें, समझें–सिर्फ यही मकसद नहीं हो सकता, बशर्ते वे कोई एक्शन न लें।

ट्विटर पर आज जब मैंने यही डेटा प्लेस किया तो बहुतों ने इसका इस्तेमाल कर नई पोस्ट कर डाली।

बात आगे बढ़ी, लेकिन अलग तरीके से।

मेरे लिए फेसबुक से दूरी उन प्रवासी भारतीयों जैसी है, जिनके टैलेंट को अपनों ने ही नहीं समझा।

हालांकि, परदेस कभी वतन नहीं हो सकता। लौटना ही पड़ता है।

लेकिन, वह दिन मत लाइए, जब वापसी पर कुछ भी न बचे।

अमेरिका ने अचानक ही H-1B वीज़ा की वार्षिक फीस को $100,000 (करीब 87 लाख रुपये) कर दिया है। यह सिर्फ एक इमिग्रेशन पॉलिसी में बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय आईटी सेक्टर की धड़कन पर सीधा वार है और भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक और पैंतरा है। पता नहीं मोदीजी ने उससे क्या दुश्मनी मोल ली है कि वो हाथ धोकर भारत के पीछे पड़ गया है।

आज भारत की सबसे बड़ी टेक कंपनियाँ – टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल आदि न सिर्फ अमेरिकी क्लाइंट्स पर निर्भर हैं, बल्कि वहाँ पर प्रोजेक्ट्स को मैनेज करने के लिए हज़ारों इंजीनियरों को H-1B वीज़ा पर भेजती हैं। अब यह लागत इतनी भारी हो जाएगी कि कंपनियों को अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजने से पहले दस बार सोचना पड़ेगा।

कंपनियों के लिए समीकरण साफ़ है: एक इंजीनियर को अमेरिका भेजने का वार्षिक खर्च सीधे-सीधे कई गुना बढ़ गया। इसका मतलब है कि या तो वे अमरीका में अपने भारतीय कर्मचारियों की संख्या घटाएँगी और अमरीकियों को ही नियुक्त करेंगीं, या प्रोजेक्ट्स को ही छोड़ देंगी। दोनों ही हालात भारतीय टेक सेक्टर के लिए खतरनाक हैं।

हर साल लाखों इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स भारतीय यूनिवर्सिटीज़ से निकलते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या का सपना होता है अमेरिका जाकर काम करना। H-1B वीज़ा उस सपने का दरवाज़ा था। अब वह दरवाज़ा लगभग बंद हो गया है।

जिनके पास पहले से H-1B था, उनके लिए भी नवीनीकरण एक असंभव सौदा बन जाएगा। नतीजा यह होगा कि बड़ी संख्या में भारतीय टेक टैलेंट अमेरिका से वापस लौटेगा। भारत में पहले से ही रोजगार संकट है, अब अतिरिक्त दबाव से भूखमरी जैसी स्थिति खड़ी हो सकती है, खासकर उन युवा इंजीनियरों के लिए जिनकी पूरी प्लानिंग अमेरिकी जॉब्स पर टिकी थी।

यह फैसला केवल भारतीय कंपनियों को नहीं, बल्कि अमेरिकी टेक कंपनियों को भी चोट पहुँचाएगा। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेज़न जैसी कंपनियाँ भारतीय टैलेंट पर निर्भर हैं। लेकिन नुकसान का अनुपात कहीं ज़्यादा भारत को झेलना पड़ेगा, क्योंकि यहाँ का पूरा आउटसोर्सिंग मॉडल इस वीज़ा पर टिका था।

राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कदम पूरी तरह से घरेलू राजनीति से प्रेरित है। चुनावी वादों में “अमेरिकन जॉब्स अमेरिकन्स के लिए” का नारा हमेशा से गूंजता रहा है। लेकिन इस नारे की कीमत अगर कोई चुका रहा है, तो वह भारतीय टेक सेक्टर और लाखों युवा इंजीनियर हैं, जिनके सपने इस आदेश से चकनाचूर हो रहे हैं।

H-1B की नई फीस भारतीय आईटी सेक्टर के लिए वही असर लाएगी जैसा किसी खेत में अकाल पड़ने पर होता है। यह भुखमरी का रूप ले सकता है। न सिर्फ अवसरों की, बल्कि सपनों की भी।

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1 Comment

1 Comment

  1. Punit Shukla

    September 20, 2025 at 1:49 pm

    ये सब लोग वहां से लौटकर अपना काम या स्टार्टअप शुरू करेंगे। ब्रेन ड्रेन वापस होगा।
    भारत इसका उपयोग कर सकता है। मौका भी है और दस्तूर भी

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