वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला ने मेनस्ट्रीम मीडिया और वनाक्यूलर अखबारों को कारपोरेट का चाकर करार दिया…

Shambhunath Shukla : मेनस्ट्रीम मीडिया, चाहे वह ‘जी’ टीवी हो, ‘आजतक’ हो या ‘एनडीटीवी’ अथवा हिंदुस्तान टाइम्स या टाइम्स ऑफ़ इंडिया सब कारपोरेट हाउस के चाकर है। आटो एक्सपो को ऐसी कवरेज दे रहे हैं मानों आज की सबसे बड़ी ख़बर किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के कारों की बिक्री ही है। यहाँ तक की वे वर्नाक्यूलर अख़बार भी, जिनका पाठक प्याज़ और टमाटर के भाव दो रुपये उछल जाने पर कल्लाने लगता है, अपना पहला और दसवाँ पेज आटो एक्सपो को समर्पित किए हैं। उनमें प्रकाशित और प्रसारित ख़बरें पढ़-देख कर दूर-दूर से लोग भागे चले आ रहे हैं।

बसों, टैक्सियों और अपनी छोटी-छोटी कारों से। ऐसे जैसे ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क स्थित एक्सपो मार्ट में मोदी जी और योगी जी फ़्री में कारें बँटवा रहे हों। सैकड़ों रुपये की टिकट ख़रीदता है और हज़ारों रुपये के समोसे, पकौड़ी, बर्गर खाकर हाथ मलता घर चला आता है। जिनके पास ढंग की एक जोड़ी चप्पल नहीं है वे बीएमडब्लू, मर्सडीज़ और लैंड क्रूजर गाड़ी के सामने खड़ी मेम को देखकर ही लहालोट हो जाते हैं।

दुख है कि किसी भी मीडिया हाउस के क़ाबिल पत्रकार ने यह नहीं बताया कि यहाँ किस तरह विज़िटर्स को क़दम-क़दम पर लूटा जाता है। कोई तो पत्रकार यह सवाल करने की हिम्मत करता कि जिस देश में अस्सी प्रतिशत लोगों के पास छत नहीं है वे कार कहाँ खड़ी करेंगे। और जिनकी एक करोड़ की गाड़ी ख़रीदने की औक़ात होती है, वे बेवक़ूफ़ों की तरह गोरी मेम को देखने नहीं आते। एक वह ज़माना था जब हम अख़बार में ऐसे सवाल भी उठाया करते थे कि क्या औचित्य है, ऐसे जमावड़े का! अब तो बस हम भी बस फ़ेसबुक पर ही सच लिख सकते हैं कि भैया! यह मेला नहीं आटो प्रमोशन है, जहाँ समोसा तक सौ रुपये का है। और उसके अँदर भरे आलू गंधाते हैं। सो तुम चूतिया न बनो!

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला की एफबी वॉल से.

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साहसी पत्रकार यशवंत सिंह पर हमला करने वालों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई करे सरकार : शंभूनाथ शुक्ल

Shambhunath Shukla : वरिष्ठ पत्रकार Yashwant Singh पर हुए हमले पर पत्रकार जगत चुप है. असहिष्णुता को लेकर हल्ला-गुल्ला करने वालों ने भी एक शब्द नहीं कहा. जबकि यशवंत पर हमला सही में एक ज़मीनी पत्रकार पर हमला है. पत्रकारों की अपनी रोज़ी-रोटी और उसकी अपनी अभिव्यक्ति के लिए सिर्फ यशवंत सिंह ही लड़ रहे हैं. उन्होंने मीडिया हाउसेज और सत्ता की साठगाँठ की परतें उजागर की हैं.

लेकिन अब न तो वामपंथी न दक्षिणपंथी कोई भी संगठन उनके साथ खड़ा हो रहा है. बहरहाल कोई हो न हो, लेकिन मैं इस साहसी और कर्मठ पत्रकार यशवंत सिंह पर हुए हमले की कड़ी भर्त्सना करता हूँ. मैं फेसबुक के अन्य साथियों से भी अपील करूँगा कि वे साथी यशवंत पर हुए हमले की निंदा करें और सरकार पर दबाव डालें कि वह हमलावरों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई करे.

कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं….

Nirmal Kumar जिस तरह की पत्रकारिता यशवंत सिंह जी करते हैं मुझे पहले से अंदेशा था कि ऐसा होगा। आज की तारीख में ईमानदार को कोई देखना नहीं चाहता। ईमानदारी एक ऐसी रौशनी की तरह हो गयी है जो चहुँ ओर व्याप्त बेईमानी और भ्रष्टाचार के अँधेरे को चीरती है इसलिए इन धतकर्मों में लिप्त लोग रौशनी के स्त्रोत को ही बंद करने में लगे हैं काली कोठरी के रोशनदान को बंद करने में लगे हैं। धिक्कार है डरपोक सियासतदानों पर।

Thakur Ramsingh Chhonkar सचतो यह है कि दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों ही पत्रकार अपने-अपने खेमों में चिपके हुए हैं और एक दूसरे पर वाक प्रहार कर रहे हैं। निष्पक्ष और अखबार के पुराने पत्रकार का आज के दौर में कोंन साथ देगा। मीडिया पतन के दौर में हैं।

Amitaabh Srivastava हर तरह की हिंसा, मारपीट घोर निंदनीय है. एक ऐसे समय में जबकि समूची पत्रकार बिरादरी की साख तमाम वजहों से संकट में है, इस तरह की घटनाएं, उस संकट को और गहरा करती हैं

Anshuman Shukl आपने ये मुद्दा उठाया देख कर अच्छा लगा। आप पर भरोसा है आप पक्ष पात नहीं करते। रही बात इस मुद्द्दे कि तो यशवंत भाई तो उनको माफ करने को भी तैयार हैं लेकिन ये दोनों मुँह छुपाए घूम रहे है। अपना फेसबुक और ट्विटर भी बंद कर दिए है। बाकी सभी वरिष्ठ पत्रकार मौन है। शायद मन ही मन सोच रहे है अच्छा हुआ मारा गया बहुत बमचक मचाये था।

Sanjay Sharma Sir कटु सत्य तो यह है कि हिंदी पत्रकारों को अंग्रेज़ी पत्रकार के मुक़ाबले आज भी दोयम स्थिति का सामना करना पड़ता है चाहे विरोध हो या समर्थन । अंग्रेज़ी वाले हो हल्ला ज़्यादा मचाते है हिंदी वाले रस्म अदायगी। विचारधारा का फ़र्क़ तो है ही।

Pradeep Tiwari यशवंत सिंह पर हुए हमले की मध्यप्रदेश के सभी पत्रकार संगठनों ने अलग अलग ढंग से अलग अलग तरीके से निंदा की। कोई भी पत्रकार यशवंत की हत्या पर विरोध ना करे, ऐसा कहां हो सकता है।

Asha Shailly जिसके बारे में कोई बोल नहीं रहा उसके पक्ष में आप बोल रहे हैं यह महत्वपूर्ण है। यहाँ बिकाऊ मीडिया को चारा नहीं मिला होगा। एक बात और समझ में आती है और वो यह कि यदि यशवंत वामपंथी होते या हिन्दुओं को गरियाने वाले होते तो लोग खूब उछलते। क्योंकि यह निष्पक्ष रहे इस लिए इनका पक्ष बिकाऊ मीडिया नहीं ले रहा। पर हम आप के साथ हैं। हम सरकार से अनुरोध करेंगे कि सरकार इन हत्याओं, आक्रमण कारियों पर जांच बैठाए और ऐसे अपराधियों को बेनकाब करे जो सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं।

Shiv Kumar Dixit हमे जो करना है कर्तव्य के रूप में, हम करते चले। शब्दद्रोहियों का समाज शताब्दियों से रहा है, इनके सिंहासनों का इतिहास खोजे नहीं मिलता लेकिन शब्द रहता है, केवल यही रहता है जैसे राम नहीं केवल राम शब्द बचा। कोई पत्रकार हो शिक्षक हो लेखक हो इनका काम जोखिम का है तो फिर डर या अपेक्षाओं का बोझ क्यों लादें। समय का जबड़ा किसने देखा, शम्भुजी, भाग्यवाद की बात नहीं कह रहा हूँ। नाक की सीध में चलने की बात कह रहा हूँ, जितने बार रोका जाएगा फिर उसी रास्ते पर चल देंगे। आतंक की भर्त्सना के साथ, अभिवादन।

Ranjana Tiwari बिलकुल ..सर जो हमारी आवाज को बुलंद करते है अपनी कलम से आज वही पत्रकार सुरक्षित नहीं.. बेहद दुखद।

Niranjan Sharma यशवंत सिंह जी जैसे संघर्षशील पत्रकार पर हमला अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ! इस कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए कम है!

Hemraj Singh Chauhan सहमत सर उनके द्वारा एफआईआर करने के बाबजूद वो पकड़ से बाहर हैं, दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए

Abhay Dwivedi यह घटना अत्यंत निंदनीय है। लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ पर हो रहे हमले बन्द होने चाहिए।

Gopal Rathi एक ही तरह के कुछ मुद्दे राष्ट्रीय चिंता बन जाते है और कुछ मुद्दे स्थानीय भी नही बन पाते ?

Ajay Kumar Shukla गौरी लंकेश की हत्या पर पूरी मीडिया ने हल्ला मचा दिया वही मीडिया यसवंत जी के लिए कुछ नही बोल रही क्योंकि यहां उसकी राजनीतिक रोटियां नही सिक पाएंगी। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

Shariq Ahmad Khan हम सख़्त मज़म्मत करते हैं

Pradeep Mahajan सबसे पहले आरोपियों पर कानूनी कार्यवाही करा कर मुकदमा बनाया जाए Yashwant Singh

Sukesh Sharma Attack on Yashvant is really attack on PATRAKARITA.

Sujeet Singh Prince शुक्ला जी जब तक आप जैसे लोग सच्चाई का साथ देते रहे गे, यशवंत भाई साहब हरामखोरों को सबक सिखाते रहेंगे.

Usmaan Siddiqui बिल्कुल सही बात कही आपने Shambhunath Shukla सर.. आई एम टोटली एग्री विद यू… ज़िन्दाबाद, ज़िन्दाबाद, ज़िन्दाबाद…

Shweta R Rashmi बड़े चैनल और अखबारों के पैरोकारों को जगाएं… हम लोग तो पहले दिन से निंदा कर रहे हैं और कदम से कदम मिला रहे हैं।

Jai Narain Budhwar हर तरह की हिंसा के खिलाफ खड़े होना पड़ेगा। चुनी हुई चुप्पियां नहीं चलेंगी।

Satish Tyagi यशवंत पर हुआ हमला निंदनीय है। हम रोहतक के कितने ही साथी भड़ास के ज़रिए यशवंत से जुड़े हैं। हमें उनकी फिक्र है और हम पूरी शिद्दत से उनके साथ खड़े हैं।

Kailash Prasad Sharma एक निन्दा करने से नहीं, जबरदस्त विरोध होना चाहिए, तभी कुछ होगा सर…

Mahendra Agrawal बहुत ही निंदनीय, पत्रकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं एकजुटता की आवश्यक्ता है

Yasmeen Kausar Athar ये कब हुया?

Shambhunath Shukla चार दिन पहले. दिल्ली में ऐन संसद के पास.

Yasmeen Kausar Athar Omg… सभी वरिष्ठ पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान की जाए…. वरना सरकार इसकी, ज़िम्मेदार होगी…

डॉ.धनञ्जय सिंह भर्त्सना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो……..सही बात करनेवाला आदमी आज अकेला पड़ता जा रहा है, यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है

Awadh Sharma भाई ये यशवन्त सिंह तथाकथित सेकूलरों को खुश नहीं करते होंगे

ब्रजभूषण प्रसाद सिन्हा यशवंत जी ने अपनी फोटो भी फेसबुक पर पोस्ट की थी पर वे वामपंथी नहीं हैं, इसलिए रवीश जैसे पत्रकार भी चुप है।

Shalabh Mani Tripathi बेहद अफ़सोसजनक और दुर्भाग्यपूर्ण !!

Abhinav Chauhan सर, उनके बारे में बोलने से किसी की दुकान नहीं चलनी, इसलिए कोई नहीं बोलेगा।

Shambhunath Shukla यहाँ आप निंदा करिए, कौन चुप है कौन नहीं यह अलग प्रश्न है.

Chander Mohan Singla यशवंत जी पर हमला पत्रकारिता पर हमला नही मानते चापलूस मीडिया कर्मी ।

Ashok Kumar Kaliramna मैं निंदा करता हूँ हमले की

Rakesh Pandey वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह पर हमले की कड़ी निंदा, आरोपी शीघ्र पकड़े जाय।

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वीपीआई हामिद अंसारी का विदाई समारोह : संजय राउत ने चुटकी ली- ‘राज्यसभा टीवी चलता रहे!’

Shambhu Nath Shukla : हामिद अंसारी साहब बहुत याद आएंगे। पूरे दस साल वे भारत के वाइस प्रेसीडेंट रहे और राज्य सभा में कड़क प्रिंसिपल की तरह। सबको डांटते रहे, लड़ियाते भी रहे। मगर आज विदाई के दिन उन्हें प्रिंसिपल का चोला उतार देना था। आज भी अपने सम्मान में वक्ताओं का समय भी उन्होंने ही तय किया और बीच-बीच में हड़काते भी रहे।

सबसे बढ़िया विदाई भाषण जदयू के अली अनवर अंसारी ने दिया। उन्होंने उप सभापति कूरियन को पवनपुत्र हनुमान बताया और अंसारी साहब को भगवान राम। तुलना मार्मिक थी और भावप्रवण भी। अन्ना द्रमुक के मैत्रेयन ने तो नरेश अग्रवाल को भरे बाजार खींच दिया, यह बता कर कि सुबह नरेश तय कर देता था कि सदन चलने नहीं देना। पर नरेश पाला बदल कर सपा में चला गया और अहलूवालिया भाजपा में। बाद में नरेश जी ने सफाई भी दी पर जमी नहीं।

एनसीपी के मजीद मेमन का भाषण भी अत्यंत भावुक था और सीताराम येचुरी का भी। डेरेक पूर्ववत बंगालियों की तरह उछलते रहे। प्रधानमंत्री का भाषण बेहद संतुलित था। संजय राउत ने चुटकी भी ली और कह गए कि राज्यसभा टीवी चलता रहे। राज्यसभा टीवी वाकई है तो लाजवाब! आज के विदाई भाषण में अटलबिहारी बाजपेई और चंद्रशेखर जैसी गम्भीरता कोई वक्ता नही ला सका। न चचा मुलायम की तरह कोई चुटकी ले सका। जाइए महामहिम आप याद बहुत आएंगे। हामिद अंसारी साहब के भविष्य के प्रति मेरी भी शुभकामनाएं और उनको प्रणाम। उप सभापति कूरियन साहब की तरह मैं भी यही कहूँगा कि कल अच्छा ही होगा।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

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भारतीय रेल के लिए मोदी राज है ‘नर्क काल’, ताजा अनुभव सुना रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला

Shambhunath Nath : कहीं रेलवे को बेचने की तैयारी तो नहीं!… आज रेलवे की भयानक अराजकता और रेल कर्मचारियों की लापरवाही के साक्षात दर्शन हुए। सुबह मुझे कानपुर शताब्दी (12033) पकड़कर वापस गाजियाबाद आना था। कानपुर स्टेशन से यह गाड़ी सुबह छह बजे खुलती है। कानपुर में मैं वहां जहां रुका था, वह जूही कलाँ दो के विवेक विहार डब्लू-टू का इलाका स्टेशन से करीब सात किमी होगा। सुबह पहले तो बुकिंग के बावजूद ओला ने धोखा दे दिया। वह कैब आई ही नहीं और ड्राइवर ने फोन तक नहीं रिसीव किया। तब मेरे बहनोई स्वयं मुझे छोडऩे आए। इस तरह दो लोगों की नींद में खलल पड़ा।

हम घर से साढ़े पांच पर निकले थे और रास्ते भर यही सोचकर परेशान रहे कि कहीं टाटमिल चौराहे पर जाम न मिल जाए। खैर जब स्टेशन पहुंचे तो 5.48 हो रहा था। अपना सामान उठाए मैं भागता हुआ प्लेटफार्म में दाखिल हुआ तो गाड़ी का कहीं पता नहीं जबकि नियमत: उसे साढ़े पांच पर प्लेटफार्म पर लग जाना चाहिए। आखिर वहीं से यह ट्रेन चलती है। मगर ट्रेन प्लेटफार्म पर आई ही छह बजे। पूरी भीड़ ट्रेन के दरवाजों पर टूट पड़ी। मगर दरवाजे अंदर से ही बंद थे। सब उनके खुलने का इंतजार करते रहे। अब एक आदमी था जिसने एक के बाद एक कोच के दरवाजे खोलने शुरू किए। तेरह कोचों वाली इस ट्रेन के दरवाजे खुलने में ही 15 मिनट लग गए। सारे लोग एकदम से भड़भड़ा कर चढऩे लगे। और ट्रेन पांच मिनट बाद चल दी। अब जो चढ़ाने आए थे वे तो ट्रेन के अंदर तथा जिनको चढऩा था वे बाहर। हंगामा हुआ ट्रेन फिर रुकी और चली।

हमारा कोच सी-7 था। गाड़ी में बैठते ही मच्छरों ने घेर लिया। वृहदाकार के मच्छर जो भनभनाते तो डिस्टर्ब करते और चुप रहते तो हाथों-पांवों में काट लेते। हमे जो इंडियन एक्सप्रेस अखबार दिया गया उसे पढऩे की बजाय हम मच्छरों का शिकार करते रहे। मगर मच्छरों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि ट्रेन में चढ़ा हर मनुष्य परेशान हो गया। औरतें, बच्चे सब तंग। तब मैने अपना रौद्र रूप दिखाया और टिकट चेक करने आए बाबू से कंप्लेंट बुक लाने को कहा। बुक आ तो गई मगर उसमें पहले से जो शिकायतें थीं उन पर ही कोई जवाब नहीं आया था। दूसरी सवारियां भी उखड़ पड़ीं तब एक सफाई कर्मी आया और फर्श पर पोछा लगा गया। फिर जो चाय आई लाई गई उसका पानी ठंडा था। फिर टीटी बाबू को बुलाकर शिकायत की गई तो वेटर ने बताया कि ब्वायलर काम नहीं कर रहा। एक तो ट्रेन वैसे भी डिले थी उस पर उसकी गति ऐसी जैसे बारात चल रही हो।

