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सुख-दुख

कल से सोच रहा हूँ कि विनेश फोगट की खबर क्राइम में आएगी, खेल में या पॉलिटिक्स में?

अभिषेक श्रीवास्तव-

बात 2003 की है। मैं नया-नया यूएनआइ में आया था। एक खबर खरखराते हुए मशीन से फ्लैश हुई। यूपी की घटना थी। कोई क्रिकेट टूर्नामेंट हुआ था जिसमें कोई माननीय शामिल थे। वहां किसी खिलाड़ी ने किसी और के सिर पर बल्ला मार कर उसकी हत्या कर दी थी। शिफ्ट इंचार्ज ने पन्ना फाड़ा और क्रिकेट का स्लग देखते हुए कॉपी को खेल डेस्क को पकड़ा दिया।

थोड़ी देर में टहलते हुए क्राइम रिपोर्टर आए। यहां-वहां झाँकने की आदत के चलते उनकी नजर खेल डेस्क के सज्जन की कॉपी पर पड़ गई। उन्होंने दावा ठोंक दिया कि खबर क्राइम की है, खेल की नहीं इसलिए उन्हें दी जानी चाहिए। इसके बाद बहस शुरू हो गई, जैसा कि एजेंसियों के खलिहर न्यूजरूम में आम होता था। सब ने अपने-अपने तर्क रखे कि क्राइम और खेल में से किसमें यह खबर फाइल की जानी चाहिए। एक सज्जन की दलील थी कि टूर्नामेंट में चूंकि विधायक जी आए थे और आयोजन भी किसी राजनीतिक दल के संगठन ने ही करवाया था तो खबर पॉलिटिकल है। सभी दावों पर विस्तार से विचार हुआ। अंततः वहां उपस्थित वरिष्ठतम व्यक्ति और लंबे समय तक मुझे वहां संरक्षण देने वाले दिवंगत पत्रकार श्री रामकृष्ण पांडे के कहने से मामला क्राइम डेस्क के पास पहुंचा।

इस बहस के बाद मैंने जान-बूझ कर कभी खेल की खबर नहीं बनाई। खेल से मन तो 1996 के बाद ही टूट गया था। अब भी खेल की कॉपी से साफ मना कर देता हूं क्योंकि तकनीकी पहलुओं पर बात करना बहुत बेमानी लगता है। बहरहाल, खबर बनाने से पहले उस पर बहस करने वाला माहौल अब तो कहीं भी नहीं रहा, फिर भी कल से सोच रहा था कि विनेश फोगट की खबर क्राइम में आएगी, खेल में या पॉलिटिक्स में? जबकि खेल, अपराध और राजनीति को अलग करने वाली रेखा ही खत्म हो चुकी है? जब विभाजक रेखा नहीं रही, तो मेरिट के आधार पर निर्दोष और दोषी पक्ष का निर्धारण भी उतना आसान नहीं रह जाता।

जो लोग भी सौ ग्राम के चक्कर में दुनिया भर के तकनीकी नुक्ते और राजनीतिक कयास गिनवा रहे हैं, उनकी खेल विशेषज्ञता का सम्मान करते हुए मैं सोच रहा हूँ कि यदि वास्तव में यह प्रसंग राजनीतिक है तो आम लोगों के मूल्य-निर्णय को मापने का पैमाना क्या चुनाव-परिणाम हो सकता है? चांदी का मिलना या न मिलना अब खास मतलब नहीं रखता जब पहलवान ने सन्यास ले लिया है। सवाल हर जगह बह रहे दुख के ठोस रूप में जाहिर होने का है। क्या हरियाणा वाकई चुनाव में इसका उचित जवाब देगा? या फिर, कोई और पैमाना है जो इस प्रसंग को साक्ष्य-आधारित राजनीतिक घटना ठहरा सके? या विशुद्ध खेल का तकनीकी लोचा ही साबित कर दे?

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