कोबरा पोस्ट का ‘ऑपरेशन व्हाईट कोट’ : इलाज के दौरान मरीज भले मर जाए, रेफर करने वाले का कमीशन नहीं मरेगा!

गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज अपनी जिंदगी बचाने के लिए बड़े और नामी अस्पतालों का रुख करते हैं या फिर कहे उन्हे छोटे अस्पताल से बड़े सेंटर के लिए रेफर कर दिया जाता है। लेकिन इन बड़े अस्पतालों में मरीजों को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का जरिया समझा जाता है। रेफर करने वाले छोटे अस्पतालों और डाक्टरों को कमीशन देकर ये बड़े अस्पताल मरीजों को अपने यहां रेफर कराते हैं और फिर इलाज, सर्जरी और ऑर्गन ट्रांसप्लांट के नाम पर उनसे भारी-भरकम कमाई करते हैं।

कोबरपोस्ट की तहकीकत “OPERATION WHITE COAT” में सामने आया कि Fortis Hospital (Mumbai और बैंगलुरू), Noida के JP Hospital और Metro Hospital, गाज़ियाबाद के Yashoda Hospital और Columbia Asia Hospital (बैंगलुरू की ब्रांच भी), MAX Hospitals (नई दिल्ली में Saket और Patparganj स्थित), Apollo Hospital (नई दिल्ली और बैंगलुरू), BLK Super Speciality Hospital, नई दिल्ली; मुंबई के Nanavati Super Speciality Hospital, Hiranandani Hospital, Asian Heart Institute, Seven Hills Hospital और Jaslok Hospital; बैंगलुरू के Narayana Hrudayalaya College of Nursing और Mallya Hospital जैसे 20 बड़े अस्पतालों में कमीशन या फिर कहे रेफेरल कट का घिनौना काम खुलेआम हो रहा है।

कोबरापोस्ट विशेष संवाददाता उमेश पाटिल एक छोटे अस्पताल का नुमाइंदा बनकर देश के इन नामी बड़े प्राइवेट हास्पिटल्स के कॉर्पोरेट रिलेशन्स हैड, सेल्स एंड मार्केटिंग हैड, मार्केटिंग मैनेजर और असिस्टेंट मैनेजर स्तर के अधिकारियों से मिले और हर जगह पाया कि ये नामी अस्पताल छोटे अस्पतालों और डाक्टरों को मरीज भेजने के एवज में मोटा कमीशन यानि रेफेरल कट देते हैं। कैमरे पर इनके कबूलनामें कुछ इस तरह है:

-मुनाफ़ा कमाने के लिए छोटे अस्पतालों और डॉक्टर को रेफेरल कट यानि कमिशन के तौर पर दस से पेंतीस फीसदी तक कमिशन।

-हर अस्पताल का रेफेरल कट देने का तरीका अलग है।

-निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर को कमिशन कॉन्सल्टेशन फीस के तौर पर दिया जाता है।

-कमिशन के अलावा डॉक्टर को महंगे गिफ्ट भी दिये जाते है।

-रेफेरल के इस काम को अंजाम देने के लिए इन बड़े होस्पिटल्स का विशाल नेटवर्क है।

– MCI Code of ethics Regulations, 2002 Chapter 6 Unethical Acts के मुताबिक कोई physician किसी तरह का gift, gratuity, commission or bonus किसी मरीज को refer या recommend के नाम पर नहीं ले सकता। ये पूरी तरह से गलत है।

इसी कड़ी में सबसे पहले हमारी मुलाक़ात हुई नोएडा के जेपी हॉस्पिटल में डिप्टी मैनेजर (सेल्स एंड मार्केटिंग) अमित कुमार बंदोपाद्धाय से। अमित कुमार ने हमे बताया कि रेडियो थेरेपी में ये 10 परसेंट कमिशन देंगे और कीमो थेरेपी में तो हर साइकिल पर कमिशन दिया जाएगा। यानि जितनी बार मरीज कीमो थेरेपी के लिए जेपी हॉस्पिटल आएगा हर विजिट पर जेपी हॉस्पिटल 10 परसेंट कमिशन देगा। इन्होंने बताया कि चाहे किसी भी बीमारी का मरीज क्यों ना हो, या भले ही इलाज के दौरान मरीज की मौत ही क्यों ना हो जाए लेकिन रेफर करने वाले का कमीशन नहीं मरेगा, उसे हर हाल में कमिशन मिलेगा। आगे अमित ने हमारी मुलाकात जेपी हॉस्पिटल के सीनियर मैनेजर डी.के. भारद्वाज से कराई। जेपी हॉस्पिटल के इन लोगों ने इंटरनेशनल पेशंट पर बीस से पच्चीस परसेंट कमिशन देने की बात भी की।

जेपी हॉस्पिटल के बाद हमारी मुलाकात हुई मेट्रो हॉस्पिटल में असिस्टेंट मैनेजर बिलाल अहमद खान से। बिलाल ने हमे बताया कि इन का कांटैक्ट देश भर में कई सौ डॉक्टर से है जो इन्हे कमिशन के बदले पेशंट रेफर करते है। बिलाल के मुताबिक कमिशन कैश में दिया जाता है और इंटरनेशनल पेशंट पर ये तो तीस से पेंतीस फीसदी तक है। हमारी पेशेंट रेफर की बात पर बिलाल ने तुरंत हमारी मीटिंग अपने कॉर्पोरेट हैड प्रणव सिन्हा से कराई। प्रणव मेट्रो हॉस्पिटलस के 12 अस्पतालों के कॉर्पोरेट रिलेशंस हैड हैं। प्रणव ने हमें 10 परसेंट कमिशन देने की बात की और इस बातचीत में आगे ये भी मालूम चला कि कैसे महज़ 30 हजार के स्टंट पर मेट्रो हॉस्पिटल भारी भरकम खर्च और पैकेज दिखाकर मरीजों से लाखों वसूल रहा है।

OPERATION WHITE COAT में हमारा अगला पड़ाव था दिल्ली के साकेत इलाके में स्थित मैक्स सुपर स्पैशलिटी हॉस्पिटल।यहाँ हॉस्पिटल के मैनेजर बिज़नस डेव्लपमेंट सुमित ने बताया कि वो हमें 10 परसेंट रेफरलकट देंगे और यही इनका फिक्स रेट है।कमिशन की रेट लिस्ट मांगने पर सुमित ने MEDICAL COUNCIL OF INDIA का हवाला देकर हमें कमिशन की लिस्ट देने से मना कर दिया। ज्यादा जानकारी के लिए सुमित ने हमे मेक्स हास्पिटल के एसिस्टेंट मैनेजर मुस्तफा के पास भेजा। मुस्तफा ने हमें बताया कि इनके कॉन्टेक्ट दिल्ली-NCR के करीब 400 डॉक्टरों से हैं। जो इनके यहां कमिशन पर मरीज़ रेफर करते हैं। बतौर मुस्तफा साकेत स्थित मैक्स अस्पताल हर महीने 20 से 25 लाख रुपये कमिशन रेफर करने वाले डॉक्टरों और अस्पतालों को बांटता है। मुस्तफा ने आगे बताया कि रुपया कमाने के लिए कई बार मैक्स सुपर स्पैशलिटी हॉस्पिटल मरीज को बिना जरूरत के भी एक-दो दिन के लिए वेंटिलेटर पर डाल देता है। ताकि बिना कुछ किए ही इनकी मोटी कमाई होती रहे।

कोबरपोस्ट टीम ने आगे रुख किया मैक्स सुपर स्पैशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज का। यहा हमारी मुलाक़ात हुई हॉस्पिटल के डिप्टी मैनेजर बिज़नस डेव्लपमेंट आशीष सिंह से। रेफर के बदले कमिशन के अलावा आशीष ने बताया कि किस बीमारी के मरीज से अस्पताल को सबसे ज्यादा फायदा होता है और इससे रेफर करने वालों की भी खूब कमाई होती है। आशीष के मुताबिक ट्रीटमंट के नाम पर एक ही मरीज को बार बार एड्मिट करने पर हॉस्पिटल और रेफर करने वाले को ज्यादा कमाई होती है। इतना ही नहीं रेफर करने वाले डॉक्टरों को ना सिर्फ मैक्स सुपर स्पैशलिटी हॉस्पिटल मोटा कमिशन देते हैं बल्कि जो डॉक्टर मरीज का इलाज कर रहा है वो भी रेफर करने वाले को कमिशन देता है।

OPERATION WHITE COAT में अगला मुकाम था दिल्ली का सबसे मशहूर इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल। अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर मैनेजर मार्केटिंग राम नरेश भगतने बताया कि angioplasty, रेडियो थेरेपी और knee replacement पर 10% कमिशन है, kidney transplant पर कोई fix नहीं है, liver पर 50 हज़ार fix है। इसके अलावा IPT के patient के total bill पर 10% कमिशन मिलेगा। अंतर्राष्ट्रीय मरीजों को रेफर करने पर ये अस्पताल कितना कमिशन देता है। तो इस सवाल का जवाब हमें अपोलो हॉस्पिटल के एसिस्टेंट मैनेजर विपिन शर्मा से मिला। विपिन ने हमें बाहर के देशों से आए मरीजों को रेफर करने पर पूरे इलाज का 15 फीसदी कमिशन देने की बात कही।

पेशंट रेफर करने के बदले कमिशन का कारोबार दिल्ली के BLK Super Speciality Hospital में भी खुले आम चल रहा है। हॉस्पिटल में बतौर सीनियर मैनेजर विनय के मुताबिक दिल्ली के सभी प्राइवेट अस्पतालों में ये खेल जारी है, और इसी खेल के दम पर ये अस्पताल कमाई कर रहे हैं। यही नहीं कमिशन लेन-देने के इस गोरखधंधे ने अस्पातलों के बीच कॉम्टीशन के हालात पैदा कर दिए हैं। कैसे ये अस्पताल रेफर करने वाले डॉक्टरों का कमिशन सेट करते हैं। किस बीमारी के मरीज पर कितना कमिशन देना है ये सब कैसे निर्धारित किया जाता है? इस बारे में भी विनय ने हमें सबकुछ खुलकर बताया। विनय के मुताबिक हॉस्पिटल 12% रेफेरल कट यानि कमिशन देता है। इसके अलावा पंद्रह से बीस हज़ार रुपए बाइपास सर्जरी पर, बारह से पंद्रह हज़ार रुपए स्टंट पर और डेढ़ से दो लाख रुपए लीवर ट्रांसप्लांट पर देते है।

ऑपरेशन व्हाइट कोट के तहत कोबरपोस्ट विशेष संवाददाता उमेश पाटिल ने कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल गाज़ियाबाद का दौरा किया। मलेशिया के प्रसिद्द हेल्थ केयर ग्रुप कोलंबिया एशिया के पूरे एशिया में 28 संस्थान हैं। कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल गाज़ियाबाद के मार्किटिंग हैड सत्यनारायणन के मुताबिक रेफेरल कट हम किसी भी तरह से ले सकते है। इलाज पर होने पर खर्च का 10 परसेंट या फिर फिक्स अमाउंट के तौर पर। महज़ एक मरीज पर 10 परसेंट कमिशन देने वाला ये अस्पताल करीब 7 करोड़ रुपया इसी तरीके से कमाता है। इसके लिए बाकायदा अस्पताल में मार्किंटिंग एक्सपर्ट की टीम है, जो छोटे डॉक्टरों और अस्पतालों में जाकर कमिशन के बदले मरीज रेफर कराती है।