कानपुर से इटावा आने में ही दो घंटे लग गए। उस शताब्दी से जिसकी स्पीड कम से कम 130 रखी जाती है। और कानपुर-इटावा की दूरी महज 133 किमी की है। फिर राम-राम करते ट्रेन चली तो जो नाश्ता आया वह भी ठंडा और ऊपर से मच्छरों की भरमार। टूंडला पार करने के बाद वह कर्मचारी आया जिसके कंधे पर ट्रेन की सफाई का भार था। उसने बताया कि मच्छर तो आएंगे ही ट्रेन रात को जंगल में खड़ी की जाती है। और हमारे पास हिट है नहीं। उसकी शैली से लग रहा था कि रेलवे सफाई के वास्ते जो सामान इसे मुहैया करवाता होगा उसे यह जरूर बाजार में बेच देता होगा। मजे से गुटखा खाते हुए और खूब फूला पेट लेकर वह जैसे आया था वैसे चला गया।

अलीगढ़ में स्टाप न होते हुए भी ट्रेन रोकी गई और तब कोच में एक अधिकारी आया और उसने हिट उसी कर्मचारी से मंगवाई और छिड़काव करवाया। उसके बाद ट्रेन चली मगर स्पीड वही साठ-सत्तर वाली। इस तरह जिस गाजियाबाद में हमें साढ़े दस पर पहुंच जाना था उस पर हम साढ़े बारह पर उतरे और एक बजे घर आए। समझ में नहीं आता कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने शताब्दी में तमाम तरह के सुविधा शुल्क लगाकर कानपुर तक का किराया लगभग 11 सौ रुपये कर दिया है मगर न तो कोई सुविधा बढ़ाई न खानपान की गुणवत्ता ही सुधारी। जबकि दस साल के मनमोहन राज और उसके पहले की सरकारों के वक्त भी शताब्दी जाड़ों के कोहरे के दौरान को छोड़ दिया जाए तो कभी लेट नहीं होती थी।

खाने का हाल यह है कि शताब्दी खाने और नाश्ते के नाम पर दो सौ रुपये और चार सौ रुपये वसूलती है पर नाश्ता ऐसा था कि उसे खाना दूभर। दो स्लाइस और एक डिब्बी मक्खन। न नमक न कालीमिर्च पाउडर। दो ही विकल्प थे या तो दो पीस कटलेट अथवा आमलेट। दोनों ही बेस्वाद और एकरस। पिछले 28 वर्षों से यही परोसते आ रहे हैं। प्रभु ने जब पैसे बढ़ाए थे तो कहा था कि खाने की क्वालिटी सुधरेगी। मगर क्वालिटी तो और गिरी। मजे की बात कि कानपुर और लखनऊ शताब्दी में इतनी भीड़ होती है कि कभी भी दो दिन पहले टिकट नहीं मिल पाती। पर इसका फायदा रेलवे उठाता है कि जो कुछ दे दो खा ही लेंगे। क्या ट्रेन को इस तरह लेट करने तथा साफ-सफाई न करने के पीछे रेलवे को निजी हाथों में देने की तैयारी तो नहीं चल रही है।

(जो कंप्लेंट मैने की उसका नंबर और पावती मेरे पास है। सोचता हूं कि दो दिन बाद रेलवे से पूछा जाए कि मेरी शिकायत पर हुआ क्या।)

अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vishwanath Dwivedi रेलवे का यह सामान्य अनुभव है. पता नहीं कब सुधरेगे हम लोग. मच्छर ही नहीं चूहे भी मिलते है शतब्दी में.
Rahul Bhardwaj ये भारत में विमान यात्रा को बढ़ावा देने का परोक्ष तरीका है
gazab kumar ये तो है शताब्दी का हाल, अब ज़रा सोचिए नार्मल ट्रैन का क्या हाल रहता होगा, और नीति निर्माता लोग अपने मुद्दे पर जनता से बहस करवाते हैं। व्यवस्था नहीं सुधरेगी फिर वही होगा कि प्राइवेट को सौंप दिया जाये…
Vir Vinod Chhabra शुक्र है कि आप गोमती एक्सप्रेस में नहीं बैठे। वैसे आप सुषमा जी को भी ट्वीट कर दें। विदेश मंत्री हैं तो क्या हुआ? उनका हृदय विशाल है।
Kaushal Madan सर सभी जगह ये ही हाल है कब सुधरें भगवान जाने
Vinay Oswal सब को साथ लेने के बाद विकास होगा। अभी तो शिकायतें इकठ्ठी की जा रही हैं। फिर विचार करेंगे किस एजेंसी से निस्तारण कराएं। उसके खर्चे भी जोड़े जाएंगे टिकट में। ऐसे में उन एजेंसियों का विकास होगा। आपको गलत फहमी तो नहीं कि किसका विकास किये जाने का लक्ष्य है?
Nitish Shukla आपने चिल्लाकर ‘जय भारत माता’ नहीं बोला, बोलते ही यकीन मानिए सारी तकलीफ कम लगने लगती
Prabhat Mishra 13 मार्च को लखनऊ शताब्दी से कानपुर से आया था, जैसा खराब खाना दिया गया उसे देखकर लग रहा कि रेलवे को डाक्टर भी रेल में रखना पड़ेगा इलाज के लिए.
Rakesh Pandey एक सवाल? कहीं रेलवे की बेचने की तैयारी तो नहीं … एक जवाब! देश के हालात रेलवे जैसे ही हैं।
Om Shanker Porwal मोदीराज में सबसे बदतर व्यवस्था रेलवे की ही है, सारी ट्रेने लेट, गति आराममय, खड़ी तो खड़ी, खाना बदतर, तमाम शिकायतो के बाद भी इसका कोई पुरसाहाल नहीं है।
Akmal Faruqi आपकी एक बात से इत्तेफ़क नही रखता की 12033 अलीगढ में स्टोपेज नहीं है Shambhunath Nath ji 9.05 का शेडयूलड आने का समय है
Shambhunath Nath बहुत से लोग मेरी बहुत-सी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। पर मैं तो वही लिखूंगा जो कानपुर में रेलवे ने एनाउंस किया। कानपुर से ट्रेन खुलते ही एनाउंस होने लगा कि यह ट्रेन यहां से चलकर इटावा और गाजियाबाद रुकेगी। अब अलीगढ़ वालों ने भी पव्वा लगवा लिया होगा। सो इसे रुकवाने लगे। आखिर भाजपा के आदि पुरुष कल्याण सिंह का गृह जिला जो है। पहले इटावा नहीं रुकती थी तो मुलायम राज में रुकने लगी थी।
Akmal Faruqi बहुत से लोग मेरी बहुत-सी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। आपकी इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ
Chitaranjannath Tiwaric अच्छे दिन हैं साहब…. थोड़ा विधर्मी, कुलच्छनी ममता बैनर्जी को भी याद कर लिया जाय !!!
Nadim S. Akhter Shambhunath Nath जी, देख पा रहा हूं कि आपको पोस्ट लिखे करीब 35 मिनट हो गए. इस पर लाइक और कमेंट की संख्या को देखते हुए आपको भी अंदाजा लग रहा होगा कि लोग ट्रेन को लेकर कितने जागरूक हैं. जाने दीजिए. सबको आदत हो गई है. कितनों से लड़िएगा. हां, रेलवे से सवाल-जवाब जारी रहे तो बेहतर. अपडेट जरूर दीजिएगा. इंतजार रहेगा.
Anil Maheshwari This catering system in Indian Railways has become a big fraud. Whether you want or not, you have to pay it. It was introduced by Scindia as Railway Minister. The time has come, it should be abandoned. Anyone willing to pay can purchase items from the pantry car as is the case with the trains in the USA. Shambhunath Nath
Shambhunath Nath पेंट्री तो ओवरनाइट जर्नी वाली किसी भी ट्रेन में नहीं लगती। हम या तो स्वयं बाजार से खरीद कर चलें अथवा ट्रेन कहां से हमारे लिए खाने की व्यवस्था करेगा। इटावा और अलीगढ़ में तो सामान्य रोटी-दाल भी ढंग का मिल जाए तो बहुत है। कानपुर से दिल्ली की दूरी कुल 444 किमी की है और शताब्दी इसे पांच घंटे में पूरी करती है। इस बीच भोजन नहीं तो भाव तो मुहैया करवाएं।
Anil Maheshwari Youn are correct. I was talking about this catering business in all the trains, in particular Rajdhani and Shatabdi trains.
Shambhunath Nath ऐसा भी होगा तो रेलवे किसी एक कंपनी को ठेका देगा और अभी भी रेलवे शताब्दी में किसी को ठेका ही देती है। खाना पैक कर उसमें चढ़ा लिया जाता है। चूंकि शताब्दी अधिक से अधिक सात घंटे की यात्रा करती है इसलिए इस दूरी के लिए पेंट्री रखना मुमकिन नहीं। शताब्दी का बटर-चिकेन देख लें तो नानवेज खाना ही छोड़ देंगे। और वेज में वे अरहर की बजाय खेसारी की वह दाल परोसते हैं जिस पर 1975 में बैन लगा दिया गया था।
Anil Maheshwari That is why the choice should be left to the passenger. If one does not like tyhe Railway food, one can bring food from his house or restaurant, as we used to do in the past.
Giriraj Kishore रेलवेज़ क्या हर जन माध्यम को विशिष्ट में बदलने की योजना है। मैंने जबसे रेल में सफ़र करना आरंभ किया रेलवे में इतनी अव्यवस्था पहले कभी नहीं देखी।
Vijay Balyan विमान यात्रा को बढ़ावा देने का परोक्ष तरीका……. अच्छे दिन हैं
राजेश कुमार यादव रेल और रेलकर्मी आपसे कष्ट के लिए क्षमा चाहते हैं, साथ ही रेलवे मे खाली पदों को भरने के लिए आपसे हमारा साथ देने की अपील भी करते हैं ।
Rudresh Kumar मोदी सरकार ने सिर्फ लोगों की जेबे खाली करने के तरीके ढूंढे हैं। सुविधा देने के नहीं।
Anil Kumar Yadav प्राइवेट करने में ही भलाई है। टीटी और जो तोंद वाले भाई साहब गुटका खा कर मज़ा मार रहे थे, उनको भी पता चल जायेगा।
Sanjaya Kumar Singh रेल मंत्री पानी और चखना भिजवाने से ऊपर की शिकायतों का जवाब भी नहीं देते। और फेसबुक वालों को बिल्कुल भाव नहीं देते। ट्वीटर पर शिकायत कीजिए तब शायद सुनें भी।
Shambhunath Nath मैं फेसबुक के जरिये रेलवे मंत्री से जवाब नहीं मांग रहा बल्कि जनता को सचेत कर रहा हूं ताकि वे सब जरा-सी भी असुविधा होते ही शिकायत पुस्तिका में शिकायत दर्ज करवाएं। मेरी लिखित शिकायत को सक्षम अधिकारी ने बाकायदा दस्तखत कर पावती दी है। अलीगढ़ में जब ट्रेन रुकवाई गई तब एक अधिकारी आया और उसने बाकायदा हमारी शिकायत और सीट का भी फोटो लिया। अब कुछ न कुछ तो होकर रहेगा। मैं तो बोड़ चला जाऊँगा शिकायत करने।
Sanjaya Kumar Singh सही बात है। सभी यात्रियों को अपने अधिकारों के प्रति ऐसे ही सचेत रहना चाहिए।
Umesh Kr कही अब आपको देशविरोधी ना घोषित कर दिया जाए
Shambhunath Nath अब मैं आप सब लोगों की तरह इतना कायर तो नहीं। अपन सिर्फ फेसबुक बहादुर ही नहीं हैं कोर्ट तक जाएंगे। ऐसे नहीं यहां हठी और पागलों के बीच डटे हैं।
Rao Deepak पहले सिस्टम को ख़राब करो, फिर बीमार बता के बेच दो।
Vikas Patel भगवान भरोसे रेलवे विभाग…. और सुनने मे आ रहा है कि भोपाल का हबीबगंज स्टेशन का निजीकरण कर बंसल कंम्पनी के दिया जा रहा हैl संम्पूर्ण भारत के यही हाल…
Govind Prasad Bahuguna आपने जिस तरह हालात बयान किये उसको पढकर लगा जैसे मैं खुद सफर ही नहीं बल्कि suffer कर रहा हूँ। मेरा सुझाव है इस लेख को बिना सम्पादित किये रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को जरूर भेज दीजिए। आप विख्यात पत्रकार हैं सब आपको जानते हैं कार्यवाही जरूर होगी। नहीं तो फिर रवीशकुमार के साथ इस इश्यू को हाइलाइट करिये ।
Suresh Sharma कार्रवाई होना चाहिए वरना लापरवाह कमिंयो को सबक नही मिलेगा ।
Nikhil Katiyar बुलेट train की तैयारी मे सरकार बिजी है असुविधा के लिये खेद है
Nimish Sharma Sir aapki is shikayat ka me samarthan karta hu,jab shatabdi ka ye hal he to sir mail express aur passenger trains to ram bharose hain
Sujata Choudhary उसके बाद जब मोबाईल पर आवाज आती है रेलवे से कोई शिकायत हो तो कृपया इस नम्बर पर बताएं ,असुविधा के लिए खेद है,।उस समय क्या इच्छा होती है बता नहीं सकती। जब अडानी को समुद्र दिया जा सकता है तो रेलवे क्या चीज है।
Smith Agrawal Delhi bhopal satabdi ka bhi bura haal hai. मैं तो कंप्लेंट करके थक गया, जवाब वही एक पुराना घिसा पिटा सा है। खैर अब तो सरकार देशभक्तो की है तो प्रश्न उठाने का तो सवाल ही नहीं उठता। वैसे भी 2020 तक वेटिंग ख़त्म करनी ही है।
Prakash Kumar Jha हम रेलवे में काम करने वाले कभी शताब्दी राजधानी नहीं चढ़ पाते…. तो उसका एक्सपीरियंस नहीं है, पर खाना सच में खराब मिलता है, उसका कारण है ठेकेदारी सिस्टम में गला काट प्रतियोगिता… जिसके कारण बहुत ऊँचे दाम पर पैंट्री लिया जाता है, ठेकेदार उसका पैसा वसूलने के लिए खराब खाना देते हैं, और ज्यादा पैसे लेते हैं, पूर्णतः निजीकरण जल्द ही होगा, उस समय स्थिति और खराब ही होगा… इतना तय है…
Pratik Bajpai बहुत बुरा हाल है रेलवे का ,विपक्षी रेलवे जैसे मुद्दे उठाने के बजाय ऊना ,नजीब, जैसे फालतू मुद्दे पर समय बर्बाद कर रहे है ।मुझे भी कुछ ऐसे ही एक्सपेरियन्स हुए है
Sudhendu Patel इसे कहते हैं मोदिजी का गुड गवेरनेंस ! प्रभु तो प्यादा ही हैं न गुरू.
Kalyan Kumar वास्तव में रेलवे का जितना बुरा हाल सुरेश प्रभु के कार्यकाल में है, उतना मैंने पहले कभी नहीं देखा…सफाई नहीं, खाना ठीक नहीं, सफर का समय लंबा और पता नहीं और कितनी कमियां समा गई हैं…शताब्दी-राजधानी से बेहतर तो लोकल ट्रेन लगने लगी है…कम से कम खिड़की खोलकर खुली हवा तो ले सकते हैं….फिर अद्भुत भारत के दर्शन भी हो जाते हैं…
Shoeib Khan टिकट लेट बुक कराओ तो चार्ज बढ़ने का प्रावधान लेकिन ट्रैन लेट हो तो कोई हर्जाना नही। मज़ेदार है न ?
Pawan Mishra You got IE in Shatabdi, good
Pankaj Singh प्रभु (सुरेश) को याद कीजिए….सब अच्छा होगा।
gazab kumar रेलवे की व्यवस्था पहले से अगर कुछ बेहतर हुई है तो उसका लाभ, गाजीपुर बनारस और पूर्वांचल के विभ्भिन ज़िलों को ही मिला है, जिसका श्रेय केवल मनोज सिन्हा जी को जाता है, सुरेश प्रभु जी से बेहतर इस विभाग को सुषमा जी देख सकतीं हैं। जब बहुमत में सुरेश प्रभु जी का ये हाल है, तो समर्थन दिए होते तब पता नहीं क्या होता।
Abhay Singhai कल मैं जलगाँव से सागर कामायनी एक्सप्रेस से आया था। ए सी बी1 कोच के टॉयलेट में पानी नहीं था अंदर पोस्टर लगे थे कि सफाई के लिये बाहर दरवाजे पर अंकित मोबाइल पर सम्पर्क करें ,परन्तु कहीं कोई नम्बर नहीं लिखा था। टॉयलेट गन्दे पड़े थे।सब प्रभु की माया है।
Raj Kumar सबसे बुरा ये है कि रेलवे अब आधे से एक घंटे की देरी को देरी मानता ही नहीं है। आपकी अगर छः बजे की ट्रेन है और ६:२० या ६:४० तक ट्रेन नहीं आयी, तब भी रेलवे उसे सही टाइम ही मानता है। और नोटिस बोर्ड पर लेट नहीं दिखता। अब ६:३० पे अनाउन्स होता है की ट्रेन समय पे हैं और ६:०० बजे प्लेटफ़ार्म पे आएगी। जबकि आपकी घड़ी में ६:३० हो रहा है। स्टेशन मास्टर और पूछ ताछ केन्द्र के लोग गुंडागर्दी करते हैं। सवारी को लगता है कि ट्रेन किसी और प्लेटफ़ार्म पर खड़ी है, इसलिए लेट नहीं दिखा रहा है। इससे अफ़रातफ़री का माहोल भी बन जाता है।
Rajesh Kumar बिल्कुल सही कहा सर जी, सफ़ाई व्यवस्था पुरी ठेकेदार के पास है,हॉस्पिटल से मरीज़ प्राइवेट हॉस्पिटल में भेजे जा रहें हैं,दवाइयाँ सीधे उपलब्ध होने की जगह स्थानीय क्रय से आ रहीं हैं, कभी-2 मिलती हैं कभी नहीं भी, कर्मचारी संविदा पर रखे जा रहें हैं, रेल कारखाने जिस चीज़ को ख़ुद बनाते थे और फ़ायदे में रहते थे वही सामान बाहर से ख़रीदा जा रहा है और अब घाटा बढ़ता जा रहा है, ठेकेदार के लोगों को न तो चार्जशीट से डर है न नौकरी जाने का…पद खाली पड़े हैं…अवैध वेंडर और दलालों की पौ बारह है, सारे निर्माण जो रेलवे ख़ुद कराती थी सब ठेके पर
धीरेन्द्र अस्थाना It is same situation in 12003 Lko to Delhi. I never expected such treat by IR.
Somnath Bhattacharya हम सबको भी यह सहना पड़ता है। कहते हैं पर कोई सुनता नहीं। आप बड़े और सम्मानित पत्रकार है शायद बात पहुँच जाये और प्रभु की कृपा हो ।
Pradeep Singh रेलवे की यह दुर्दशा बताती है कि यह कर्मचारियों की लापरवाही है। अपने देश में अच्छे कर्मचारी का चयन नहीँ किया जाता है। सामाजिक न्याय के नाम पर नौकरी दी जाती है। सामाजिक न्याय का साथ दीजिए।
Yogendra Sharma इसके लिए सीधे ठेकेदार और अधिकारी जिम्मेदार हैं। समय-समय पर इसकी न जांच होती है न निगरानी होती है।
Deepak Sootha यात्रियों के सब्र का इम्तिहान तो रोज़ होता है। कोई सुनने वाला नहीं। आपका प्रभु आराधन शायद स्वीकार हो जाय।फिर भी एक ही दिन ( inspection day) का सुधार नज़र आ सकता है। जहाँ तक रेल के बिकने का सवाल है, वह आज नहीं तो कल हक़ीक़त बनना तय है। भोपाल के हबीब गंज रेल स्टेशन से शुरुआत हो चुकी है।

