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सुख-दुख

“कभी किसी का बुरा नहीं किया… फिर ये मेरे ही साथ क्यों?” पूछकर फफक पड़े मयंक के पिता!

दीपक कबीर-

“कभी किसी का बुरा नहीं करा..फिर ये मेरे ही साथ क्यों..बस इसी का जवाब नहीं मिल रहा” …और यहां पर आते ही वो फफक जाते हैं…”

  • – पिताओं का ये सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है..

दाह संस्कार हो चुका है, उसके घर पर हम लोग बैठे रहे, घंटा भर तक मयंक के पिता से बतियाते रहे । सारे किस्से, लोक व्यवहार चलता रहता है..कभी उसकी बहन..दादा पानी ले लीजिए, कभी कोई ये कुर्सी इधर खिसका लीजिए, यहां हवा लगेगी.. औपचारिकताओं की भी अपनी भूमिका होती है शायद.., मैं सुनने से ज्यादा बस सोच रहा कितना साहस चाहिए होता है ये सब बर्दाश्त करने के लिए..अचानक मयंक के पिता मुझसे बोले ..”मैं बस तब से यही सोच रहा हूं कभी किसी का पांच रुपए नहीं लिया..इंजीनियर महकमे के बावजूद कभी बेईमानी का एक अन्न नहीं छुआ, कभी किसी का बुरा नहीं करा..फिर ये मेरे ही साथ क्यों..बस इसी का जवाब नहीं मिल रहा” …और यहां पर आते ही फफक जाते हैं…

इस ” मेरे ही साथ क्यों ” का जवाब शायद सिर्फ नास्तिकों के पास है मगर सब्र और दिलासा अब भी आस्था के पास सुरक्षित..

हर शहर में कई शमशान घाट होते हैं मगर आलमबाग साइड में जिंदगी में दूसरी बार गया..अचानक एक अजीब साम्य दिखा..
वही जगह ..उसी एक नंबर स्थान पर मयंक का शरीर धधक रहा था…इसी जगह 3 बरस पहले अमृत मोहन नमक दोस्त और पत्रकार साथी को भी अकस्मात विदा करना पड़ा था, वो भी पत्रकार था..PTI और प्रेस क्लब का हीरो, मयंक की तरह ही गायक, वादक…,वो भी एक बहन के साथ घर का अकेला..मयंक भी, दोनों का वैवाहिक जीवन भी एक सा…
ये क्या क्या बेसिर पैर का सोचने लगा मैं…

मयंक एक एक्टिविस्ट था..एक्टिविस्ट लोगों की प्राब्लम है उन्हें बहुत लोग जानते हैं वो भी बहुतों को जानते हैं मगर जब तक फोन नंबर या सोशल मीडिया का पता काम करता है तब तक तो ठीक । वरना लोग कभी घर परिवार के लोगों को कहां ,मकान है,नंबर ये सब ध्यान ही नहीं कर पाते…,हालांकि संगठन के कार्यकर्ता को ये मुश्किल नहीं होती ।

अब कल से जाने कितने लोग मयंक का घर और घरेलू नंबर तलाश रहे मगर किसी को एक्जैक्ट कुछ पता नहीं, कभी ध्यान ही नहीं गया किसी का…हां ,मयंक को हर कोई जानता था…

मयंक की दोस्त और पत्नी रही इला घर में सबको संभाल रही थी, पिता को , मां को..व्यवस्था को ..और खुद को भी..,
आश्वस्ति हुई…

मयंक का कॉलेज का ही साथी गौरव लगातार साथ बना रहा,
सब बताता रहा…किशोरवय में सबका आपस में जुड़ना, झगड़े, बड़ा होना..विचारधाराओं से जुड़ना….और फिर विदा हो जाना..

दिल्ली से भी कई साथी आए थे, नितिन ठाकुर सहित और भी लोग, दोस्त…,किसी के न रहने पर भी दिल्ली से लखनऊ तक साथ आना ,संभालना…, मयंक ने सचमुच कुछ तो अद्भुत दोस्तियां कमाई थीं….मयंक बड़ा हो गया था..

मयंक को कुछ दिक्कतें महसूस हुई थीं तो उसने लखनऊ में बकायदे टेस्ट कराए थे, थोड़ी बहुत ऊंच नीच के साथ नॉर्मल थे, फिर भी सभी रिपोर्ट्स लेकर उसने सोचा था अब दिल्ली में दिखा लूंगा मगर….

मयंक का एक दोस्त अमित श्रीवास्तव जो क्लास 3 से उसके साथ पढ़ा, शिया कॉलेज तक तो साथ था ही, वो दाह स्थल पर अंत तक खुद को नहीं संभाल पा रहा था..फूट फूट कर रोना ,बिखरना.., यहां तक बाद में घर पर भी वो ऐसे ही ज़ार ज़ार रोता रहा..मयंक की मम्मी ,बहन और खुद पिता उसे संभाल रहे थे..
………..

जाने क्यों मैं सोचने लगा कि क्या मेरे पास कोई भी एक दोस्त ऐसा होगा..इस कदर फूट फूट कर रोने वाला..
शायद कोई नहीं…..

विदा मयंक ,तुम्हे प्यार ❤️


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