रोते क्यों हो दुनिया के पहरेदारों

भारत में कुछ स्वयंभू हितैषी और संगठनों को छोड़ दें, तो ना तो पत्रकारों का कोई अधिकृत संगठन है और ना ही उनके हितों की रक्षा करने वाली कोई संस्था। लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाने वाली अमेरिकी संस्था कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ने पिछले दिनों एक सूची जारी की थी। इसमें उन देशों को शामिल किया गया है जहां हाल फिलहाल में या तो पत्रकारों पर हमले बढ़ गए हैं या नियमित होते रहते हैं। सूची में शामिल पहले 15 देशों में भारत भी मौजूद है। भारत 11वें स्थान पर है। जबकि पहले भारत 14वें स्थान पर था। इससे साफ जाहिर हो जाता है कि भारत में पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं। ये बेहद अफसोसनाक स्थिति है। जो मीडिया, देश-दुनिया का ठेका लिए बैठा है, खुद वो असुरक्षित होते जा रहा है। मीडिया में काम करने वालों में हमेशा असुरक्षा की भावना बनी रह रही है।

यूपी के शाहजहांपुर में पत्रकार जोगिंदर और मध्य प्रदेश में संदीप की हत्या ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अप्रत्यक्ष रूप से प्यार से दी जाने वाली धमकियां, प्रत्यक्ष रूप में इस रूप में सामने आ जाएंगी, कौन जानता था। इन मौतों ने मुंबई में मारे गए पत्रकार जे डे की हत्या की यादें ताजा करा दी। कैसे तेल माफिया के खिलाफ खुलासा करने वाले डे की नृशंस हत्या कर दी गई थी।  

सवाल उठता है कि आखिर जिस मीडिया को समाज का प्रहरी माना जाता है, समाज का मुख पत्र माना जाता है, जिसे लोकतंत्र का चैथा खंभा माना जाता है, उसके खिलाफ ये सोच कहां से विकसित होती जा रही है। उन पर हमले होने के पीछे वो कौन सी ताकतें हैं, जिन्हें ये कुकृत्य करने में जरा भी डर नहीं लगता। जबकि मीडिया वालों की पहुंच मंत्री से लेकर संत्री तक मानी जाती है। ये मान कर चला जाता है कि प्रशासनिक अमला भले ही आम लोगों की शिकायत नहीं सुनता, लेकिन मीडिया वालों के साथ थोड़ी भी उंच नीच हो जाती है तो फौरी कार्रवाई की जाती है। इसके पीछे अच्छे संबंध या उनके कार्य के प्रति सम्मान या एक दूसरे को ऑबलाइज करने की भावना कुछ भी हो सकती है। इस का असर ये होता है कि मीडियाकर्मी मुगालता पालने लगते हैं कि उनके साथ तो कुछ हो ही नहीं सकता। उन्हें समाज में एक अलग दर्जा मिला हुआ है। प्रशासन तो उनके पीछे है ही। इसलिए वो बिना डर, बिना झिझक अपने काम को अंजाम देने में लगे रहते हैं। सच्चाई को उजागर करने में जुनून की हद तक पहुंच जाते हैं।

