
बद्री प्रसाद सिंह-
आज १० मई को १७.००बजे भारत-पाकिस्तान में संघर्ष विराम हो गया है।यह संघर्ष-विराम संयुक्त राज्य अमेरिका के दबाव पर हुआ है। पहलगाम में हुई आतंकी घटना के बाद दोनों देशों में तनाव चरम पर था। कुछ मिसाइलें, ड्रोन दोनों तरफ से दागे गए जिससे धन-जन की हानि भी हुई थी।लगता था इस बार निर्णायक युद्ध होगा और देश में आतंकी गतिविधियों पर स्थाई विराम लगेगा लेकिन इस बार भी ऐसा कुछ नहीं हुआ, मात्र जुमले बाजी ही होकर रह गई। हां सिंधु जल संधि पर भारत द्वारा लिया गया निर्णय अभी बरकरार रहेगा, कितने दिन तक, राम जानें। इस मुद्दे पर पूरा देश एक स्वर से सरकार के साथ खड़ा था, आज वह स्वयं को छला हुआ पा रहा है।
आज पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी शिद्दत से याद आ रहीं हैं जिन्होंने १९७१ में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और उनके सातवें नौ सैनिक बेड़े की धमकी के बाद भी पाकिस्तान को तोड़कर विश्व के मानचित्र पर नये देश बांग्लादेश का निर्माण कराया था।
इसी प्रसंग पर भगवती चरण वर्मा की एक प्रसिद्ध कहानी “दो बांके” बरबस याद आ गई जिसमें लखनऊ शहर के दो गुंडे एक पुल के दोनों तरफ अपने शागिर्दों के साथ आमने-सामने खड़े होकर एक दूसरे को ललकार रहे थे और लाश गिराने की धमकी दे रहे थे।जनता दूर से खड़ी होकर कुछ अनहोनी की आशंका कर रही थी कि कुछ देर बाद दोनों दल के उस्ताद आगे बढ़ कर मात्र पंजा लड़ा कर एक दूसरे को शाबाशी देकर वापस चले गये और जनता ठगी देखती रह गई।हैदर अली आतिश का एक मशहूर शेर याद आ रहा है-
“बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का,
जो चीरा तो इक कतरा-ए-खूं भी न निकला।”
इस ड्रामें के सबसे बड़े किरदार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्वनामधन्य पत्रकार रहे जिन्होंने अपनी खबरों से न जाने कितनी बार पाकिस्तान की मट्टी पलीद की। मैंने अपने जीवन काल में इतनी खराब, झूठी एवं बकवास रिपोर्टिंग कभी नहीं देखी थी।
पाक से अधिक सामर्थ्य वान होते हुए भी आज हम फिर हार गए, हमारी शहादत बेकार गई, हम फिर छले गए, विश्व में हमारी साख को बट्टा लगा। अभी न जिन्हें कितने वर्ष तक आतंकवादी हमरी छाती छलनी करते रहेंगे, न जाने कितनी बहू बेटियां विधवा होती रहेंगी।कोई आश्चर्य नहीं, कल बांग्लादेश, मालदीव भी अपने आतंकवादी हमारे देश भेज कर हमें धमकाना प्रारंभ कर दे।