रेफेरल कट का ये खेल फोर्टिस हॉस्पिटल नोएडा में भी धड़ल्ले से चल रहा था। यहाँ हमारी मुलाक़ात फोर्टिस हॉस्पिटल के डिप्टी मैनेजर निशांत चौहान से हुई। निशांत के मुताबिक जिस बीमारी के इलाज के लिए यहां फिक्स पैकेज निर्धारित किया गया है सिर्फ उसी पर कमिशन दिया जाता है। इसके अलावा निशांत ने किस बीमारी पर कितना खर्च और कितने खर्च पर कितना कमिशन दिया जाता है उसकी पूरी रेट लिस्ट भी बताई।

कुछ इसी तरह का हाल कौशांबी गाज़ियाबाद स्थित यशोदा सुपर स्पैशलिटी हॉस्पिटल का भी था। यहाँ के मैनेजर मार्किंटिंग नागेन्द्र की माने तो यशोदा अस्पताल भी एक बिजनेस फर्म की तरह है जिसका मकसद रुपया कमाना है। अगर कोई मरीज एक बार इनके चंगुल में फंस जाए तो ये उसे जल्दी से डिस्चार्ज नहीं करते। जब तक ये उससे मनचाही कमाई न कर लें। बक़ौल नागेन्द्र इस मोटी कमाई के लिए ही तो डॉक्टरों ने इतनी पढ़ाई की है और जो कंपनियां मरीजों के लिए महंगे पार्ट्स बनाती हैं, वो अगर पैसा नहीं कमाएंगी तो खर्चा कैसे चलाएंगी। इसलिए डॉक्टर मरीजों को महंगे इलाज और सर्जरी कराने के लिए बोलते हैं।

दिल्ली एनसीआर के बाद कोबरपोस्ट रिपोर्टर उमेश पाटिल ने मुंबई के होस्पिटल्स की स्थिति भी मालूम करनी चाहिए और रुख किया मुंबई के पोवाई इलाके के मशहूर डॉ एलएच हीरानन्दानी हॉस्पिटल का। यहाँ मैनेजर मार्किंटिंग भगत सिंह ने हमें प्रपोजल तैयार कर उसे ईमेल करने की बात कही। आगे बातचीत के दौरान इन्होंने हमसे मरीजों का ब्यौरा भी पूछ लिया। मसलन हमारे पास किस-किस बीमारी के कितने मरीज़ हैं। जैसे ही हमारे रिपोर्टर ने इनके सवालों का जवाब दिया। ये भी खुल्लम खुल्ला कमिशन की बातें करने लगे।

ऑपरेशन व्हाइट कोट में फोर्टिस हीरानंदानी हॉस्पिटल की भी सच्चाई सामने आई।फोर्टिस हीरानंदानी हॉस्पिटल के सीनियर मैनेजर मार्किंटिंग शुभेंदु भट्टाचार्य ने रेफेरल कट का पूरा रेटकार्ड हमारे सामने कंप्यूटर पर खोल दिया। शुभेंदु भट्टाचार्य ने बताया कि इनके तार 200 से 300 डॉक्टरों से जुड़े हैं। जो इनके अस्पताल को मरीज़ रेफर करते हैं और बदले में इनसे मोटा कमिशन भी वसूलते हैं। इसके अलावा शुभेंदु खुद भी मानते हैं कि जिस काम को ये अंजाम रहे हैं वो पूरी तरह से गलत और कानून के खिलाफ है।

अगला पड़ाव था दिल की गंभीर बिमारियों के इलाज के लिए मशहूर मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स इलाके का ASIAN HEART इंस्टीट्यूट। यहाँ एसिस्टेटं मैनेजर मार्किंटिंग एंड सेल्स मिलिंद मेहता ने न सिर्फ रेफेरल कट के बारे में बताया बल्कि उन छोटे अस्पतालों में से एक ऐसे अस्पताल का भी जिक्र किया जो इन्हें कमिशन पर महीने भर में 40-50 लाख का बिजनेस (पेशेंट रेफर) देता है।

मुंबई के अँधेरी इलाके में बना मशहूर सेवन हिल्स हॉस्पिटल, हमारा अगला मुकाम। अस्पताल के एसिस्टेंट जनरल मैनेजर शिव कुमार ने रेफेरल कट के बारे में खुल कर बात की। इसके बाद सेवेन हिल्स हॉस्पिटल के सीनियर मैनेजर वीरेन्द्र ने हमें बताया कि इनका 1500 डॉक्टर्स और करीब 250 छोटे अस्पतालों से टाई अप है। जो इन्हें मरीज सप्लाई करते हैं और बदले में ये उन्हें मोटा कमिशन देते हैं। यही नहीं वीरेन्द्र ने आगे बताया कि हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने इन्हें हर महीने 13 करोड़ की कमाई का टारगेट भी दे रखा है।

ऑपरेशन व्हाइट कोट के तहत ये है मुंबई के वीले पार्ले स्थित नानावती सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल। क्या रेफेरल कट की फेहरिस्त में ये अस्पताल भी शुमार है ? अस्पताल में खुद को रेफरेल टीम का हेड बताने वाले अरविंद मौर्या ने हमे अपना कमिशन एजेंट (रिटेनर) बनने का ऑफर दे दिया। यहां तक कि इसने हमें बताया कि इनके साथ काम करने पर हम हर महीने ढाई से तीन लाख रुपये कमा सकते हैं। साथ ही अरविंद ने बताया कि इस काम में कई डाक्टर भी शामिल है।

कोबरपोस्ट टीम ने मुंबई की पेडर रोड स्थित जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर का रुख किया। यहां मार्केकिंग डिपार्टमेंट में काम करने वाले सुबोध ने रेफेरल कट का रेटकार्ड बताया। मसलन लीवर ट्रांसप्लांट के पेशेंट भेजने पर कमिशन के तौर पर पूरा एक लाख रुपया ये अस्पताल देता है। मुंबई के बाद ऑपरेशन व्हाइट कोट में हमारा अगला मुकाम था बैंगलुरू। बैंगलुरू के फोर्टिस हॉस्पिटल के मार्किंटिंग मैनेजर परवेज सज्जाद ने रेफेरल कट के नाम पर तुरंत हमें कहा Than u r make me a right person..i will handle the cases यानी आपने एकदम सही इंसान को चुना है, मैं आपके सारे मामले हैंडल कर लूंगा। फोर्टिंस हॉस्पिटल के मैनेजर यूनिट सेल्स एंड मार्किंटिंग ने हमें टोटल बिल पर 5 परसेंट कमिशन देने की बात कही। जिसमें किसी तरह की कोई कैपिंग भी नहीं होगी। कैमरे पर इन्होंने ये भी कबूल किया कि इनका टाईअप दूसरे अस्पतालों से भी है। जो इन्हें मरीज भेजते हैं और बदले में इनसे मोटा कमिशन लेते हैं।

दिल्ली की ही तर्ज पर बैंगलुरु में भी अपोलो हॉस्पिटल का बड़ा नाम है। बैंगलुरू के अपोलो हॉस्पिटल में हमारी मुलाकात हुई यहां के सीनियर मैनेजर नितेज से, जब हमने इन्हें मरीज रेफर करने की बात कही और बदले में रेफरलकट के बारे में पूछा, तो इन्हें हमसे कहा कि ये अपने सीनियर से पूछकर हमें बताएंगे। हालांकि जब हमारे रिपोर्टर ने इनसे पूछा कि क्या बाकी अस्पतालों के साथ भी इनका टाईअप है, क्या ये उन्हें कमिशन देते हैं। जवाब में सीनियर मैनेजर साहब ने भी कह दिया कि ये हमारा बिजनेस है।

बैंगलुरू के अपोलो हॉस्पिटल में सबसे अलग नियम कानून हैं। यहां 10 मरीज भेजने के बाद ही अस्पताल से इकट्ठा कमीशन मिलता है। ये बात खुद हॉस्पिटल के सीनियर मैनेजर ने हमारे कैमरे पर कबूल की। कमिशन का पैसा यहां न चैक से दिया जाता है और न ही यहां कैश चलता है। 10 मरीजों के इलाज पर जो भी कमिशन बनेगा उसका पूरा पैसा इकट्ठा NEFT के जरिए आपके खाते में पहुंच जाएगा।

ऑपरेशन व्हाइट कोट में आगे जा पहुंचे बैंगलुरू के हेब्बल इलाके में बने कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल । अस्पताल के मैनेजर कुमार हिरेमत से मरीज रेफर करने के बदले रेफरलकट पर खुलकर रेटलिस्ट पर बात की। कुमार ने बातचीत में साफ कह दिया कि हॉस्पिटल सात परसेंट कमिशन सिर्फ उन्हीं अस्पतालों और डॉक्टर्स को देता हैं जिनसे इनका टाईअप यानी डील हो चुकी है।

बैंगलुरू के नारायणा हृदयालय कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग में भी कुछ इसी तरह का खेल चल रहा है। यहां हमारी मुलाकात हॉस्पिटल के मार्किटिंग मैनेजर एंथनी सग्याराज से हुई। ये हमें हर मरीज पर 10 परसेंट कमिशन देने को राजी हो गए। साथ ही इन्होंने हमें बताया कि कमिशन की जो रकम रेफर करने वाले डॉक्टर को दी जाएगी, उसे विजिटिंग कंसलटेंसी फीस का नाम दे दिया जाएगा। इसके अलावा इन्होने आगे कहा कि ये एक और अस्पताल की मार्किंटिंग टीम से हमारी सेटिंग करा देंगे।

बैंगलुरू में माल्या हॉस्पिटल एक जाना माना नाम है। कोबरापोस्ट टीम की जैसे-जैसे माल्या ह़स्पिटल के बिजनेस डेवलपमेंट मैनेजर टी.सोमा शेखर से हमारी बातचीत आगे बढ़ी…हकीकत परत-दर-परत खुलती चली गई। जो शख्स 5 मिनट पहले तक ये कह रहा था कि इनके अस्पताल में कमिशन और रेफरल कट का कोई सिस्टम नहीं है, वो 5 हजार, 10 हजार और 15 हजार तक कमिशन मिलने की बात कहता दिखाई दिया। आगे बातचीत में इस शख्स ने हमसे कहा कि अगर हम अस्पतालों में सर्जरी से जुड़े केस भेजेंगे तो बदले में डॉक्टर हमें अच्छा कमिशन भी देंगे। यहां डॉक्टर ही रेफर करने वाले डॉक्टरों को कमिशन देते हैं।

ये हाल देश के किसी एक अस्पताल का नहीं बल्कि खास बात ये है कि बड़े शहरों के नामी हॉस्पिटल्स में ये धंधा खुलेआम चल रहा है। छोटे अस्पतालों की बड़े हॉस्पिटल्स से मरीजों पर डील होती है। जो मरीज यहां इलाज कराने आते हैं उन्हें भी कानों कान इस बात की भनक तक नहीं लगती कि उनका सौदा हो चुका है। वो बेचे जा चुके हैं। यहां तक कि इन्हें बेचने वाले को जो पैसे दिए जाएंगे वो भी इन्हीं की जेब से निकाले जाएंगे। ये भी मरीजों को पता नहीं लग पाता। हैरत की बात ये है कि हॉस्पिटल मैनेजमेंट के साथ-साथ डॉक्टर भी इस काली कमाई के धंधे में शामिल हैं।

न्यूज़ डेस्क, कोबरापोस्ट
Date: 1 Sep 2017


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https://hindi.cobrapost.com/braking-news/cobrapost-expose-operation-white-coat/85449

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सिजेरियन का सच

Ila Joshi : जब तक सिजेरियन तरीके से प्रसव कराने की तकनीक हमारे देश में नहीं थी, या कहना चाहिए कि जब तक ये तरीका बेहद आम नहीं बना था तब तक नॉर्मल डिलीवरी को लेकर जितनी आशंकाएं डॉक्टर आज आपको गिनाते हैं ये लगभग नामौजूद ही थीं। सिजेरियन डिलीवरी से जुड़ी डिलीवरी के बाद की कॉम्प्लिकेशन के बारे में अगर आप अंजान हैं तो ज़रूर पढ़ लें क्योंकि ये फेहरिस्त बेहद लम्बी है।

