अरुण माहेश्वरी-
भारत की राजनीति में इस समय असाधारण उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं । सतह पर तो दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनंत अंबानी के वनतारा प्रकल्प पर जाँच के लिए एसआईटी बनाई है। लेकिन असली खेल अदालत से कहीं गहरा नज़र आता है।
अफ्रीका से हाथियों का आयात, CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora ) की अंतरराष्ट्रीय शर्तें, CZA (Central Zoo Authority ) की भूमिका और प्रकल्प के वित्तीय स्रोत से जुड़े जटिल सवालों पर एसआईटी को सिर्फ़ बारह दिन में रिपोर्ट देने का आदेश यह साफ़ संकेत देता है कि इस रिपोर्ट की सामग्री पहले से ही कहीं तैयार पड़ी है। अदालत को आगे उस पर मुहर लगाने की औपचारिक भर पूरी करनी है।
न्यायपालिका में मोदी के प्रभाव को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला ही जा सकता कि मोदी अडानी-अंबानी तनातनी में अडानी के पाले में खड़े हो गए हैं ।
इसी मार्च महीने में वनतारा जू का उद्घाटन हुआ था। मंच पर अनंत अंबानी ने जैसे ही अपने प्रकल्प के बारे में भावुक होकर वक्तव्य रखा, मुकेश अंबानी स्वयं विगलित हो गए थे । कैमरों ने साफ़ दिखाया कि इस प्रकल्प का उनके लिए कितना गहरा निजी महत्व है।
यही कारण है कि अब जब उसी वनतारा को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, तो इसे मुकेश अंबानी सहजता से स्वीकार नहीं सकते । वे इसे अपनी निजी प्रतिष्ठा और शक्ति पर सीधा हमला मानेंगे। और, जैसा कि अंबानी को जानने वालों का मानना है, उनका स्वभाव नहीं है कि वे किसी वार को बिना प्रतिघात के जाने दें।
इसी बीच अंबानी-अडानी का कॉरपोरेट वॉर और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण भी खुलकर सामने आ चुका है।
अंबानी का कथित थिंक टैंक ORF लगातार भारत–अमेरिका सहयोग पर ज़ोर दे रहा है, तो दूसरी ओर अडानी का थिंक टैंक ‘चिंतन’ भारत–चीन समीकरण को रीसेट करने की बहस चला रहा है।
इस बीच ट्रंप और अंबानी की दो मुलाक़ातें हो चुकी है । पहली ट्रंप के शपथ लेने के पहले और दूसरी इसी मई महीने में क़तर के सरकारी भोज में । वहीं दूसरी ओर अडानी समूह ट्रंप प्रशासन की जाँचों के दबाव में फँसा हुआ है। अब अडानी-मोदी बनाम अंबानी–ट्रंप का द्वंद्व दिखाई देने लगा है ।
अब इसी बीच 9 सितम्बर को उपराष्ट्रपति चुनाव है।एनडीए के पास संख्याबल ज़रूर है, लेकिन गुप्त मतदान इसे कभी भी बिगाड़ सकता है। कांस्टिट्यूशन क्लब के चुनाव में इसका नमूना देखा जा चुका है ।
यही वह मौका है जहाँ अंबानी के रुपयें की ताकत का खेल भी संभव है। अगर उन्होंने वनतारा को अपने खिलाफ़ राजनीतिक हमले के रूप में लिया तो एनडीए के सहयोगियों या बीजेपी के भीतर भी अनेक सांसदों पर उनकी पकड़ निर्णायक हो सकती है।
उधर राहुल गांधी के “वोट चोर, गद्दी छोड़” आंदोलन ने मोदी की साख को रसातल में पहुँचा दिया है । जनता के बीच राहुल गांधी का उभार अब महज़ कल्पना नहीं, एक ठोस यथार्थ है ।
इस प्रकार, वनतारा, अडानी–अंबानी–मोदी–ट्रंप का तनाव और उपराष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान, ये सब सूत्र एक ऐसे बिंदु पर आकर मिल रहे हैं, जो भारत की राजनीति में किसी भी चमत्कारी पट-परिवर्तन का बिंदु साबित हो सकता है । राजनीति में जिस प्रक्रिया से बड़े परिवर्तन घटित होते हैं, उसके सारे घटक यहां सक्रिय दिखाई पड़ रहे हैं। जन-असंतोष, सांसदों में विचलन, पूंजी की भूमिका, कॉरपोरेट की साजिशें और वैश्विक परिस्थिति और सर्वोपरि वैकल्पिक शक्ति का उदय । ऐसा लगता है कि मोदी पर शनि का योग पूरा हो रहा है ।
सवाल अब केवल यह है कि 9 सितम्बर को क्या सिर्फ़ उपराष्ट्रपति चुना जाएगा, या वह मोदी सरकार के अंत की घोषणा का भी दिन होगा ?


