
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सात अखबारों में पांच लीड है। नीट और उड़ीशा में भाजपा की सरकार की खबर अलग-अलग शीर्षक से एक से ज्यादा अखबारों में है। कुल मिलाकर, लोकसभा चुना जीतने के बाद भाजपा निश्चिंत होती लग रही है तो संघ परिवार और मीडिया हार के कारणों की समीक्षा कर रहे हैं। इसमें नुकसान कैसे हुआ यह महत्वपूर्ण है कैसे सत्ता पर कब्जा बना रहा उसकी चर्चा कम है। द टेलीग्राफ ने भागवत के भाषण को लीड बनाया है और लिखा है कि आरएसएस ने मौका हथियाया और झिड़की लगाई। शिन्दे ने कहा कि 400 पार का नारा सभी समस्याओं का असली कारण है। द टेलीग्राफ के अनुसार राहुल गांधी ने मतदाताओं से कहा है कि काम अभी पूरा नहीं हुआ है। हिन्दुस्तान टाइम्स में फोटो का शीर्षक है, राहुल गांधी राय बरेली के मतदाताओं को धन्यवाद देने आये। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर कहती है, आरएसएस की पत्रिका के अनुसार चुनाव परिणाम आत्मविश्वास से भरपूर भाजपा नेताओं के लिए रियलिटी चेक है। तीर्थयात्रियों की बस पर पर हमले के बाद एक और हमला। अबकी बार दो गंभीर। वैसे आज की महत्वपूर्ण और दिलचस्प खबर ‘मोदी का परिवार’ से संबंधित है। उस पर आने से पहले पत्रकारिता की कुछ बातें।
शुरुआत हिन्दुस्तान टाइम्स से। यह दिल्ली के कुछ इलाकों में कल दोपहर बिजली नहीं आने और इससे गर्मी के मारे बेहाल होने की खबर है। चुनाव के समय दिल्ली के पड़ोस के गाजियाबाद में जहां मैं रहता हूं, खूब बिजली गई और दो घंटे से ज्यादा गई, कई बार गई। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर खबर नहीं दिखी। कारण चाहे जो हो, तथ्य यह है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और मुख्यमंत्री जेल में हैं। सरकारी व्यवस्था ऐसी है कि प्रधानमंत्री के अनुसार मुख्यमंत्री के ‘अनुभवी चोर’ होने के कारण सबूत नहीं होने पर भी वे जेल में हैं, जमानत नहीं मिल रही है और दूसरी व्यवस्था नहीं है या जैसी है उसमें बिजली नहीं आई। दूसरी ओर, गाजियाबाद में डबल इंजन की सरकार है इसलिए कई बार घंटों बिजली गुल रहने पर भी पहले पन्ने पर खबर नहीं छपी लेकिन दिल्ली में करीब दो घंटे नहीं रहने पर तीन कॉलम की खबर छपी है।
खबरों की समझ मुझे है। दिल्ली की खबर और दिल्ली का एडिशन जानता हूं। इतना ही होता तो यह संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक का मामला होता। पर नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर आज छपी एक खबर का शीर्षक है, पावर ग्रिड सब स्टेशन में आग कई इलाकों में बिजली गुल। इस खबर के साथ दिल्ली सरकार की उर्जा मंत्री आतिशी का बयान छपा है, “नेशनल पावर ग्रिड की विफलता से हुई कटौती : आतिशी”। आप समझ सकते हैं कि आग लगने से बिजली नहीं आई पर हिन्दुस्तान टाइम्स ने आधी खबर ही दी है कि दो घंटे बिजली नहीं आई। बिना पूर्व सूचना, अकारण बिजली जाना सरकार की नाकामी है तो हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर से ऐसा ही लगता है। हालांकि यह इरादतन बदनाम करने का मामला नहीं भी हो तो मौका मिला है, मत चूको चौहान का जरूर है। खबरों और शीर्षक में यह अंतर और इस कारण खबरों को मिलने वाली प्रमुखता कई कारणों से हो सकती है और संभव है कि सामान्य तौर पर हो। ऐसा कभी-कभी हो तो नजरअंदाज किया जा सकता है लेकिन अक्सर हो तो रेखांकित करना जरूरी है।
गर्मी में दो घंटे बिजली न आये तो परेशानी स्वाभाविक है और खबर नहीं छपेगी तब भी लोगों को पता नहीं चलेगा कि बिजली क्यों नहीं आई। जैसे गाजिबायाद में बिजली नहीं आने का कारण मुझे नहीं पता चलता है और मैं मानकर चल रहा हूं कि यह केंद्र सरकार और राज्य की योगी सरकार के बीच खट-पट का असर होगा लेकिन पावर ग्रिड में आग लगने से बिजली गुल रही – एक सूचना है और दूसरी सूचना बिना कारण बताये बिजली गुल रहने की है और तीसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि मीडिया आपको ऐसी बातें बताये ही नहीं । इस क्रम में यह बताना दिलचस्प है कि आज द टेलीग्राफ का कोट राहुल गांधी का है, पीढ़ियों के संघर्ष, सेवा और बलिदान की परंपरा को परिवारवाद कहने वाले अपने ‘सरकारी परिवार’ के बीच सत्ता की बंदरबांट कर रहे हैं। कथनी और करनी के इसी फर्क को नरेंद्र मोदी कहते हैं!
आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने राहुल गांधी को वंशवादी कहकर कितना बदनाम किया था और इस बार चुनाव प्रचार में भी शहजादे कहते रहे जबकि राहुल गांधी ने अगर नरेन्द्र मोदी की तानाशाही से लोहा नहीं लिया होता तो भाजपा की सीटें कम होना शायद असंभव था। नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने जिस तरह मीडिया और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है उसमें यह शंका मजबूत हो चली थी कि इस बार भी बहुमत मिल गया तो भविष्य में चुनाव नहीं होंगे। आम चुनाव से ठीक पहले चंडीगढ़ और फिर सूरत, इंदौर आदि शहरों में जो हुआ वह इसकी पुष्टि है यह अलग बात है गैर भाजपाई दलों के समर्थन और मंत्रीपद की बंदरबांट करके नरेन्द्र मोदी ने फिर सरकार बना ली है और कल ही सोशल मीडिया पर अपने समर्थकों से कहा कि वे अपने नाम के साथ लिखे गये ‘मोदी का परिवार’ को हटा लें। पत्नी छोड़ चुके मोदी का 2014 में यह कहना कि मेरा कोई नहीं है और 2024 चुनाव से पहले समर्थकों से कहना कि अपने नाम के साथ मोदी का परिवार लिखें और फिर कल हटा लेने के लिए कहना निश्चित रूप से खबर है।
आज यह हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम में तो टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। दो लाइन का शीर्षक और 13 लाइन की कुल खबर है। पूरी खबर अंदर के पन्ने पर होने की सूचना है। कल सोशल मीडिया पर खबर आई कि गौतम गंभीर ने अपने नाम से ‘मोदी का परिवार’ हटा दिया है। आज की खबरें कहती है इस खबर के अनुसार पीएमओ इंडिया के सोशल मीडिया अकाउंट के कवर पेज की फोटो कल ही बदली गई और अब जो फोटो है उसमें प्रधानमंत्री संविधान के आगे सर झुका रहे हैं। इसी दिन उन्होंने कहा है कि अब उनके समर्थक (फॉलोअर्स) अपने नाम के साथ लगाये गये ‘मोदी का परिवार’ हटा दें। अखबार ने लिखा है, मार्च में भाजपा के कई नेताओं और समर्थकों ने अपने नाम के साथ ‘मोदी का परिवार’ (अंग्रेजी में भी) जोड़ दिया था। उस समय लालू यादव ने कहा था कि उनका अपना परिवार नहीं है और जवाब में मोदी ने कहा था कि वे पूरे देश को अपना परिवार मानते हैं। संयोग हो या प्रयोग लालू यादव के 77वें जन्म दिन पर मोदी ने इसे हटाने के लिए कह दिया और कल राहुल गांधी ने एक जनसभा में कहा कि मोदी को संविधान को माथे से लगाना पड़ा क्योंकि जनता ने उन्हें इसके लिए मजबूर कर दिया।

द टेलीग्राफ ने आज राहुल गांधी के कोट के साथ यह भी बताया है कि उन्होंने एक्स पर मंत्रिपरिषद में वंशवादी राजनीतिज्ञों की सूची भी पेश की है। इस सूची में 16 नाम हैं जो एनडीए के विभिन्न दलों के नेता हैं और वंशवाद से ही राजनीति में आये हैं। भाजपा ने ऐसे बहुत सारे लोगों को टिकट दिया था और वे जीत कर भी आये हैं। पहले मंत्री थे इस बार क्यों नहीं हैं कोई नहीं जानता। सबको भले मंत्री नहीं बनाया गया है पर जिन्हें बनाया गया है उनमें कम से कम दो ऐसे नेताओं के बेटे और पोते हैं जिन्हें 2024 में भारत रत्न दिया गया था। आप जानते हैं कि तीसरे राजनेता लाल कृष्ण आडवाणी हैं और भाजपा सरकार के लिए यह घर या परिवार की ही बात है फिर भी उन्हें 2024 में ही भारत रत्न घोषित किया गया। अखबारों ने राहुल गांधी ने जो कहा और जिनका नाम लिया है उनकी सूची तो नहीं ही छापी है भारत रत्न के बेटे और पोते को इसी साल मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के संयोग की भी चर्चा नहीं की है। आप जानते हैं कि अगले साल भाजपा की पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सौ साल होने जा रहे हैं और इसलिये सत्ता में रहने की अलग जरूरत थी।