पिछले एक दशक में जिस तरह से सिजेरियन तरीके से प्रसव के आंकड़े बढ़ रहे हैं उससे तो ये लगने लगा है कि कुछ समय बाद यदि कोई भारतीय औरत नॉर्मल डिलीवरी से बच्चा पैदा करती है तो ये ख़बर बनेगी। कुछ बेहद समझदार लोग ये तर्क भी देते हैं कि नई लड़कियां लेबर पेन से बचने के लिए सिजेरियन तरीका अपनाती हैं तो उन महान लोगों को पता होना चाहिए कि सिजेरियन के बाद ज़िंदगी भर जो उन लड़कियों को झेलना पड़ता है उसमें कोई भी थोड़ा बहुत समझदार इंसान अपनी इच्छा से इस विकल्प को कभी नहीं चुनेगा। सरकारी अस्पतालों के बिगड़ते हालात, अच्छे डॉक्टरों की उन सुविधाविहीन अस्पतालों में काम करने के प्रति उदासीनता और निजी अस्पतालों की बढ़ती संख्या ने एक नया बाज़ार खड़ा किया है।

ऐसे में बड़े शहरों में रहने वाले लोगों के लिए मेडिकल इनश्योरेंस कोई लक्ज़री नहीं एक बुनियादी ज़रूरत बन गई है। आए दिन हम अख़बारों में, टीवी में इस तरह की ख़बरें पढ़ते देखते हैं कि अस्पताल ने केस बिगाड़ दिया, कुछ नहीं था लेकिन दुनियाभर के टेस्ट करवा दिए, डिपाजिट न दे पाने की हालत में मरीज़ को एडमिट नहीं किया, बकाया न अदा कर पाने तक बॉडी देने से इंकार कर दिया। और ये सब केस अपवाद नहीं हैं, दुर्भाग्यवश ज़्यादातर मामलों में ऐसा ही होता है। एक अनुभव तो निजी है जिसमें डिपाजिट का पैसा मरीज़ के डिस्चार्ज होने के 100 दिन बाद मिला वो भी जब सैंकड़ों तकादे दिए गए। इसी बाज़ार का एक अहम हिस्सा है सिजेरियन तरीके से प्रसव कराना।

आम तौर पर प्रसव के समय सभी लोग थोड़े टेंशन में होते हैं ऐसे में अचानक डॉक्टर कहे कि सिजेरियन करना पड़ेगा तो अमूमन लोग उस वक़्त तर्क न कर सकने की स्थिति में हाँ कह देते हैं और इसी का फ़ायदा ये बाज़ार उठाता है। गर्भ के नौ महीनों में रेगुलर चेकअप के दौरान डॉक्टर का ज़ोर इस बात पर होना चाहिए कि कैसे होने वाली माँ स्वस्थ रहे जिससे सिजेरियन की ज़रूरत न ही पड़े।

इसी बीच बहुत से ऐसे ख़ास संस्थान/अस्पताल सामने आने लगे हैं जो नॉर्मल डिलीवरी कराने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन इनमें से अधिक्तर का प्रोसीजर एक आम इंसान की आर्थिक हैसियत से बाहर है सो ज़्यादातर लोगों के पास ये विकल्प नहीं। ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि आप निजी तौर पर ख़ुद को जागरूक रखें, नौ महीने के समय में आपके पास पर्याप्त समय है एक अच्छा डॉक्टर और अस्पताल ढूंढने का। क्योंकि अगर इस मसले पर आप ख़ुद लापरवाह रहेंगे तो इस बाज़ार को फलने फूलने का मौका आप ख़ुद दे रहे हैं। वैसे मैं सिस्टम पर सवाल करना चाहती हूं लेकिन क्या फ़ायदा दस लाइनें ज़्यादा लिखकर, क्योंकि जिस देश में धर्म के नाम पर चंदा मिलना आसान है लेकिन सभी सुविधाओं से लैस ग़रीबों के लिए एक मुफ़्त अस्पताल बनाने की बात कोई सोचता तक न हो तो वहां सिस्टम को सवाल करने से कौन सा आप लोग जागने वाले हैं।

रंगकर्मी, पत्रकार और एक्टिविस्ट इला जोशी की एफबी वॉल से.

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किंगजार्ज मेडिकल कॉलेज के भ्रष्टाचारी कुलपति डा. रविकांत को हटना पड़ा

किंगजार्ज मेडिकल कॉलेज के निवर्तमान कुलपति डा0 रविकांत के खिलाफ चल रही मेरी भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में आखिरकार मुझे विजय प्राप्त हुई। राजनैतिक शक्तियों से समृद्ध कुलपति डा0 रविकांत ने सत्ता संरक्षण में केजीएमसी को जिस तरह से लूट का अड्डा बना दिया था, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मरीजों की कैंटीन से लेकर दवाओं की खरीदी और उपकरणों व बेड की खरीदी से लेकर, कंप्यूटर खरीद और भर्तियों में जिस तरह से मनमानी व भ्रष्टाचार किया गया, वह डरावना है।

पूरा मेडिकल कॉलेज प्राइवेट लिमिटेड बनाकर रख दिया गया। मैंने व्यक्तिगत तौर पर डा0 रविकांत को तमाम अनियमितताओं की ओर उनका ध्यानाकृष्ट किया लेकिन सत्ता के मद में चूर कुलपति सब कुछ अनसुना करते गए। डा0 वाखलू ने भी कंप्यूटर खरीद में जमकर घपला किया और वह इस लिए निरंकुश रहा क्योंकि उसके सीधे संबंध सत्ता के शीर्ष तक थे।

एक रूपए का पर्चा 51 रूपए में बनने लगा। मरीजों के रजिस्टेशन के नाम पर उनका दोहन हुआ है। केजीएमसी में मरीजों को एक्सरे के नाम पर सीडी दी जाने लगी। गाँव- देहांत और छोटे से शहर से आने वाले मरीजों को अगर तत्काल कोई जरूरत पड़ जाए तो अब वह सीडी कहाँ खुलवाता घूमे? जिलों में कितने चिकित्सक लैपटाप लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों या जिला अस्पतालों में आते हैं? अगर आते भी हैं तो क्या यह आवश्यक है कि उनके सिस्टम पर सीडी खुले?

मैंने डा0 रविकांत को व्यक्तिगत तौर पर यह समस्या बताई पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया….भर्तियों में जमकर मनमानी हुई। उपकरणों की खरीद को लेकर भी यही हुआ। मरीज दवाओं को लेकर पूरे तीन साल भटकता रहा। कैंटीन प्राइवेट हाथों में सौंप दी गई। पूरा केजीएमसी प्राइवेट लिमिटेड बनाकर रख दिया गया।

आखिरकार मोर्चा खोलना पड़ा। अपने कार्यकाल को बढवाने के लिए डा0 रविकांत ने पश्चिम के भाजपा के जाट नेताओं से लेकर संघ के नेताओं तक से संपर्क साधारण लेकिन सफल नही हुए। मैं हृदय से महामहिम मा0 राज्यपाल का आभारी हूँ कि उन्होंने न्यायसंगत निर्णय लिया। मेरी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

डा0 रविकांत को जाती हुई सरकार ने कैंसर इंस्टीट्यूट का निदेशक बना दिया है। हाल ही में मैं कैंसर इंस्टीट्यूट गया था। बहुत बुरी स्थिति में है। मुख्यमंत्री से गुजारिश है कि गरीब और असहाय मरीजों के हितों को ध्यान में रखते हुए यहां किसी ईमानदार छवि के योग्य चिकित्सक की बतौर निदेशक तैनाती करें। केजीएमसी में हुए भ्रष्टाचार की जांच और दोषियों के सजा होने तक मैं लडूंगा।

…महामहिम का पुनः आभार….

कई अखबारों में काम कर चुके और लखनऊ में सोशल एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय पवन सिंह की एफबी वॉल से.

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काक्रोच क्लब आफ इंडिया में तब्दील हो गया पीसीआई! (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया को अगर काक्रोच क्लब आफ इंडिया भी कह लें तो कोई बुरा न मानेगा क्योंकि एक तो वैसे ही होली नजदीक है और दूजे प्रेस क्लब की टेबल पर सरेआम काक्रोच घूमते टहलते और आपके खाने में मुंह मारते मिल जाएंगे. सबकी दुर्व्यवस्था की खोज खबर रखने वाले पत्रकारों के अपने ही क्लब का क्या हाल है, इसे देखने लिखने वाला कोई नहीं.

पिछले दिनों भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह जो प्रेस क्लब आफ इंडिया के सदस्य भी हैं, क्लब पहुंचे और खाने-पीने का आर्डर किया तो देखा कि एक काक्रोच बार-बार टेबल के बीच में आकर उन्हें सलामी देकर वापस नीचे चला जा रहा है. कई बार जान-बूझ कर अनदेखा करने के बावजूद जब काक्रोच जिद पर अड़ा रहा कि वीडियो बनाकर न्यूज छापो तो यशवंत को मजबूरन अपना मोबाइल कैमरा आन करना पड़ा और गवाह के बतौर क्लब के एक वेटर को सामने खड़ा करके सवाल करना पड़ा ताकि कोई यह न कह सके कि वीडियो फेक है.

हालांकि खुद के घर की गंदगी को दबाने, तोपने, ढंकने की जिम्मेदारी घर के सदस्यों पर रहती है और घर की बात घर में ही रह जाए टाइप भावना जोर मारती रहती है, लेकिन जब गंदगी इतनी हो जाए कि बदबू आने लगे तो इसे दुनिया समाज के सामने लाना जरूरी हो जाता है ताकि गंदगी और बदबू की सफाई के लिए कोई अभियान चल सके.

भड़ास के एडिटर यशवंत ने फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है :

Yashwant Singh : प्रेस क्लब इंडिया या काक्रोच क्लब आफ इंडिया! परसों प्रेस क्लब गया. खाने-पीने का आर्डर किया. अचानक एक छोटे जीव ने ध्यान खींचा. एक प्यारा-सा काक्रोच बार-बार टेबल के बीच में आकर मुझे सलामी देकर वापस नीचे चला जाता, इठलाते हुए. कई बार अनदेखा किया. पर नटखट और पब्लिसिटी का भूखा यह चुलबुल काक्रोच जिद पर अड़ा रहा कि हे यशवंत, वीडियो बनाकर मेरी न्यूज छापो, दुनिया को मेरे अस्तित्व और विकास के बारे में बताओ. आखिरकार मुझे मजबूरन अपना मोबाइल कैमरा आन करना पड़ा. गवाह के बतौर क्लब के एक वेटर को सामने खड़ा करके इस प्राणी के क्लब में ठाठ से वास करने के बारे में जानकारी हेतु सवाल किया. आप भी देखें वीडियो..