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पत्रकारिता की राह पर शंभूनाथ शुक्ला का सफर… कुछ यादें, कुछ बातें

मैं बनवारी जी से मिलने साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर दिल्ली आ गया

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल

जब से विजुअल मीडिया का दौर आया है पत्रकारिता एक ग्लैमरस प्रोफेशन बन गया है। पर हमारे समय में दिनमान ही पत्रकारिता का आदर्श हुआ करता था और रघुवीर सहाय हमारे रोल माडल। लेकिन उनकी दिक्कत यह थी कि वे साहित्यकार थे और पत्रकारिता उनके लिए दूसरे दरजे की विधा थी। पर दिनमान वे पूरी पत्रकारीय ईमानदारी से निकालते थे। हमारे घर दिनमान तब से आ रहा था जब उसके संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे। लेकिन जब मैने उसे पढऩा शुरू किया तो संपादक रघुवीर सहाय हो गए थे।

दिनमान हम पढ़ते जरूर थे। उसके तीखे तेवर, हर विषय पर सामयिक टिप्पणी और उसके शीर्षक। सदस (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) का नियमित कालम तथा श्याम लाल शर्मा, शुक्ला रुद्र, सुषमा पाराशर, त्रिलोक दीप और जवाहर लाल कौल के लेख और रपटें। पर बनवारी जी ने जब इस पत्रिका में कदम रखा तो इसके तेवर ही बदल गए और यह एक विशुद्ध रूप से सामयिक पत्रिका बन गई।

बनवारी जी के लिखने की स्टाइल ही अलग थी। चाहे वह नेपाल के चुनाव की रपटें हों या दिल्ली में कुतुब मीनार की सीढिय़ों से फिसल कर ४२ बच्चों की मौत की रपट। अब तो शायद लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज से ३२ साल पहले तक कुतुब मीनार पर चढ़ा भी जा सकता था। लेकिन १९८२ में एक भयानक दुर्घटना घटी। कुतुब मीनार देखने आई छात्राओं की एक भीड़ भरभराती हुई तीसरी मंजिल से नीचे आ गिरी, उसमें ४२ छात्राएं मरीं। बनवारी की इस रपट की हेडिंग थी घिसी हुई सीढिय़ों पर मौत। मुझे यह शीर्षक इतना आकर्षक और रपट इतनी कारुणिक लगी कि मैं सिर्फ बनवारी जी से मिलने के लिए साढ़े चार सौ किमी की यात्रा तय कर कानपुर से दिल्ली आ गया।

चूंकि मैं हावड़ा-दिल्ली (इलेवन अप) एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली आया था और वह ट्रेन सुबह पांच बजे ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन आ जाया करती थी इसलिए पूरे तीन घंटे तो प्लेटफार्म पर ही वाक कर काटे और आठ बजे के आसपास वहां से पैदल ही दिनमान के दफ्तर के लिए निकल पड़ा। ठीक नौ बजे १० दरियागंज स्थित टाइम्स बिल्डिंग में पहुंच गया। पता लगा कि बनवारी जी तो दस के बाद आएंगे। लेकिन वहां मौजूद सक्सेना नामके चपरासी ने चाय पिलाई और समोसे लाकर खिलाए।

मैं उसकी सज्जनता से गदगद था। उसने बताया कि टाइम्स से उसे १२ सौ रुपये महीने पगार मिलती है जो मेरी पगार से ड्यौढ़ी थी जबकि मैं कानपुर में दैनिक जागरण में उप संपादक था। खैर करीब सवा दस बजे बनवारी जी आए। मैं उनसे जाकर मिला। वे हल्की लाइनों वाला कुरता तथा एकदम झकाझक सफेद पायजामा धारण किए हुए एक बेहद सौम्य और उत्साही पत्रकार लगे। पर यह भी महसूस हुआ कि शायद पत्रिकाओं के संपादक कुछ हौवा टाइप के हुआ करते थे। क्योंकि बनवारी जी मुझसे बात करते समय कुछ सहमे से लगे और बार-बार संपादक रघुवीर सहाय के केबिन की तरफ देख लिया करते थे। ऐसा लग रहा था कि अभी एक दरवाजा खुलेगा और एक डरावना सा अधबूढ़ा संपादक निकलेगा। जो महान कवि होगा और महान चिंतक भी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और केबिन खुला तो खाकी रंग की एक जींस नुमा पैंट पहने एक व्यक्ति निकला और लंबे-लंबे संगीतकार जैसे बालों वाले सदस की टेबल तक गया फिर उसने हाल पर नजर डाली मुझे भी देखा और लौट गया। बनवारी जी ने बताया कि वे रघुवीर जी थे।

मेरी मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन न तो बनवारी जी ने मेरी उनसे मुलाकात के लिए बहुत उत्कंठा जताई और न ही वे सज्जन हाल में ज्यादा देर तक रुके थे। इसलिए मन मारकर चला आया। दिल्ली में तब तक किसी को जानता नहीं था इसलिए नई दिल्ली स्टेशन गया। पता लगा कि गोमती जाने को तैयार है। टिकट लिया कुल बीस रुपये अस्सी पैसे का। और ट्रेन में जाकर बैठ गया। तब गोमती एक्सप्रेस नई-नई चली थी। और दिल्ली के बाद सीधे कानपुर आ कर ही रुकती थी। सामने वाली बर्थ पर जो मोहतरमा थीं वे कोई लखनऊ के नवाब परिवार से ताल्लुकात रखती थीं। जब भी वे अपना पानदान खोलतीं तो पूरा कोच उसकी गमकती खुशबू से भर जाता।

आगे है…

मोहन बाबू ने कहा- नौकरी चलती रहेगी, लेकिन होगी ठेके पर

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अतुल माहेश्वरी की पुण्य स्मृति : इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा…

Shambhunath Shukla : नौकरी छोड़े भी चार साल हो चुके और अमर उजाला में मेरा कुल कार्यकाल भी मात्र दस वर्ष का रहा पर फिर भी उसके मालिक की स्मृति मात्र से आँखें छलक आती हैं। दिवंगत श्री अतुल माहेश्वरी को गए छह वर्ष हो चुके मगर आज भी लगता है कि अचानक या तो वे मेरे केबिन में आ जाएंगे अथवा उनका फोन आ जाएगा अरे शुक्ला जी जरा आप यह पता कर लेते तो बेहतर रहता। इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा।

साल 2002 की अगस्त में मैने अमर उजाला ज्वाइन किया था और 2011 की तीन जनवरी को वे नहीं रहे पर इतने ही वर्षों में उन्होंने ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो दुर्लभ थी। वे अपना बुरा चाहने वालों का भी भला चाहते थे। स्वयं का नुकसान उठाकर दूसरों का भला करने में भरोसा करते थे और अपने कर्मचारियों को अपना सहकर्मी समझते थे। संपादकीय विभाग के लिए वे एक पत्रकार पहले थे मालिक बाद में। हारी-बीमारी में मदद करने के लिए उनका हाथ सदैव खुला रहता और अपना दिया पैसा वापस लेने में वे उतना ही संकोच करते। ऐसे अमर उजाला के स्मृतिशेष मालिक को कोटिश: प्रणाम।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के इस एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Vivek Shukla : मेरा अतुल जी से परिचय भाई Hari Joshi जी ने 1988 में करवाया। मैं सन्डे मैगज़ीन के लिए लिखने लगा। फिर एक दिन उन्होंने मुझे मेरठ बुलाया। कहा, आप दिल्ली से खेल और बिज़नेस पर लिखो। 1989 में लोक सभा चुनाव, फिर खाड़ी युद्ध और उसके बाद भी अमर उजाला से दैनिक हिन्दुस्तान में रहते हुए जुड़ा रहा। कई बार उनसे बंगाली मार्किट में मिला भी। बेहतरीन इन्सान थे वे। पर बाद में अमर उजाला में भी कुछ मित्रों को हटाया गया तो लगा क़ि बदलने लगा है अमर उजाला।

Lalit Chaturvedi : शत शत नमन। शुक्ला सर पत्रकारिता के इस असाधारण व्यक्तित्व की असामयिक मौत प्राकृतिक तो नहीं थी। यह बात दबी जबान से आप सभी जानते हैं। आश्चर्य है कि 6 वर्ष बाद भी परिवार या वाह्य आवरण में इस प्रश्न को किसी ने नहीं छेड़ा। सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब इस तथ्य की निष्पक्ष जाँच होगी तथा सच सामने होगा। हां, अतुल भाई साहब के जाने से कुछ लोग आज अरबों में जरूर खेल रहे हैं। उन्हें सजा दिलाना जरूरी है।

Surendra Mohan Sharma : दस ग्यारह वर्ष की उम्र में अतुल और राजुल के साथ बचपन में खेलने का मौका मिलता था जब वे अपने पिता श्री मुरारीलाल माहेश्वरी जी के साथ होलीगेट मथुरा पर रहते थे। उनके पिता और मेरे पिता का अच्छा दोस्ताना था उस समय। असमय ही चले गए अतुल। नमन।

Harendra Narayan : बहुत सच्चे इंसान. भोपाल में पत्रकारिता के बाजारवाद पर खुद का लिखा पेपर पढा था। आज भी याद है। मुझे बुलाया था। समय ऐसा बदला फिर उनसे मिलना ना हुआ। अब न वो रहे, न मैं पत्रकारिता में! ऐसे इंसान को श्रद्धासुमन।

Mukesh Shriram : अतुलजी को सादर नमन…आज के सभी मीडिया मालिकों को अतुलजी जैसा मन और समर्पण मिले। कोटिशः धन्यवाद…

राकेश कुमार मिश्रा : स्व. डोरी लाल अग्रवाल जी मुरारी माहेश्वरी जी से विनम्रता सीखी है अगली पीढ़ियों ने। क्या ग़ज़ब लोग थे ये।


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यादे! कितने सरल और सहज थे अतुल माहेश्वरी

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अनिल यादव ने जब लेखक बनने के लिए लंबी छुट्टी की अर्जी अतुल माहेश्वरी को दी…

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अतुल माहेश्‍वरी ने कहा- जाकर कानपुर में संपादकीय प्रभार संभालिए

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प्रॉपर्टी डीलरों को सदस्यता, पत्रकारों की बेदख़ली… यह है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का सच!

कल दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की वोटिंग है। मुझे एक संजीदा पत्रकार मानते हुए लोगबाग मुझे भी अप्रोच कर रहे हैं कि मैं उनके पैनल को वोट करूं। मगर मैं करूं तो कैसे, मेरा वोट ही कहां है? आज तक मुझे प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने यह जवाब नहीं दिया कि मुझे इस क्लब का सदस्य नहीं बनाने के पीछे उनका तर्क क्या है। क्या मैं उनके मानकों को पूरा नहीं करता? पिछले 33 साल से मैं पत्रकार हूं और वह भी श्रमजीवी। इंडियन एक्सप्रेस समूह में बीस साल रहा। 12 साल अमर उजाला में और पिछले 17 वर्षों से मान्यताप्राप्त पत्रकार हूं तथा आज भी यह मान्यता है। क्लब के मानकों के अनुरूप मेरी नियमित मासिक आय जो पहले दो लाख के करीब थी अब रिटायर होने के बाद घट अवश्य गई लेकिन पत्रकारीय पेशे से ही मुझे 50 हजार रुपये मासिक की आय तो आज भी है।

चूंकि मैं शराब नहीं पीता इसलिए मेरा कोई उधारखाता प्रेस क्लब में नहीं चलेगा और न ही कोई बकाया होगा। नियमित उनका चंदा चुकाऊँगा ही। और उलटे उनके पदाधिकारियों की शराब का खर्च भी यदा-कदा वहन कर लिया करूंगा। मैने तीन-तीन सौ रुपये देकर आवेदन किया, सारे कागजात जमा किए मगर मुझे दिल्ली के प्रेस क्लब का सदस्य नहीं बनाया गया जबकि इसी बीच प्रापर्टी डीलरों, सत्ता के दलालों और फर्जी पत्रकारों को सदस्य बनाया गया। मैने पूछने की कोशिश भी की पर प्रेस क्लब के पदाधिकारी अपने को विशेष सुविधा प्राप्त होने का दावा करते रहे और मेरी जिज्ञासा ठंडे बस्ते डालते रहे। हालांकि इस प्रेस क्लब को तमाम सरकारी सुविधाएं मिली हुई हैं। दिल्ली के सबसे प्राइम लोकेशन में इतनी शानदार जगह और मद्य, मांस व मदिरा पर अथाह छूट। यह सब लेकर भी पदाधिकारीगण सदस्य किसको बनाते हैं इस पर कभी बहस होनी चाहिए और इसका उचित जवाब मिलना चाहिए।

प्रेस क्लब को एक्साइज में छूट वाली शराब दी जाए। जमीन दी जाए और प्रेस क्लब परिसर में रेलवे रिजर्वेशन काउंटर हो, ये सुविधाएं क्यों जब वहां पर पत्रकारों का ही प्रवेश निषेध हो।  मज़े की बात जब मैने शिकायत दर्ज की तो एक सज्जन ने कहा कि फॉर्म जमा करते वक्त आपने बताया क्यों नहीं? मैने कहा क्यों बताता। मैं क्यों कोई सिफारिश लगवाऊं, क्या मैं फर्जी पत्रकार हूं और फिर जब फॉर्म में सब लिखवा ही लिया था तब सिफारिश क्यों? प्रॉपर्टी डीलरों को तो सदस्यता और पत्रकारों की बेदख़ली, यह है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का सच॥

अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Harshvardhan Tripathi सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं मिली। ये प्रेस क्लब के पदाधिकारियों का मानसिक दिवालियापन दिखाता है। सच यही प्रेस क्लब की सदस्यता के लिए पदाधिकारियों से जुगाड़ लगाना ही होता है। इतना ही नहीं 7500 से ज्यादा सदस्यों वाले प्रेस क्लब के चुनाव में बमुश्किल 1500 लोग मत डालते हैं। लोगों को मताधिकार का महत्व समझाने वाले पत्रकार मत डालने नहीं आते। सुनते हैं प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने इधर अच्छी कमाई की है। इसीलिए सिर्फ अपने लोगों को सदस्यता, अपने लोगों का चुनाव।

Pramod Bramhbhatt प्रेस क्लब आफ इंडिया अप्रजातांत्रिक हो गया है। वहां साढ़े 12 हजार रुपए के साथ एक प्रेस क्लब सदस्य की अनुशंसा पर प्रेस वार्ता की पात्रता है यानि बिना अप्रोच और पैसे के कोई आदमी अपनी बात भी मीडिया के सामने नहीं रख सकता है। जबकि इससे तो बेहतर राज्यों के प्रेस क्लब हैं जहां हर व्यक्ति मात्र कुछ सैकड़े में प्रेस जगत के सामने अपनी बात रख सकता है। शुक्ल जी जब गाय इतनी दुधारू होगी तो राजनीति तो लाजमी है।

Sudesh Ranjan प्रेस क्लब को अपने सभी सदस्यों की लिस्ट सार्वजनिक करनी चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि पॉपर्टी डीलरों और गैर पत्रकारों को सदस्यता कैसे दी गई? एक सफाई अभियान वहां भी चलाया जाए।

Sanjaya Kumar Singh जब आप सदस्य नहीं बन पाए तो मुझे कौन पूछता। हर जगह चुनाव लड़ने वाले वोटर भी बनाते हैं (कुछ तो फर्जी भी) पर अपना प्रेस क्लब इन सब लफड़ों से ऊपर है। वोट मांगे जाते हैं लेकिन वोटर बनाने पर किसी का ध्यान नहीं है।

Sunil Yadav सर LUCKNOW प्रेस क्‍लब भी ऐसा ही है, यहां दिल्‍ली से भी अधिक जंगलराज है , इसके कारण ज्‍यादातर पत्रकार वहां आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में जाने से परहेज करते हैं

Suresh Sharma ईमानदारी से काम करने वाले कस्बाई अंचल से लेकर राष्ट़ीय स्तर तक के पत्रकार इस पीड़ा के शिकार है

Sunil Mishra पत्रकारीय नैतिकता के मानक पूरे होने से भी आप इनकी नजर में पत्रकार नही हैं तो ये दोष आपका कतई नही।

Yogendra Sharma इसका तात्पर्य यह है कि प्रेस क्लब की सदस्यता के लिए चाटुकार होना ज़रूरी है। ऐसे जगह आप अपनी मर्ज़ी से नहीं लिख सकते। यानि की एक गुलाम पत्रकार। हो सकता है मेरी ये धारणा गलत हो।

Narendra Tomar वहां एक ताकतवर कोकस का साम्राज्य है जो बहुत खास पहचान / सिफारिश के बिना दाखिल नहीं होने देते हैं ।

Kumar Atul चंडीगढ का भी बुरा हाल है । वहां भी मीडियाकर्मी कम माफिया ज्यादा काबिज हैं । वहां तो बकायदा कारपोरेट मेम्बर बनाने का चलन है । लाखों की फीस है। जाहिर है टुटपुजिये मीडियाकर्मियो की जगह उन्हीं का राज है । दिल्ली प्रेस क्लब से कई गुना बड़ा है । स्वीमिंग पूल और लान टेनिस कोर्ट भी है । अय्याशियो के लिए और क्या चाहिए।

Shravan Shukla आजकल फिल्म सिटी में प्रचारकों की बाढ़ आई हुई है। न्यूजरूम में घुस ही जाते हैं। अपन तो पहले ही हाथ जोड़ लेते हैं कि भैया हम सदस्य नहीं। उसके बाद ऐसे भागते हैं, जैसे पहचाना ही नहीं। पहले ऐसे बोलते हैं,जैसे लंगोटिया यार जमाने बाद मिले हों। हालांकि अधिकतर परिचित ही होते हैं।

Shashi Kant Rai यही हाल पत्रकारिता की भी है सर। पत्रकारिता से अब जनसरोकार और मिशनरी भाव हट सा गया है।बिजनेश हाबी है।मिशन की जगह कमीशन ने ले लिया है। दिल्ली प्रेस क्लब दलालों का अडडा सा बन गया है। जहा शाम होते होते शराब की नदियां बहनी शुरू हो जाती हैं जो देर रात तक चलती हैं। केवल कमीशन वाली पत्रकारिता करने वालों का ही बोलबाला है।मिशनरी पत्रकार तो मजदूरों से भी बदतर जीने को मजबूर हैं। मीडिया घराने खूब फल फूल रहे हैं। काला धंधा को सफेद कर रहे हैं मीडिया की आड में। ऐसे में पत्रकारिता और पत्रकार दोनों पर संकट आ पडा है।

Devendra Yadav अभिजात्य-कुलीन और श्रमजीवी पत्रकारिता में यही एक मौलिक भेद है।क्लब के सदस्य आप जैसे बौद्धिक पत्रकार जनों को एक खतरे के रूप में देखते हैं।

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रेणुका शहाणे नाम की एक सामान्य और औसत दर्जे की अभिनेत्री ने सभी पत्रकारों का अपमान किया

Shambhunath Nath : रेणुका शहाणे नाम की एक सामान्य और औसत दर्जे की अभिनेत्री ने कल एक लिंक शेयर किया जिसमें उन्होंने बताया था कि पत्रकार कितने मूर्ख, जाहिल और अपढ़ होते हैं कि वे इंटरव्यू करते समय कोई होमवर्क करके नहीं आते। इसके बाद जैसे ही यह लिंक फेसबुक पर वायरल हुआ तमाम तरह के संघी, मुसंघी और सेकुलर संघी टूट पड़े पत्रकारों के बारे में कुछ भी आँय-बाँय-साँय लिखने लगे। लगभग सभी ने कहा कि पत्रकार दलाल होते हैं, पढ़े लिखे नहीं होते और मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं और सारे के सारे पत्रकार दंभी होते हैं। लेकिन क्या वे महान संघी, मुसंघी और सेकुलर संघी लेखक, साहित्यकार, कलाकार, राजनीतिकार बताएंगे कि क्या आज देश में बाकी के पेशे उतने ही ईमानदार बचे हैं जैसे कि उनसे अपेक्षा की जाती है? क्या स्वयं रेणुका देवी जी बता सकती हैं कि वे भावाभिव्यक्ति में कितनी माहिर हैं और कितने तरह की भावाभिव्यक्ति की जा सकती है?

