श्याम मीरा सिंह-
पाकिस्तानी आतंकियों ने हमारे लोगों को मारा, आतंकियों ने नाम पूछकर, धर्म देखकर मारा। ये भी सह लेंगे। लेकिन तकलीफ़ उन लोगों से अधिक पहुँचती है जो थोड़े से फेम के लिए कह रहे हैं कि नहीं आतंकियों ने तो धर्म पूछा ही नहीं। ये वे लोग हैं जिनके पोस्ट दिखाकर BJP फ़ायदा लेती है, बीजेपी इन्हें ही दिखाकर कहती है कि ये Liberal, हिंदुओं की तकलीफ़ पर कभी नहीं बोलेंगे। बोलना छोड़िये, उल्टा वाइटवाश करेंगे।
इससे शिक्षित, धर्मनिरिपेक्ष हिंदुओं में आम हिंदुओं का विश्वास घटता है। जब शिक्षित हिंदू अन्य पीड़ितों या अल्पसंख्यकों के मामले पर बोलते हैं। तब शिक्षित हिंदुओं के सामने यही प्रश्न आता है कि आप लोग तब तो बोले नहीं? जब पीड़ित हिंदू था, तब तो आप ये बोल रहे थे, तब तो आप ये तर्क दे रहे थे? इस तरह अंत में शिक्षित हिंदुओं के पास कोई जवाब नहीं होता. क्योंकि अति उत्साहित, लिबरल समाज के पालनहारों और रखवालों ने माहौल बना रखा है कि सत्य को छुपाने की कला का प्रदर्शन करना है इससे एक अलग हीरोइक इमेज उभरकर सामने आएगी। बुद्धिजीवियों का एक धड़ा “इन सॉलिराडिटी” और “मोर पॉवर टू यू” जैसे शस्त्रों से नवाजेगा।
लेकिन असल में ऐसे लोग एक बड़ी कॉज को नुक़सान पहुँचाते हैं। बड़ा मसला ये है कि धर्म और जाति के नाम पर जहाँ भी भेदभाव, हिंसा हो, हम उसका विरोध करें। ऐसा करने में सबसे कमजोर व्यक्ति का फायदा है। क्योंकि ताकतवर को हमारी सहानुभूति और सपोर्ट की नहीं है। वे बदला लेने में सक्षम हैं। जरूरत कमजोर को पड़ती है।
इसलिए जरूरी है कि या तो सत्य बोलें। या अगर सत्य के जोखिम हैं, उसका लाभ हत्यारा उठा लेगा तो संयम से बोलें, समझदारी से बोलें। और अगर इतना ना बोल पाएँ तो चुप रहें। लेकिन ऐसा कुछ ना बोलें जिससे व्यापक तौर पर हमारे अच्छे काम पर भी आम लोगों को शक हो।
कोई भी मूर्ख नहीं है। एक बच्चे की प्रेस कॉन्फ्रेंस है जिसमें वह कह रहा है कि हमें कहा गया कि हिंदू अलग हो जाएँ। और गोली मार दी। एक पीड़ित महिला ने कहा कि उसके पति को कलमा पढ़ने को कहा गया। एक पीड़ित महिला की वीडियो है जिसमें वो कह रही है कि मेरे पति से नाम पूछा और गोली मार दी। साफ़ है, आतंकियों ने टार्गेट किलिंग की है, उनके लिए वे हिंदुस्तानी थे, हिंदू थे। इसलिए मारे। उन्हें इंडिया से नफ़रत थी। इसलिए मारे।
इसलिए हीरो बनना बंद कर दीजिए। सच नहीं बोला जा सकता तो शांत रहिए। मुसलमानों को आपसे सफ़ाई की जरूरत नहीं है। ये आतंकी उनके रिश्तेदार नहीं थे। उन आतंकियों ने अनगिनत बार उन मुस्लिमों की भी हत्या की है जो भारत के पक्ष में रहे हैं या भारत की आर्मी में थे ये पुलिस में थे। कोई सांप्रदायिक व्यक्ति ही होगा जो किसी दूसरे के काम के लिए किसी ऐसे को दोष देगा जो ना वहाँ है, ना उसका कोई संबंध है।
अगर कोई पाकिस्तान के चार आतंकियों के लिए पूरी मुस्लिम क़ौम को गाली दे, तो वह ख़ुद नफ़रती और जाहिल होगा। लेकिन इसके बदले में जब आपकी बातें “हिंदुओं को नहीं मारा। नाम पूछकर नहीं मारा, एक मुस्लिम भी तो मारा था।” ऐसी बातें अंत में भारत के शिक्षित, प्रबुद्ध और प्रगतिशील हिंदुओं के प्रति आम हिंदुओं के मन में अविश्वास और घृणा का भाव भरते हैं।
इसलिए बेहतर हो कि हम सब इस आतंकी हमले के ख़िलाफ़ एक साथ हों। हिंदू मुसलमान दोनों एक दूसरे के साथ हों। कश्मीरी भाइयों के साथ हों। पीड़ित परिवारों के साथ हों। हमारे इसी कर्म में पाकिस्तानी आतंकियों की पराजय है।
भारत माता की जय। इस देश का लोकतंत्र, सेक्युलरिज्म, भाईचारा बना रहे। पीड़ित परिवारों को भगवान साहस दे।
मूल पोस्ट-
धर्म पूछकर गोली मारने वाली बात झूठी है!


