विजय सिंह ठकुराय-
इन दिनों डिज्नी-हॉटस्टार “जियो-हॉटस्टार” हो गया है। इस बहाने जियो पर मौजूद एक फ़िल्म “MadMax – Furiosa” देखने की पुरानी चाहत पूरी हो गयी। फ़्यूरियोसा की कोई तारीफ करने से पहले मैं मैडमैक्स सीरीज में इससे पहले रिलीज हुई “मैडमैक्स – फ्यूरी रोड” की बात करना चाहूंगा।
फ्यूरी रोड कहानी है ऑस्ट्रेलियन वेस्टलैंड में फिल्माई गयी एक Post Apocalyptic संसार की – जिसमें आणविक विकिरण से संताने विकृत पैदा हो रही हैं। वर्ल्ड आर्डर ध्वस्त हो चुका है। बचे-खुचे संसाधनों पर वॉर-लॉर्ड्स का कब्जा हो चुका है। ऐसा ही एक वारलॉर्ड है – Immortan Joe – जो सिटाडेल नामक एक पहाड़ी दुर्ग में “वॉर-बॉयज” नामक अपनी सेना के साथ रहता है।

फ्यूरी रोड में हम देखते हैं कि इमोर्टन जो की कमांडर फ़्यूरियोसा अपने साथ एक वॉर-रिग में गुप्त रूप से 5 यौन दासियों के साथ फरार हो कर अपनी जन्मभूमि तक लौटने की योजना बना रही है। विनष्ट होने से बच गयी वह एकमात्र जगह, जहां से फ़्यूरियोसा को बचपन में अगवा कर लिया गया था। इस सफर में उसे साथ मिलता है “मैक्स” का, जो स्वयं इस वेस्टलैंड में भटक रहा है। दोनों की जुगलबंदी ने क्या रंग दिखाया? क्या वे दोनों अपनी मंजिल तक पहुंच पाए? इसका जवाब तो आपको फ़िल्म देख कर मिलेगा। रोड एक्शन एडवेंचर के अद्वितीय दृश्यों से सजी यह फ़िल्म सिनेमा के इतिहास का मील का पत्थर है।
फ़्यूरियोसा देखा जाए तो मैडमैक्स का प्रीक्वल है। इसकी कहानी की शुरुआत नन्ही फ़्यूरियोसा को डीमेंट्स (क्रिस हेम्सवर्थ) नामक वॉरलॉर्ड के गुंडों द्वारा किडनैप कर लेने से शुरू होती है। तत्पश्चात डीमेंट्स से होते हुए फ़्यूरियोसा के इमोर्टन जो तक पहुंचने, उसका विश्वासपात्र बनने और डीमेंट्स से बदला लेने की दास्तान हम फ़िल्म में देखते हैं।
फ़्यूरियोसा यूँ तो मुझे फ्यूरीरोड के मुकाबले 19 ही लगी। पर फिर भी, जॉन मिलर ने ऑस्ट्रेलियन वेस्टलैंड का भव्य सिनेमेटिक चित्रण करते हुए क्लासिक फ़िल्म बनाई है, जिसका आनंद हर सिनेमाप्रेमी को लेना ही चाहिए।
फ़्यूरियोसा में एक बड़ा दमदार संवाद है – There was, is, and always will be war. युद्ध मनुष्य की सबसे सहज मनोवृत्ति है। देखा जाए तो मनुष्यता के इतिहास के नाम पर हमारे पास कुछ खास मनुष्यों द्वारा धर्म की चाशनी में लपेट कर भूमि और राज्य विस्तार जैसे निजी स्वार्थों के लिए लड़े गए युद्धों के लेखे-जोखे के अतिरिक्त कुछ खास नहीं है। मनुष्य युद्ध के वृतांतों को अपने इतिहास के तौर पर सहेजता है, उन्हें पूजता है और जब से मनुष्य ने होश संभाला – किसी न किसी स्वार्थ को महान प्रयोजन का लबादा ओढ़ा कर युद्ध कर रहा है और भविष्य में जब तक भूमि पर मनुष्य का अस्तित्व है – तब तक युद्ध होते रहेंगे।
वास्तव में मनुष्य का अंत किसी प्राकृतिक आपदा या बीमारी से होना संभव ही नहीं है। मनुष्यता का अंतिम पल तो वह होगा – जब उसके पास दूसरे मनुष्यों से संघर्ष की कोई वजह ही शेष न रहेगी। जिस दिन युद्ध का कोई कारण ही न बचा – उस दिन मनुष्य अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ेगा – दोबारा कभी न जागने के लिए।