क्या आज के नामी-गिरामी एक्टर या एक्ट्रेसेस यह जानते हैं कि भरत मुनि कौन थे? और कितनों ने उनका नाट्य शास्त्र पढ़ा है? आज के राजनेता जब यह तक नहीं जानते कि मुजफ्फराबाद पाक अधिकृत कश्मीर में है या भारत के कश्मीर में और तक्षशिला व नालंदा में फर्क क्या है तो आप कैसे अपेक्षा करते हैं कि पत्रकारिता दूध की धुली होगी? जिस देश में शिक्षक अनाचार सिखाते हों जहां नौकरशाह लूट मचाए हों और स्वयं पुलिस वाले थाने में बुलाकर गरीब स्त्रियों का पेटीकोट उतरवाते हों, विधायक-सांसद अपनी आमदनी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते हों, नामी अस्पतालों में मरीज को आपरेशन के बहाने लिटाकर उसके अंग निकाल लिए जाते हों और इंजीनियर इमारतें गिराते हों वहां एक पत्रकार ही सच्चाई की बिना पर बिना कुछ खाये-पिये डटा रहेगा।

जहां पर संसद के अंदर बैठकर सांसद अपने वेतन-भत्ते बढ़वा लें, हर चार साल में सरकारी नौकरों के लिए नया वेतन आयोग आ जाए और जिसका जब जी चाहे हड़ताल पर चला जाता हो वहां पर पत्रकारों को न्यूनतम मजदूरी न मिलती हो वहां कौन पत्रकारिता करने आएगा? जैसा समाज होता है वैसे ही उस समाज में रहने वाले लोग। जब कुएं में भांग पड़ी हो तो होशमंद लोग कहां से लाओगे? मगर हर आदमी पत्रकार और पत्रकारिता को कोस कर चला गया। आप पत्रकारिता और पत्रकारों को कोसकर गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर उन असंख्य पत्रकारों का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने सच्ची बात के लिए अपनी जान दी। स्वयं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, मोहनदास कर्मचंद गांधी, बाबा साहेब अंबेडकर, मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू पत्रकार भी रहे हैं। संघी नेताओं में अटलबिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी पत्रकार रह चुके हैं। अत्याचार, अनाचार और कुतर्कों के विरुद्ध पत्रकार ही लड़े हैं। कोई एक्टर, एक्ट्रेसेस या फेसबुक के पठ्ठे नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला की एफबी वॉल से.

रेणुका शहाणे ने जो फेसबुक पर लिखा है, उसका हिंदी अनुवाद ये है….
एक जाने-माने अख़बार के ‘पत्रकार’ ने मुझे फोन किया. मैं उन्हें यहां शॉर्ट में जे कहूंगी.
जे: मैम हम आपका एक इंटरव्यू करना चाहते हैं, एक कॉलम के लिए जो वरिष्ठ टीवी एक्टरों के बारे में है.
मैं: ठीक है.
जे: तो जैसा कि मुझे याद है, ‘सुरभि’ के अलावा आपने ‘स्वाभिमान’ किया था, है ना?
मैं: बहुत से सीरियल किए, लेकिन ‘स्वाभिमान’ नहीं.
जे: ओ नहीं.. तो फिर ‘शांति’ था? बहुत ही लोकप्रिय था…
मैं: हां, बहुत लोकप्रिय था, लेकिन मैं उसमें नहीं थी.
जे (लगा कि वो अचंभे में है) : अरर.. तो फिर आप किस सीरियल में थीं? प्लीज़ अपने सीरियलों के नाम बताइए?
मैं: आप होमवर्क क्यों नहीं करते?
जे: प्लीज़ मैम अभी मेरी मदद करिए.. मैं अगली बार से मैं होमवर्क करूंगा.. बस कुछ सवाल हैं.
मैं: ठीक है.
जे: जो सीरियल आप करती थीं और जो आज आते हैं, उनमें क्या फर्क है?
मैं: जिन सीरियलों में मैं काम करती थी वो वीकली (साप्ताहिक) थे.
जे: वीकली?
मैं (संयम से) : अब तो डेली सोप आते हैं.. उन्हें डेलीज़ कहते हैं क्योंकि वो रोज दिखाए जाते हैं.. मेरे सीरियल वीकली कहलाते थे, क्योंकि वो हफ्ते में एक बार दिखाए जाते थे.
जे: सिर्फ़ हफ्ते में एक बार? आपका मतलब है कि एक हफ्ते के लिए एक कहानी?
मैं: नहीं.. आपको कैसे समझाऊं? देखिए, दैनिक अख़बार होते हैं, साप्ताहिक पत्रिकाएं होती हैं, पाक्षिक होते हैं और मासिक भी होते हैं.. कुछ तो तीन महीने में भी प्रकाशित होते हैं? ठीक है?
जे: तो आपके पास तो बहुत विविध चीजें थीं जैसे साप्ताहिक, पाक्षिक.
मैं: नहीं.. नहीं.. मेरा मतलब है कि हमारे पास विविधता थी.. लेकिन मैं तो सिर्फ एनालॉजी ड्रॉ (मिसाल दे रही थी) कर रही थी, ताकि आप अपने काम के हिसाब से आप इसे समझ सकें.
पॉज
मैं: आप हैं ना?
जे: जी मैम, मैंने सोचा कि आप कुछ ड्रॉ कर रही हैं इसलिए मैं इंतज़ार कर रहा था.
मैं: हम्म्म. आप कुछ नोट भी कर रहे हैं क्या?
जे: मैम मेरी याददाश्त ज़बरदस्त है.. आपने ‘सुरभि’ में अभिनय किया था, और आपने ‘शांति’ में भी अभिनय किया था जो कि साप्ताहिक था और आपने पंद्रह दिन और तीन महीने में एक बार आने वाले सीरियलों में भी अभिनय किया था.
मैं (अपनी हंसी को दबाते हुए): आप ज़बरदस्त हैं.. आपको सब कुछ याद है.. क्या अब मैं जा सकती हूं.. ड्रॉइंग करने.. ड्रॉइंग एनालॉजी.
जे: जी मैम.. अगर आप मुझे अपनी एलर्जी की ड्रॉइंग व्हाट्स एप करेंगी तो मैं इसे आपकी हॉबीज में रखूंगा.. बहुत ही अच्छा रहेगा.
गहरी सांस.. कुछ पत्रकार बहुत मनोरंजन करते हैं.. पूरे मामले की अच्छी बात ये है कि मैंने एक कैनवास ख़रीद लिया है.. हालांकि अभी एलर्जी की ड्रॉइंग नहीं बना पाई हूं.
गौरतलब है कि इससे पहले भी रेणुका शहाणे की एक फेसबुक पोस्ट काफी चर्चा में रही थी, जिसमें उन्होंने काले हिरण के शिकार मामले में फिल्म ‘हम आपको हैं कौन’ के अपने सह-कलाकर सलमान खान को बरी किए जाने पर सवाल उठाए थे.

ओरीजनल अंग्रेजी में है जो इस प्रकार है….
Renuka Shahane : A “journalist” called on behalf of a well-known daily, I’ll call him J for short.
J: Ma’am we would like to ‘do’ your interview for a column about veteran tv actors.
Me: Okay
J: So apart from Surabhi which I remember you’ve done Swabhimaan right?
Me: Many serials but not Swabhimaan
J: Oh no no it was Shanti right? It was very popular….
Me: It sure was but I wasn’t in it?
J (sounding utterly gobsmacked): Er….then what were you in? Please tell me names of your serials?
Me: Why didn’t you do your homework?
J: Please ma’am help me now…I will do it from next time….only a few questions
Me: Okay
J: What is the difference between the serials you did & the serials today?
Me: Serials I acted in were weeklies.
J: Weeklies?
Me ( patiently): We have daily soaps now…they are called dailies because they are shown daily. My Serials were called Weeklies because they were shown once a week
J: Oh so only once a week? You mean one story for one week?
Me: No….how do I explain this? You have daily newspapers, weekly magazines, fortnightly ones & monthly ones…..some are printed quarterly? Right?
J: Oh so you had a lot of variety like Weeklies & Fortnightly
Me: No no….I mean we had variety….but I was just drawing an analogy so that you could relate it to your work
Pause
Me: Are you there?
J: Yes ma’am….I thought you were drawing something so I waited
Me: Hmmmm are you writing anything down at all?
J: Ma’am I’ve got an excellent memory…..you’ve acted in Surabhi….and you’ve acted in Shanti which was a weekly & you acted in a variety of Fortnightly & quarterly Serials too ma’am
Me (trying to hold back the mirth): You’re amazing….you’ve got it spot on….now may I please go back to er….drawing analogies
J: Sure ma’am….if you what’s app me the photo of the drawing of the “allergy” I can include it as your hobby….it’s a very unique concept.
Sigh….some journalists are a source of great entertainment…..the upside is that I’ve bought myself a canvas….still not been able to draw my “allergy” though.

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यूपी के जंगलराज से भयमुक्त होने के लिए वरिष्ठ पत्रकार ने अपनाया था यह नायाब तरीका

Shambhunath Shukla : तीव्र शहरीकरण किसी इलाके को हुआ है तो वह शायद एनसीआर का इलाका ही होगा। देखते ही देखते दिल्ली के करीब बसे नोएडा व गाजियाबाद में इस तेजी से बहुमंजिली इमारतें खड़ी हुई हैं कि यह पूरा इलाका कंक्रीट के जंगल में ही बदल गया है। इसमें भी गाजियाबाद जिले का इंद्रा पुरम इलाका तो अव्वल है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब यहां से गुजरने मेें दिन को भी डर लगता था। मैने यहां पर अपना 200 मीटर का एक भूखंड इसलिए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को वापस कर दिया था क्योंकि 1993 में उन्होंने इस भूखंड के लिए 264000 रुपये मांगे थे जो कि मेरे लिए बहुत ज्यादा रकम थी और मैने वह आवंटित भूखंड सरेंडर कर दिया।

साल 2008 में जब मैं नोएडा अमर उजाला के दिल्ली-एनसीआर-हरियाणा संस्करण का कार्यकारी संपादक था तब अक्सर नोएडा के अपने दफ्तर से लौटते हुए देर हो जाया करती और ड्राइवर अपने घर चला जाता तब मुझे अपनी एवियो कार स्वयं ड्राइव करते हुए वसुंधरा आना पड़ता। सीआईएसएफ वाली रोड से मैं कनावनी पुलिया आता और वहां से लेफ्ट टर्न लेकर जनसत्ता अपार्टमेंट। उस समय सीआईएसएफ रोड पर रोज राहजनी अथवा कार लूट हुआ करती थी। मुझे भी कभी-कभी सन्नाटे में डर लगता और एक दिन मैने अपने एक गूजर मित्र से अपनी व्यथा कही। उसने कहा कि सर जी आप चाहो तो रिवाल्वर का लायसेंस ले लो पर क्या फायदा आप चलाओगे हो नहीं उलटे उसकी सुरक्षा करने में जान जा सकती है। आपकी सुरक्षा का उपाय मैं ढूंढ़ता हूं।

एक दिन वह आया अपने साथ मास्टर ब्रह्मपाल नागर की रागिनी का कैसेट लेकर। और मेरी गाड़ी के स्टीरियो में उसे फुल आवाज में बजाया तथा कहा कि सर जी अब आप को कोई खतरा नहीं है। आप दो काम करो एक तो रात को लौटते वक्त कार का एसी मत ऑन करना और दरवाजों की खिड़कियों के सारे शीशे खोलकर रखना। तथा फुल आवाज में यह कैसेट बजाते हुए चले जाना। किसी की हिम्मत नहीं है कि आपकी कार को रोक ले या ओवरटेक कर ले। उसकी उक्ति कारगर रही और मैं बड़े मजे से कभी रात 11 बजे तो कभी 12 बजे आता रहा मगर किसी ने गाड़ी नहीं रोकी। एक रागिनी ने मेरे अंदर आत्मविश्वास भर दिया। जब मैने ब्रह्मपाल को यह बात बताई तो उन्होंने मुझे अपनी रागिनी के कई कैसेट भेंट कर दिए। अब तो उन्हें नहीं सुन पाता मगर मास्टर ब्रह्मपाल नागर की रागिनी एक जमाने में पूरे एनसीआर में धाक तो भरती ही थी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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दवा कंपनियों की माफियागिरी के खिलाफ बोलने की अखबारों और सरकारों में हिम्मत नहीं

Shambhunath Shukla : एलोपैथी दवा कंपनियां बड़े पूंजी घरानों के पास हैं और एलोपैथी के चिकित्सक उनके क्रीत दास। ये कंपनियां ही दिल्ली तथा समस्त मेट्रो टाउन्स के हाई-फाई अस्पताल भी चलाती हैं। नतीजा यह होता है कि इनके पालक डॉक्टर कम बीमार को घोर बीमार बता देते हैं और जिसका आपरेशन करने की जरूरत नहीं है उसे अपने चहेते अस्पताल के गंदे व इन्फैक्टेड ओटी में लिटा देते हैं। नतीजा यह होता है कि दस प्रतिशत रोगी इनके ओटी से बाहर आने के कुछ समय बाद दम तोड़ देते हैं।

जो अस्पताल में ही दम तोड़ देते हैं उन्हें लेकर यदि उनके परिजनों ने हंगामा किया तब तो एकाध अखबार छोटी-मोटी खबर छाप देते हैं और कहीं घर जाकर मरा तो अस्पताल तो साफ मुकर जाएगा। किसी अखबार, नेता या पोलेटिकल पार्टी अथवा सरकार की हिम्मत नहीं है कि उनके विरुद्ध कोई पहल करे। दवा कंपनियों की यह माफियागिरी किसी संगठित माफिया से कम घातक नहीं है। हथियारों और नशे के सौदागरों के समान ही एलोपैथी दवा कंपनियों की दादागिरी है। ये विज्ञान और वैज्ञानिकों को भी खरीदे हुए हैं तथा मीडिया को भी।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त कोई व्यक्ति इन्हें अगर सर्टीफिकेट दे दे तो ये पाकसाफ नहीं हो जातीं। मेरा तो आज भी मानना है कि होम्योपैथी गरीब आदमी के लिए वरदान है। कलकत्ता, कानपुर, बम्बई और अहमदाबाद में जब कल-कारखाने लग रहे थे तो मशीनों की धड़धड़ व रुई तथा जूट के रेशों से फेफड़ों की बीमारी हो जाया करती थी तो इन गरीब और बेसहारा मजदूरों को होम्योपैथी दवाएं तथा घरेलू चिकित्सा पद्घतियां ही बचाया करती थीं। तब गुड़ उनके लिए रामबाण था। इसलिए आप लोग नोबेल विजेता वेंकटरमण रामकृष्णन के झाँसे में मत आइए। न तो होम्योपैथी अवैज्ञानिक है न यूनानी विद्या ज्योतिष। आज भी कोलकाता में होम्यो डॉक्टरों के यहां लाइन लगती है वे मूर्ख नहीं हैं। होम्योपैथी को पढ़ें और जानें कि होम्योपैथी एलोपैथी की तुलना में वैज्ञानिक तो है ही साथ में गरीब आदमी के लिए अमृत।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार हर महीने दस हजार रुपये की किताबें खरीदकर पढ़ जाते हैं!

Shukla SN : रवीश कुमार: भीड़ में एक चेहरा! मीडिया में आया हर पत्रकार रवीश जैसी चकाचौंध चाहता है, ग्लैमर चाहता है पर रवीश बनना आसान नहीं है. उन जैसे सरोकार तलाशने होंगे और उन सरोकारों के लिए एकेडिमक्स यानी अनवरत पढ़ाई जरूरी है. रवीश बताते हैं कि साहित्य या फिक्शन की बजाय वह इकोनामिक्स और सोशियोलाजी तथा साइसं पढ़ते हैं और इन्हीं विषयों की किताबें खरीदते हैं. उनकी किताब खरीद का बजट कोई दस हजार रुपये महीना है.

