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अपने बीमार पत्रकार को नौकरी से निकालने की तैयारी में दैनिक जागरण!

बामारी से जूझ रहे पत्रकार राकेश पठानिया

गेट वैल सून या गेट ऑऊट सून? : खुद को देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले दैनिक जागरण के प्रबंधन की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर उनके सबसे पुराने पत्रकारों में से एक और प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा (जहां जागरण का प्रिंटिंग यूनिट और हिमाचल संस्करण का मुख्य कार्यालय भी मौजूद है) के ब्यूरो प्रभारी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं, वहीं प्रबधन ने उनको चलता करने के पैंतरे आजमाने शुरू कर दिए हैं। प्रबंधन उनको गेट वेल सून कहने की जगह गेट आऊट सून की तैयारियों में जुट गया है।

बामारी से जूझ रहे पत्रकार राकेश पठानिया

गेट वैल सून या गेट ऑऊट सून? : खुद को देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले दैनिक जागरण के प्रबंधन की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर उनके सबसे पुराने पत्रकारों में से एक और प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा (जहां जागरण का प्रिंटिंग यूनिट और हिमाचल संस्करण का मुख्य कार्यालय भी मौजूद है) के ब्यूरो प्रभारी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं, वहीं प्रबधन ने उनको चलता करने के पैंतरे आजमाने शुरू कर दिए हैं। प्रबंधन उनको गेट वेल सून कहने की जगह गेट आऊट सून की तैयारियों में जुट गया है।

राकेश पठानिया का कांगड़ा में जागरण के प्रस परिसर के निर्माण में अहम योगदान रहा है। किसी जमाने में उनकी गिनती जागरण के मजबूत सतम्भों में होती थी। जब निशीकांत ठाकुर जगारण के सथानीय संपादक एवं मुख्य महाप्रबंधक हुआ करते थे, राकेश पठानिया यहां समाचार संपादक से भी ज्यादा ताकतवर हुआ करते थे। राकेश पठानिया श्रमजीवी पत्रकार हैं और पत्रकारिता के अलावा जीवन में दूसरा कोई कारोबार अथवा व्यापार नहीं किया। उनकी पत्नी भी घरेलू महिला हैं। देरी से शादी की है, इसलिए बच्चे अभी छोटे हैं।

इस बीच राकेश पठानिया गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। उनके उपचार पर लाखों रूपए खर्च हो चुके हैँ। अभी भी दवाई चल रही है। वह छुट्टी पर हैं और स्वस्थ्य लाभ कर रहे हैं। लोगों के दुख दर्द को कम करने के लिए मसीहा बनने का ढोंग करने वाले अखबारों का स्याह चेहरा यह है कि जागरण प्रबंधन ने उनका हाल चाल पूछना तो दूर की बात, कुशल क्षेम पूछने की जहमत उठाना जरूारी नहीं समझा है। उल्टा उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे ब्यूरो कार्यालय (जो उनके घर के करीब है) के बजाये प्रस परिसर में डेस्क पर आकर अपनी सेवाएं दें।

कांगड़ा से ही प्रकाशित होने वाले स्थानीय समाचार पत्र दिव्य हिमाचल के मुख्य संपादक अनिल सोनी और समाजसेवी संजय शर्मा ने जरूर राकेश पठानिया के घर पर पहुंच कर न केवल उनका कुशल क्षेम जाना है, बल्कि हर तरह की मदद का भरोसा दिया है। राकेश पठानिया के मामले में जागरण प्रबंधन की संवदनहीनता हिंदी समाचार पत्रों के खोखले आदर्श का भंडाफोड़ है।

लेखक विनोद कुमार भावुक दैनिक जागरण में ब्यूरो प्रभारी रह चुके हैं. वर्तमान में साप्ताहिक समाचार पत्र का संचालन करते हैं.

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2 Comments

2 Comments

  1. rajesh kumar

    August 22, 2016 at 11:23 am

    sabko sanmati de BHAGWAAN

  2. Ramesh

    August 26, 2016 at 8:34 pm

    Bhavuk bhayee jo aap ke n baap ke vo kiske kaam aayenge.

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