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अगर सरला मिश्रा की मौत के मामले में 28 साल बाद जांच दोबारा हो सकती है तो जस्टिस लोया की मौत के बारे में 11 साल बाद दोबारा जांच क्यों नहीं हो सकती?अगली सरकार ध्यान रखे!

न्याय की पुनर्परिभाषा — जस्टिस लोया की मौत की जांच फिर से क्यों नहीं?

हाल ही में, मध्य प्रदेश की एक अदालत ने कांग्रेस नेता सरला मिश्रा की 1997 में हुई रहस्यमयी मौत के मामले की पुनः जांच का आदेश दिया है। 28 वर्षों बाद यह निर्णय उनके भाई अनुराग मिश्रा की याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने पहले की जांच को अधूरी बताया।

इस घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में, यह प्रश्न उठता है: यदि 28 साल पुराने मामले की जांच फिर से हो सकती है, तो क्या 2014 में हुई विशेष सीबीआई न्यायाधीश बी.एच. लोया की संदिग्ध मौत की पुनः जांच संभव नहीं है?

जस्टिस लोया, जो सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे, की मृत्यु नागपुर में एक सहकर्मी की बेटी की शादी में भाग लेने के दौरान हुई। सरकारी रिपोर्टों में इसे हृदयगति रुकने से हुई प्राकृतिक मृत्यु बताया गया। हालांकि, उनके परिवार और कुछ पत्रकारों ने इस पर सवाल उठाए, जिससे मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। 2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की विशेष जांच टीम (SIT) से जांच की याचिकाओं को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि याचिकाएं राजनीतिक प्रेरणा से प्रेरित थीं। 

इसके बावजूद, महाराष्ट्र सरकार ने संकेत दिए हैं कि यदि कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किया जाता है, तो वे मामले की पुनः जांच पर विचार कर सकते हैं। 

जब न्यायपालिका और सरकारें पुराने मामलों की पुनः जांच के लिए तैयार होती हैं, तो यह अपेक्षा की जाती है कि सभी संदिग्ध मामलों को समान रूप से देखा जाए। जस्टिस लोया की मौत जैसे संवेदनशील मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास बना रहे।

आगामी सरकारों को चाहिए कि वे इस मामले को पुनः जांचने पर विचार करें, ताकि सभी पक्षों को न्याय मिल सके और लोकतंत्र की नींव मजबूत हो।

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