रवीश ने बिजली वाली स्टोरी करने के लिए बिजली के बारे में ही नहीं पढ़ा बल्कि इसके लिए बिजली से बनते-बिगड़ते अर्थशास्त्र को जानने के लिए उन्होंने अमेरिका से पांच हजार रुपये की एक किताब मंगवाई. इसी तरह कचरे पर अरबनाइजेशन पर वे निरंतर पुस्तकें पढ़ते रहते हैं. यह जरूरी भी है सरोकार का टारगेट समझना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक उस सरोकार से होने वाले विकास को समझना. विकास एक द्विअर्थी शब्द है जिसका प्रतिक्रियावादी और प्रगतिकामी अलग-अलग अर्थ बताते हैं. एक विकास नरेंद्र मोदी का है तो दूसरा नीतीश कुमार का, अखिलेश यादव का और मायावती का. पर प्रश्न वही है कि आप किस तरह के सरोकारों के साथ खड़े हैं. (‘शुक्रवार’ मैग्जीन के अगले अंक में मेरे लेख “रवीश के सामाजिक सरोकार” से)”

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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मैत्रेयी पुष्पा बनी हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष : अकादमिक चयन में केजरीवाल सरकार के कदम ज्यादा स्वीकार्य

एक अच्छी और लोकप्रिय सरकार का काम है कि कम से कम अकादमिक संस्थाओं में काबिल और अविवादास्पद लोगों को बिठाए। इन पर कैडर को बिठा देने का मतलब होता है कि सरकार के पास योग्य व्यक्तियों का अकाल है। एनडीए की पूर्व अटल बिहारी सरकार इस मामले में खरी उतरी थी। अकादमिक संस्थाओं में दक्षिणपंथी विद्वान बिठाए जरूर गए थे मगर उनकी योग्यता पर कोई अंगुली नहीं उठी थी। पर मोदी सरकार के वक्त ऐसे लोग बिठा दिए गए हैं जो योग्यता में बौने तो हैं ही विवादास्पद भी हैं। 

यही कारण है कि चाहे वह इतिहास का मामला हो अथवा विज्ञान का सब जगह बौने बैठ गए हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि दक्षिणपंथी आरएसएस के विचारकों में विद्वानों और अविवादास्पद लोग न हों पर सरकार जब तय कर ले कि वह तो चुन-चुनकर भक्तों को ही बिठाएगी तो क्या कहा जा सकता है। इसी के बरक्स तुलना करिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर चर्चित व प्रतिष्ठित साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा (Maitreyi Pushpa) का चयन। 

यह चयन अधिक औचित्यपूर्ण व बुद्धिमत्ता का कदम है। मैत्रेयी जी न सिर्फ साहित्य की दुनिया में चर्चित नाम है वरन् समाजशास्त्रीय विश्लेषण में भी लाजवाब हैं। उनके सारे उपन्यास एक पूरी कथा ही नहीं पूरे समाज को व्याख्यायित भी करते हैं। चाक, अल्मा कबूतरी और ईसरी जैसे असंख्य अद्भुत और समाज व इतिहास का आईना दिखाने वाले उपन्यास लिखने वाली मैत्रेयी जी को बधाइयां।

शंभुनाथ शुक्ला के एफबी वॉल से

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जब खुद नेताओं ने पत्रकारों को बताया कि उनका सही नाम क्या है और इसे कैसे लिखा जाए

Shambhunath Shukla : ग्लासनोस्त दर्शन के प्रणेता और सोवियत संघ के कर्ताधर्ता मिखाइल गोर्बाचेव साल 1988 में भारत आए तो दिल्ली के सारे अखबारों को सोवियत सूचना केंद्र ने एक-एक पेज का विज्ञापन दिया। हमारे जनसत्ता को भी दिया गया। मगर उनका नाम गलत न छपे इसलिए कनाट प्लेस के बाराखंभा रोड स्थित सोवियत सूचना केंद्र का एक रूसी अधिकारी हमारे दफ्तर आया और उसने बताया कि साहब आप लोग हमारे नेता का नाम गलत लिखते हैं। उनका सही नाम गोर्बाचेव नहीं गोर्बाच्येव है।

 

उस रूसी अधिकारी ने स्याही वाले पेन से नागरी लिपि में गोर्बाच्येव का नाम इतना सुघड़ लिखा कि हम उसके मुरीद हो गए। चौधरी चरण सिंह के अंतिम दिनों में उनके विलायतपलट सुपुत्र अजित सिंह ने एक दिन स्वयं आकर बताया कि साहब हमारा नाम अजित सिंह है अजीत सिंह नहीं जैसा कि आप जनसत्ताई लोग लिखते हो। नीतिश कुमार ने खुद हमारे संपादक प्रभाष जोशी को फोन कर बताया था कि मेरा नाम नीतिश कुमार है नीतीश कुमार नहीं। लेकिन आज तक मुझे यह बात समझ नहीं आई कि जब खुद पूर्व प्रधानमंत्री दस्तखत करते समय अपना नाम अटलबिहारी वाजपेयी लिखा करते थे तो अरुण जेटली जैसे बच्चों की हिम्मत कैसे पड़ गई उनका नाम बिगाड़ कर अटलबिहारी बाजपाई बोलने की।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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जीवन जीने की आजादी देने वाले किसान की चिंता न सरकार को है, न विपक्षी नेताओं को और न शहरी मध्यवर्ग को

Shambhunath Shukla : हिंदुस्तान में पढ़ाई मंहगी है, इलाज मंहगा है और ऐय्याशी (शराबखोरी, होटलबाजी, शौकिया पर्यटन आदि-आदि) मंहगी है। लेकिन सबसे सस्ता है भोजन। आज भी मंहगे से मंहगा गेहूं का आटा भी 45 रुपये किलो से अधिक नहीं है और गेहूं 28 से अधिक नहीं। रोजमर्रा की सब्जियां भी 40 से ऊपर की नहीं हैं। अगर आप दिन भर में एक स्वस्थ आदमी की तरह 2400 कैलोरी ग्रहण करना चाहें तो भी अधिक से अधिक 50 रुपये खर्चने होंगे। मगर जो किसान आपको इतना सस्ता जीवन जीने की आजादी दे रहा है उसकी चिंता न तो सरकार को है न विपक्षी नेताओं को और न ही शहरी मध्यवर्ग को।

 

एक एकड़ में 25 कुंतल गेहूं पैदा करने के लिए किसान को जो मंहगी-मंहगी खादें व कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है वह उसकी कुल लागत से थोड़ा ही अधिक होता है। और एक किसान अगर उसके पास सिंचाई के पूरे साधन हैं तो भी अधिक से अधिक देा फसलें ले सकता है। उसमें भी धान और गेहूं की फसल लेने वाले ही किसान अधिक होते हैं। सरसों या दालें बोने पर पैसा तो आता है मगर लागत बढ़ जाएगी और कहीं खुदा न खास्ता सावन-भादों सूखा निकल गया और फागुन-चैत भीगा तो फसल गई। अब ऐसे में किसान आत्महत्या न करे तो क्या करे। इसके बाद भी कलेक्टर के यहां से हरकारा आ जाता है लगान और आबपाशी वसूलने। इस धमकी के साथ ढिंढोरा पिटवाया जाता है कि अगर किसान ने वक्त पर लगान व आबपाशी न जमा की तो किसान के खेत की कुर्की तय। हैं न अजीब सरकारें! किसान की फसल चौपट हो जाए, सूखा, बारिश या पाला-पाथर पड़ जाए अथवा हमलावर लूट लें, खेतों में खड़ी फसल को आग लग जाए या नीलगाय फसल चर जाए पर सरकार की वसूली तय है।

अरे इन मौजूदा तुर्कों से बेहतर तो अलाउद्दीन खिलजी, शेरशाह सूरी और जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर जैसे मध्ययुगीन शासक थे जिन्होंने लगान के लिए उपज को पैमाना माना था। यानी फसल चौपट तो लगान भी नहीं। मगर हमारी ये लोकप्रिय और लोकतांत्रिक सरकारें बेशर्मी के साथ विधायिका में प्रस्ताव लाकर अपने वेतन-भत्ते तो बढ़वा लेती हैं पर किसानों को आत्महत्या के लिए उकसाती हैं। एक मंतरी से लेकर संतरी तक के वेतन की अनुशंसाओं के लिए आयोग हैं, न्यूनतम मजदूरी तय करने के लिए भी लेकिन आज तक न तो कृषिभूमि रखने की न्यूनतम हदबंदी तय की गई है न किसान को अपनी जमीन न अधिग्रहीत करने देने का अधिकार है। इसमें कांग्रेस और भाजपा और जनतापार्टी व जनतादल की सरकारें बराबर की उस्ताद रही हैं। ऐसी क्रूर व निकृष्ट तथा किसान विरोधी सरकारों की क्षय होवे और ऐसे लोभी व धूर्त राजनेताओं की भी तथा नौकरशाही व मीडिया कर्मियों व शहरी मध्यवर्ग की भी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था

Shambhunath Shukla : 1983 में जब दिल्ली आया तो शुरू-शुरू में राजघाट के गेस्ट हाउस में रहा करता था। जनसत्ता के संपादक दिवंगत प्रभाष जोशी ने मेरा, राजीव शुक्ल और सत्यप्रकाश त्रिपाठी के रहने का इंतजाम वहीं पर करवा दिया था। उस गेस्ट हाउस की खास बात यह थी कि वहां पर लंच व डिनर में अरहर की दाल भी मिलती थी। यह दाल हमारी सबसे बड़ी कमजोरी थी। इतनी अधिक कि हम जनसत्ता की नौकरी छोड़ वापस कानपुर जाने की ठान रखे थे। और तब चूंकि दिल्ली के ढाबों में छोले-भटूरे व मां-चने की दाल के सिवाय कुछ नहीं मिलता था इसलिए हमने ठान लिया था कि हम कानपुर लौट जाएंगे।

 

भाड़ में जाए यह जनसत्ता की नौकरी जो नवभारत टाइम्स व हिंदुस्तान से कम वेतन देता था। सब एडिटर के तीन इंक्रीमेंट देने के बाद भी मात्र 1463 रुपये और वह भी हर महीने दो-तीन दिन के पैसे कट जाते क्योंकि हम जब छुट्टी लेते तो वह छुट्टी अवैतनिक हो जाती। ऊपर से इंडियन एक्सप्रेस के लोगों ने हमें बता रखा था कि इस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका हिंदी अखबार पटापट बंद कर देते हैं। इसलिए उनके मूड का कोई भरोसा नहीं है। पर सही समय में प्रभाष जी ने राजघाट गेस्ट हाउस में अरहर की दाल का इंतजाम कर दिया। उसी गेस्ट हाउस के परिसर में कवि भवानी प्रसाद मिश्र रहा करते थे।

हम रोज उस आवास के बाहर हिंदी में लिखी उनकी नेमप्लेट देखते और सोचते कि एक दिन उनके पास जाना है। उनकी एक नहीं अनगिनत कविताएं हमें याद थीं। एक रोज पिताजी को मैने पत्र लिखा कि मैं कानपुर आ रहा हूं बहुत हो गई यह दिल्ली की नौकरी। यहां की पत्रकारिता में वह चार्म नहीं जो डकैतों के इलाके में रिपोर्टिंग करते हुए महसूस होता था। जनसत्ता से तो दैनिक जागरण भला। भले वहां पगार कम थी और मेहनत ज्यादा पर मनोनुकूल काम का अवसर तो था। इस पर पिताजी का पत्र आया जिसमें भवानी प्रसाद मिश्र की कविता कोट थी-

जन्म लिया है खेल नहीं है/
यहां नाचना ही होता है/ हर राधा को
भले किसी के पास मनाने को/ छटाक भर तेल नहीं है।

इसके बाद कानपुर सिकनेस कुछ दिन के लिए रुक गई। पर जब फिर कानपुर की हूक उठी तो मैं हिम्मत कर भवानी बाबू के आवास पर पहुंच गया और काफी देर के इंतजार के बाद जब वे मिले तो मैने उनको अपने पिताजी का वह खत दिखाया और कहा कि क्या आपके पास ऐसी और कोई कविता है जो मुझे दिल्ली रोक सके। भवानी बाबू के धीर-गंभीर चेहरे पर मुस्कान झलकी और फिर उन्होंने कई कविताएं सुनाईं। उनमें से जो मुझे सबसे अधिक पसंद आई वह थी- “कठपुतली गुस्से से उबली …….!”

बाद में भवानी बाबू ने हमारे संपादक प्रभाष जी को कहा कि आपके परचे से अच्छे लोग जुड़े हैं। जब प्रभाष जी ने यह बात बताई तो हमने कहा कि बस अब नहीं जाना। यहीं रहना है। आज उन्हीं भवानी बाबू यानी भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म दिन है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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रवीश की यही समझ उन्हें बड़ा बनाती है

Shambhunath Shukla : टीवी न्यूज चैनलों में Ravish Kumar एक शानदार एंकर ही नहीं है या वे महज न्यूज चयन में सतर्कता बरतने वाले बेहतर टीवी संपादक ही नहीं अथवा आम आदमी के सरोकारों के प्रति आस्था जताने वाले पत्रकार ही नहीं है वरन उनकी असल खूबी है उनकी सामाजिक सरोकारों के प्रति आस्था। एक ही उदाहरण काफी होगा जब कल उन्होंने एक वृद्घ से बात करते हुए कहा कि बेटियां न होतीं तो क्या होता! इस एक वाक्य ने हम पति-पत्नी को भिगो दिया। मुझे खुशी हुई यह सुनकर।

मेरी तीन बेटियां हैं और दो बहनें भी। सब रोज फोन करती हैं कैसे हो भैया और कैसे हो पापा। न कोई बेटा न कोई भाई। मगर बेटियां या बहनें कोई बेटे या भाई से कमतर तो नहीं। यह अलग बात है कि हर कोई कहता रहता है कि एक बेटा होता तो अच्छा होता। खाक अच्छा होता! मुझे अपने मरने के बाद कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं कराना और जिनके घर बेटे होते हैं तो आमतौर पर देखता हूं कि बेटे की नौकरी के बाद वे भी अलग-थलग रह जाते हैं। अथवा बेटे की शादी होती है तो बहू से पटी न पटी तब फिर क्या! इससे तो बेटियां-बहनें अच्छी माँ-बाप व भाई की पीड़ा को समझती हैं और हर कष्ट या पीड़ा में सहायक होती हैं।

कुनबा बेटियों से बढ़ता है बेटे तो अलग रहते व बसते हैं। बेटियों के प्रति संवेदनशील हो समाज। बेटियों को सम्मान दोगे तो तय मानिए कि बहू भी खुद को सम्मानित महसूस करेगी। वाकई रवीश की यही समझ उन्हें बड़ा बनाती है। मैं तो चाहूंगा कि रवीश सदैव ऐसे ही सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक बने रहें।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव ने फेसबुक को अलविदा कहा!

Shambhunath Shukla : नया साल सोशल मीडिया के सबसे बड़े मंच फेस बुक के लिए लगता है अच्छा नहीं रहेगा। कई हस्तियां यहाँ से विदा ले रही हैं। दक्षिणपंथी उदारवादी पत्रकारों-लेखकों से लेकर वाम मार्गी बौद्धिकों तक। यह दुखद है। सत्ता पर जब कट्टर दक्षिणपंथी ताकतों की दखल बढ़ रही हो तब उदारवादी दक्षिणपंथियों और वामपंथियों का मिलकर सत्ता की कट्टर नीतियों से लड़ना जरूरी होता है। अगर ऐसे दिग्गज अपनी निजी व्यस्तताओं के चलते फेस बुक जैसे सहज उपलब्ध सामाजिक मंच से दूरी बनाने लगें तो मानना चाहिए कि या तो ये अपने सामाजिक सरोकारों से दूर हो रहे हैं अथवा कट्टरपंथियों से लड़ने की अपनी धार ये खो चुके हैं। इस सन्दर्भ में नए साल का आगाज़ अच्छा नहीं रहा। खैर 2015 में हमें फेस बुक में खूब सक्रिय साथियों- रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव की कमी खलेगी।

Om Thanvi : नमस्कार। आदाब। दोस्तो, एक और साल जीवन से जाता है। नया आता है। आप सबको नया साल बहुत खुशगवार गुजरे; आपके घर, परिवार, मित्रों (और कहूँगा जो मित्र नहीं हैं उनके यहाँ भी) खुशियां आएं। आपके सपने पूरे हों; नए सपने बुनें, देखें। वे भी पूरे हों। नए साल की देहरी पर यह मेरी हार्दिक शुभकामना है। यह संदेश मेरी ओर से फिलहाल आखिरी संदेश है। साल विदा होता है और मैं भी। मुझे अभी फेसबुक से अवकाश चाहिए। बेमियादी। आखिरी यों कि नए जमाने का माध्यम है। अपने आप को आजमाना इतना ही था कि जमाने के साथ हैं या पिछड़ गए। प्रतिक्रिया और प्रेम का जो सैलाब उमड़ा वह यह बताने को काफी था कि फेसबुक कोई अजनबी दुनिया अपने लिए नहीं है। पर इसमें अब काफी वक्त हो चला। और फिलहाल यों कि इसमें लिखने-पढ़ने के काम अटके रहते हैं। उनके लिए समय चाहिए। फेसबुक को अपना समय चाहिए। जितने मित्र और पढ़ने वाले बढ़ते हैं, मेरी बेचैनी भी बढ़ती जाती है। इसलिए अंततः अवकाश लेता हूँ। कितना, कब तक – कुछ पता नहीं। फिर मिलेंगे गर खुदा लाया। नमस्कार। आदाब। साभिवादन, ओम थानवी।

Virendra Yadav : कुछ मित्रों का कहना है कि मुझे विवादों में नही पड़ना चाहिए . दरअसल मेरे लिए ये विवाद थे भी नही हस्तक्षेप ही रहे हैं . फिर भी सच तो यह है कि चाहे ‘रायपुर प्रसंग’ हो, सी आई ए-कमलेश का मुद्दा हो ,’छिनाल -प्रसंग’ हो या निराला-प्रेमचंद का भगवा अधिग्रहण हो या डॉ.धर्मवीर की प्रेमचंद को ‘सामंत का मुंशी’ की मुहिम या अन्य कई और प्रसंग हों ,हर मसले या मुद्दे पर मैंने अपनी सोच-समझ के अनुसार हस्तक्षेप किया है . यह करते हुए मैंने अपने कई अच्छे मित्रों को नाराज़ किया है और खोया भी है , वैसे इन मुद्दों पर साथ देने वाले साथी भी कम नही रहे हैं.लेकिन मुझे लगता है कि आम प्रवृत्ति व्यावहारिक चुप्पी की होती जा रही है .संगठन भी ‘कांख भी ढकी रहे और मुठ्ठी भी तनी रहे’ की व्यावहारिक भूमिका में ही ढलते जा रहे हैं. ऐसे में बेहतर यही है कि ‘काजी जी दुबले क्यों ,शहर के अंदेशे से’ मसल अपने ऊपर ही क्यों लागू करवाई जाय..इसलिए जरूरी है कि अपने लिखने-पढने पर अधिक केन्द्रित हुआ जाय और इस मुगालते से मुक्त हुआ जाय कि कुछ कहने -सुनने या सिद्धांत ,सरोकार या पक्षधरता आदि से कुछ बनना या बिगड़ना है .’ होईहै वही जो राम रचि राखा’ पर भरोसा न करने के बावजूद हो तो वही रहा है जो ‘राम’ रच रहे हैं. इसलिए मन है कि फिलहाल कुछ विराम लिया जाय अपने इस ‘विवादी’ स्वर से और फेसबुक से भी . अतः कह नही सकता कि यहाँ कब ,कितनी उपस्थिति हो पायेगी. वैसे भी असली मुद्दों का समर स्थल आभासी दुनिया न होकर वास्तविक दुनिया है. अतः फिलहाल जरूरत वहां ज्यादा है .अभी के लिए फेसबुक से लम्बा अवकाश .धन्यवाद मित्रों. आप सब को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल, ओम थानवी और साहित्यकार वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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आज ये कहना कि वे हमारे माल हैं, आरएसएस की बेहयाई है

