मजीठिया वेतनमानः मीडिया मालिकों पर बहुत भारी पड़ सकती है पत्रकारों की लड़ाई

28 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर पत्रकारों में हताशा है। कारण मालिकों को जेल नहीं हुई, जो जायज है। उम्मीद तो यही लगाई जा रही थी कि सुको मजीठिया वेज बोर्ड के लिए कोई समिति गठित कर सकती है और अवमानना के मामले में मालिकों को गिरफ्तार कर सकती है, लेकिन फैसला आधा ही हुआ। खैर अब आगे जो होने वाला है वह मालिकों को लिए रूह कंपा देने वाला होगा। क्योंकि श्रम अधिकारी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट सीधे वसूली पत्रक जारी कर सकता है। इसके लिए जरूरी है पत्रकार एकजुट हों और हर संस्थान में अपना संगठन बनाएं। नहीं तो लाभ मिलते-मिलते हाथ से चला जाएगा। 

दरअसल मजीठिया वेतन मान का लाभ मिलने की प्रक्रिया यही है जो सुप्रीम कोर्ट ने अपनाया। पहले लेबर अधिकारी से रिपोर्ट मंगाए उसके बाद वसूली पत्रक और कुर्की आदेश जारी करें। अब पत्रकारों के साथ संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। और रिपोर्ट में पूरी भूमिका पत्रकारों की होगी। राज्य सरकार और श्रम अधिकारी चाह कर भी मालिकों के पक्ष में रिपोर्ट नहीं बना सकते। पत्रकारों की लाॅबी उन्हें चैन से बैठने नहीं देगी। हर जंग एकता और शक्ति से जीती जाती है अब समय आ गया है कि हर प्रेस संस्थान के कर्मचारी एक संगठन बनाए और फिलहाल शांति पूर्वक क्रियांवन करें। कुछ लोग संगठन इस उद्देश्य से बनाते है कि हड़ताल कर प्रबंधन को झुकाए रखेंगे, लेकिन अभी जरूरत संगठन बनाने और इसे जिंदा रखने की है, जिससे कर्मचारी एकता को बल मिले। प्रेस संस्थान में संगठन प्रमुख सामान्यतः मशीन का इंचार्ज होता है। 

श्रम अधिकारी के जांच के मानए 

जांच किस तरह होगी क्या प्रक्रिया होगी, किन-किन बिंदुओं पर जांच होगी यह तो समय बताएगा, लेकिन अनुमान यही लगाया जा रहा है कि जांच अधिकारी सहायक आयुक्त लेबल को होगा। जो यह जानने का प्रयास करेंगा कि किस संस्थान में कितने पत्रकार/गैर पत्रकार कार्य कर रहे है। कब से काम कर रहे है। क्या वेतनमान दिया जा रहा है। कंपनी का टर्नओवर कितना है। श्रमिक के प्रकार- संविदा, मानदेय, अंशकालिक आदि। यदि संविदा कर्मचारी है तो ठेकेदार कौन है। इन्हें वेज बोर्ड के अनुसार वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा है। और यह सवाल एक नोटिस जारी कर पूछा जाएगा। नोटिस का जवाब मिलते ही अधिकारी कंपनी में जाकर कुछ कर्मचारियों से बयान लेगा, लेकिन जो संस्था जांच में सहयोग नहीं देगी या नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया तो जांच अधिकारी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। 

हम क्या करें ?

वर्तमान समय में प्रेस संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। संगठन के माध्यम से पत्रकार मजीठिया वेतनमान की जांच कर रहे श्रम अधिकारी को यह जानकारी दे कि कौन श्रमिक कब से काम कर रहा है क्या उसका वेतनमान है साथ ही उसके साथ दस्तावेज संलग्न करें जैसे हाजिरी रजिस्टर, सैलरी स्लीप, आई कार्ड, आदि। यह कार्य संगठन का सहारा लेकर करना उचित होगा या फिर गुमनाम खत लिखकर अपनी पहचान छुपाकर जांच अधिकारी को रिपोर्ट दे। नहीं तो सभी कर्मचारी एक साथ जाकर दस्तावेज देने के साथ अपना बयान भी दर्ज कराए। 

कलेक्टर जारी कर सकता है आरआरसी

यदि एक बार श्रम अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट दे दी तो यह सिद्ध हो जाता है कि किस श्रमिक का कितना बनाया है और आरोप सिद्ध होने पर जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 के तहत राज्य सरकार स्व प्रेरणा से वसूली पत्रक जारी कर सकती है। लेकिन इसका सीधा मतलब यह है कि रिपोर्ट बनते ही प्रेस संगठन कलेक्टर को उक्त धारा का हवाला देकर सीधे वसूली पत्रक जारी करने का दबाब बनाए। और इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करें जिसके आधार पर अन्य राज्यों के पत्रकार कलेक्टर से आरआरसी जार करवा सकें। ध्यान रहे सिर्फ आरआरसी (कुर्की आदेष) जारी होने से न्याय नहीं मिल जाएगा इसके लिए लगे रहना पड़ेगा नहीं तो बीच में ही कुर्की आदेष गायब हो जाएगा। खैर सुप्रीम कोर्ट भी यही प्रक्रिया अपना सकती है। कोर्ट राज्य शासन को वसूली के लिए आदेशित कर सकती है। और राज्य सरकार कलेक्टर, एडीएम या एसडीएम वसूली पत्रक जारी कर सकते है। अथवा सुप्रीम कोर्ट स्वयं मालिकों से राषि जमा कराकर संबंधित पत्रकार को राशि दे दें। इसके बाद भी अवमानना का केस प्रेस मालिकों पर चलेगा और प्रेस मालिक कोर्ट के चक्कर लगाकर इतने परेशान हो जाएंगे कि हर नियम मानेंगे। अंत में फिर वहीं बात कहता हूं कि यह सब पत्रकारों की एकता पर निर्भर करेंगा। क्योंकि जो साथी कई परेशानी सह कर सुप्रीम कोर्ट गए वह अन्य साथियों के लिए फायदे मंद रही अब न्याय सबके पहुंच में है वश उसे पकड़ने की आवश्यकता है।

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