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गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए

दिल्ली। हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती है। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए।

दिल्ली। हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती है। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए।

चकोर पक्षी पर लिखे ‘प्यारे चक्खू’ को श्रोताओं से विशेष सराहना मिली तो एक अन्य प्रसंग में पहाड़ की स्त्रियों की आत्मीय छवियाँ भी मन को मोहने वाली थीं। आयोजन में युवा कवि और ‘दखल’ के संपादक अशोक कुमार पांडेय ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य स्मृतियों को जीवित रखने में मदद करता है। उसके सहारे हम जान पाते हैं कि मनुष्यों ने किस तरह संघर्ष कर अपना विकास किया है। उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता और धर्मान्धता को खतरनाक बताते हुए कहा कि रिवर्स गियर में चलकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तरखंड के जन संघर्षों और स्त्रीवादी आन्दोलनों में गीता गैरोला की भूमिका को रेखांकित करते पांडेय ने कहा कि उनका लेखन रोशनी देने वाला है।

हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने ‘मल्यो की डार’ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  हम सबके जीवन में ऐसे अनेक लोग आते हैं जो मामूली और साधारण हैं   लेकिन इनका लेखा करना हम सब के लिए सम्भवनहीं हो पाता। गीता गैरोला ऐसा करती हैं तो न केवल पहाड़ (और भारत भी) की सामासिक संस्कृति का निजी आख्यान रच देती हैं अपितु जबड़े फैलाते उपभोक्तावाद के सामने सामूहिकता का निजी प्रतिरोध भी खड़ा करती हैं। साहित्य ऐसे ही तो अपने पाठकों को संस्कारवान बनाता है।

डॉ पल्लव ने कहा कि स्त्री मुक्ति की छटपटाहट इन संस्मरणों में भी है और पितृसत्ता की जकड़न की प्रतीति भी। फिर भी जो नहीं है वह है स्त्री मुक्ति की वे तस्वीरें जो हिन्दी की स्त्री विमर्शवादी लेखिकाओं द्वारा बहुधा प्रयुक्त की गई हैं। यौन स्वतंत्रता और देह कामना भी जीवन से जुड़ी सचाइयां हैं लेकिन इन सचाइयों से गीता जी आक्रान्त नहीं हैं। आयोजन में बी ए प्रतिष्ठा संस्कृत के विद्यार्थी सत्यार्थ ग्रोवर ने पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की। इस आयोजन के दूसरे भाग में महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुबह’ के प्रवेशांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ रचना सिंह ने पत्रिका के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि स्त्री विषय पर केंद्रित प्रवेशांक में मूर्धन्य कला चिंतक कपिला वात्स्यायन से साक्षात्कार तथा कवयित्री अनामिका की कवितायेँ विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित की गई है। समारोह का संयोजन प्रकोष्ठ की आकांक्षा ने किया तथा अध्यक्षा सिमरन ने गैरोला को शाल ओढाकर अभिनन्दन किया। 

रिपोर्ट – मोनिका शर्मा

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