सांप्रदायिकता पूंजीवाद और औद्योगिक सभ्यता की देन है। बाजार हथियाने के लिए बाजारवादी शक्तियां सांप्रदायिकता का हथकंडा अपनाती हैं। अपनी सांप्रदाकियता की धार को तेज करने के लिए वे अतीत को भी सांप्रदायिक बनाने का कुत्सित प्रयास करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सामंती काल में भी मंदिर-मस्जिद ढहाए गए पर उसके पीछे सोच सांप्रदायिक नहीं विजित नरेश के सारे प्रतीकों को ध्वस्त करना था। हिंदू शासकों ने भी जब कोई राज्य जीता तो वहां के मंदिर तोड़े और पठानों व मुगलों ने भी जब कोई मुस्लिम राजा को हराया तब मस्जिदें भी तोड़ीं।

ये अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए उनके पूजा स्थल बनवाते भी थे। तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जब हिंदू शासकों ने मस्जिदें बनवाने के लिए अनुदान दिया और मुस्लिम शासकों ने मंदिरों के लिए माफी की जमीन दी। किसी भी सामंती शासक ने किसी धर्म पर प्रहार नहीं किया। जो लोग यह सोचते हैं कि फिर इतनी भारी संख्या में मुसलमान कैसे बने क्योंकि तुर्क जब आए तो मुठ्ठी भर ही थे। तो इसका भी एक मजेदार तथ्य है और वह भी परवर्ती व्यापारी कंपनी के काल का।

शुरू में अंग्रेजों को लगा कि अगर इंडिया के हिंदुओं का द्विज तबका ईसाई बना लिया जाए तो यह देश उनके कहे मुताबिक चलेगा। उन्होंने गोआ, कोचीन और कोलकाता में ब्राह्मणों और अन्य द्विज जातियों को ईसाई बनाने की मुहिम चलाई। कुछ बने भी जैसे की बांग्ला के मशहूर कवि माइकेल मधुसूदन दत्त तथा तमाम बनर्जी और मुखर्जी परिवार। इसी तरह यूपी के कुमायूं में तमाम पंत और पांडे ईसाई बन गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं क्योंकि जो ब्राह्मण ईसाई बनते उसे उसके ही परिवारजन और उसकी जाति इकाई अलग कर देती और बाकी का कुनबा जस का तस बना रहता। तब ईसाई मिशनरियों को लगा कि द्विज जातियों से अच्छा है कि अन्य जातियों पर डोरे डाले जाएं।

आसान तरीका था यह क्योंकि अधिसंख्य तबका हिंदू धर्म की पूजा पद्घति से दूर था। इसमें सफलता तो मिली लेकिन यह गुर कारगर नहीं रहा। इसकी वजह थी मिशनरीज पर गोरों को दबाव होना। यह वह दौर था जब समानता, बराबरी और मानवता का पाठ लोगों ने पढ़ा और इसका असर यह हुआ कि लोगों को लगा कि समानता के मामले में इस्लाम ज्यादा बराबरी देता है। जब अपना मूलधर्म छोड़कर यह तबका अन्य धर्मों की तरफ जाने लगा तो उसे सूफी संतों की उदारता, सादगी और बराबरी पर जोर अधिक रास आई। इसलिए आप पाएंगे कि इस्लाम में जाने का रुझान 18 वीं व 19वीं सदी में सबसे अधिक हुआ पर इस्लाम में जो लोग गए वे या तो हिंदू धर्म की ब्राह्मण श्रेष्ठता के कारण किनारे पड़े थे अथवा वे हिंदू थे ही नहीं। वे नाथ, कनफटा और निरंजनी समाज के थे जहां एकेश्वरवाद, शून्यवाद और समान आत्मा का प्रचलन था इसलिए इस्लाम अंगीकार करने में उन्हें हिचक नहीं हुई। इसलिए आज यह कहना कि वे हमारे माल हैं आरएसएस की बेहयाई है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के ब्लाग tukdatukdazindagi.com से साभार.

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अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘झाड़े रहो कलेक्टर गंज’ का अर्थ कुछ यूं समझाया…

कई लोगों ने मुझसे अनुरोध किया है कि फ्रेज झाड़े रहो कलेक्टर गंज का मतलब बताऊँ। तो खैर सुनिए। यह मुहावरा मैं भी बोला करता था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह शुरू कहां से हुआ। इसलिए पूरा किस्सा सुनाता हूं। बात 1990 की है। राम मंदिर विवाद के चलते पूरा यूपी दंगे की आग में सुलग रहा था। मुझे अपने चचेरे भाई की शादी में शामिल होने के लिए कानपुर जाना था। तब नई दिल्ली स्टेशन से रात पौने बारह बजे एक ट्रेन चला करती थी प्रयागराज एक्सप्रेस। चलती वह अभी भी है लेकिन समय बदल गया है। तब नई-नई ट्रेन थी और सीधे बोर्ड द्वारा चलवाई गई थी इसलिए सुंदर भी थी और साफ-सुथरी भी। इसके थ्री टायर सेकंड क्लास में मेरा रिजर्वेशन था। और वह भी एक सिक्स बर्थ वाले कूपे में।

जब गाड़ी में दाखिल हुआ तो पाया कि ट्रेन खाली है उसी दिन गोमती एक्सप्रेस में सफर कर रहा एक व्यक्ति दिन-दहाड़े काट डाला गया था क्योंकि दंगाइयों को उसने अपना नाम नहीं बताया था। गाड़ी के जिस कूपे में मेरा नंबर था उसमें मेरे अलावा पांच मौलाना थे। दाढ़ी और टोपी वाले। कुछ वे सहमे और कुछ मैं। मगर बाहर जाने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि बाहर तो पूरे कोच में सन्नाटा पसरा था। सफर शुरू हुआ। न तो उन मौलानाओं को नींद आ रही थी न मुझे। शायद अंदर ही अंदर डर सता रहा होगा। गाड़ी जब कानपुर पहुंचने को आई तो सहयात्रियों में से सबसे बुजुर्ग मौलाना ने पूछा कि बेटा आप कानपुर उतरोगे? मैने कहा हां तो बोले- हमें छोटे नवाब के हाते में जाना है। और हम पाकिस्तान कराची से आए हैं। अब मुझे भी काटो तो खून नहीं। रात भर मैं अजनबी विदेशियों के बीच सफर करता रहा। लेकिन एक डर यह भी कि ये विदेशी अब अपने गंतव्य जाएंगे कैसे? पहले तो झुंझलाहट हुई और खीझ कर कहा कि बड़े मियाँ इसी समय आपको इंडिया आना था। वे बोले- बेटा भतीजी की शादी है इसलिए आना जरूरी था।

खैर मैंने कहा कि आप अकेले तो जाना नहीं और मैं भी छोटे मियाँ के हाते शायद न जा पाऊँ पर आपको पहुंचा जरूर दूंगा। उतरने के बाद मैने वहां के तत्कालीन पुलिस कप्तान श्री विक्रम सिंह को बूथ से फोन किया और अनुरोध किया कि आप रेल बाजार थाने से फोर्स भेज कर इन विदेशियों को सुरक्षित पहुंचा दें। जब थाने से सिपाही स्टेशन आकर उन लोगों को ले गए तो मुझे राहत मिली और मैं अपने घर की तरफ चला। दिल्ली लौटने के बाद मैने जनसत्ता में कानपुर दंगे पर खबर लिखी और यह भी लिखा कि कैसे अराजक तत्वों ने राजनीतिक स्वार्थों के लिए उस शहर का मिजाज जहरीला बना दिया है जहां पिछले साठ वर्षों से हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। यह अलग बात है कि मुस्लिम समुदाय के शिया-सुन्नी दंगे की खबरें जरूर पढ़ा करते थे।

यह खबर लोकसभा में तब के नेता विरोधी दल अटलबिहारी बाजपेयी ने पढ़ी और उन्होंने हमारे अखबार के ब्यूरो चीफ श्री रामबहादुर राय से पूछा कि ये शंभूनाथ शुक्ल कौन हैं, मेरे पास किसी दिन भेजना। राय साहब के निर्देश पर मैं एक दिन बाजपेयी जी के छह रायसीना रोड आवास पर पहुंच गया। परिचय होते ही बाजपेयी जी ने पूछा कि अच्छा झाड़े रहो कलेक्टर गंज । मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया कि बाजपेयी जी कहना क्या चाहते हैं। मैने पूछा कि इसके मायने क्या हैं तब उन्होंने इस मुहावरे का बखान किया। जो यूं है-

“गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के दौरान सबसे अधिक मार पड़ी विदेशी चीजें बेचने वाले व्यापारियों पर। ये व्यापारी अधिकतर खत्री थे। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, पटना और कलकत्ता के व्यापारी सड़क पर आ गए। उन्हीं दिनों कानपुर में कलेक्टर गंज में आढ़तें लगनी शुरू हुईं। इसमें मारवाड़ी व्यापारी अव्वल थे। तभी आई तीसा की मंदी। अब तो व्यापारियों का घर तक चलना मुश्किल हो गया। इसलिए रात को इन्हीं सफेदपोश व्यापारियों के घर की महिलाएं कलेक्टर गंज आतीं और आढ़त मंडी की जमीन की मिट्टी झाड़तीं तथा जो शीला निकलता उसे घर ले जातीं और तब उनका चूल्हा जलता। सबेरे सेठ जी साफ भक्क कुर्ता-धोती पहन कर बाजार आते और अनाज की दलाली करते। अब शुरू-शुरू में तो कोई जान नहीं पाया लेकिन जब सब सफेदपोशों के घर की औरतें आकर सीला बिनने लगीं तो भेद खुला और सबेरे जो भी साफ धोती-कुरता पहने दीखता अगला आदमी दाएं हाथ की तर्जनी अंगुली को अंगूठे की छोर से छुआता और फटाक से दागता- चकाचक!!! झाड़े रहो कलेक्टर गंज। यानी हमें पता है इस सफेदी की हकीकत लेकिन………..!”

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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व्यापार मेला देखने अवश्य जाएं और इस एडवाइजरी पर गौर करें

कुछ संभलकर ही ट्रेड फेयर जाएं क्योंकि जो दिखता है वही सुंदर नहीं है! यह पोस्ट मैं नहीं भी डाल सकता था क्योंकि यह एक सामान्य-सी निजी घुमक्कड़ी है जिसे आप चाहें तो विंडो शापिंग भी कह सकते हैं। लेकिन डाल रहा हूं। दरअसल मुझे इस बात से कभी संतोष नहीं होता कि एक सामान्य दर्शक की भांति एक पत्रकार व्यवहार करे। पत्रकार के कुछ सामाजिक दायित्व होते हैं और चुनौतियां भी। वह महज एक प्रचारक या जस का तस दिखाने वाला, बताने वाला संजय नहीं कि हर धृतराष्ट्र उससे पूछे कि बताओ संजय क्या हुआ कुरुक्षेत्र में।

खैर हुआ यह कि आज दोपहर 12 बजे मैं प्रगति मैदान में लगे ट्रेड फेयर को देखने-घूमने गया। और शाम सात बजे तक वहीं रहा। हर पैवेलियन तथा हर स्टाल को देखा। किसी के अंदर गया और किसी के नहीं। रक्षा मंत्रालय का निराकार पैवेलियन देखने के बाद मैं उसके ठीक सामने के जेएंडके पैवेलियन गया। मुझे वहां से कुछ सामान खरीदना था। एक तो मेरी प्रिय केसर और बादाम। बादाम मनचाहा नहीं मिला तो मैने एक कश्मीरी टोपी खरीदी और बाहर आकर एक कप कहवा खरीदा और कहीं बैठने का जुगाड़ तलाशने लगा। उसके बगल में बिहार पैवेलियन था जिसके बाहर एक चबूतरा-सा बना था और उस पर घास लगाई गई थी। पैवेलियन खाली था, कोई भी उधर का रुख नहीं कर रहा था इसलिए खाली देख मैं उस चबूतरे पर जाकर बैठा और मजे से कहवा पीने लगा। कहवा स्वादिष्ट था, उसमें केसर भी पड़ी थी और कुछ ड्राई फ्रूट्स भी। तभी एक अधेड़ महिला की कर्णकटु आवाज सुनाई पड़ी- ओए, तू उत्थे किद्दर जा रही ए? वो तो बिहार है उत्थे कुच्छ नहीं ए।

यह वाक्य मुझे खला और कहवा का कप डस्टबिन में फेक मैं बिहार पैवेलियन के अंदर चला गया। अंदर भी जो दर्शक आए थे उसमें से अधिकांश ऐसा सलूक कर रहे थे मानों वे बिहार पैवेलियन को उपकृत करने के मकसद से अंदर आए हों। दिल्ली के छोकरे हरियाणवी लहजे में कह रहे थे कि यहां तो सत्तू मिलेगा। पर मैं जब अंदर गया तो सनाका खा गया। बहुत ही सुंदर पैवेलियन बनाया हुआ है। वहां जाकर मधुबनी कला की तमाम कलाकृतियां मैने खरीदीं और खासकर राजबाड़ी चाय। बहुत अच्छी और बिहार की पुरानी चाय। जीविका से कुछ हस्तकला की सामग्री खरीदी और बाहर निकलते समय गैलरी में मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की आदमकद फोटो देखीं और साथ में श्री मांझी द्वारा किए गए कार्यों का भी उल्लेख था। उनसे पता चला कि बिहार के मुख्यमंत्री ने तो वहां के अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। मसलन बिहार ने कन्या भ्रूण हत्या रोकने का ही काम नहीं किया है बल्कि कन्या के जन्म पर परिवार को 2000 रुपये का अनुदान मांझी सरकार उदारतापूर्वक दे रही है। इसके अलावा कन्या शिक्षा तथा विवाह तक सरकार कुछ न कुछ करती ही रहती है। मेरा दिल भर आया और बिहार के मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी के प्रति मेरा मन कृतज्ञ हो उठा।
खैर आप टीवी और अखबारी पत्रकारों के झांसे में मत आइएगा। मैं लोक कल्याणार्थ कुछ एडवाइजरी डाल रहा हूं। आप यह व्यापार मेला देखने अवश्य जाएं और खूब घूमें पर मेरी एडवाइजरी के हिसाब से चलेंगे तो कम खर्च कर और कम थक कर इस मेले का पूरा मजा लेंगे। एडवाइजरी पर गौर करें-

1. ध्यान रखें मेला परिसर में बहुत चलना पड़ता है इसलिए मेले में जाते समय आप कैजुयल ड्रेस पहनें। फार्मल जूतों की बजाय स्पोर्टस शू ही पहनें।
2. पीने का पानी अवश्य ले जाएं।
3. अगर कुछ खरीदारी करनी है और जरूर करनी चाहिए तो अपने घर से एक बड़ा-सा झोला जरूर ले जाएं। वहां के कैरीबैग बहुत छोटे और जल्दी ही फट जाते हैं।
4. आप बेहतर रहे कि अपने साथ किसी साथी को भी ले जाएं। परस्पर बातचीत करते रहने से आप कम थकेंगे और कम बोर होंगे।
5. हर पैवेलियन में कुछ खाएं-पिएं जरूर। खासकर राजस्थान और महाराष्ट्र के पैवेलियन में। राजस्थान में आप खाखड़ा के साथ लहशुन की चटनी खा सकते हैं और मीठे में तिलपट्टी तथा महाराष्ट्र में पाव-भाजी, पाव बड़ा या बटाटा बड़ा। और गर्मागर्म चाय।
6. जेएंडके में आप कहवा पीकर आएं। यह कम ही मौका मिलेगा।
7. खरीदारी करनी हो तो आप जेएंडके से गर्म कपड़े, फिरन, और शालें खरीद सकते हैं। हिमाचल में भी गर्म ऊनी कपड़े तथा सेब का जूस भी ले सकते हैं।
8. असम से चाय जरूर खरीदें। खासकर अगर आप चाय की किस्मों के शौकीन हैं तो टी बोर्ड के स्टाल से किस्म-किस्म की चाय पत्ती खरीदें।
9. मणिपुर से रंग-बिरंगे स्वेटर और बांस का सामान खरीद सकते हैं तथा बांस का अचार भी लें।
10. नगालैंड से स्वेटर, रंग-बिरंगे मफलर और बांस का हस्तशिल्प ले सकते हैं।
11. सिल्क की साडिय़ां व कुर्ते खरीदना चाहें तो बंगाल व असम का टसर और बिहार के भागलपुर स्टाल से ले सकते हैं।
12. कुछ और पैसा खर्च करना चाहें तो कर्नाटक से हस्तशिल्प की तमाम नायाब चीजें खरीद सकते हैं। सिल्क भी और एक से बढ़कर एक सुंदर और मंहगी साडिय़ां भी। चंदन की लकड़ पर उत्कीर्ण मूर्तियां और जड़ाऊ गहने व कपड़े।
13. आंध्र से आप फ्रूट हलवा जरूर खरीदें और मदरासी मैथा भी। यह मैथा डायबिटीज के लिए उपयोगी है। लेकिन वहां पर मैथा बेचने वाला व्यक्ति उत्तर भारतीय है और उससे बारगेन जरूर करिए। जो दाम वह बताए उससे आधा दाम लगाएं।
14. तेलांगना से आप यूनानी दवाएं खरीद सकते हैं। यहां घुटने के दर्द और जुखाम तक के ड्राप मिल जाएंगे।
15. तेलांगना पैवेलियन में आप बेहद खूबसूरत लेकिन बुर्के में ढकी, सिर्फ चेहरा छोड़कर तन्वंगी हैदराबादी बालाओं को देखकर दंग रह जाएंगे।
16. केरल के पेय, सूखी मछली के अचार, समुद्री जल-जंतुओं की चटनी खरीद सकते हैं पर मुझ सरीखे शाकाहारियों के लिए ये लाजवाब लुभावनी पर लजीज चीजें बस देखने भर की हैं। यहां आप आयुर्वेदिक दवाएं और मालिश के लिए तेल किस्म-किस्म के खरीद सकते हैं। यहां से आप काली मिर्च और जावित्री जरूर खरीदें।
17. तमिलनाडु मुझे बहुत पसंद है। आप यहां से इडली, सांभर बनाने का सामान, तमाम तरह के मसाले और आर्ट ज्वेलरी जरूर लें। महंगी से महंगी और ईमानदारी भी।
18.यूपी, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब तथा गुजरात में खरीददारी न ही करें। यहां कोई चीज असली नहीं दिखी।
19. जूतों पर लूट मची है। पर अगर आपको जूते खरीदने हों तो महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्टाल से ही लें।

बाकी आप ठगाही से बचें और जेबकतरों से भी तथा अन्य जिनसे भी आपको एलर्जी हो। पर जाएं जरूर। मेला सुंदर है स्थल के लिहाज से भी और आने वालों के लिहाज से भी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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आजम खान : आह…. वाह….