लेकिन इसका स्याह पक्ष ज्यादा चैंकाने वाला और वास्तविकता के ज्यादा करीब है। इसके पुख्ता करता है उसका संस्थान। जो उसका हो कर भी कई मामलों में उसका नहीं होता। फर्ज कीजिए, दिन-रात की भागदौड़ करने के बाद वो कोई खबर लाता है। लेकिन उस खबर को उसके संस्थान में तरजीह नहीं दी जाती। बाइलाइन तो छोडि़ए कई बार वो खबर दिखाई भी नहीं जाती। ऐसा खास कर तब होता है जब खबर लीक से हट कर और रचनात्मक होती है। लिहाजा, अच्छी और सकारात्मक खबर से इतर धीरे धीरे उसका ध्यान नेगेटिव, अपराध और हार्डकोर खबरों की तरफ बढ़ने लगता है। नतीजतन, वो ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि कई बार उसे खबर नहीं भेजने की एवज में कई तरह की सेटिंग का ऑफर मिलने लगता है। कई बार उसका संस्थान ही उसके साथ खड़ा नजर नहीं आता। ऐसे में बात बन जाती है तो ठीक नहीं तो फिर धीरे धीरे टकराव वाली स्थिति सामने आने लगती है। क्योंकि कई बार जिसके खिलाफ खबर भेजी जा रही होती है, वो संस्थान में बैठे आला अधिकारी तक अपने संपर्क सूत्र तलाश लेता है, जिनके पास खबर चलाने या दिखाने का अधिकार होता है। ऐसी सूरत में, पत्रकार अपने स्तर पर भी वही करने लगता है, जो उसके संस्थान में बैठा बॉस कर रहा होता है। यहीं पर गड़बड़ी शुरू हो जाती है। जब तक भरोसा कायम रहता है, दोनों पक्ष फलते-फुलते रहते हैं। जब दोनों पक्षों के बीच आम राय नहीं बन पाती यानि कि न्यूनतम साझा समन्वय, तो बात बिगड़ जाती है। जो बाद में धमकी या हमला या कभी-कभी हत्या के रूप में सामने आती है। 

सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है इसकी। मीडिया के अलावा किसी दूसरे सेक्टर में इस तरह की नौबत क्यों नहीं आती। आई टी ले लीजिए, सर्विस ले लीजिए, मैन्युफैक्चरिंग ले लीजिए। हालांकि इनमें भी कई बार इस तरह के मामले सामने आते हैं, लेकिन उसकी वजह या तो आपसी रंजिश होती है या फिर भ्रष्टाचार और अनियमितता के खिलाफ वॉचडॉग बनने वाली स्थिति। पर मीडिया के केस में तो मामला ही दूसरा है। यहां जिसके खिलाफ आप खबर करते हैं, ना तो उस व्यक्ति से आपका सीधा संबंध होता है ना ही किसी संस्थान से। ना ही किसी तरह की आपसी रंजिश। यहां तो सच्चाई और वास्तविकता को सामने लाने के चक्कर में मामला बिगड़ता है। जबकि वास्तव में ये खबर किसी व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि व्यवस्था के खिलाफ होता है। व्यवस्था में गड़बड़ी चाहे शर्माजी करें या वर्माजी, मीडिया को वो दिखाना ही है, सामने लाना ही है। ठीक उसी तरह चाहे ए कुमार हों या बी कुमार, सच्चाई को सामने लाने वाली खबर को कवर करना ही है। बावजूद, मनुष्य के स्वभाविक गुण की वजह से ये निजी रंजिश में तब्दिल हो जाता है। 

एक और बात का जिक्र करना यहां जरूरी है कि इस तरह की परिस्थितियां बनने के पीछे वजह क्या है। क्यों कई बार कोई पत्रकार, असली पत्रकारिता के लिए सच से भीड़ जाता है तो कई बार वही पत्रकार सच जानने के बावजूद, समझौता कर बैठता है। तो इसके पीछे, मीडिया की खोखली, अपारदर्शी और सिद्धांतविहिन होती जा रही कार्यप्रणाली ही है। सबसे पहली चीज, मीडिया हाउसेज में होने वाली नियुक्तियां कभी भी पारदर्शी नहीं होती। कोई भी मीडिया संस्थान नियुक्तियों और उसकी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक नहीं करता, इक्का दूक्का मामला छोड़ दें तो। खास तौर से पत्रकारों की नियुक्तियों में। अगर किसी संस्थान में आपका कोई अपना सूत्र नहीं है तो आपको भनक तक नहीं लगेगी कि किसी संस्थान में नियुक्तियां होने वाली है। अगर किसी तरह पता चल भी गया तो, जब तक संस्थान के अंदर आपका अपना सूत्र प्रभावशाली पद पर नहीं होता, आपकी नियुक्ति असंभव है। हालांकि यहां भी इक्का दूक्का ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जब आपके टैलेंट को वास्तव में पहचाना जाता है। क्योंकि संस्थान में काम करने वाले भी तो होने चाहिए। 