अब लग रहा है कि चुनाव जीतने के लिए 2024 में आबादी के पांच भिन्न वर्गों को प्रभावित करने के लिए समाज के भिन्न वर्गों के पांच लोगों को भारत रत्न दिया गया जिनके कार्य औऱ जीवन का कालखंड बिल्कुल अलग-अलग था। भले यह सब सामान्य है और जब घोषणा हुई थी तो इसके पीछे की राजनीति स्पष्ट थी। चरण सिंह के पोते ने सार्वजनिक रूप से दिल जीत लिया कहकर भाजपा के साथ होने की घोषणा भी की थी लेकिन किसी ने इसपर कुछ कहा नहीं क्योंकि यह भारत रत्न के सम्मान से जुड़ा मामला था। लेकिन सरकार बनाने के लिए मोदी ने उसे भुनाया और समर्थन देने वालों में पांच में दो के बेटे औऱ पोते को मंत्री बना दिया। तीसरे लाल कृष्ण आडवाणी हैं। उनके बारे में कहने की जरूरत ही नहीं है। बाकी दो दक्षिण भारतीय हस्ती हैं और भले उनके करीबी मंत्री नहीं बनाये गये हों पर बहुमत के लिए दक्षिण में भाजपा को समर्थन की कितनी जरूरत थी यह किसी से छिपा नहीं है। राजनीतिक दल इसका विरोध नहीं कर रहे हैं तो संभव है उन्हें भी इसका लाभ मिला हो या भविष्य में लेना हो। लेकिन मीडिया में भी इसपर पूरी तरह सन्नाटा है।
वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने आज एक्स पर लिखा है, नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाना आरएसएस की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। मोहन भागवत का बयान आया है कि संविधान और आरक्षण पर एक कैंपेन चला जिससे उनकी राजनीतिक पार्टी बीजेपी को चुनाव में नुकसान हुआ। मोहन भागवत मान रहे हैं कि संविधान और अधिकारों के प्रति जागरुकता से उन्हें नुकसान हुआ है। चुनाव परिणाम के बाद आरएसएस प्रमुख का भाषण काफी चर्चा में है। कल मैंने यहां उसकी खास बातों का उल्लेख किया था और बताया था कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने उनकी खबर को प्रमुखता से छापा था। कुल मिलाकर पूरा संघ परिवार किसी ना किसी तरह भाजपा के सत्ता में बने रहने के लिए प्रयासरत रहता है और इनमें सहयोगी दल शामिल हैं तथा प्रयास और योगदान कर रहे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है। प्रशांत टंडन ने आगे लिखा है, ये कहना बिलकुल गलत है कि चुनाव में आरएसएस ने हाथ खींच लिए थे – ये पूरी ताकत से लगे थे बीजेपी के लिए।
वे लिखते हैं, आरएसएस की विचारधारा नफ़रत पर आधारित मनुवाद को स्थापित करने की है। उसने चुपचाप इस दिशा में 90 साल काम किया है। राम मंदिर एक ऐसा ही आंदोलन था …. इसका लक्ष्य राम मंदिर बनाना नहीं था। इस आंदोलन के जरिए अकेले सत्ता में आना था। जो पूरा हो गया था। … यहां से आरएसएस को अतिवाद और कॉरपोरेट को छोड़ना था जिसके लिए जरूरी था कि वो मोदी को विदा कर दें। आरएसएस ये कर नहीं पाई या करना नहीं चाहा। वजह जो भी हो नुकसान तो उसे ही