Shambhu Nath Shukla :  मैं भारतीय मुसलमानों की बौद्घिक क्षमता का कायल रहा हूं। मुझे याद है कि पक्के दक्षिणपंथी रजत शर्मा ने अपने कार्यक्रम ‘आपकी अदालत’ में ओवैसी को फँसाने की बड़ी कोशिशें की पर ओवैसी लगातार अपने दमदार तर्कों और बौद्घिक कौशल के तीर चलाकर उलटे रजत को ही निरुत्तर करते रहे। लेकिन जब मैं आजम खान के बयान सुनता हूं तो लगता है कि एक अनपढ़ और जाहिल आदमी भी उनसे तो बेहतर ही बोलता है। क्या उत्तर भारत के मुस्लिम राजनेता भी अपने हिंदू हमपेशा लोगों की तरह कूढ़मगज हैं। अच्छा ही है परस्पर हमजुल्फ जो हैं।

Mohammad Anas : आज़म साहब बेहद ईमानदार और खुद्दार किस्म के सियासतदां हैं। मीडिया उनको इरिटेट करती है। वे मीडिया को मसाला दे देते हैं। आज का उनका बयान माइक घुसेड़ू और सवाल मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है वाले लोगों के लिए है। असल में मीडिया से आज़म साहब को एक इंच भी डर नहीं लगता क्योंकि इनकी राजनीति बेहद साफ है। तालिबान और दाऊद से मिले पैसे से नेता जी का बड्डे सेलीब्रेट हो रहा है, उनका यह कहना उस मीडिया को ठेंगे पर रखना दिखाता है जिसे मोदी के प्लेन से लेकर छत्तीसगढ़ के भाजपाई विधानसभा अध्यक्ष के पास्पोर्ट को पहुंचाने के लिए भेजा गया विमान नहीं दिखता। आज़म खान हो या जीतन राम माझी, मैं ऐसे नेताओं के हर बयान का समर्थन करता हूं। मेरे लिए मीडिया सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक गुणा गणित का एक साधन है। आज इसका इस्तेमाल भाजपा कर रही है वरना मोदी द्वारा अब तक बदले और फेंके गए बयानों से बेहतर प्रोग्राम किसी और चीज़ पर बन ही नहीं सकता। लेकिन कोई नहीं दिखाता। एक सेक्यूलर मुस्लिम नेता को पहले कम्यूनल बनाया गया और अब उसकी छवि के साथ पोस्टमार्टम हो रहा है। लेकिन इन सब बातों का जनता पर एक इंच फर्क नहीं पड़ेगा। मुझ पर तो कतई नहीं। आप पर भी नहीं पड़ना चाहिए। अच्छे और तरीके के लोगों के साथ रहिए, कहां मीडिया के बनाए अोपीनियन के साथ बह जाते हैं। हैप्पी बड्डे नेता जी।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

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शताब्दी और राजधानी का किराया पिछली सरकार के मुकाबले ड्योढ़ा हुआ, सुविधाएं निल, नाश्ते-भोजन की क्वालिटी जस की तस

आज रिजर्वेशन कराया। यकीनन रेलवे कर्मचारियों का मिजाज सुधरा है पर रेलवे का मिजाज बिगड़ा है। शताब्दी व राजधानी का किराया डॉक्टर मनमोहन सिंह के जमाने से करीब-करीब ड्योढ़ा हो गया है। और सुविधाएं निल। नाश्ते व भोजन की क्वालिटी जस की तस है। वही पुराने दो पीस ब्राउन ब्रेड के और उतने ही बासी कटलेट नाश्ते में। मैले कप में घटिया-सी चाय और पनियल सूप।

डिनर में जो दाल मिलती है उसकी गुणवत्ता पर संदेह है कि वह पीली दाल के नाम पर खेसारी है या तूअर (अरहर)। रोटी या पराठा बस दो पीस और कंकडय़ुक्त भात जिसे रेलवे की मैन्यू में पुलाव लिखा होता है। जो पनीर की सब्जी मिलती है वह खटाती है यानी पनीर सड़ा है। दही कभी मिलता है तो कभी नहीं। चिकेन का स्वाद मुझे नहीं पता आप लोग बताइएगा। लेकिन इतना पता है कि शताब्दी, राजधानी और दूरंतो में सेवाएं बदतर हुई हैं।

मैं जब रेलवे की सलाहकार समिति में था तब सुधार के लिए लिखापढ़ी की थी और सेवाएं सुधरी थीं लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। चाहे सदानंद गौड़ा आएं या सुरेश प्रभु जब तक रेलवे बोर्ड का राज चलेगा मंत्री की कोई सुनेगा तक नहीं। अब छोटे कर्मचारी भले सुधर जाएं पर हाथी तो बोर्ड में बैठता है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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संत रामपाल : ….यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता!

मैं संत रामपाल को नहीं जानता न ही उनके दर्शन और अध्यात्म की उनकी व्याख्या से। पर वे खुद कहते हैं कि वे हिंदू नहीं हैं और खुद को ही परमेश्वर मानते हैं। हिंदुओं के लगभग सभी सेक्ट उनके खिलाफ हैं खासकर आर्य समाज से तो उनकी प्रतिद्वंदिता जग जाहिर है। वे कबीर साहब के आराधक हैं और मानते हैं कि वे इस दुनिया में आने वाले पहले गुरु थे। इसमें कोई शक नहीं कि संत रामपाल अपार लोकप्रिय हैं। उनके भक्त उनके लिए अपनी जान तक दे सकते हैं। संत परंपरा वैदिक अथवा ब्राह्मण परंपरा नहीं है। संत परंपरा श्रावक व श्रमण परंपरा तथा पश्चिम के सेमेटिक दर्शनों का घालमेल है। पर जो व्यक्ति संत की पदवी पा जाता है उसके भक्त उसको ईश्वर अथवा ईश्वर का दूत मानने लगते हैं।

वैदिक परंपरा ईश्वर को नकारती है। पर संत रामपाल के भक्त कोई चतुर, सुजान अथवा अपराधी प्रवृत्ति के नहीं हैं। वे सामान्य मानव हैं और अपने को सताए जाने से दुखी हैं। वे किसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज में हैं जो उनके कष्ट समाप्त कर सके। संत रामपाल ने उन्हें कोई राह तो दिखाई होगी वर्ना यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। पर यहां यह बात मैं जरूर कहूंगा कि भले संत रामपाल ईश्वर हों लेकिन चूंकि वे इस मानवी दुनिया में और वह भी ईश्वर की भूमि कहे जाने वाले भारत में प्रकट हुए हैं इसलिए उन्हें यहां के सारे गुण-दोष मानने पड़ेंगे। मसलन संत जी को भारतीय संविधान, कानून और नियम सब मानने पड़ेंगे। वे संविधानेतर नहीं हैं इसलिए उन्हें कोर्ट के समक्ष प्रकट होना चाहिए। उन्हें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। तब ही वे अपने को परमेश्वर के रूप में और स्थापित कर पाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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हिंदी अखबार के उप संपादक छोकरे और अंग्रेजी अखबार की कन्या का लव जिहाद!

साल 1988 की बात है। मैं तब जनसत्ता में मुख्य उप संपादक था और उसी साल संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के राज्यों में प्रसार को देखते हुए एक अलग डेस्क बनाई। इस डेस्क में यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान की खबरों का चयन और वहां जनसत्ता के मानकों के अनुरूप जिला संवाददाता रखे जाने का प्रभार मुझे सौंपा। तब तक चूंकि बिहार से झारखंड और यूपी से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था इसलिए यह डेस्क अपने आप में सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाली डेस्क बनी। अब इसके साथियों का चयन बड़ा मुश्किल काम था। प्रभाष जी ने कहा कि साथियों का चयन तुम्हें ही करना है और उनकी संख्या का भी।

मैंने आठ लोग रखे- Sunil Shah (संप्रति अमर उजाला हल्द्वानी के स्थानीय संपादक) Sanjaya Kumar Singh, Arihan Jain (इस समय वे बिजनेस स्टैंडर्ड में संपादकीय प्रभारी हैं), अजय शर्मा (संप्रति एनडीटीवी में संपादक हैं) Sanjay Sinha (आजतक समूह के में संपादक हैं) अमरेंद्र राय बहुत दिनों से मिले नहीं पर वे विजुअल मीडिया के बिग गन हैं। सातवां साथी प्रभाष जी ने दिया प्रदीप पंडित। वे चंडीगढ़ जनसत्ता से आए थे और पद में तो मुझसे ऊपर थे ही पैसा भी अधिक पाते थे। अब प्रभाष जी की इच्छा। कौन किन्तु-परन्तु करे इसलिए स्वीकार किया। उनसे मुझे भी कुछ कहने में संकोच होता पर वे थे सज्जन आदमी कभी भी कोई भी काम सौंपा ऐतराज नहीं किया बस जिम्मेदारी लेने से कतराते थे इसलिए इस डेस्क पर डिप्टी इंचार्ज मैने बेहद पढ़ाकू और जिम्मेदार तथा जिज्ञासु पत्रकार सुनील शाह को बनाया। अब बाकी का तो ठीक था लेकिन संजय सिन्हा और संजय सिंह से काम कराना बहुत कठिन।

ऐसा नहीं कि वे नाकारा थे अथवा काम नहीं करना चाहते थे बल्कि वे सबसे ज्यादा काम करते लेकिन अपनी मर्जी से। एक घंटे काम किया और दो घंटे एक्स्प्रेस बिल्डिंग के पीछे टीटू की दूकान में जाकर अड्डेबाजी करने लगे। अथवा शाम आठ बजे पीक आवर्स में जामा मस्जिद के पास वाले करीम होटल में चले गए। कभी-कभी वे अपने साथ सुनील शाह को भी ले जाते। डांट-डपट से उन्हें भय नहीं था और उन दोनों के बीच कोई भेद उत्पन्न करना भी संभव नहीं था। मेरा सारा कौशल और श्रम उनकी मान-मनौवल में चला जाता। यह देखकर मेरे समकक्ष साथी मजे लेते क्योंकि इस डेस्क का भौकाल देखकर सभी उसमें आना चाहते थे। यह एक ऐसी डेस्क थी जिसमें किसी की कुछ न चलती सिवाय मेरे व संपादक श्री प्रभाष जोशी जी के। बड़े-बड़े जनसत्ताई तीसमार खाँ इस डेस्क से बेजार थे। इसलिए ऐसे में उनके पास एक उपाय था डेस्क के साथियों को फोड़ लेना। तब मैने एक आखिरी दांव फेंका संजय सिंह और संजय सिन्हा के पास। संजय सिन्हा नरम थे और जल्दी समझाए जा सकते थे। मैने कहा कि संजय देखो मैं भी चला करूंगा तुम लोगों के साथ करीम। अकेले-दुकेले जाते हो कुछ झगड़ा वगड़ा कर बैठे तो मुश्किल होगा। एक गार्जियन नुमा कद-काठी में भारी आदमी रखना जरूरी है। संजय सिन्हा ने यह बात संजय सिंह को बताई और दोनों राजी हो गए। अब दस साढ़े दस बजे जब मैं फारिग होता तो कहता चलो। तब तक वे भी थक जाते और टाल जाते तथा कहते कि शंभू जी अब सारा काम निपटा ही लेते हैं। इस तरह मैं उनको काम पर वापस लाया।

इसी बीच बेहद दर्शनीय, मनोहारी और लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय संजय सिन्हा ने शादी करने की ठानी इंडियन एक्सप्रेस की उप संपादक दीपशिखा सेठ से। अब दोहरी मुसीबत लड़का खाँटी बिहारी और कन्या ठेठ पंजाबी। ऊपर से तुर्रा यह कि लड़का हिंदी अखबार में उप संपादक और कन्या अंग्रेजी अखबार में। यह अलग बात है कि बिहार के एक अभिजात्य कायस्थ परिवार में जन्में संजय सिन्हा का पारिवारिक माहौल अंग्रेजी दां था। उनके दादा ब्रिटिश काल में कानपुर के एडीएम थे और पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक। संजय की पढ़ाई विदेश में हुई थी। पर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों को लगा कि अंग्रेजी पत्रकार कन्या हिंदी अखबार के पत्रकार से ब्याही जाए यह तो उनके लिए लव जिहाद टाइप का मामला हो गया। तत्काल इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता की डेस्क के बीच दीवाल चिनवा दी गई। लेकिन “जब मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी” सो शादी तो होकर रही। चोरी-चोरी घर से छिपाकर भी और दफ्तरी लोगों से भी। फिर भी वह शादी ऐतिहासिक थी। शादी तो हुई आर्य समाज मंदिर में और भात हुआ नेशनल स्पोट्स क्लब आफ इंडिया (एनएससीआई) के लान में। खूब खाया भी गया और पीया भी। बाद में इंडियन एक्सप्रेस वालों ने वह दीवाल खुद ही तुड़वा दी।

कल दिल्ली के छतरपुर स्थित जी समूह के मालिक श्री जवाहर गोयल के फार्म हाउस में संजय सिन्हा का पुनर्विवाह हुआ। मैं तब भी मौजूद था और कल भी। चौंकिए नहीं दरअसल मौका था उन्हीं संजय सिन्हा की फेसबुक पुस्तक रिश्ते का जब विमोचन हुआ तो वहां एकत्र करीब हजार के आसपास फेसबुक मित्रों और उनके मित्रों को बताया गया कि यह साल संजय व दीपशिखा सेठ की शादी के 25 साल पूरा होने का है तो सब ने कहा कि तिथि की कौन जाने आज ही संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ का फिर से जयमाल कार्यक्रम हो। और हुआ। मैं ये दोनों फोटो अपनी पुरानी यादों के साथ रख रहा हूं। संजय सिंह और मेरे अलावा वहां वे लोग ही थे जिन्होंने संजय व दीपशिखा का वह जयमाल कार्यक्रम नहीं देखा था जो 24 साल पहले हुआ था पर यकीनन यह आयोजन ज्यादा भव्य और ज्यादा उत्साह के साथ मनाया गया। संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ के नवजीवन की बधाई और शुभकामनाएं कि अचल रहे अहिवात तुम्हारा जब लौं गंग-जमन की धारा।

मित्रों मेरा यहां यह चिठठा लिखने का आशय यह है कि अगर आप चाहते हो कि परस्पर प्रेम के बीच आने वाले अवरोधों और दीवालें तोड़नी हैं तो पहली क्रांति सामाजिक रिश्तों की करो। रिश्ते बनाओ प्रेम से, स्नेह से परस्पर के मेल-मिलाप से। खुदा तो सिर्फ मां-बाप ही देता है और बाकी के रिश्ते तो इंसान खुद तलाशता है। रिश्तों के अवरोधों को ध्वस्त करो।

लेखक शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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गैंग रेप के आरोपी निहालचंद को मोदी ने मंत्रिपद पर कायम रखकर क्या संदेश दिया है?

Om Thanvi : नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल फैलाव में स्वागतयोग्य बातें हैं: पर्रीकर और सुरेश प्रभु जैसे काबिल लोग शामिल किए गए हैं। बीरेंद्र सिंह, जयप्रकाश नड्डा, राजीवप्रताप रूडी और राज्यवर्धन सिंह भी अच्छे नाम हैं। सदानंद गौड़ा से रेलगाड़ी छीनकर उचित ही सुरेश प्रभु को दे दी गई है। लेकिन स्मृति ईरानी का विभाग उनके पास कायम है। गैंग रेप के आरोपी निहालचंद भी मंत्रिपद पर काबिज हैं। अल्पसंख्यकों को लेकर प्रधानमंत्री की गाँठ कुछ खुली है, मगर मामूली; मुख़्तार अब्बास नक़वी को महज राज्यमंत्री बनाया है। वे वाजपेयी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रह चुके हैं, जैसे रूडी भी।

मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान भिजवाने वाले गिरिराज सिंह को मंत्री बनाकर मोदी क्या सन्देश देना चाहते हैं? कि उन्हें चापलूस पसंद हैं या विरोधियों से सड़कछाप निपटने वाले! संघ का दबदबा मोदी-शाह के रहते बढ़ता जा रहा है। वह बढ़ता जाएगा। राजस्थान ने भाजपा को पच्चीस के पच्चीस सांसद दिए; वहां से दो मंत्री आज और जुड़ गए। पर तीनों के तीनों राज्यमंत्री ही क्यों हैं? निहालचंद मेघवाल की जगह अर्जुनराम मेघवाल (जो दो बार श्रेष्ठ सांसद रहे) को केबिनेट मंत्री के रूप में लेकर मोदी से किंचित भूल-सुधार की उम्मीद थी। पर हम शायद मोदी को ठीक से जानते कहाँ हैं जो ऐसी भलमनसाहत की अपेक्षा या उम्मीद रखते हैं?

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

Shambhunath Shukla : मंत्रिमंडल का विस्तार हर प्रधानमंत्री का अपना अधिकार है और यह भी वह किसे क्या मंत्रालय सौंपता है पर मुख्तार अब्बास नकवी को हल्का करने की कोशिश अखरी। उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया है जबकि वे अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए वन की सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा के हर संकट में वे काम आए और पार्टी का अकेला पढ़ा-लिखा संजीदा अल्पसंख्यक चेहरा है। इसके विपरीत राजीव प्रताप रूड़ी की छवि साफ-सुथरी तो नहीं ही कही जा सकती। पर उन्हें स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री बनाया गया है। ऐसे तमाम और मंत्री बने हैं जो अनाड़ी कहे जा सकते हैं। इस तुलना में नकवी अनुभवी और संजीदा तथा परिपक्व नेता हैं। पर क्या किया जा सकता है जब पूरा का पूरा आवा ही कच्चा निकल जाए। विपरीत बुद्घि वालों का ऐसा ही हश्र होता है। नकवी को विरोध तो दर्ज करना ही चाहिए। ऐसा भी क्या कि ‘जात भी गँवाई और भात भी न खाया’।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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क्यों मनाते हैं दिवाली?