खैर, पत्रकार की नियुक्ति येन केन प्रकारेण हो गई तो फिर मामला उसके पगार और उसके नौकरी के स्थायी बने रहने पर आ टिकती है। कुछ बड़े मीडिया घराने और कुछ उपर के अच्छे पदों को छोड़ दें तो मीडियाकर्मियों की पगार कभी भी इतनी नहीं होती कि वो तनावरहित हो कर पूरी ईमानदारी के साथ सिर्फ और सिर्फ अपने काम को अंजाम देने में लगा रहे। अपना बेहतरीन अपने संस्थान को दे। प्रतिकुल परिस्थितियों में भी वो यदि ऐसा कर पाता है तो सिर्फ इसलिए कि उसकी नौकरी बची रहे। ऐसा कर पाता है तो सिर्फ अपने पत्रकारिता के जुनून की वजह से। 

इतना ही नहीं, तमाम संस्थानों में एक नई कार्य संस्कृति भी प्रचलन में है। ये है स्ट्रींगरशीप। क्या इलैक्ट्रॉनिक, क्या प्रिंट। राजधानियों या कुछ बड़े शहरों को छोड़ दें तो देश के ज्यादातर हिस्से में मीडिया की पत्रकारिता इन्हीं अस्थायी पत्रकारों पर है। जिन्हें उनके प्रति खबर की एवज में मेहनताना दिया जाता है। कई मामलों में तो महिनों तक एक भी पाई उन्हें मयस्सर नहीं होती। लिहाजा वो एक साथ कई-कई संस्थानों के लिए काम कर रहे होते हैं। ताकि एक संस्थान उन्हें पैसे ना दे तो कम से कम दूसरा तो दे ही दे। इसका असर ये भी होता है कि वो पत्रकारिता के अलावा जिविकोपार्जन के लिए दूसरे धंधे में भी मशगुल हो जाते हैं। जो अपने निजी व्यवसाय से लेकर खबरों के मार्फत ब्लैकमेलिंग तक कुछ भी हो सकता है। खबर चलवाने के लिए भी और खबर रूकवाने के लिए भी, तोल मोल होते रहता है। फिर कई बार ऐसा भी होता है कि उनका अपना निजी व्यवसाय इतना अच्छा चल जाता है कि पत्रकारिता उनके लिए प्राथमिकता रह ही नहीं जाती। ऐसी हालत में कई बार अपनी पहचान बनाए रखने के लिए, अपना काम निकालने के लिए और अपने वाहनों पर प्रेस लिख, दूसरों पर धौंस जमाने भर के लिए पत्रकारिता बची रह जाती है। 

अभी तो, जे डे, संदिप और जोगिंदर जैसे उंगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम हैं हमारे पास। जिनके लिए हमने कैंडल मार्च कर लिया है। ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल जाए। लेकिन असल में उन आत्माओं को शांति तभी मिलेगी जब पत्रकारिता की पवित्रता को बचाए रखने के लिए, उसकी आत्मा को अमर बनाए रखने के लिए मीडिया घराने अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएंगे। सही मायने में जिस दिन हम सच्ची पत्रकारिता करने लगेंगे, उस दिन काबिल भी होंगे और सफल भी। तब रेवेन्यू भी झक मार कर पत्रकारिता के पीछे आएगी। जिसके लिए मीडिया ने अपने सभी सिद्धांतों को तिलांजली दे रखी है। 

लेखक-पत्रकार पंकज कुमार पांडेय से संपर्क : 9350085257, pankajpandeyjsr@gmail.com



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