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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बस्तर की बूटी से जर्मन कंपनी बनाएगी अल्जाइमर की दवा

बस्तर की रहस्यमयी बूटी से जर्मनी की कंपनी ऐसी दवा बनाएगी जिसे खाने के बाद आपका दिमाग आइंस्टाइन जैसा हो जाएगा। यानि, इसके बाद आप कभी कुछ भी जरूरी जानकारी नहीं भूलेंगे। हम जिन बूटियों की बात कर रहे हैं, इसका उपयोग लाइलाज बीमारी अल्जाइमर की दवा बनाने के लिए किया जाएगा। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें इंसान उम्र बढऩे के साथ याददाश्त खोने लगता है। जर्मनी के वैज्ञानिकों को इस बीमारी के निरोधक तत्व की खोज जिन जड़ी-बूटियों में की वह उन्हें बस्तर में मिली है।

एक वेबसाइट में इन जड़ी-बूटियों के बारे में जानने के बाद जर्मनी के एक्सीलेंस कम्पनी के वैज्ञानिक व मुख्य प्रबंध निदेशक डॉ गेरहार्ड, मुख्य सलाहकार निदेशक डॉ सीलविया व डॉ अमल मुखोपध्याय बस्तर पहुंचे थे। उन्होंने कोण्डागांव के मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म समूह के साथ जड़ी-बूटियों के लिए पांच साल का एमओयू किया है। समूह के संचालक राजाराम त्रिपाठी ने बताया, एक्सीलेंस कंपनी ने एक दर्जन जड़ी-बूटियों को जर्मनी भेजने एमओयू किया है। एमओयू के तहत वे इन हब्र्स का खुलासा नहीं कर सकते लेकिन इनसे अल्जाइमर रोग की दवा बनाई जाएगी। इनकी पहली खेप भेजने की तैयारी की जा रही है।

वेबसाइट के जरिए हुआ संपर्क

त्रिपाठी ने बताया, जर्मन की एक्सीलेंस स्वास्थ्य कंपनी ने वेबसाइट से जरिए उनसे संपर्क किया था। यहां पहुंचे कंपनी के अधिकारियों ने बताया, उन्होंने जब नेट पर इससे संबंधित जड़ी-बूटियों की खोज की थी उन्हें मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म सबसे उपयुक्त लगी। इसके बाद उन्होंने यहां आकर पूरे फार्म का निरीक्षण करने के साथ हब्र्स की क्वालिटी देखी। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद उन्होंने एमओयू किया है।

बीस साल से उगा रहे 72 किस्म की जड़ी-बूटी

डॉ त्रिपाठी ने बताया, उनका समूह बीस साल से करीब 72 किस्म के जड़ीबूटी उगाता है। इसमें सफेद मूसली, स्टीविया या मीठी तुलसी, गुगल समेत अन्य हब्र्स शामिल है। 1999 में स्थापित यह फार्म देश का पहला अतंराष्ट्रीय जैविक फार्म है। 2001 में इस फार्म ने अपना वेबसाइट लांच किया था जिसे भारत के पहले किसान वेबसाइट फार्म का दर्जा मिला था।

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ब्रेन-हैमरेज के अटैक से उबर रहे वरिष्ठ पत्रकार जयनारायण प्रसाद

लाये गये अपने कर्मनगर कोलकाता…  दो हफ्ते पहले शिरडी में घातक मस्तिष्काघात झेलने के बाद जनसत्ता-कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार जयनारायण प्रसाद अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं. नासिक अपोलो अस्पताल में हालत सुधरने के बाद उन्हें दो दिन पहले भतीजे फ्लाइट से कोलकाता ले आये. अब यहां न्यूरो सर्जन और फिजियोथेरपिस्ट की मदद से उन्हें सामान्य हालत में लाने की कोशिश हो रही है. रविवार (06.11.2016) शाम कोलकाता के खिदिरपुर बाबू बाज़ार स्थित उनके घर जाने पर हालचाल जाना. उनमें हो रहा सुधार देख कर तसल्ली हुई. उठ, बैठ व चल पा रहे, सबको पहचान रहे, नित्यक्रिया में समर्थ हो गये हैं, धीमी आवाज़ में बात कर पा रहे, लेकिन रह-रह कर इष्ट-मित्रों को पास देख सुबक पड़ते हैं, जैसे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा कि नियति के क्रूर वार से वह साफ बच निकले हैं.

सारा कोलकाता जानता है कि व्यावहारिक ज़िंदगी में जयनारायण प्रसाद जी कितने ज़िंदादिल, वाचाल व चपल व्यक्तित्व हैं. उन्हें देख कर पता चलता है कि कितना सिवियर था ब्रेन-हैमरेज का अटैक. तन से कुछ, पर मन से बहुत कमज़ोर हो गये हैं जयनारायण सर. हंसते-दमकते-स्वाभिमानी चेहरे की आभा कहीं दब गयी है, पर आशा ही नहीं, विश्वास है कि वह अपनी रौ में उसी दमखम के साथ फिर लौटेंगे. मंद सही, पर हो रहा सुधार उत्साहजनक है. साईंबाबा के धाम में होने के चलते वह यह अटैक झेल गये. अटैक के वक्त से ही उनके साथ रहे उनके भतीजे अंजन ने बताया – साईंबाबा की कृपा ना होती, तो बड़े पापा को बचा पाना मुश्किल था.

एक डॉक्टर ने तो उन्हें … घोषित कर दिया था, पर ऐन वक्त पर उपलब्ध संपर्क व पुर्जे इस तरह जुड़े कि उपचार ने आपातकालिक गति पकड़ी और वह सुधरने लगे. फिर दूर से ब्रेन-हैमरेज के विशेषज्ञ डॉक्टर ने अस्पताल के डॉक्टर को खास तरीका बताया, जिसे मरीज पर आजमा कर पता लगाया गया कि वह बस अचेत हुए हैं, उनमें चेतनता लायी जा सकती है. बस यहीं से उपचार ने सकारात्मक मोड़ लिया और वह स्वास्थ्य-लाभ की डगर पर चल पड़े. परमपिता जयनारायण प्रसाद को यथाशीघ्र स्वस्थ करने की हम सब की प्रार्थना स्वीकार करें.बीमार जयनारायण प्रसाद के भतीजे अंजन रॉय का नंबर है : 08420890305

कोलाकात के पत्रकार रमेश द्विवेदी की रिपोर्ट. संपर्क : 9681846550

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कैंसर की नई दवा के परीक्षण में जुटे गाजीपुर के डाक्टर एमडी सिंह का कवि रूप (देखें वीडियो इंटरव्यू)

Yashwant Singh : गाज़ीपुर जिले के मशहूर चिकित्सक डॉक्टर मुनि देवेंद्र सिंह उर्फ एमडी सिंह के कवि रूप को उनके ही जिले के बहुत कम लोग जानते होंगे। इस बार गाज़ीपुर प्रवास की उपलब्धि रहे DR. MD SINGH जी. आधे घंटे तक उनसे विस्तार से बातचीत हुई और पूरी बातचीत को मोबाइल में रिकार्ड किया. इस इंटरव्यू में एक डॉक्टर को कैसा होना चाहिए और संवेदनशीलता किस तरह शब्दों में ढलकर व्यक्ति को कवि बना देती है, इसके बारे में बताया डाक्टर एमडी सिंह ने. Continue reading

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यूपी में जंगलराज : जेल के चिकित्साधिकारी को क्यों है मौत का अंदेशा, पढ़िए पूरा पत्र

सेवा में
महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
महानिदेशालय स्वास्थ्य भवन लखनऊ उ.प्र.
विषय – हत्या से पूर्व का बयान
महोदय

सविनय निवेदन है कि मैं जिला कारागार फिरोजाबाद में चिकित्साधिकारी के पद पर तैनात हूँ। मैं डायबिटीज का मरीज़ हूँ और सुबह-शाम इन्सुलिन लेता हूँ। जनवरी 2016 में जब मैं नवीन प्रा. स्वास्थ्य केंद्र इटौली पर तैनात था, तब मुझे पैनिक एंग्जायटी की समस्या हो गई थी। ढाई महीने तक नियमित दवा लेने और 21 फरवरी से 22 मार्च तक स्वास्थ्य लाभ हेतु अर्जित अवकाश लेने के बाद में पूरी तरह ठीक हो गया।

मैं छुट्टी से वापस लौटा तो मुझे पता चला कि मुख्य चिकित्साधिकारी ने बदले की भावना से मेरा ट्रांसफर जिला कारागार में कर दिया है। जिला कारागार में लेवल तीन की पोस्ट खाली थी जबकि मैं लेवल एक में हूँ। लेवल एक की जिले में 45 पोस्ट खाली हैं और 35 चिकित्साधिकारी कार्यरत हैं और लेवल-2 की ग्यारह पोस्ट हैं और लेकिन सभी भरी हैं। मैंने मुख्य चिकित्साधिकारी को 15.02.16 को आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था जो ACR भेजने के पैसे लेता था और उसके द्वारा ACR न भेजने के कारण 2014 में सात चिकित्साधिकारियों का प्रमोशन लेवल-1 से लेवल -2 में नहीं हो सका। मुख्य चिकित्साधिकारी ने बजाय जांच करने के उसकी पेंशन सुनिश्चित कर दी।

19 मई को मैंने एक पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखा  जिसमें अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आधार पर अपनी मूल तैनाती नवीन प्रा. स्वा केंद इटौली पर करने का निवेदन किया। मैंने RTI के माध्यम से आशु लिपिक रामजीलाल गुप्ता पर हुई कार्रवाई के बारे में पूछा। मुख्य चिकित्साधिकारी महोदय ने RTI का जवाब तो आज तक नहीं दिया, तीन दिन बाद जेल से डॉ धर्मेंद्र हरजानी का ट्रांसफर पर दिया। इससे मेरा ड्यूटी सिड्यूल और मुश्किल हो गया और नियमित दवा लेने के बावजूद मेरी स्वास्थ्य समस्या सुधरने के बजाय बढ़ गई। 22 जून को मैंने पुनः चिकित्साधिकारी को पत्र लिखकर अपनी स्वास्थ्य समस्या बताई और चिकित्सा अवकाश के लिए कहा। महोदय ने स्पष्ट शब्दों में कहा – हम तुम्हें चिकित्सा अवकाश नहीं दे सकते।

10 जुलाई को डॉ अमित जिंदल का जेल से ट्रांसफर कर दिया और डॉ संजीव कुमार को उनकी जगह जेल में ट्रांसफर कर दिया। १२ जून को मैंने पुनः जिला अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट डॉ अजय अग्रवाल से परामर्श लिया। उन्होंने मुझे दो हफ्ते का रेस्ट लिखा है। दांत में अक्सर दर्द होता रहता है , इसके लिए जिला अस्पताल के डेंटिस्ट ने RCTकराने के लिए लिखा है। मैंने स्वास्थ्य संबंधी नए-पुराने प्रपत्रों के साथ 15 जुलाई को चिकित्सा अवकाश के लिए लिखित फॉर्म भरकर चिकित्साधिकारी को दिया है। मगर महोदय ने अवकाश देने से मना कर दिया है।

बिना किसी वजह के मेरा मार्च के बाद से वेतन भी मुख्य चिकित्साधिकारी ने रोक रखा है। मौखिक रूप से कई बार और 09.06.16 को मैंने लिखित पत्र मुख्य चिकित्साधिकारी को दिया पर मार्च के बाद से मेरा वेतन अभी तक नहीं निकल सका है।

मैं 23.06.16 को अपर निदेशक आगरा व महानिदेशक महोदय को अपने स्वास्थ्य,चिकित्सा अवकाश व वेतन के बारे में लिख चुका हूँ पर कहीं से कोई राहत नहीं मिली। महोदय, इनसोम्निया व एंग्जायटी के लिए सरटालिन, क्लोनेज़ीपाम व ज़ोल्पिडेम मुझे नियमित लेनी पड़ती हैं। रात में नींद बहुत देर से आती है और दिन में दोपहर तक नींद आती रहती है। मैं अकेला  रहता हूँ। जेल शहर से पांच किलोमीटर दूर है। माचिस, आटा, सब्जी तक लेने शहर से पांच किलोमीटर जाना पड़ता है। एंग्जायटी के समय शुगर लेवल तेज़ी से नीचे गिरता है। 15.05.16 को मेरा शुगर लेवल 48 व 23.05.16 को 52 व 10.06.16 को 56 था। ऐसे मैं भी मुख्य चिकित्साधिकारी शाम पांच से सुबह नौ बजे तक कारागार की ड्यूटी। दिन में नौ से पांच तक पोस्टमॉर्टम ड्यूटी और पांच से सुबह नौ बजे तक फिर कारागार ड्यूटी की उम्मीद करते हैं।

