हैप्पी दीवाली, शुभ महंगाई

दीवाली में चिंटू-मिंटू खुशी से उछलने लगे। दीवाली इनके लिए डबल धमाका है। एक तरफ लड्डू, रसगुल्ला, बरफी, दूसरी तरफ तड़ाक-भड़ाक करने का मजा। वे मनाते हैं कि रोज दीवाली आये। दीवाली समृद्धि और खुशियों का सौगात लेकर आती है। जुआ खेलना भले ही अनैतिक और गैर कानूनी है, दीवाली में यह शुभ होता है, क्योंकि यह लक्ष्मीजी का मामला है। घर की साफ सफाई करके चिन्टू की मम्मी रात भर के लिए दरवाजे को खुला रख छोड़ेगी। दरवाजा बन्द होने पर कहीं लक्ष्मीजी रूठ कर पड़ोसी के यहां न चली जाय। हाय! लक्ष्मीजी से पहले महंगाई की डायन घर में घुस आई।

लेकिन कुछ लोग एैसे भी है जो चिन्टू की मम्मी जैसे नहीं है। अब की दीवाली में कम्पनियों ने उनके लिए समृद्धि और खुशी का द्वार तहेदिल से खोल दिया है। किसी कम्पनी का ब्राण्ड एक के साथ एक फ्री, दो फ्री, भारी छूट, फ्री ही फ्री, बम्पर आफर, करोड़पति बनें, सोना जीतें, कार जीतें, मोटर साईकिल जीतें …। चांदी बेचारी का तो कोई वैल्यू ही नहीं है, हर सामान के साथ फ्री मिलती है और चवनप्राश ने तो सबको चादी खिला-खिला कर चमका दिया है। कम्पनिया तो इतना दरियादिल हो गई है कि खूलेआम लूटवाने के लिए सहर्ष तैयार है।

इनके विज्ञापन में सुन्दरियां बिंदास अपील करती हैं कि लूट लो…, समय कम हैं। सुन्दरियों की पेशकश पर लुटेरा बनने से भला कौन बच पायेगा। बेरहम पुलिस सरेआम लूटने की घोषणा के बावजूद भी शान्त है। छोड़िये सुन्दरियों पर लुट जाने की बात। इधर सड़कों पर और मोहल्लों में राहजनी और लूट के काफी समाचार है।

दीवाली के मौसम से वातावरण खुशगवार हो गया है। फिर भी लोग बेवजह परेशान है कि महंगाई मार रही है। भाई अपुन के देश की परम्परा है, मुफ्त में जो मिले सहर्ष ग्रहण करो। कहावत है ‘माले मुफ्त, दिले बेरहम‘। इसलिए फ्री में मिले तो अलकतरा भी गटक जाते हैं। अपने यहां रिवाज है कि इंसान दुकान पर जाता है तो घलुआ फ्री अवश्य लेता है। यह आदिकाल से चला आ रहा है।  महंगाई सामान के साथ फ्री मिल रही है तो हाय तौबा क्याों मच रही है। अब सामान में महंगाई की मात्रा तौलाना और साथ में मुक्त बाजार एवं मुक्त व्यापार की बात करना तो महज इकनॉमिक बेवड़ेबाजी है। रसिक बाबू कहते है कि मंहगाई घरवाली का बाहरवाली से भी ज्य़ादा खून जला रही है। सरकार को हर बात में कोसना राजधर्म के विरूद्ध है।

लेकिन जनाब महंगाई का कृपया फायदा भी देखे। जानते है इंसान को जब फेवरेट पकवान मिलता है तो दबा-दबा कर खाता है और तीज-त्यौंहार में फिर क्या पूछना। हम खाने के मामले में मरने-जीने से भी नहीं डरते है। भले तबीयत बिगड़ जाय और दुःखी मन से कडुवा दवा खानी पड़े। पहले किसी सामान का दाम दुकानदार किलो में बताता था अब पाव में बताता है। हो सकता है कल छटांक, रत्ती या मासा में बताये। इंसान पाव भर खरीदेगा, तो खायेगा ग्राम में। जिससे डाईट फस्टक्लास रहती है। न डाक्टर का टेंशन, न हकीम की जरूरत।

आज काजू और लहसून का दाम समान गति से बढ़ रहा है। लहसून का मेडिसनल वैल्यू तो पता ही है। स्वामीजी कहते है लहसुन खाये सेहत बनाये। इंसान पहले कद्दू, तरोई जानवर को खिलाता था। अब कद्दू की सब्जी भी खाने लगा है और जूस भी पीने लगा। यह कई रोगो में फायदेमन्द है। सेहत के राज का ज्ञान भी मंहगाई में ही छिपा है।  ये चिन्टू-मिन्टू दीवाली में तड़ाक-भड़ाक कर-कर के नाक में दम कर देते थे। इनको लाख मना करो, माने कहां। अब बेचारे पहले हीं मान गये हैं। कह रहे कि ये ’मंहगाई क्या‘ है। क्योकि जितने में पहले पाच पटाखें मिलते थे उतने में अब एक मिलेगा। पटाखें कम छूटेगे तो प्रदूषण भी कम होगा। यह मंहगाई जनहित के साथ-साथ इको फ्रेडली भी है।

महंगाई आर्थिक प्रगति का भी द्योतक है। भाई लोगों के पास पैसा है तो महंगाई है। चिन्टू की मम्मी का गम देश का गम थोड़े है, कि सरकार भी गमगीन हो जाय। चलिये सब मिल कर बोले हैप्पी दीपावली, शुभ मंहगाई।

इस व्यंग्य के लेखक प्रवीण कुमार सिंह से संपर्क 9473881407 के जरिए किया जा सकता है.

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