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सियासत

ईरान की जंग जहां पहुंच चुकी है वहां से अब अमेरिका और इज़राइल के लिए सम्मानजनक वापसी का रास्ता बंद हो चुका है!

नदीम अख़्तर-

ईरान पर अमेरिका और इज़राइल द्वारा थोपे गए युद्ध पे कहने को कुछ है नहीं। शिया आइडियोलॉजी से बंधा ईरान मरते मर जाएगा, लेकिन समर्पण नहीं करेगा। वो कर्बला को याद कर रहे हैं।

ये जंग अब लंबी खिंचेगी क्योंकि जहां तक ये लड़ाई पहुंच गई है, वहां से सम्मानजनक वापसी का रास्ता अमेरिका और इज़राइल के लिए बंद हो चुका है। इसलिए अब ईरान में तेल के ठिकानों पर हमले कर रहे हैं लेकिन यहां भी दांव उल्टा पड़ गया है।

ईरान के साथ दिक्कत ये है कि उसके सुप्रीम लीडर खामनेई बुढ़ापे में शहीद होकर तथाकथित जन्नत तो पा गए लेकिन पूरे देश को अनाथ छोड़ गए। अगर ज़िंदा रहते तो देश को भी गाइड करते और समझौते की सूरत निकालने में भी मदद करते। प्रतिष्ठा में प्राण गंवा के उनको शायद जन्नत मिल गई हो, उनके देश को बाबाजी का ठुल्लू भी नहीं मिला। ये सोचने वाली बात है कि ईरान जब निर्णायक लड़ाई की कगार पे पहुंचा तो उसका रहनुमा खामनेई साहब जन्नत की फिक्र में लग गए। अगर ना लगे होते तो आसान निशाना बनने की बजाय किसी बंकर से युद्ध को दिशा निर्देश दे रहे होते। युद्ध में बहादुर आमने सामने लड़ते हुए मरता है, घर में बैठकर बम का निशाना बनने वालों को किंकर्तव्यविमूढ़ कहते हैं। हिंदी का भारी- भरकम शब्द है। इसका अर्थ ढूंढिएगा।

बहरहाल तेल के खेल पे टिकी ये दुनिया अब तेल के कुओं में आग लगने से झुलसने लगी है। एक तो मुए AI ने पहले ही मार्केट को ज़मीन सुंघा रखा था, अब कोढ़ में खाज तेल ने पैदा कर दिया है। तेल का अभाव मतलब महंगाई। चारों तरफ। सुना है कि हमारे प्यारे पड़ोसी और शेख हसीना की जान के दुश्मन बांग्लादेश वालों ने तेल की मार से बचने के लिए अपनी सभी यूनिवर्सिटीज को बंद कर दिया है! ये कमाल की खबर है। अभी कॉलेज बंद हुए हैं, मुंह और नाक भी बंद करना पड़ेगा क्योंकि लजीज़ खानों की महक और स्वाद दोनों पर आफत आ सकती है। जिन देशों ने ईरान के हालत पे आँखें बंद की हुई हैं, उन पे तेल की मार ज्यादा पड़ेगी। रूस अपने प्रिय मित्र चीन को तो सस्ता तेल देगा और चीन की सिफारिश पे पाकिस्तान को भी शायद दे दे लेकिन बाकियों की गारंटी नहीं है।

यानि शेयर बाजार से लेकर फल- मंडी बाज़ार तक में खूनखराबा निश्चित है। ट्रेलर तो अभी से दिख रहा है, पिक्चर आनी बाकी है। मेरा अंदाज़ा है कि रूस ने ईरान युद्ध को यूक्रेन युद्ध से जोड़ दिया है। सुना है कि अमेरिका सस्ता ईरानी ड्रोन से निपटने के लिए यूक्रेन से मदद मांग रहा है क्योंकि वहां रूस का ड्रोन भी नाटो और अमेरिका के साज़ोसमान से निपटने के लिए यही खेल खेलता है। हमारे कुछ हज़ार के ड्रोन को गिराने के लिए लाखों का माल स्वाहा करो। तो रूस तब तक अमेरिका को ईरान से निकलने नहीं देगा, जब तक अमेरिका उसे यूक्रेन में फंसाए हुए है। ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं, आसमान के नीचे आ गया है।

सो एक लंबे युद्ध और आर्थिक मंदी के लिए तैयार हो जाइए। छंटनी और महंगाई की सौगात आने वाली है। ऐसे हालात से दुनिया को अगर कोई बचा सकता है तो वह है रूस और वहां के राजा पुतिन। उनकी बात ना चीन काटेगा और ना ईरान।

इसलिए यूक्रेन से लेकर ईरान तक की जंग में अंतिम विजेता पुतिन हैं। ट्रंप और नाटो बैकफुट पे हैं। इज़राइल की कोई औकात नहीं। वह अमेरिका का प्यादा है। एक फिल्म में सलमान खान का डायलॉग था – जो जीजाजी बोलेंगे, मैं वही करूंगा। आप सलमान की जगह इज़राइल को और जीजाजी की जगह अमेरिका को रखकर ये डायलॉग दोहरा लें।

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