29 मई को मैंने सात पोस्टमॉर्टम किए। सड़ी हुई लाशें जहां खड़ा होना दुश्वार था। मोरचरी ऐसी जगह पर है जहां का तापमान 45 डिग्री से ऊपर रहा होगा। बैठ कर खाना खाने तक की जगह नहीं है। पंखा चलवाने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी व चिकित्सा अधीक्षक को कई फोन किए। डेढ़ घंटा पंखा चला कर बंद कर दिया। अगर पानी की बोतल और मीठा मेरे साथ न होता और जब तक आधा किलोमीटर से पानी लेकर व्यक्ति आएगा तब तक किसी भी इन्सुलिन लेने वाले व्यक्ति की हाइपोग्लाइसीमिया से मौत हो सकती है।

मेरी स्वास्थ्य समस्या ऐसी है जिसके साथ मैं काम तो कर सकता हूँ परंतु उससे तात्कालिक रूप से वह मेरे लिए जानलेवा हो सकता है और  लंबे समय में मेरे स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डाल सकता है। मेरे साथ भी कहीं पर किसी भी तरह से ऐसी दुर्घटना घटती है तो इसके लिए सीधे तौर पर मुख्य चिकित्साधिकारी को ज़िम्मेदार ठहराया जाए। मेरा वेतन निकलवा दिया जाए। मेरा NPS का और ACP का पैसा मेरे माँ-बाप को दे दिया जाए (रामजीलाल गुप्ता द्वारा ACR न भेजने के कारण मेरा प्रमोशन नहीं हुआ और ACP की पहली लिस्ट में मेरा नाम नहीं है ) । 2014 में मेरे जवान भाई की मृत्य के बाद उसकी आठ साल व चार साल की बच्चियां मुझ पर आश्रित हैं सरकार उनके पालन-पोषण व अध्ययन की व्यवस्था करे। जिन – जिन अधिकारियों को मैंने पत्र लिखे हैं वे सब मेरी फाइल में उपलब्ध हैं।

सधन्यवाद

प्रार्थी
डॉ राम प्रकाश
चिकित्साधिकारी
जिला कारागार फिरोजाबाद उ. प्र.
वरिष्ठता क्रमांक – 13517 
मोबाइल – 8273492240

प्रतियां
1. महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य लखनऊ        
2. अपर निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण आगरा
3. मुख्य चिकित्साधिकारी फिरोजाबाद

संलग्नक-
1. 15.02.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
2. 19.05.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
3. 22.06.16 को मुख्य चिकित्साधिकारी को लिखे पत्र की प्रति
4. पुराने व नए चिकित्सा संबंधी दस्तावेज पृष्ठ

दिनांक-  25.07.2016

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अपने बीमार पत्रकार को नौकरी से निकालने की तैयारी में दैनिक जागरण!

बामारी से जूझ रहे पत्रकार राकेश पठानिया

गेट वैल सून या गेट ऑऊट सून? : खुद को देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले दैनिक जागरण के प्रबंधन की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर उनके सबसे पुराने पत्रकारों में से एक और प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा (जहां जागरण का प्रिंटिंग यूनिट और हिमाचल संस्करण का मुख्य कार्यालय भी मौजूद है) के ब्यूरो प्रभारी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं, वहीं प्रबधन ने उनको चलता करने के पैंतरे आजमाने शुरू कर दिए हैं। प्रबंधन उनको गेट वेल सून कहने की जगह गेट आऊट सून की तैयारियों में जुट गया है।

राकेश पठानिया का कांगड़ा में जागरण के प्रस परिसर के निर्माण में अहम योगदान रहा है। किसी जमाने में उनकी गिनती जागरण के मजबूत सतम्भों में होती थी। जब निशीकांत ठाकुर जगारण के सथानीय संपादक एवं मुख्य महाप्रबंधक हुआ करते थे, राकेश पठानिया यहां समाचार संपादक से भी ज्यादा ताकतवर हुआ करते थे। राकेश पठानिया श्रमजीवी पत्रकार हैं और पत्रकारिता के अलावा जीवन में दूसरा कोई कारोबार अथवा व्यापार नहीं किया। उनकी पत्नी भी घरेलू महिला हैं। देरी से शादी की है, इसलिए बच्चे अभी छोटे हैं।

इस बीच राकेश पठानिया गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। उनके उपचार पर लाखों रूपए खर्च हो चुके हैँ। अभी भी दवाई चल रही है। वह छुट्टी पर हैं और स्वस्थ्य लाभ कर रहे हैं। लोगों के दुख दर्द को कम करने के लिए मसीहा बनने का ढोंग करने वाले अखबारों का स्याह चेहरा यह है कि जागरण प्रबंधन ने उनका हाल चाल पूछना तो दूर की बात, कुशल क्षेम पूछने की जहमत उठाना जरूारी नहीं समझा है। उल्टा उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे ब्यूरो कार्यालय (जो उनके घर के करीब है) के बजाये प्रस परिसर में डेस्क पर आकर अपनी सेवाएं दें।

कांगड़ा से ही प्रकाशित होने वाले स्थानीय समाचार पत्र दिव्य हिमाचल के मुख्य संपादक अनिल सोनी और समाजसेवी संजय शर्मा ने जरूर राकेश पठानिया के घर पर पहुंच कर न केवल उनका कुशल क्षेम जाना है, बल्कि हर तरह की मदद का भरोसा दिया है। राकेश पठानिया के मामले में जागरण प्रबंधन की संवदनहीनता हिंदी समाचार पत्रों के खोखले आदर्श का भंडाफोड़ है।

लेखक विनोद कुमार भावुक दैनिक जागरण में ब्यूरो प्रभारी रह चुके हैं. वर्तमान में साप्ताहिक समाचार पत्र का संचालन करते हैं.

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कोई पुरुष दिनभर में 5 बार से ज्यादा चाय पीता है तो उसे प्रोस्टेट कैंसर होने की आशंका!

Aaku Srivastava : कई लोग चाय को अपना लाइफ मान लेते हैं। उसके बिना वह अपने बेड से एक कदम बाहर नहीं रखते है। यहां तक कि अपनी आंखे भी नहीं खोलते हैं। इसका नाम सुनते ही हमारी आधी नींद खुल जाती है। सुबह-सुबह एक कप चाय मिल जाएं तो आपका पूरा दिन बन जाता है। दिन भर की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमें स्फूर्ति मिल जाती हैं। लेकिन शायद आपको यह बात नहीं पता है कि सुबह-सुबह खाली पेट इसका सेवन करने से आपके शरीर के लिए कितना नुकसान दायक हैं। जानिए इसका सेवन करने से आपको क्या नुकसान हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार अनूप भटनागर की किडनी ट्रांसप्लांट, एम्स में अब भी चल रहा इलाज

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके दिल्ली के पत्रकार अनूप भटनागर की किडनी पिछले दिनों सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट कर दी गई. एम्स में भर्ती अनूप भटनागर हाल फिलहाल पीटीआई से जुड़े रहे. उनके इलाज में लगभग दस बारह लाख रुपये खर्च आए. पीटीआई भाषा के साथियों ने चंदा करके तीन चार लाख रुपये अनूप को दिए. प्रेस क्लब आफ इंडिया की तरफ से भी पच्चीस तीस हजार रुपये दिए गए. अनूप भटनागर अब भी एम्स में भर्ती हैं और उनका इलाज चल रहा है. 

असल में नई किडनी को बाडी एसेप्ट करे, इसके लिए ढेर सारी दवाएं दी जाती हैं जिसके कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. किडनी तो एडजस्ट हो जाती है लेकिन बाद में इम्यून सिस्टम कमजोर होने के कारण छोटे मोटे रोगों से निपटना पड़ता है. इन दिनों इसी तरह के कई समस्याओं से अनूप भटनागर जूझ रहे हैं. अनूप भटनागर जीवट पत्रकार हैं जो पिछले कई सालों से डायलिसिस के जरिए जी रहे थे और पत्रकारिता भी कर रहे थे. डायलिसिस के कारण उन्हें हर हफ्ते या पंद्रह दिन में पूरा खून निकलवाना और नया खून चढ़वाना होता था. यह प्रक्रिया बहुत पीड़ादायी और खर्चीली थी. अंतत: उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट का फैसला लिया. इसके पहले उन्होंने केंद्र सरकार से लेकर दिल्ली सरकार और यूपी सरकार तक से इलाज के लिए आर्थिक मदद की गुहार लगा चुके हैं लेकिन कहीं उनकी सुनवाई नहीं हुई. 

अगर आप अपने स्तर से मदद करना चाहते हैं या किसी प्रदेश या केंद्र सरकार से आर्थिक मदद दिला सकते हैं तो अनूप भटनागर से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9810871279 के माध्यम से कर सकते हैं.

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लखनऊ से निकलेगा इवनिंग समाचार, मीडिया वालों के लिए है इसमें जॉब

उत्तर प्रदेश के लखनऊ से जल्द ही दैनिक सांध्य अखबार शुरू होने जा रहा है, जिसका नाम है इवनिंग समाचार (evening samachar)। इस अखबार के लॉन्चिंग की तैयारी लगभग पूरी कर ली गई और इसे आगामी महीने यानी जुलाई से लॉन्च किए जाने  की संभावना है। अखबार के मैनेजिंग एडिटर समीर श्रीवास्तव हैं।

अखबार ने कई विभिन्न पदों पर नियुक्तियां भी निकाली हैं, जिनमें रिपोर्टर, कम्प्यूटर ऑपरेटर, सब एडिटर, मार्केटिंग और रिसेप्शनिस्ट शामिल हैं। इच्छुक व्यक्ति अपना रेज्यूमे ई-मेल आईडी vivek.kharee@gmail.com पर भेजें। साथ ही आप जिस पद के लिए आवेदन करें उसका नाम सब्जेक्ट लाइन में जरूर लिखें।

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Medanta- The Medicity or The Murdercity!

Today i would lyk to post on behalf of my DAD Jagjit Sandhu (who is no more with us) the reality of the so called Asia’s number 1 hospital Medanta- The Medicity, or The Murdercity. This post won’t bring my dad back, bt a lil relief to his soul. As a loving daughter it’s really hard to dictate what our family went through.

#1 The hospital is more about money, then the transplants and surgeries. Ppl trust these morons (doctors) as if they are god and surrender thyselves so dat they can get a new life, bt for the hospital, doctors and the staff, the patient is a game on which they play for looting money.

#2 This hospital ws recommended to my parents coz my dad had liver issues since few yrs, and they trusted it coz of the brand name. They went to the hospital with appointment with the so called head of the liver transplant and regeneration team Dr. A. S. Soin and firstly met their councillor Geeta who gave my dad a great hope and told about the 100% success rates for the transplants. Later on the doctor met them and reassured that the transplant will be successful and my dad will be perfectly healthy.

#3 firstly, the donor was my younger brother Navyug SanDhu  just 19 yrs old, after few tests they rejected him saying he has a fatty liver, same they said with the tests of my elder brother Navjot SanDhu . (Me being unaware of all this coz im married and settled in canada and he never wanted me to worry abt his health or he knew i would fly the same day). Mydad ws shattered, bt another hope came when my mom told doctr dat she wanted to be the donor. Just by asking my mother’s height and weight he agreed for the surgery and asked the assistant doctors to give the transplant date asap.