झेलना है। ऐसे में कहा जा सकता है कि भागवत की कोशिश इसी दिशा में हो। आप जानते हैं कि आरएसएस पर दो बार प्रतिबंध लग चुका है लेकिन हिन्दुत्व के नाम पर यह भाजपा के जरिये अस्तित्व बनाये हुए है। इसका सबसे बड़ा और कारगर पार्टनर है। दिल्ली और एनसीआर में बहुतायत में रहने वाले सेक्यूलर दिखने वाले सवर्ण बुद्धिजीवियों और नौकरशाहों के साथ उच्च मध्यमवर्गीय लोगों का परिवार। कांग्रेस के अंदर भी आरएसएस के शुभचिंतकों की कमी नहीं रही। शुरु से हैं और आज भी हैं। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की जोड़ी ने पहली बार आरएसएस के राजनीतिक चुनौती दी और पहली ही चोट में बुरी तरह घायल कर दिया।
सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात की थी तो राहुल गांधी ने भाजपा मुक्त भारत की बाता नहीं की। उन्होंने कहा था कि विचारधारा की लड़ाई है और भाजपा को विचारधारा से हरायेंगे। वे संसद में मोदी से गले मिलने भी गये थे पर जो हुआ सो आप जानते हैं। नरेन्द्र मोदी विपक्ष को विरोधी और दुश्मन मानते हैं और उनसे वैसे ही लड़ते हैं। यह सब अब किसी से छिपा नहीं है और संघ परिवार को अब इसका नुकसान समझ आ रहा है तो बचाव के उपाय किये गये हैं। आज मीडिया में इसकी खूब चर्चा है। भाजपा के मीडिया मैनेजमेंट की चर्चा सोशल मीडिया पर भी है और एएनआई का एक वीडियो घूम रहा है जो संपादक स्मिता प्रकाश के साथ उनके दफ्तर का लग रहा है। इसमें चिन्ता जताई जा रही है कि भाजपा यू ट्यूबर्स का मुकाबला नहीं कर पाई और भाजपाई यू ट्यूबर लोकप्रियता में भाजपा विरोधियों (या स्वतंत्र) के मुकाबले काफी पीछे हैं। इसमें यह भी चर्चा है कि डीबी लाइव (जो काफी समय नंबर वन रहा और कभी 4पीएम से पीछे रहा है) क्या है? तो इतना भर बताया जाता है कि दैनिक भास्कर का नहीं है। यानी भाजपा के मीडिया मैनेजमेंट के लिए चिन्ता कर रहे लोगों को यू ट्यूब के नंबर वन चैनल के बारे में भी जानकारी नहीं है।
यहां उल्लेखनीय है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी सोशल मीडिया का उपयोग खूब करते थे। उसी से लोकप्रियता पाई थी और सोशल मीडिया पर दूसरों को दबाकर रखने के लिए ट्रोल सेना भी बनाई गई थी। यही नहीं वे गालीबाजों को भी फॉलो करते हैं और यह सेना कैसे काम करती है इसे बताने के लिए पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने एक किताब भी लिखी थी, आई एम अ ट्रोल। बाद में मोदी सरकार सोशल मीडिया कंपनियों पर दबा डालकर अपना उल्लू सीधा करती रही ऐसे नियम बनाये जिससे भाजपा को फायदा हो तो कोई कार्रवाई नहीं कर पाये और दूसरों की गतिविधि से भाजपा को नुकसान हो तो कार्रवाई आसानी से हो सके। अब जब सरकार और भाजपा समर्थक भाजपा के पीछे रह जाने पर चिन्ता जता रहे हैं तो मुख्य धारा की मीडिया में लालू यादव के 77वें जन्म दिन की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ ने इसे छह कॉलम में बॉटम बनाया है। ऊपर मंत्रिमंडल में सहयोगियों को झुनझुना थमा देने की खबर भी है। आप जानते हैं कि लगातार तीसरी बार शपथ लेने पर मोदी की तुलना नेहरू से की गई लेकिन भारत रत्न देकर बेटे पोते के सहयोग से सरकार बनाने की चर्चा बिल्कुल नहीं हुई।



