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सुख-दुख

मुस्लिम समाज की नींव ही युद्ध और हमले को आधार बना कर रखी गई है!

सिद्धार्थ ताबिश-

मोमिनों के जितने भी हीरो हैं, सब लड़ाके, खलीफा, गाज़ी इत्यादि ही हैं.. एक भी ऐसा हीरो इस्लामिक इतिहास में नहीं मिलेगा, जिसके बारे में मदरसों और इस्लामिक इदारों में पढ़ाया जाए और वो युद्ध या किसी लूट और कब्जे का हिस्सा न रहा हो.. जिसने जितना अधिक आतंक फैलाया, वो चाहे खालिद बिन वलीद हो, खलीफा उमर और अन्य हों वो उतना ही अधिक सम्माननीय होता है इस्लामिक इतिहास में.. इस्लाम की शिक्षा में प्रेम, सद्भावना, मैत्री, सहस्तित्व की कोई जगह नहीं है और न ही इन सब इंसानी गुणों वाला एक भी हीरो है जिसके बारे में किसी भी मदारिस में पढ़ाया जाए.

अब्दुल कलाम काफ़िर होते हैं क्योंकि वो हिंदू संतों को अधिक मानते थे, इकलौते भौतिकी का नोबेल पाने वाले अब्दुस्सलाम भी काफ़िर हैं क्योंकि वो अहमदिया पंथ मानते थे, रूमी जैसे सूफ़ी भी काफ़िर कहे गए क्योंकि वो प्रेम और इंसानियत को ही धर्म मानते थे.. सऊदी जैसे देशों में रूमी बैन हैं.. जितने भी “इस्लामिक” हीरो या महापुरुष जिन्हें दूसरे धर्मों के सेकुलर लोग मानते हैं और पसंद करते हैं, उनकी मूल इस्लाम में और मोमिनों के घरों में कोई जगह नहीं होती है.. मोमिन के किसी भी घर में रूमी किसी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होते हैं मगर सारे खलीफा, गाज़ी और लड़ाकू की कहानियां बच्चों की सिखाई और सुनाई जाती हैं और मदरसों के पाठ्यक्रम में भी इन्हीं लोग शामिल होते हैं.. जिसने जितने अधिक युद्ध जीते होते हैं वो उतना बड़ा हीरो होता है.

ये मैं किसी बुराई के तहत नहीं लिख रहा हूं.. मैं एक समाज की डिज़ाइन बता रहा हूं.. मुस्लिम समाज ऐसे ही डिज़ाइन किया गया है.. ये सही है या गलत है ये आप जानिए.. मगर जैसे राधाकृष्ण वाले प्रेम को पूजते हैं वैसे ही मोमिन युद्ध, जंग और लड़ाई हमले को पूजते हैं.. शहीद इनके लिए सबसे सम्माननीय होता है, प्रेमी नहीं.. इस समाज की नींव ही युद्ध और हमले को आधार बनाकर रखी गई है.

ओसमा बिन लादेन जब अमेरिका पर हमला करता है तो भारत और पाकिस्तान में लाखों बच्चों के नाम ओसामा रख दिए जाते हैं.. जब सद्दाम हुसैन अमेरिका से भिड़ता है तो भी बच्चों के नाम सद्दाम रखे गए.. ऐसे ही दाऊद जब चरम पर था तब हर घर में एक बच्चे का नाम आपको दाऊद मिल जाता था.. ये किसी डर की वजह से ऐसा नहीं हो रहा है.. ये इस समाज की डिज़ाइन और सोच है.. ये प्रेम को पूजने वाला समाज नहीं.. प्रेम को असल मोमिन कायरता की श्रेणी में रखता है और प्रेममय संतों, जैसे श्री रविशंकर इत्यादि को ये समाज समलैंगिक बोलकर चिढ़ाता है और ओसामा और मुख्तार अंसारी को असली मर्द बोलता है.

इसलिए हर बार आश्चर्य में न पड़ जाया कीजिए.. आपका समाज अलग तरह से डिजाइन है और अरब की विचारधारा का समाज अलग तरह से डिज़ाइन है.. आप इस डिजाइन को कभी भी नहीं बदल सकते हैं क्योंकि वो उस समाज की नींव है.. ये आपकी गलती है कि आप धर्म को प्रेम और सद्भावना ही समझते हैं.. कुछ लोगों के लिए सारे विश्व पर कब्ज़ा करना भी धर्म हो सकता है और इस समाज के वैसे ही हीरो भी हो सकते हैं.. और दोनो बातें ठीक हैं.. क्योंकि दोनो समाज की सोच और विचारधारा अलग है.

जिस समाज का धर्म प्रवर्तक अपने जीवन काल के अंतिम दो से तीन सालों में तीसों युद्ध लड़ा हो, उस समाज की नींव “प्रेम” कैसे होगी? ये तो कॉमन सेंस वाली बात है.. और युद्ध वहां कोई बुराई की बात नहीं थी, वो उस समाज की जीवनशैली थी.. इसलिए उनके लिए वही “धर्म” है और युद्ध करने वाले “धार्मिक.”

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