#4 My parents were admitted on 13th of April 2016, for the transplant which ws scheduled the very next day after a week of tests and lakhs of rupees. They started the surgery next morning on 14th April at 7am, ( shocking fact is dat 3 more liver transplants were scheduled the very same hour) the transplant took the whole day to night, the doctors took 4 hours more on surgery then scheduled. Reason?

#5 My Dad and Mom were then shifted to The ICU( from where my mother ws moved to ward next day as she started recovering). On questioning them abt the surgery, the doctors told it went successful. And in two days doctor’s informed us dat the liver didn’t start working they need another donor for the retransplant. (How did they say before dat my mother’s liver matched 100%? Than why it didn’t work?). My four cousins came by the evening and they started with their tests.( charging bundles for the tests) after rejecting 3 of them they told one matched, asked us to deposit another 5-6 lakhs right away. They took my cousin to the surgery room and bought him back within 10 minutes nd told his liver has enzymes. (Really, were enzymes not on the test reports? Were they on his body?)

#6 My dad ws already on ventilators, filters and slowly they failed my dad’s kidneys as well for which they started dialysis as well. They kept befooling us by assuring dat even if 1% of the liver start to work, he would survive. I ws then informed by my brother abt this after which i flew right same day. My dad didn’t see me, i kept calling him papa, papa ur daughter is here papa, im here papa but my bad luck my dad ws not there to see me anymore. Still, the doctors kept putting on filters for making as much more money as they can. One of My dad’s friend Harpal Dhaliwal uncle have a lot of links and met the owner of the hospital Dr Trehan, after which the doctors finally called from the ICU 10 at 4pm on 21st april 2016. My brothers and husband rushed and the doctors had bouncers and security with them just to tell my DAD IS NO MORE.

We could not do anything as our mom ws still the patient in the hospital, as her health ws not keeping good at all. The doctors then blackmailed us for if we tell our mom abt dad then we will loose her aswell. My mom who did all this just to save my dad could not even see my dad’s face for the last time (the body ws getting in worse condition so we could not keep it) And we lived a still life for 10 days by lying to our mom dat dad is doing ok just to keep her with us. The day we asked Dr Soin to inform our mom abt what happd to our dad, he refused and kept shivering and asked us to take her home and tell her everything there. He talked so rudely, i wish i could kill him, the way they murdered my father. We lost our lifeline, our hero and the best DAD ever. MEDANTA murdered my Dad. They never told the real cause of death. My dad ws clinically dead 2 days evn before they declared, but just for money’s sake they befooled us. They never told about donor’s health risk, but if u visit nd enquire, 4 donors have died there. My dad didn’t survive even after paying them 45 lakhs. We would pay them crores only if our dad could cm back.

My Dad will never come back, but i just wanted to make ppl aware of this Murdercity and if my post can save any life. Once my mother recovers, we won’t leave those butchers. I Love U Papa, ur love and memories will never fade from our hearts. Being a proud daughter I salute my hero my dad…..

नंदिनी सिन्हा का यह एफबी पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है.

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Interesting fact to prevent Dengue by using simple tips

: Dengue cases increasing day by day in Delhi : With alarming number reported in the month of August itself Dengue today is posing a huge threat. We all are aware that Dengue is caused by mosquitoes; we can surely take some corrective measures to stop them from breeding and safeguard our self. Also there are lot of repellents like coil, gel, cream, etc available in the market which we use regularly but its excess use can be harmful for us, especially for our children. Lets understand what makes an repellent and how we can avoid excess use of them….

What Mosquito Repellents do?

If you are wondering how insect repellents work, then here’s some interesting stuff for you! Mosquitoes and other insects such as ticks and flies, detect you by the smell of carbon dioxide emitted from your body. Since DEET is an aromatic compound with a strong odour, it helps mask the odour of carbon dioxide and in the process, makes it impossible for the insects to detect your presence. Research has proved that repellents can successfully protect you from mosquitoes and other insects and they are more often used on children. However, this has a flip side: the various side effects that these repellents can cause. Here we shall look into the reported dangers of mosquito repellents.

Dangers of Using Mosquito Repellents

It has been found that topical application of repellents containing DEET, can cause long-term side effects. This is because of the fact that nearly 50% of the chemical penetrates into the deeper layers of the skin and around 15% of it, to the bloodstream. This can adversely affect the skin and prove toxic for the body. Laboratory research conducted on animals, have shown that DEET can cause damage to the brain cells and affect the musculoskeletal system and the internal organs.

In humans, children are the most vulnerable, as their tender skin absorbs substances more readily. In some cases, toxic substances from repellents have been reported to affect the nervous system and even affect the growth rate. Given below are some of the potential health hazards and side effects of using chemical-based mosquito repellents.

•Headaches
•Difficulty in breathing
•Tiredness or fatigue
•Muscle pain
•Pain in the joints
•Inflammation and redness of the skin
•Inflammation of the eyes
•Slurred speech
•Insomnia or sleeplessness

Prolonged exposure can sometimes lead to serious complications, although such cases are very rare. The risks of excessive exposure to insect repellents are as follows:

•Anxiety disorders
•Mild to severe depression
•Hyperactivity
•Loss of memory
•Tremors and seizures
•Adverse effects on the central nervous system

Now, the question is, “Can we do without insect repellents completely?”. Ayurveda can certainly help in this area. Here are some handy tips from Dr. Partap Chauhan, Ayurvedacharya and Director Jiva Ayurveda.

Take equal quantities by weight of 3 easily available powders, viz. Mustard, Neem leaves and natural sea salt. Mix the powders and store. Use it like Sambrani or guggul. Take an iron bowl with burning red coal in it. Sprinkle little powder in installments. There will be smoke. Fan the smoke. Let it permeate the room or the house .The mosquitoes fly away because the smoke is unbearable for them.Ideally the mixture should be sprinkled on hot and dried dung cakes. The smoke is not poisonous. If a person is allergic to any of the above 3 ingredients used he must not use this .

A mixture of Cedrus Deodara (deodar), Andropogon Nardus (lemongrass), Cymbopogon Citriatus (lemongrass) and Azardirachta Indica (Neem) is also a good repellent. Other Ayurvedic remedies to keep these mosquitos away:   

Camphor known as “kapura” in Hindi act as a very effective mosquito repellant. Light a small piece of camphor in your room and shut the door and windows. Leave the room closed for 15 min. Your room will become a mosquito free zone.

Neem oil is also a great mosquito repellent. To make and effective skin friendly insecticide, mix neem oil and coconut oil in 1:1 proportion and apply it on the body. This will protect you from mosquito bites for at least 8-10 hours. This is very helpful especially if you are sleeping in your balcony or any other open area or camping in woods.

Tulsi is extremely effective in killing the mosquito larvae and keeping them away. Tulsi plant has medicinal properties which does not allow mosquitos to enter your home. So plant a Tulsi in your home and keep it on your windows.   

Lavender is a natural mosquito repellent. The divine and strong fragrance of lavender keeps the mosquitos at bay. Burn lavender oil in your fancy aromatic lamps or use lavender room freshener to keep mosquitos away from your home.

Keep shrubs like neem, Tulsi, lemon grass, marigold, mint etc. inside your home. These plants acts very strong natural mosquito repellents and also add beauty to your home.

Thanks & best regards
Radhey S. Gaud
Cell No.-09811986803
Email:- rsgaud1988@gmail.com

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कंपनियों के हवाले बीमार स्वास्थ्य सेवा : 86 फीसदी ग्रामीण और 82 फीसदी शहरी आबादी के पास इलाज का कोई इंतजाम नहीं

सस्ती दवाएँ बनने के बाद भारत को ‘गरीब देशों की दवा की दुकान’ कहा जाने लगा क्योंकि यहाँ से एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिकी देशों में सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। सबसे बड़ी त्रासदी है कि देश का 60 फीसदी तबका दवाओं से वंचित है। बदले हालातों में भारतीय कम्पनियाँ दवाओं के निर्माण की बजाय सिर्फ व्यापार में लिप्त हैं जिससे चीन का दवा बाजार पर कब्जा बढ़ा है। हाल में आयी एनएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक गाँवों की 86 फीसदी तथा 82 फीसदी शहरी आबादी के पास इलाज का कोई इन्तज़ाम नहीं होता है। इनके लिए न तो सरकारी योजना है और न ही कोई निजी स्वास्थ्य बीमा। पूरा जीवन भगवान भरोसे गुजरता है।

लोग दवा पर 80 फीसदी खर्च अपने कीमत पर करते हैं। आम आदमी के पहुँच से दूर होती जा रही है स्वास्थ्य सेवा। असमानता की खाई का आलम यह है कि जहाँ गरीबों तथा आम लोगों को इलाज के लिए अपना पैसा खर्च करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर लोग सरकारी धन पर विदेश जाकर इलाज कराते हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती है दवाओं के व्यापार और इसमें तरह-तरह के गठजोड़ ने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को कम्पनियों के हवाले करने पर आमादा है।

अमेरिका में हथियार के बाद सबसे बड़ा व्यापार दवा है। दवा कम्पनी ईली लिल्ली ने दवाओं के दुष्परिणाम के फलस्वरूप 57 हजार करोड़ रुपये का जुर्माना अदा किया, तो दूसरी ओर इस जुर्माने से कम 120 करोड़ की आबादी वाले भारत का स्वास्थ्य बजट 35 हजार करोड़ रुपये का है। इन्हीं महत्त्वपूर्ण सवालों पर केन्द्रित रहा झाबुआ में विकास संवाद की ओर से आयोजित तीनदिवसीय राष्ट्रीय पत्रकार समागम का दूसरा दिन। इस महत्त्वपूर्ण सत्र की अध्यक्षता जानेमाने पत्रकार प्रसून लतांत ने की। इन्होंने मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए ‘जन स्वास्थ अभियान’ के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. अमित सेन गुप्ता ने कहा कि दवाओं की राजनीति में नाटक हो रहा है। उस नाटक के अलग-अलग पात्र हैं-दवा कम्पनी और दवा के व्यापारी, मरीज उपभोक्ता, लिखने वाले डॉक्टर और प्रतिबंधित करनेवाली ऐजेंसी। भारत जैसे देश में दवाओं का बाजार 60 से 70 हजार करोड़ का सालाना है। यह दुनिया का एक फीसदी है।

दवा के व्यापार को यूरोेपीय देश तथा उत्तरी अमेरिका संचालित करती आयी और इसका दबदबा कायम रहा। बाद के वर्षों में भारत ने दवा के क्षेत्र में कामयाबी हासिल की। दवा निर्माण में भारत तीसरे नम्बर पर है। दुनिया की 8 फीसदी दवाओं का निर्माण भारत में होता है। इसके बावजूद 20 से 40 फीसदी लोगों को ही दवा उपलब्ध हो पाती है। हिन्दुस्तान में दवाओं के दाम अधिक थे उसे आयात कर लाया जाता था और मनचाहे दामों पर बेची जाती थी। जर्मनी की ओर से तकनीक मिली। पहली बार जर्मन के सहयोग से भारत के ऋषीकेश में ‘आईपीडीएल’ नाम से दवा कम्पनी स्थापित की गई जो अब खण्डहर है। बाद के वर्षों में अमेरिकी बाजार का भारत में प्रसार बढ़ा और वे देश में छा गई।

