पत्रकारों की शहादत, बेशर्म सियासत

सारी दुनिया में पत्रकारों के सिर पर 24 घंटे मौत का साया मंडराता रहता है। कलम पर हमले जारी हैं। भारत के कई राज्यों में स्थिति बेहद संवेदनशील है। खासकर उत्तर प्रदेश में पत्रकार बेखौफ होकर काम नहीं कर पा रहे हैं। सत्ता और कानून के पहरेदारों (पुलिस) की संगीने हर पल कलम का पीछा कर रही हैं। बात अस्सी के दशक से शुरू करते हैं। मैं ग्रुजुएशन करके निकला था। दिल्ली के नवभारत टाइम्स, दिनमान और असली भारत के अलावा बांदा से छपने वाले दैनिक मध्ययुग, कर्मयुग और बम्बार्ड में लिखने लगा था। इस दशक की वो काली तारीख अब मुझे याद नहीं है, जब बबेरू कस्बे में तत्कालीन दरोगा अरुण कुमार शुक्ला के इशारे पर भुन्नू महाराज एंड कंपनी ने दैनिक जागरण कानपुर के तत्कालीन संवाददाता और मध्ययुग के संपादक सुरेशचंद गुप्ता की दिनदहाड़े लाठियों से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। वर्ष जरूर मुझे याद है-1983। सुरेश चंद गुप्ता का कुसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने पुलिस के फर्जी एनकाउंटर की रिपोर्ट छापी थी।

सुरेश चंद गुप्ता की शहादत का समाचार सुबह जब अखबारों में छपा तो पूरे बांदा जिले में आग लग गई। और अगले दिन यह खबर राजधानी दिल्ली से छपने वाले हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अखबारों की सुर्खी बनी तो तूफान मच गया। धरना-प्रदर्शन का सिलसिला पूरे दो माह चला। देश-दुनिया का मीडिया बांद पहुंच गया। इसकी वजह यह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में इलाहाबाद के केके तिवारी मंत्री थे। वो इंदिरा गांधी के आंखों के तारे थे। और सुरेश की हत्या का दोषी दरोगा अरुण शुक्ला तिवारी का भांजा था। बांदा में तब एसपी एके बनर्जी थे। शुक्ला भूमिगत हो गया था। भुन्नू महाराज एंड कंपनी को पुलिस ने अपनी गाड़यों से दूसरे शहर में शिफ्ट कर दिया था। मुख्यंत्री श्रीपति मिश्र होते थे। आंदोलन की आग पूरे देश में भड़क गई थी। बांदा का बच्चा-बच्चा इसमें कूद गया था। बांदा, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पत्रकार संगठनों के नेता अनशन पर बैठ गए थे। इन सालों में मुझे नहीं याद कि इतना तगड़ा आंदोलन और किसी पत्रकार की शहादत पर हुआ हो। 

तब की प्रमुख पत्रिकाओं और साप्ताहिक अखबारों दिनमान, रविवार, ब्लिटज, करंट के कई अंकों में आंदोलन की लपटों की खबर चस्पा हुई। बसें रोकी गईं। ट्रेन रोको आंदोलन हुए थे। और जनदबाव के कारण इंदिरा गांधी ने तिवारी को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया। तब दरोगा और उसके खासमखास भुन्नू महाराज एंड कंपनी की गिरफ्तारी हुई। मुकदमें की परिणतिः  कोर्ट से शुक्ला को आजीवन कारावास और भुन्नू महाराज एंड कंपनी को 20 साल को सजा हुई। शुक्ला को कभी जमानत नहीं मिली। कहते हैं वह जेल में पागल हो गया था और उसकी मौत कारागार में ही हुई। सुरेश गुप्ता की शहादत के सालों साल तक पत्रकारों पर नेता और पुलिस हमले कराने से डरने लगे थे। मगर छह साल बाद फिर वही शुरू हो गया। मसलन एक और पत्रकार साथी की जान ले गई। वो थे उमेश डोभाल। 

यह बात 1989 की है। उत्तर प्रदेश में समाजवादियों की सरकार ही थी। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। उत्तराखंड नहीं बना था। पहाड़ के प्रखर पत्रकार उमेश डोभाल की शराब माफिया के इशारे पर हत्या कर दी गई थी। माफिया को कथित तौर पर नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। उमेश की हत्या के विरोध में भी पूरे देश में आंदोलन हुआ था। आरोपी पकड़े भी गए पर उन्हें कड़ी सजा नहीं हो पाई। ऐसा नहीं है कि इसके बाद पत्रकारों के मारे जाने का सिलसिला रुका। वह जारी रहा। विरोध के इक्का-दुक्का स्वर दिखाई पड़े। इसकी वजह यह कि हममें से ही कुछ पत्रकार नेता-मंत्रियों और पुलिस अफसरों के चम्पू बन गए। इस तिकड़ी ने सच की पत्रकारिता करने वाले कलमकारों के सिर कलम कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यह शाहजहांपुर में सामने आया है।  

शाहजहांपुर में जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जलाकर मार डाला गया। जगेंद्र हत्याकांड में अखिलेश सरकार के मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा, इंस्पेक्टर प्रकाश राय समेत कई खिलाफ धारा 302 और 120 बी का मुकदमा दर्ज हुआ है। शहीद पत्रकार की हत्या के आरोपी पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री वर्मा की गिरफ्तारी नहीं की गई है। कांग्रेस ने सीबीआई जांच की मांग की है। जगेंद्र की हत्या के बाद भी कलम पर हमले जारी हैं। कानपुर में पत्रकार दीपक पर जानलेवा हमला हो चुका है। अमर उजाला बस्ती के जिला प्रभारी धीरज पांडेय भी जिंदगी से जूझ रहे हैं। आरोप है कि बांसी के पूर्व विधायक सपा नेता लालजी यादव के गुर्गों ने पांडेय की बाइक पर सफारी चढ़ा दी।  

इस बारे में शाहजहांपुर से लाइव रिपोर्ट करने वाले पत्रकार सौवीर ने अपनी फेसबुक वाल पर बिलकुल सही टिप्पणी की है। वो कहते हैं, बेशर्मी की सारी सीमाएं तोड़ दीं हैं शाहजहांपुर के पत्रकारों ने। जो पत्रकार था, उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं थी यह पत्रकार बिरादरी और जो पत्रकार नहीं हैं, उन्हें जबरिया पत्रकार का तमगा देने पर आमादा थे यही लोग। पत्रकारिता के नाम पर कलंक बने इन्हीं हत्यारेनुमा पत्रकारों ने पुलिस, अफसर, नेता और मंत्री की चौकड़ी तैयार कर ऐसा जाल बुना कि जगेंद्र को शिकंजे में जकड़ कर दिनदहाड़े पेट्रोल डालकर जिंदा फूंक दिया गया। पत्रकार श्रीकांत अस्थाना जगेंद्र की शहादत से आहत हैं। वो कहते हैं ऐसी घटनाएं प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर कलंक हैं। यूपी में जंगलराज है। आरोपी मंत्री व अन्य को जेल के अंदर होना चाहिए। हत्याकांड में शामिल पुलिसवालों को नौकरी से बाहर करने की जरूरत है। यह वक्त चुपचाप बैठने का नहीं है। हमें सुरेश गुप्ता की शहादत को याद करते हुए जगेंद्र की आत्मा की शांति के लिए कातिलों को जेल के अंदर पहुंचाने के लिए लामबंद होना होगा।

मुकुंद के फेसबुक वाल से



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप ज्वाइन करें-  https://chat.whatsapp.com/JYYJjZdtLQbDSzhajsOCsG

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate

भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849



Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code