शंभूनाथ शुक्ल :  भाई Siddharth Kalhans ने पूछा है क्यों मनाते हैं दीवाली? मेरी मोटी बुद्धि में जो समाया है, वह यह है कि …

भारत में गर्मी एक परेशान कर देने वाला मौसम है इसीलिए भारत में वर्षा की धूमधाम से अगवानी की जाती है। भारत की समस्त ऋतुओं में वर्षा को रानी माना गया है। वर्षा के समाप्त होते ही शरद का आगमन होता है जो भारत में आने वाले लोगों के लिए सबसे मुफीद मौसम है। इसीलिए अक्टूबर से फरवरी तक भारत पर्यटकों को सबसे अधिक लुभाता है। इसी शरद की अगवानी का त्योहार है दीवाली। दियों और रोशनी का त्योहार, खुशियों और उल्लास का पर्व, मेलों-ठेलों का पर्व और वह भी कोई एक या दो दिन का नहीं पूरे पांच रोज का। दीपावली का त्योहार धनतेरस से शुरू होता है और भैया दूज तक लगातार पांच दिन तक चलता है। पूरे देश में यह त्योहार समान रूप से मनाया जाता है और हिंदू, सिख, जैन तथा बौद्ध आदि सभी इसे मनाते हैं। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश देशों में इस दिन हिंदुओं को सरकारी तौर पर दीवाली की छुट्टी मिलती है। नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, मारीशस, गयाना, थाईलैंड में तो खैर इस दिन राजकीय अवकाश रहता है और आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सारे कामकाज बंद रहते हैं। लेकिन अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में इस दिन हिंदुओं को छुट्टी मिलती है। साल २००३से तो हर साल दीपावली के रोज अमेरिका के व्हाइट हाउस को भी रोशनी से सजाने की परंपरा चली आ रही है।

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महिषासुर मर्दिनी को पूजो अथवा महिषासुर को या शत्रुघ्न को अपने मिथक में सम्मान दो या नरकासुर को। विशाल हिंदू समुदाय पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां आज से नहीं 19 वीं सदी और इसके पहले से ही इन असुरों का पूजक समाज रहा है। अगर बंकिम चंद्र चटर्जी और बाल गंगाधर तिलक ने क्रमश: दुर्गा पूजा और गणेशोत्सव के अनुष्ठान न कराए होते तो देवी दुर्गा शाक्त संप्रदाय की ईष्ट रही होतीं और गणेश जी शिव परिवार के एक सदस्य और विघ्न के देवता। विघ्नहंता का स्वरूप तो उन्हें बाद में मिला। हिंदू धर्म कोई विधिसम्मत धर्म नहीं है। यह संगमन का धर्म है जिसमें असंख्य आदिम आस्थाएं और प्रकृति पूजक जातियां मिलीं और जिनके आराध्य सुर-असुर, देवता-दैत्य-दानव-भूत व पिशाच आदि हैं। सनातन का अर्थ ही है लगातार एक सूत्र से पिरोया गया। यह सूत्र संगमन है। जो बनता है फिर टूटता है और फिर बनता है। इस धर्म का कोई नियामक नहीं कोई विधि सम्मत व्यवस्था नहीं। मैं एक सामान्य तौर पर हिंदू कहे जाने वाले समाज की बात कर रहा हूं हिंदुत्व के पैरोकार आरएसएस के लोगों के बारे में नहीं। यूं भी अहिंसा जैन परंपरा से सनातनियों में आया। जैन परंपरा हिंदू परंपरा के समानांतर बह रही एक पृथक परंपरा है और बौद्घ इसी परंपरा की उपज हैं। अगनित बार समाज सुधारकों ने इसे संवारा पर यह संगमन की महिमा है कि यह फिर वहीं पहुंच जाता है। यहां हर जाति के अपने ईश्वर हैं, अपने लोक देवता हैं और अपने ईष्ट हैं। कोई समाज सुधारक इसे बदलने की कोशिश करे अथवा कोई इसे छोड़ जाए, हिंदुओं को कोई बेचैनी नहीं होती। जो लोग कनवर्जन या लव जिहाद से घबराते हैं वे आरएसएस के लोग हैं और हिंदू धर्म के प्रवक्ता या ठेकेदार नहीं हैं, यहां तक कि वे शंकराचार्य भी नहीं जो अपने अजीबोगरीब बयान के लिए कुख्यात हो चुके हैं। शंकराचार्य दशनामी संन्यासियों के नेता तो हैं जो समग्र हिंदू समाज का मात्र पांच फीसदी है पर उस विशाल वैष्णव संप्रदाय के नहीं जिसमें सामंतवाद के उदय के साथ बर्बर आदिम दास व्यवस्था को खत्म करने के लिए आत्मा का आगमन हुआ और पशुपालक जातियों में शाकाहार का अभूतपूर्व उदय हुआ। असुरों का वध हुआ तो इस वजह से क्योंकि कृषि व्यवस्था के अनुरूप ये असुर नहीं थे और पशुपालक जातियां इनसे अनवरत भिड़ती रहीं। पर असुरों के वध के बाद भी असुर पूजा बनी रही। ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म के अंतर को भी समझना होगा। ब्राह्मणवाद यानी कि एक किस्म का श्रेष्ठतावाद जो आमतौर पर बाहरी लोगों में पाया जाता है। ब्राह्मण अपनी आनुष्ठानिक हैसियत के कारण समाज में अव्वल दरजा पाए थे पर सिर्फ इतना ही कि एक समाज में झगड़ा होने पर उसे कोई पार्टी नहीं बनाया जाता था और अगर वह उस झगड़े में शरीक नहीं है तो लोग उसे पीटते नहीं थे जबकि समाज के ब्राह्मणेतर लोग बिना कसूर पीटे जाते थे। पर वह न तो धर्म का नियामक था न ही रक्षक वह मात्र धर्म का अनुष्ठान कराने वाला पुरोहित था जिसकी राजकाज में ज्यादा दखल नहीं थी पर जिसका राज होता था वह अपनी सुविधा से ब्राह्मणवाद पैदा कर लेता था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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आज बहुत दिनों बाद एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार दिखे। अच्छा लगा। रवीश अपने विषय पर पूरी स्टडी करते हैं और कहीं भी नहीं लडख़ड़ाते। इसी तरह उनकी टीम भी उम्दा होती है। अभय कुमार दुबे हिंदी के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जिनकी जिनकी जमीनी समझ लाजवाब है। अभय जी के अपने कुछ पूर्वाग्रह हो सकते हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि अभय जी राष्ट्रीय राजनीति को समझने में निष्णात हैं। वे हर जटिल से जटिल समस्या का भी ऐसा समाधान पेश कर देते हैं कि लगने लगता है अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। आज भी उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा के ढोल की पोल खोल दी। भाजपा लगातार एक देश एक जाति एक धर्म की बात करती है जबकि भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी और बहु संस्कृति वाले देश में ऐसा नामुमकिन है। यही कारण है कि भाजपा अपनी पूरी ताकत लगाकर भी महाराष्ट्र में मोदी के व्यक्तित्व को तेज हवा में भी नहीं बदल सकी। इतने धुंआधार प्रचार के बावजूद कोई ऐसी लहर नहीं पैदा कर सकी कि बहुमत के करीब तक पहुंच पाती। उसे जो भी सीटें मिली हैं वे मोदी की सोच और तैयारी के मुकाबले बहुत कम हैं। यहां तक कि वह लोकसभा में जो सीटें जीती थी वह भी नहीं जीत पाई। नीलांजल मुखोपाध्याय और संजय कुमार भी अपनी बात ढंग से रख सके तथा भाजपा कोटे से आर बालाशंकर भी और भाजपा के प्रच्छन्न चिंतक सुधींद्र कुलकर्णी भी। आज रवीश के आने पर प्राइम टाइम देखा और उनकी टीम का वाक् कौशल सुनकर अच्छा लगा। कल से लगातार टीवी पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन 50 मिनट के इस कार्यक्रम से ही पता चला कि हकीकत क्या है बाकी में तो प्रवचन ही चल रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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‘अच्छे दिन’ का नारा लगा मोदी केंद्र की सत्ता तक पहुंचे पर इन साढ़े चार महीने में हालात बद से बदतर हुए हैं

Shambhu Nath Shukla : केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बने साढ़े चार महीने होने को जा रहे हैं। मैने आज तक मोदी के कामकाज पर कोई टिप्पणी नहीं की और न ही कभी उनके वायदों की खिल्ली उड़ाई। मैं न तो हड़बड़ी फैलाने वाला अराजक समाजवादी हूं न एक अभियान के तहत मोदी पर हमला करने वाला कोई माकपाई। यह भी मुझे पता था कि मेरे कुछ भी कहने से फौरन मुझ पर कांग्रेसी होने का आरोप मढ़ा जाता। लेकिन अब लगता है कि मोदी के कामकाज पर चुप साधने का मतलब है कि आप जानबूझ कर मक्खी निगल रहे हैं। ‘समथिंग डिफरेंट’ और ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ का नारा लगाकर मोदी केंद्र की सत्ता तक पहुंचे पर असलियत यह है कि इन साढ़े चार महीने में हालात बद से बदतर हुए हैं।

मान लिया कि बिजली संकट का दारोमदार राज्य सरकार पर है और पुलिसिया नाकामी तथा लालफीताशाही पुरानी परंपरा पर चली आ रही है। लेकिन रेलवे तो केंद्र का मामला है। पहले तो किराया बढ़ाया, यह कहकर कि ज्यादा सुविधा तो ज्यादा किराया। फिर तत्काल का टिकट करीब-करीब दूना कर दिया। मगर जरा रेलवे का हाल देखिए। कानपुर शताब्दी का किराया पहले से सवाया हो गया है पर पिछले साढ़े चार महीने में मैने पांच दफे क्रमश: 12033 और 12034 पकड़कर गाजियाबाद से कानपुर अप डाउन किया। एक भी बार यह गाड़ी न तो समय पर आई न समय से चली। कभी एक घंटा लेट तो कभी डेढ़ घंटा। आज तो हद हो गई। नियमत: कानपुर जाने वाली 12034 को गाजियाबाद शाम को 4.24 पर आ जाना चाहिए था। रनिंग ट्रेन स्टेटस से पता चला कि गाड़ी एक घंटा आठ मिनट लेट है और शाम पांच बजकर 32 मिनट पर गाड़ी गाजियाबाद आएगी। रेलवे इन्क्वायरी नंबर 139 ने भी यही बताया।

हम पांच बजे शाम पहुंच गए। मालूम हो कि गाजियाबाद स्टेशन पर बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। हमारे साथ बच्चे भी थे पर गाड़ी साढ़े पांच तो दूर छह बजे तक नहीं आई। इसके अलावा प्लेटफार्म नंबर दो पर इतनी भीड़ की खड़े तक होने की जगह नहीं। गाड़ी छह बजकर 22 मिनट पर आई। गाजियाबाद स्टेशन में ट्रेन का कौन सा कोच कहां रुकेगा यह बताने वाला संकेतक भी नहीं है। और अंधेरे में गाड़ी आई तो किसी भी कोच में यह नहीं लिखा था कि सी-1 कहां है और सी-9 कहां? किसी भी अन्य कोच में चढ़कर सामान लादे-फादे ट्रेन के भीतर ही एक के बाद दूसरे कोच पार करते हुए अपने कोच तक पहुंचे। रास्ते में बस एक बार वही दस साल पुराने मैन्यू वाला जलपान करा दिया गया। यानी बासी और गँधाती ब्रेड के दो पीस तथा तेल से चिपचिपे कटलेट। इडली बडा वाला मैन्यू दर्ज तो था पर उपलब्ध नहीं था और कभी भी उपलब्ध नहीं होता। सीटें भी और स्तरहीन हो गई हैं। संडास में पानी नहीं आता और उसके आसपास की गैलरी पर टीटी महोदय अपनी सवारियां बिठा लेते हैं। बस किराया सवाया हो गया है। कुछ तो बदलो मोदी जी वर्ना दस साल का सपना भूल जाओ अपना यही कार्यकाल पूरा कर लो बड़ी बात है। यह मेरा निजी अनुभव है इसलिए मुझे नहीं लगता कि मोदी भक्त अब मुझसे इसकी पुष्टि के लिए किसी लिंक अथवा गूगल ज्ञान की अपेक्षा रखेंगे। (हां, यह और जोड़ दूं कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में यह गाड़ी एकदम समय पर ही नहीं चला करती थी बल्कि अक्सर कानपुर से आते वक्त 12033 तो दस मिनट पहले ही आ जाया करती थी। यह गाड़ी ममता दीदी यूपीए दो के समय दे गई थीं।)

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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यूपी की सपा सरकार की धोखाधड़ी से खिन्न हैं वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला

Shambhu Nath Shukla : फेसबुक पर आजकल समाजवादी पार्टी के प्रवक्तागण आँधी की तरह टूट पड़े हैं। हो सकता है कि मुख्यमंत्री का निर्देश हो पर अगर वे इस सोशल साइट के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री को यह अवगत कराएं कि उनके सूबे में किस कदर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ रही हैं और कैसे जमीन माफिया गाजियाबाद व नोएडा की जमीनों पर कब्जा कर रहा है तो ज्यादा समीचीन होगा।

जमीन माफिया पार्कों और हरित पट्टी पर कब्जे करवा रहा है। मैं गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में जहां रहता हूं वहां पर सामने के सेक्टर सात का पूरा भूखंड हरित पट्टी और पार्क के लिए छोड़ा गया था इसीलिए हमसे जमीन का रेट आवास विकास प्राधिकरण ने ज्यादा लिया। पर इस इलाके में बसावट पूरी हो जाने के बाद भी इस सेक्टर में न तो पार्क बना न हरित पट्टी जबकि हमारे फ्लैट नगर निगम को हैंडओवर कर दिए गए तथा हाउस व वाटर टैक्स भी वसूला जा रहा है।

अकेले गाजियाबाद ही नहीं कानपुर के साकेतनगर इलाके में जहां मेरा मकान है वह पार्क फेसिंग था और इसीलिए उस प्लाट की कीमत हमसे फालतू ली गई। पर पिछले चार दशकों में पार्क बनना तो दूर वहां अराजक तत्वों का वास रहा। पार्क अभी तक नहीं है। अब सुना है सपा सरकार ने वह जमीन बेच दी। सपा सरकार के मुखिया से अनुरोध है कि हमसे जो अतिरिक्त पैसा उस समय लिया गया था उसे आज के सर्किल रेट से वापस किया जाए और साथ में उन सारे अफसरों पर कार्रवाई भी की जाए जिन्होंने पार्क की जमीन बेची। अन्यथा मुझे भी किसी स्वामी की तरह कोर्ट के जरिए इंसाफ मांगने पर मजबूर होना पड़ेगा। फिर सपा के कार्यकर्ता अन्ना द्रमुक कार्यकर्ताओं की तरह वफादार भी नहीं हैं जो अपने नेता को सजा सुनाए जाने पर छाती पटक-पटक कर रोएं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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दक्षिण रेलवे के महाप्रबंधक, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी और मुख्य राजभाषा अधिकारी को कितनी हिंदी आती है

Shambhu Nath Shukla : हिंदी जैसे दुजाहू नहीं, तिजाहू की बीवी है! यूपीए-2 की सरकार में जब ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तो मुझे भी रेल मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में रखा गया। मैने पहली ही बैठक में रेल मंत्री के समक्ष यह मुद्दा उठाया कि मंत्रालय हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी की कार्यशालाएं बंद करवाए तथा हिंदी विभाग में कार्यरत कर्मचारियों और अफसरों की फौज भी घटाए और इसकी बजाय मंत्री महोदय उन राज्यों पर हिंदी को कामकाज में लाने के लिए अधिक सतर्कता बरतें, जो हिंदी भाषी नहीं हैं और जहां के लोगों में हिंदी बोलने या बरतने के प्रति कोई रुचि नहीं दिखती अथवा उन राज्यों में जो हिंदी भाषी राज्यों से घिरे हुए हैं पर वहां की मुख्य भाषा हिंदी नहीं है। यानी ‘ग’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्य।।

मंत्री महोदय ने मेरी बात का संज्ञान लिया और मुझे चेन्नई स्थित दक्षिण रेलवे का जोन दिया गया ताकि वहां जाकर मैं हिंदी कार्यशालाएं देखूं और चेक करूं कि हिंदी में कामकाज कितना हो रहा है। पर वहां जाकर मैने पाया कि हिंदी के नाम पर सिर्फ खानापूरी ही है। दक्षिण रेलवे के महाप्रबंधक, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी और मुख्य राजभाषा अधिकारी सिर्फ इतनी ही हिंदी जानते थे जितनी कि दस्तखत करते वक्त रिजर्ब बैंक का गवर्नर। मैने जब वहां दबाव बनाया तो पता चला कि स्टाफ ही नहीं है और जो स्टाफ है वह अपने समकक्ष कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन पाता है और विरोध दर्ज करने पर कहा जाता है कि हिंदी सेवा करोगे तो क्या हमारी तरह ‘मेवा’ खाओगे! यानी हिंदी विभाग में काम करना है तो उसी मंत्रालय में अपने समकक्ष कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन पाना और दूर दराज के स्टेशनों पर उपेक्षित पड़े रहना और कभी-कभार अन्य कर्मचारियों द्वारा पिट जाना भी।

मैंने जब रेलवे बोर्ड से यह शिकायत दर्ज कराई तो जल्द ही मुझसे वहां का प्रभार ले लिया गया और जैसे ही तीन साल का टर्म पूरा हुआ तो पीएमओ से मेरी अनुशंसा होने के बाद भी रेलवे बोर्ड ने मेरा नाम आगे नहीं बढऩे दिया और फिर रेल मंत्री पवन बंसल खुद निपट गए और मल्लिकार्जुन खडगे को नई सलाहकार समिति बनाने का मौका नहीं मिला। मुझे नहीं पता कि रेल मंत्रालय ने हिंदी में कामकाज में लाने के लिए आगे कुछ किया भी या नहीं। चेन्नई में हिंदी विभाग में तमिल फिल्मों के मशहूर लेखक शंकर की बहू भी काम करती थीं, उन्होंने मुझे बताया कि हमारे घर का माहौल एकदम तमिलमय है और वहां हिंदी का क ख ग बोलने वाला भी कोई नहीं है। मुझे विभाग में ही हिंदी में काम करने, बोलने और बरतने का मौका मिलता है पर वहां भी दक्षिण रेलवे का मुख्यालय मुझे हिंदी में काम करने के कारण हर तरह से हतोत्साहित करता है। ऐेसे माहौल को देखकर तो लगता ही है कि सरकार के लिए हिंदी दुजाहू नहीं किसी तिजाहू की बीवी है जिसका कोई धनीधोरी नहीं है।

अगर साउथ में हिंदी प्रचलित हुई तो श्रेय राजभाषा विभाग को नहीं बल्कि हिंदी फिल्मों और कपिल के कामेडी शो जैसे सीरियलों और हिंदी के न्यूज चैनलों को मिलना चाहिए। एक बार जब मैं चेन्नई से कांचीपुरम जा रहा था तो रास्ते में श्रीपेरंबुदूर रुककर प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की समाधि में भी गया। और वहां पर लंच लेने के लिए जिस रेस्त्रां में रुका वहां एनडीटीवी पर Ravish Kumar का प्राइम टाइम शो चल रहा था जो अगले रोज दोपहर दो बजे रिपीट होता है। यह है हिंदी की पहुंच।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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