उन्होंने कहा कि महँगी दवाइयों के मद्देनजर संसद की ‘हाथी कमेटी’ की रिपोर्ट पर 1978 में नई दवा नीति बनाई गई जिसमें तय हुआ कि हिन्दुस्तान की कम्पनियों को मदद किया जाए और विदेशी कम्पनियों को बाहर रखा जाए। सस्ती दवाएँ बनने के बाद भारत को ‘गरीब देशों की दवा की दुकान’ कहा जाने लगा क्योंकि यहाँ से एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिकी देशों में सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। सबसे बड़ी त्रासदी है कि देश का 60 फीसदी तबका दवाओं से वंचित है। बदले हालातों में भारतीय कम्पनियाँ दवाओं के निर्माण की बजाय सिर्फ व्यापार में लिप्त हैं जिससे चीन का दवा बाजार पर कब्जा बढ़ा है। उन्होंने मूल्य नियंत्रण, अपराधीकरण, दवा के नाम पर जहर आदि के सवाल उठाये।

उन्होंने कहा कि राजनीति का हिस्सा असमानता है। यह राजनीति निर्धारित करती है। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जैन ने मिश्रित अर्थव्यवस्था और उसके दुष्परिणाम को रेखांकित करते हुए कहा कि इसका असर स्वास्थ्य सेवा पर पड़ा है। मंदी के दौर में स्वास्थ्य के क्षेत्र को खरीदने और बेचने की वस्तु बनाकर रख दिया। भारत में जनस्वास्थ्य की स्थिति टूटी साईकिल की तरह है। स्वास्थ्य के बजट में लगातार कटौती कर यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज करने और प्राइवेट सेक्टर में पैसा लगाने की बात की जा रही है।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के यशवंत सिंह ने मीडिया और उसकी बीमार मानसिकता को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अब कम उम्र में ही पत्रकारों को हार्टअटैक आने लगे हैं। सरकार ने वेज बोर्ड बनाया, लेकिन उसकी सिफारिशों को लागू नहीं करवा पा रही है। मीडिया निजी अस्पतालों की पक्षधर बन गयी है और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का विकृत चेहरा मीडिया में पेश किया जाता रहा है। इस साजिश को समझना होगा।

आशुतोष सिंह ने कहा कि दवा के क्षेत्र में ब्रांड की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने लागत और अकूत मुनाफा की प्रवृति का पर्दाफाश किया। अध्यक्षीय उद्गार व्यक्त ​करते हुए चर्चित पत्रकार प्रसून लतांत बोले काम के अधिकार,​ शिक्षा के अधिकार की तरह स्वास्थ्य के अधिकार की भी लड़ाई लड़ी जानी चाहिए।

आउटलुक की एसोसिएट एडीटर भाषा सिंह ने व्यापम से लेकर अन्य सवालों को रखा। उन्होंने इस बात पर चिन्ता का इजहार किया कि मीडिया में लोकतांत्रिक और बुनियादी मसले हाशिये पर चले गए हैं। प्रदीप सुरीन ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मनमानेपन को नियंत्रित करने की नीति पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि 50 फीसदी सांसद उनकी मुट्ठी में हैं। आबादी के लिहाज से डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टॉफ की कमी है।

साकेत दूबे ने कहा कि भोपाल गैस त्रासदी और उसके बाद निजी अस्पताल खुलने की साजिशों का खुलासा किया। पत्रकार विद्यानाथ झा ने संवेदनशीलता के हनन का मामला उठाया तो उमाशंकर मिश्र ने राजनीतिक ढाँचा पर सवाल खड़ा किया। वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी से सवालों के जरिए संवाद करते हुए विकास संवाद के सचिन जैन ने जनस्वास्थ के उन गम्भीर पक्षों पर चर्चा की जिसे आमतौर पर दरकिनार कर दिया जाता है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र ने देश में स्वास्थ और चिकित्सा की दुर्दशा और इसमें हो रही लूट को विभिन्न उदाहरणों से सभागार में रखा खासकर सरोगेसी और महँगी चिकित्सा से वंचित,पीड़ित आम आदमी की व्यथा को।

दूसरे दिन के सत्र में महिला स्वास्थ्य और मीडिया पर चर्चा की गयी। चर्चा में भाग लेते हुए संदीप नायक ने कहा कि मीडिया में महिलाओं के स्वास्थ्य के सवाल को सिर्फ ग्लैमर तक सीमित रखा जाता है। उन्होंने कहा कि कुपोषण तथा अन्य सवाल गौण कर दिए जाते है। पत्रकार अन्नू आनंद ने कहा कि महिलाओं के स्वास्थ्य के नीति आधारित मुद्दे गौण हैं। आज भी प्रसव के लिए ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएँ चारपाई पर लाद कर लायी जा रही हैं। उन्होंने नीतियों के स्तर पर बदलाव की बात की। कुमूद सिंह ने विज्ञापन तथा अन्य सवाल उठाए।

वरिष्ठ पत्रकार कुमार कृष्णन की रिपोर्ट.


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झाबुआ में चिकित्सा-विमर्श : मीडिया को मेडिकल से क्या काम, सेहत से खेल रहे अस्पताल

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योग का नया तरीका “एरियल योग”

योगपैथी, योग मेडिटेशन “द योग चक्र’ सेंटर दिल्ली में पहली बार योग की नई तकनीक ‘एरियल योग हैं, जो स्वास्थ्य के साथ-साथ शरीर को सुंदरता भी प्रदान करती है। योग गुरु कविता और मनीषा ने कहा की हाल ही में प्रदर्शित हुई हिन्दी फिल्म ‘हैपी न्यू ईयर’ में दीपिका पादुकोण ने लवली गीत में एरियल योग का ही प्रदर्शन किया था। इससे शरीर में लचकता के साथ-साथ कई बीमारियों से छुटकारा भी मिलेगा। 

यह योग शरीर को रेशम के कपड़े में लपेट कर एवं लटक कर किया जाता है। दरअसल इस योग में छत पर एक हुक पर झुला लटका होता है। इस झुले की दो रस्सियों के माध्यम से उल्टा लटका जाता है। रस्सियों में जंघा और पेट का हिस्सा ही फंदेनुमा बंधा होता है और फिर व्यक्ति इस तरह उल्टे लटकर ही झुला झुलता है। इस योग को करने वाले का सिर जमीन से लगभग 3 से 4 फिट उँचा होता है। कुछ देर झुलते रहने के बाद ‍विश्राम किया जाता है। विश्राम करने के बाद आप इसे अपनी क्षमता अनुसार फिर से शुरू कर सकते हैं।इसके लाभ बताए जाते हैं कि यह थुलथुले पेट को बहुत ही तेजी से समतल और कमर को झरहरा बना देता है साथ ही यह चेहरे की झाइयां मिटाकर उसमें कसावट भर देता है। आंखों के नीचे का कालापन मिटा देता हैं और चेहरे की त्वचा को पुन: जवान बना देता है। साथ ही यदि किसी को आर्थराइटिस जैसी समस्या है तो उसे भी दूर करने में कारगर है।

भारतीय संस्कृति में योग के महत्व को देखकर और उसे अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाने के लिए ग्रेटर कैलाश – 2 में ‘द योग चक्र’ संस्था की शुरुआत की गई है। कविता दास और मनीषा  ने इसकी औपचारिक घोषणा  करते हुए बताया कि यह संस्था न सिर्फ योग का प्रशिक्षण  देगी बल्कि इसके साथ ही इसमें नृत्य, संगीत और कला के साथ बोलना भी सिखाया जाएगा। कविता ने योग के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि योग एक संस्कृति का नाम है जो लोगो के शरीर को हवा से बाते करने की कला सिखाती है।

योग चक्र की प्रशिक्षिका कविता दास ने बताया कि उन्होने कविता के साथ लगातार एथिलीट, सेवानिवृत्त लोगो के साथ ऑफिस में काम करने वालों के स्वास्थ्य  में सुधार करने के लिए काम कर रहे है, इसके साथ ही उन्होने कहा कि यह काम लगातार हमे प्रेरणा देता रहता है। कविता ने अपने प्रयास के बारे में बताते हुए कहा कि वो हमेशा  से ही लोगो को एक ऐसा स्थान देना चाहती थी जहां वो खुद को परेशानियों  से घिरा हुआ न पाए। संस्थान की दूसरी प्रशिक्षिका  मनीशा ने योग को लेकर अपने विचार बताते हुए कहा कि योग मनुष्यों  को उनकी अन्तरात्मा से जोड़ने का काम करता है, इसके साथ ही उन्होने योग की दूसरी विधा ध्यान के बारे में बताया कि यह अपने आप को समझने और पसन्द करने का सबसे बेहतर तरीका होता है। कविता एक दशक  से भी अधिक समय से लोगो को योग का प्रशिक्षण  देती आई है और इन्होने लोगो को योग सिखाने को ही अपने व्यवसाय  के रूप में चुना है।

मनीषा ने कहा कि संस्थान में कराए जाने वाले योग की विशेषता  को बताते हुए कहा कि योग को सही तरीके से करने पर शारीरिक  सुख के साथ ही यह स्वास्थ्य  के लिए लाभप्रद होता है, इसके साथ ही योग हमारी सुस्त पड़ी इन्द्रियों को फिर से जाग्रत करता है और उनको नई स्फूर्ति प्रदान करने के साथ दिमाग को स्वस्थ बनाता है। तो वहीं योग को लेकर कविता दास ने कहा कि योग हमारी सृजन शक्ति को बढ़ाता है जिससे हमारी सोच में आशावादी  भाव आता है।

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नई तकनीक से घुटने-कूल्हे के ट्रांसप्लांट की उम्र तीन गुना तक बढ़ाना संभव

घुटने और कूल्हे के ट्रांसप्लांट की एक नयी तकनीक आई है, जिसकी मदद से लगाये गए ट्रांसप्लांट की उम्र तीन गुना तक बढ़ाई जा सकती है. इस नयी टेक्नोलॉजी की जानकारी आर्थोपेडिक एंड जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डा. रमणीक महाजन ने दी. डॉक्टर महाजन ने ये जानकारी नवीं एशिया पैसिफिक हिप और घुटना  संगोष्ठी “द ग्रेट एक्सपेक्टेशन २०१५” के दौरान दी. संगोष्टी के दौरान डॉक्टर महाजन ने लगभग ३०० डॉक्टरों को सम्बोधित करते हुए इस नयी तकनीक के बारे में विस्तार से बताया।

ऑर्थो प्लास्टी नमक इस तकनीक में हाइली क्रॉस लिंक्ड पॉलीएथेलेने कंपाउंड का इस्तेमाल किया जाता है, जो ट्रांसप्लांट की उम्र को तीन गुना तक बढ़ा देता है. अर्थात अब तक जो ट्रांसप्लांट 10 साल तक कारगर होते थे, अब वो लगभग 30 साल तक काम करेंगे. इस तकनीक के इस्तेमाल के बाद मरीज को दोबारा ऑपरेशन की दिक्कत नहीं उठानी पड़ेगी। इस अंतर्राष्ट्रीय प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य कूल्हे और घुटने की समस्या से निजात दिलाना और नई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना था। आर्थोप्लास्टी (X-3, Sequentially Irradiated Highly Cross Linked) का उपयोग मुख्यतः कूल्हे या घुटने की सर्जरी के दौरान किया जाता है। इस तकनीक के उपयोग के होने से ट्रांसप्लांट की आयु अवधि में बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। यह एक विशेष प्रकार की पोलिथिन होती है, इसे जॉइंट के बीच में रखा जाता है जिससे रोज़मर्रा की भागदौड़ द्वारा पैदा हुए घर्षण का प्रभाव ट्रांसप्लांट पे कम होता है। इस तकनीक का प्रयोग दिनों दिन देश-विदेश में बढ़ता जा रहा है। वर्तमान समय में इस तकनीक के प्रयोग से 25 से 30 वर्षों तक जॉइंट की समस्या से निजात मिल जायेगा।

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7 स्टार हास्पिटल Medanta Medicity में बहुत ही घटिया एकदम third class खाना मिलता है!

