गैंग रेप के आरोपी निहालचंद को मोदी ने मंत्रिपद पर कायम रखकर क्या संदेश दिया है?

Om Thanvi : नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल फैलाव में स्वागतयोग्य बातें हैं: पर्रीकर और सुरेश प्रभु जैसे काबिल लोग शामिल किए गए हैं। बीरेंद्र सिंह, जयप्रकाश नड्डा, राजीवप्रताप रूडी और राज्यवर्धन सिंह भी अच्छे नाम हैं। सदानंद गौड़ा से रेलगाड़ी छीनकर उचित ही सुरेश प्रभु को दे दी गई है। लेकिन स्मृति ईरानी का विभाग उनके पास कायम है। गैंग रेप के आरोपी निहालचंद भी मंत्रिपद पर काबिज हैं। अल्पसंख्यकों को लेकर प्रधानमंत्री की गाँठ कुछ खुली है, मगर मामूली; मुख़्तार अब्बास नक़वी को महज राज्यमंत्री बनाया है। वे वाजपेयी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रह चुके हैं, जैसे रूडी भी।

मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान भिजवाने वाले गिरिराज सिंह को मंत्री बनाकर मोदी क्या सन्देश देना चाहते हैं? कि उन्हें चापलूस पसंद हैं या विरोधियों से सड़कछाप निपटने वाले! संघ का दबदबा मोदी-शाह के रहते बढ़ता जा रहा है। वह बढ़ता जाएगा। राजस्थान ने भाजपा को पच्चीस के पच्चीस सांसद दिए; वहां से दो मंत्री आज और जुड़ गए। पर तीनों के तीनों राज्यमंत्री ही क्यों हैं? निहालचंद मेघवाल की जगह अर्जुनराम मेघवाल (जो दो बार श्रेष्ठ सांसद रहे) को केबिनेट मंत्री के रूप में लेकर मोदी से किंचित भूल-सुधार की उम्मीद थी। पर हम शायद मोदी को ठीक से जानते कहाँ हैं जो ऐसी भलमनसाहत की अपेक्षा या उम्मीद रखते हैं?

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

Shambhunath Shukla : मंत्रिमंडल का विस्तार हर प्रधानमंत्री का अपना अधिकार है और यह भी वह किसे क्या मंत्रालय सौंपता है पर मुख्तार अब्बास नकवी को हल्का करने की कोशिश अखरी। उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया है जबकि वे अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए वन की सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा के हर संकट में वे काम आए और पार्टी का अकेला पढ़ा-लिखा संजीदा अल्पसंख्यक चेहरा है। इसके विपरीत राजीव प्रताप रूड़ी की छवि साफ-सुथरी तो नहीं ही कही जा सकती। पर उन्हें स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री बनाया गया है। ऐसे तमाम और मंत्री बने हैं जो अनाड़ी कहे जा सकते हैं। इस तुलना में नकवी अनुभवी और संजीदा तथा परिपक्व नेता हैं। पर क्या किया जा सकता है जब पूरा का पूरा आवा ही कच्चा निकल जाए। विपरीत बुद्घि वालों का ऐसा ही हश्र होता है। नकवी को विरोध तो दर्ज करना ही चाहिए। ऐसा भी क्या कि ‘जात भी गँवाई और भात भी न खाया’।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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