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सुख-दुख

ऐसा लगता था मोदी के कंठ में मंडल घुस गए हैं!

अविनाश पांडेय उर्फ़ समर अनार्या-

दिलीप सी मंडलों का बढ़िया है। कांग्रेस सरकार थी तो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बनाये गये। विरोध करने पर एबीवीपी के तमाम कार्यकर्ता वहाँ से निष्कासित भी हुए, कई का कैरियर ही तबाह जो गया।

कांग्रेसी इकोसिस्टम की ही वजह से ही इंडिया टुडे हिंदी के संपादक भी बनाये गये- अपने कार्यकाल में भी दलित बहुजनों को नौकरी तो नहीं दी पर मीडिया में उनकी अनुपस्थिति पर लिखते रहे।

फिर सरकार पलटी तो आज की रेलगाड़ियों की तरह मंडल भी पलट गये- कमर में सीधे कमंडल खोंस लिए।

चाहते तो ख़ैर राज्य सभा से नीचे कुछ नहीं होंगे लेकिन कम से कम मीडिया सलाहकार तो बनाये गये! बाक़ी चाहे संघ के लिए जवानी जला देने वाले कार्यकर्ता हों चाहे 2014 के पहले ही पलट गये मधु किश्वर जैसे लोग- वो अब भी दरी ही बिछा रहे हैं। एम जे अकबर से मंडल तक मलाई पुराने सेक्युलर ही पा रहे हैं।


दीपांकर-

आप लोग मानें या न माने, लेकिन प्रोफेसर Dilip C Mandal SC/ST-OBC वोट बैंक खिसकने का डर दिखाकर मोदी सरकार से ऐसी-ऐसी चीजें करवा ले जाएंगे, जिसका वैसे हो पाना शायद मुमकिन नहीं हो पाता.

लेकिन मंडल का ये फीयर प्रोजेक्शन भी तभी बना रहेगा, जब चुनावी नतीजे ओबीसी/SC-ST की बीजेपी को लेकर विकसित हुई इस दुविधा को दर्शाते रहें.

लेटरल एंट्री में रिजर्वेशन को सम्मिलित कराने के मामले में उनका कितना योगदान रहा है, मुझे इसकी जानकारी नहीं है लेकिन ये किसी मझे हुए सलाहकार का ही काम हो सकता है.

ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के भाषण का तकरीबन 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दिलीप मंडल के सेट किए हुए एजेंडे के हिसाब से डायरेक्ट लिखा जा रहा था, भाषण कौन लिख रहा था मुझे नहीं पता लेकिन जो भी टीम थी, जाहिर है उसमें मंडल जी प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से शामिल जरूर रहे होंगे।

वो भाषण टीम मंडल के फेसबुक और ट्विटर पेज से डायरेक्ट एजेंडा उठा रही थी, और मोदी के भाषण का वो हिस्सा जैसे ही आता था ऐसा लगता था मोदी के कंठ में मंडल घुस गए हैं.
2024 लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के फेसबुक पेज पर 10 लगातार रील्स में से 8 दिलीप मंडल की थी और 2 मोदी की थी. कितने लोग इसका साल भर पहले अनुमान लगा सकते थे?
सारा खेल अप्रत्याशित तरीके का है.

सोशल मीडिया पर लोग अभी भी दिलीप मंडल की सरकार तक पहुंच और उनके हालिया उभार को पचा नहीं पाए हैं. ख़ास तौर पर वो वो लोग जो 10-11 साल से पर्मानेंट भजन मंडली का हिस्सा थे और शाम होते ही प्राइम टाइम पर चैनलों में मोदी भजन संध्या करने चले जाते थे. तमाम ऐसे भक्त हैं जिन्होंने मोदी की आरती की और मोदी ब्रम्हा- विष्णु और महेश बना दिया.

दिलीप मंडल ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिसे भजन-कीर्तन के व्यवस्थित व्याकरण में पूर्ण रूप से शामिल किया जाए.
जहां तक मुझे याद आता है उन्होंने किसान आंदोलन पार्ट-2 के आसपास MSP की व्यवहारिकता पर एक वीडियो बनाया.
उसके बाद उन्हें अचानक मेन स्ट्रीम मीडिया में जबरदस्त कवरेज मिलने लगी.

फिर धीरे-धीरे साफ्ट तरीके से उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों का समर्थन किया और लोकसभा चुनाव के दौरान सामाजिक न्याय के कम्यूनल एंगल वाले कार्ड को खेलकर खुलकर मोदी के समर्थन में आ गए. उन्होंने मुस्लिमों के लिए कुछ प्रदेशों में बढ़ते आरक्षण को बाकी ओबीसी/SC-ST की हकमारी से जोड़ दिया.

अब जब ये खबर आई है कि वो मोदी सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय में मीडिया सलाहकार के तौर पर नियुक्त हुए हैं, तमाम सवर्ण राजनीतिक विश्लेषकों में खलबली मच गई है.
तमाम विश्लेषक तो भजन-कीर्तन मोड से अचानक मोदी सरकार से “ऐसी सजा दी प्यार की,ऐसा क्या गुनाह किया”
कहने वाले सनम बेवफा मोड पर आ गए हैं.

ये भी कोई बात हुई, कांग्रेस के प्रवक्ता से गाली खाए अघोषित मोदी भक्ति करने वाला राजनीतिक विश्लेषक और 6 महीने की एजेंडा सेटिंग से मीडिया सलाहकार कोई और बन जाए.
अघोषित बीजेपी प्रवक्ताओं उर्फ फर्जी निष्पक्ष बनकर घूमने वाले मोदी भक्त राजनीतिक विश्लेषकों को ये हजम नहीं हो रहा, हींग की गोली खाकर भी वो मोदी भजन करने का सुख आत्मीय मन से नहीं ले पा रहे.

मंडल जी को भी ये मालूम है कि उनके मोदी मंडली में शामिल होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के बहुजनों ने मोदी सरकार को आंख दिखा दी है. बहुजन राजनीति स्वस्फूर्त से चलती रहेगी, आज की तारीख में बहुजन युवा किसी राजनीतिक विश्लेषक अथवा विचारक के मोहताज नहीं हैं. उनके पास स्पष्टता है, वो राजनीतिक तिकड़मबाजी और मौके को लपकने के हुनर का कार्यक्रम भी समझते हैं.

वो ये भी जानते हैं कि मंडल की जरूरत मोदी जी को ज्यादा है, मंडल जी को मोदी की जरूरत शायद उतनी न रही हो. बहरहाल प्रोफेसर दिलीप मंडल को बहुत बधाई. नित्य-निरंतर, नित-नए एजेंडा सेट करते रहें. एंटरटेनमेंट जारी रहे.

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