Ajit Singh :  अभी outlook पत्रिका के आखिरी पन्ने पे किन्ही भाईचंद पटेल साहब का संस्मरण पढ़ा जो उन्होंने Medanta Medicity में अपने knee replacement के बारे में लिखा है। देश का सबसे महंगा 7 star हॉस्पिटल है भाया। अच्छा होना ही चाहिए। पर उसके भोजन की बड़ी आलोचना की है उन्होंने। बहुत ही घटिया एकदम third class बताते हैं। लेख पढ़ते मुझे दिल्ली के सफदरजंग hospital का अपना अनुभव याद आ गया। मुझे लगा की उसे आपके साथ शेयर करना चाहिए। सफ़दर जंग हॉस्पिटल में ही है Sports injury centre, दिल्ली सरकार का उपक्रम जिसकी स्थापना दिल्ली के common wealth games के दौरान हुई।

मैंने Medanta भी देखा है और उसके अलावा fortis, Apollo और Escorts भी. मुझे ये कहते हुए ख़ुशी है की SIC, medanta से भी बेहतर है। न सिर्फ medical care में बल्कि साफ़ सफाई, रख रखाव, और care के मामले में भी। मेरे बेटे को जब घुटने में चोट लगी तो उसका ACL रिपेयर कराया हमने SIC में। जिस procedure के लिए मुम्बई के डॉ जोशी 1.25 लाख मांगते हैं वो SIC में सिर्फ 60,000 में हुआ जिसमे 55,000 का double bundle और screw आये और 5000 दवाओं के लगे। इसके अलावा dr की फीस, OT charges और room rent फ्री. जबकि अस्पताल की साफ़ सफाई और doctors और nurses की care तो मुझे इन 7 star hospitals से भी बेहतर लगी।

आपको जान के आश्चर्य होगा कि सरकारी अस्पताल में 7 स्टार सुविधा और सफाई और care? उसका एक कारण है। हॉस्पिटल के HOD डॉ दीपक चौधरी के अलावा सभी डॉक्टर्स, nurses समेत समस्त स्टाफ ठेके पे है. on contract. और Dr Deepak chaudhary का इतना आतंक है कि एक मिनट में लात मार के निकाल देंगे। इसलिए पूरा अस्पताल सुई की नोक पे चलता है। मुझे ये कहते हुए गर्व होता है की SIC हिन्दुस्तान के सबसे अच्छे और महंगे प्राइवेट अस्पताल से भी अच्छा है और मुफ़्त भी। मज़े की बात, यहाँ इलाज कराने के लिए खिलाड़ी होना ज़रूरी नहीं। कोई भी सामान्य नागरिक अपना orthopaedic इलाज करवा सकता है। और आखिरी बात। यहाँ का खाना भी बेहतरीन है। Medanta की तरह कूड़ा नहीं.

पर जैसा कि आप जानते हैं कि अपने Mr ईमानदार युगपुरुष ने कसम खा रखी है की देश का दिवाला निकाल कर ही रहेंगे इसलिए उन्होंने वादा कर दिया है कि दिल्ली में सभी कामगार जो ठेके पे काम कर रहे हैं उनको पक्का कर देंगे। और कर्मचारी अगर पक्का हो जाए तो गया काम से. अगर युगपुरुष की चली तो वो दिन दूर नहीं जब मेट्रो और SIC जैसे संस्थान भी रेलवे और किसी आम सरकारी मुर्दा घर बन जाएंगे।

सोशल एक्टिविस्ट अजीत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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अफॉर्डेबल कीमत पर दो-तीन महीनों में मिलेगी हेपेटाइटिस सी की नई दवा सॉवैल्डी!

(स्वामी मुकेश यादव)


Mukesh Yadav : सॉवैल्डी (Sovaldi) यानी Sofosbuvir (केमिकल नाम) को क्रोनिक हेपेटाइटिस सी (एचसीवी) के उपचार में चमत्कारिक दवा बताया जा रहा है। अमेरिका की दवा निर्माता कंपनी जिलैड साइंसेज ने यह दवा तैयार की है। इस दवा से एचसीवी (जेनोटाइप 1, 2, 3 और 4) पूरी तरह क्योरेबल बताया जा रहा है। एचसीवी का यह पहला, ऑरल ट्रीटमेंट रेजीम (सिर्फ खाने की दावा से इलाज) है; इंजेक्शन की ज़रूरत नहीं होगी! इसके तहत अमूमन रोगी को 12 सप्ताह (उपचार की अवधि इन्फेक्शन की इंटेंसिटी पर निर्भर करती है) तक बस एक टेबलेट रोज खानी होती है। अमेरिका में यह दवा पिछले साल ही बाजार में उपलब्ध हो गई थी। हालांकि दवा की कीमत वहां आश्चर्य जनक रूप से महंगी है। सॉवैल्डी की सिर्फ एक गोली $1000 यानी करीब 62 हजार की है! 12 सप्ताह का कोर्स $84000 है!

भारत में पिछले साल सितम्बर-अक्टूबर में जिलैड साइंसेज ने सॉवैल्डी का बहुप्रतीक्षित ट्रायल शुरू कराया था। ट्रायल से जुड़े चिकित्सकों और अस्पतालों ने पिछले करीब एक वर्ष से कुछ रोगियों को ट्रायल में शामिल होने के लिए आश्वासन दिया हुआ था। इसके चलते बहुत से रोगियों ने कोई दूसरा उपचार भी शुरू नहीं किया (किसी भी तरह का कोई दूसरा उपचार न लेना ट्रायल में इलाज के लिए पहली शर्त थी)। लेकिन जब ट्रायल शुरू हुआ तो उसमें खेल हो गया। प्रतीक्षारत मरीजों की अनदेखा कर दी गई और परिचितों, प्रभावशालियों के परिजनों को तरजीह दी गई। लेकिन जो पीड़ित इस ट्रायल में छूट गए थे और दूसरे लाखों एचसीवी रोगियों के लिए एक सुखद खबर यह है कि अगले दो-तीन महीनों में उक्त दवा का जेनेरिक वर्जन भारत में उपलब्ध होने की उम्मीद है। पहले इस दवा के 2015 के अंत तक या ज्यादा से ज्यादा इस वर्ष के मध्य तक भारत में उपलब्ध होने की उम्मीद जताई जा रही थी; लेकिन अब मार्च-अप्रैल तक सॉवैल्डी के मिलने की सम्भावना है।

गौरतलब है कि जिलैड सांइसेज को भारत में एचसीवी की इस नई दवा पर अभी तक पेटेंट नहीं मिल सका है। इसी का नतीजा है कि भारत में यह दवा अफॉर्डेबल कीमत पर उपलब्ध हो सकेगी। कंपनी के मुताबिक फिलहाल भारत में वह $300 प्रति माह के प्राइस पर दवा उपलब्ध कराएगी। इस बाबत पिछले साल ही जिलैड ने भारत की सिप्ला, रैनबेक्सी समेत सात दवा कंपनियों के साथ एक समझौता किया है। इसके साथ ही सॉवैल्डी की कालाबाजारी और धोखाधड़ी का खेल भी शुरू हो गया है! जानकारों के मुताबिक़ कुछ एजेंट एडवांस में दवा बुक कराने और बाजार में उपलब्ध होने से पहले ही दवा लाकर देने के नाम पर मोटा पैसा एचसीवी पीड़ितों से जमा करा रहे है। सावधान रहें और अगर संभव हो तो खुले बाजार में दवा उपलब्ध होने का इंतज़ार करें।

स्प्रीचुवल गुरु और जर्नलिस्ट मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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मुंह में रखा गुटखा, तंबाकू कहां गायब हो जाता है?

मैं ऐसे बहुत से लोगों से मिलता हूं जिन्हें लगता है कि अगर वे धूम्रपान नहीं कर रहे हैं, बीड़ी-सिगरेट को छू नहीं रहे हैं तो एक पुण्य का काम कर रहे हैं…फिर वे उसी वक्त यह कह देते हैं कि बस थोड़ा गुटखा, तंबाकू-चूना मुंह में रख लेते हैं…और उसे भी थूक देते हैं, अंदर नहीं लेते। यही सब से बड़ी भ्रांति है तंबाकू-गुटखा चबाने वालों में.. लेकिन वास्तविकता यह है कि तंबाकू किसी भी रूप में कहर तो बरपाएगा ही। जो तंबाकू-गुटखा लोग मुंह में होठों या गाल के अंदर दबा कर रख लेते हैं और धीरे धीरे चूसते रहते हैं, इस माध्यम से भी तंबाकू में मौजूद निकोटीन एवं अन्य हानिकारक तत्व मुंह की झिल्ली के रास्ते (through oral mucous membrane)शरीर में निरंतर प्रवेश करते ही रहते हैं।

और शरीर में जो निकोटीन अंदर जाता है, वह चाहे किसी भी रूट से जाए, वह दिल, दिमाग एवं नाड़ियों की सेहत के लिए बराबर ही खतरनाक है। यह बात समझनी बेहद ज़रूरी है।  शायद ही शरीर का कोई अंग हो जो इस हत्यारे की मार से बच पाता हो। शरीर में पहुंच कर तो यह उत्पात मचाता ही है, शरीर के िजस रास्ते से यह बाहर निकलता है (एक्सक्रिशन – excretion) उन को भी अपनी चपेट में ले लेता है।

ज़ाहिर सी बात है कि तंबाकू शरीर के अंदर गया है तो इस के विषैले तत्व बाहर तो निकलेगें ही ही… और पेशाब के रास्ते से भी ये बाहर निकलते हैं। यह तो एक उदाहरण है… तंबाकू का बुरा प्रभाव शरीर के हर अंग पर होता ही है। मेरी नानी के दांतों में दर्द रहता था…किसी ने नसवार लगाने की सलाह दे दी…..नसवार (creamy snuff, पेस्ट जैसे रूप में मिलने वाला तंबाकू)….इस की उन्हें लत लग गई….नियमित इस्तेमाल करने लगीं….अचानक पेशाब में खून आने लगा..जांच होने पर पता चला कि मसाने (पेशाब की थैली – urinary bladder) का कैंसर हो गया है, आप्रेशन भी करवाया, बिजली (radiotherapy) भी लगवाई लेकिन कुछ ही महीनों में चल बसीं। पीजीआई के डाक्टरों ने बताया कि तंबाकू का कोई भी रूप इस तरह की बीमारियों भी पैदा कर देता है।

बस यह पोस्ट तो बस इसी बात को याद दिलाने के लिए ही थी कि तंबाकू किसी भी रूप में जानलेवा ही है……..अब जान किस की जायेगी और किस की बच जाएगी, यह पहले से पता लगा पाना दुर्गम सा काम है…..वही बात है जैसे कोई कहे कि असुरक्षित संभोग करने वाले, बहुत से पार्टनर के साथ सेक्स करने वाले सभी लोगों को थोड़े ना एचआईव्ही संक्रमण हो जाता है, बहुत से बच भी जाते होंगे……ठीक है, शायद बच जाते होंगे कुछ…….लेकिन मुझे दुःख इस बात का होता है कि पता है कि तंबाकू ने अगर एक बार शरीर के किसी अंग में उत्पात मचा दिया तो फिर अकसर बहुत देर हो चुकी होती है….ऐसे में भला क्यों किसी लफड़े का ही इंतज़ार किया जाए।  यही बातें रोज़ाना पता नहीं कितनी बार ओपीडी में बैठ कर रिपीट की जाती हैं, लेकिन कोई सुनता है क्या?…. शायद, लेकिन तभी जब कोई न कोई लक्षण शरीर में दिखने लगते हैं।

डा. प्रवीण चौहान के ब्लाग ‘मीडिया डाक्टर‘ से साभार.

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