-महेंद्र अवधेश, दिल्ली
उत्तर प्रदेश की प्रमुख औद्योगिक नगरी कानपुर में भूमाफिया, वसूलीबाज व ब्लैकमेलर पत्रकारों के खिलाफ जिला प्रशासन ने फिलवक्त जो सख्त रुख अख्तियार कर रखा है, वह काबिले तारीफ है। लेकिन, जिला प्रशासन को कानपुर को ऐसे फर्जी पत्रकारों की गिरफ्त से मुक्त कराने के लिए कई और सख्त कदम उठाने की जरूरत है, जिन्होंने शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी एवं हसरत मोहानी की कर्मभूमि को दागदार बनाकर रख दिया है।
जो लोग अब तक कानून की गिरफ्त में आए हैं, उनकी हैसियत तो सफेदपोश अपराधियों द्वारा बिछाई गई शतरंज की बिसात पर महज एक ‘प्यादा’ भर है। अगर शासन-प्रशासन ईमानदारी से चाह लेगा, तो ऊंटों, घोड़ों और हाथियों के चेहरे भी बहुत जल्द उजागर होने लगेंगे। इसके बाद ‘वजीर’ और ‘राजा’ तो खुद सामने आ जाएंगे।
मैं कानपुर का हूं और पिछले 18 वर्षों से दिल्ली में हूं। तीस सालों का पत्रकारीय करियर है। स्वर्गीय अग्रज द्वय शैलेंद्र दीक्षित एवं प्रमोद तिवारी और उनके कार्यकाल के बाद हुए चुनाव यानी दो बार मैं कानपुर प्रेस क्लब का वोटर भी रहा। वह दौर ही अलग था। गंदगी तब भी थी, लेकिन इस कदर नहीं थी, जैसी आज है। वरिष्ठ जन जुटे रहते थे साफ-सफाई में अपनी ‘कोशिश’ भर।
खैर, कानपुर जिला प्रशासन से मेरी विशेष अपेक्षा मात्र इतनी है कि उन वाहनों एवं उनके चालकों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जो फर्जी तौर पर PRESS, POLICE और ADVOCATE लिखाकर शहर भर में घूमते व नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। सामान्य व यातायात पुलिस चाहकर भी उनके खिलाफ कुछ कर नहीं पाती। जिन्हें ढंग से एक एप्लिकेशन लिखने की तमीज नहीं है, वे बेखौफ़ पत्रकार और वकील बने घूम रहे हैं, आमजन व प्रशासन के लोगों पर रौब ग़ालिब कर रहे हैं। ऐसे वाहनों को जब्त कर मौके पर ही उनके चालकों पर कम से कम पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना ठोंका जाना चाहिए।
असली व सक्रिय पत्रकारों के पास उनके संस्थान या प्रेस क्लब, अधिवक्ताओं के पास बार-लायर्स एसोसिएशन और पुलिस स्टाफ के पास विभाग द्वारा जारी परिचय-पत्र जरूर मिलेगा। और, उनसे भी अगर कोई नियम-कानून प्रभावित होता है तो किसी तरह की छूट उन्हें नहीं मिलनी चाहिए।
अगर प्रशासन ऐसा कर पाने में सफल रहता है तो यकीन मानिये, अपराधों पर भी किसी हद तक अंकुश लग सकता है। कोई कहीं सिक्योरिटी गार्ड है, कहीं चपरासी है, दूध बेच रहा है, डेंटर-पेंटर है, सूदखोर है और PRESS, POLICE या ADVOCATE लिखाकर प्रशासन की आंखों में धूल झोंक रहा है।
यही तत्व अपराध को अंजाम देते हैं तथा किसी ताकतवर को अपना मुखिया बना लेते हैं। मार-धाड़, अवैध कब्जों व
लूटपाट की घटनाओं में यही लोग सबसे आगे रहते हैं। उम्मीद है कि पुराने-नए साथी इस पोस्ट का अन्यथा नहीं लेंगे, मुझसे सहमत होंगे और मेरी बात को कानपुर प्रशासन तक पहुंचाने में मदद करेंगे।


