कालिया जी धुर काँग्रेसी थे और मेरी छवि काँग्रेस विरोधी की थी

Sant Sameer : भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक और एक विशाल पाठक वर्ग के चहेते साहित्यकार रवीन्द्र कालिया जी के देहावसान के कई दिन बाद आज जाकर यह मानसिकता बना पा रहा हूँ कि बतौर श्रद्धांजलि उनकी याद में अपने दिल की कुछ बातें बयान करूँ। असल में, मेरी भी मानसिक बनावट कुछ अजीब सी है। परिचितों का दायरा तो सबका ही आमतौर पर बहुत बड़ा होता है, पर नज़दीकी रिश्ते कम ही लोगों से बन पाते हैं।

मेरे साथ अक्सर यह होता है कि मैं जिसे नज़दीकी मानना शुरू करता हूँ तो उसे दरअसल अपने परिवार के किसी छोटे-बड़े सदस्य के मानिन्द भी महसूस करने लगता हूँ। ऐसे में ऐसा कोई अज़ीज़ अचानक संसार छोड़ जाए तो अपनी हालत पशोपेश वाली हो जाती है। अगर तुरन्त मेरी कुछ ख़ास मदद की ज़रूरत न हो तो दाह-संस्कार तक में जाने से बचता हूँ। मेरी दादी, जो मुझे बेहद मानती थीं, जब एक सौ पन्द्रह साल की उम्र में एक दिन अचानक यह दुनिया छोड़ गईं तो मैं हतप्रभ था और दाह-संस्कार गुज़र जाने के बाद ही घर पहुँचा। सबके लिए मशहूर साहित्यकार, पर मेरे लिए चित्रा दीदी (चित्रा मुद्गल) ने जब एक दिन सूचना दी कि–अवध (चित्रा जी के पति और सारिका के सम्पादक रहे अवध नारायण मुद्गल) तुम्हारी कुछ चीज़ें पढ़कर तुम्हें बहुत याद कर रहे थे…तो मैं और मेरी पत्नी ने बड़े मन से तय किया कि जल्दी ही हम दीदी के यहाँ जाएँगे और अवध जी से कुछ लम्बी बात करेंगे। इसी बीच अचानक ख़बर मिली कि अवध जी नहीं रहे। अपना हाल फिर वही था। दूसरों से दीदी का हालचाल लेता रहा, पर व्यक्तिगत तौर पर क़रीब महीने भर बाद ही उन्हें फ़ोन करने का मन बना पाया।

कालिया जी के साथ भी अपने रिश्ते इधर के दिनों में कुछ नज़दीकी से बनने लगे थे। ज्ञानपीठ से सेवानिवृत्त होने के बाद जब वे ग़ाज़ियाबाद के क्रासिङ्ग रिपब्लिक में रहने लगे थे, तो दो-तीन बार घर पर आने को कहा था। संयोग ही है कि अपनी कुछ झञ्झटों से पार पाकर जब उनके साथ बैठकर बतियाने का मन बनाया तो वे भी अचानक यह दुनिया छोड़ चले। कालिया जी से अपनी पहली मुलाक़ात उन दिनों हुई थी जब इलाहाबाद में वे गङ्गा-यमुना साप्ताहिक का काम देख रहे थे। मैं ‘माया’ के सम्पादक बाबूलाल शर्मा के बुलावे पर किसी काम से उनसे मिलने गया था। तब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरी पढ़ाई के दिन चल रहे थे, पर सामाजिक कामों में भी काफ़ी सक्रियता से जुड़ गया था। उसी दौर में मेरे एक-दो लेखों की चर्चा देश की संसद और उत्तर प्रदेश की विधानसभा तक भी पहुँची थी। ज़ाहिर है, इस तरह कई बड़े-बुज़ुर्गों के स्नेह का पात्र मैं बन गया था। वैचारिक तौर पर उन दिनों कालिया जी से अपना छत्तीस का आँकड़ा बैठता था।

राजीव गाँधी के बेहद क़रीबी रहे कालिया जी धुर काँग्रेसी थे और वैश्वीकरण की नीतियों के विरोध के चलते मेरी छवि काँग्रेस विरोधी की थी। यह भी दिलचस्प है कि ममता कालिया जी से अपनी ज़्यादा वैचारिक नज़दीकी थी और हम उन्हें अपने कार्यक्रमों में बुलाते भी थे। जो भी हो, माया प्रेस में कालिया जी जब पहली-पहली बार अचानक ही मिल गए तो दोटूक कुछ यों कहा–‘लिखिए, गंगा-यमुना में आप लोगों के लिए खुली जगह है।’ उनसे दूसरी मुलाक़ात उनके तेलियरगंज वाले घर पर हुई। लखनऊ से कालिया जी के पुराने मित्र मशहूर साहित्यकार मुद्राराक्षस जी आए हुए थे। उन्होंने मुझसे कालिया जी के घर चलने की इच्छा जताई, तो इस तरह पहली बार कालिया जी के घर जाने का संयोग बना।

वक़्त गुज़रा और कालिया जी भारतीय ज्ञानपीठ का निदेशक पद स्वीकार कर दिल्ली आ बसे। इलाहाबाद से लेकर महाराष्ट्र और राजस्थान तक भटकते-भटकते मैं भी आख़िरकार दिल्ली आ पहुँचा था। शुरुआत की एकाध मुलाक़ात बस यों ही रही। शायद वैचारिक विरोधों का भ्रम हम दोनों में ही था। सो, ज़्यादा नज़दीकी की स्थिति नहीं बन पा रही थी। लेकिन वक़्त को शायद नज़दीक लाना था। संयोग कुछ ऐसा हुआ कि अखिल भारतीय काँग्रेस समिति की सचिव और सांसद मीनाक्षी नटराजन तथा कालिया जी के बीच मुलाक़ात का एक कार्यक्रम तय हुआ। एक दिन इस बाबत मीनाक्षी जी ने मुझे फ़ोन किया–‘भइया, रवीन्द्र कालिया जी से मिलने मैं ख़ुद भारतीय ज्ञानपीठ चलूँगी और आपको मेरे साथ चलना है।’ इस तरह से इस मुलाक़ात का माध्यम मैं बना।

मीनाक्षी नटराजन के साथ मुझे देखकर कालिया जी आश्चर्यचकित थे। इसके बाद उन्होंने मुझसे दो या तीन बार उत्सुकतापूर्वक जानना चाहा कि मीनाक्षी जी के साथ भला मैं कैसे? मैंने उनको क्या जवाब दिया, यह तो ठीक से याद नहीं, पर इसके बाद हम दोनों के मनों में बैठे भ्रम काफ़ी कुछ छँट गए थे और हम काफ़ी नज़दीकी बनने लगे थे। उम्र में मैं बहुत छोटा था, पर इस बात की मुझे ख़ुशी है कि कालिया जी ने मेरी कोई बात कभी नहीं टाली। यह बात ज़रूर है कि अपने किसी निजी काम के लिए मैंने उनसे कभी कुछ नहीं कहा, पर दूसरे लोगों के कुछ जायज़ कामों के लिए जब भी मैंने उन्हें याद किया तो उन्होंने बड़े मन से सहयोग दिया। उनकी दरियादिली याद रहेगी और यह मलाल मेरे दिल के किसी कोने में हमेशा बना रहेगा कि आख़िरी दिनों में मैं उनसे नहीं मिल पाया।

पत्रकार संत समीर के फेसबुक वॉल से.

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