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एनडीटीवी की एजेंडा पत्रकारिता के बचाव में नदीम भाई अक्सर हम सबसे लोहा लेते..

Abhiranjan Kumar : मेरे मित्र ही नहीं, भाई समान भी हैं Nadeem Ahmad Kazmi. दो दिन पहले उन्हीं से बात करके जानकारी मिली कि उन्हें एनडीटीवी से निकाल दिया गया है। करीब 20 साल से वहां काम कर रहे थे। संस्थान को परिवार समझते थे और ख़ुद भी काफी वफादार समझे जाते थे। एनडीटीवी पर “कथित सरकारी हमले” की कुछ घटनाओं के बाद संस्थान और मालिकान के पक्ष में सर्वाधिक मुखर वही थे। यहां तक कि एनडीटीवी की एजेंडा पत्रकारिता के बचाव में नदीम भाई अक्सर हम भाइयों से भी लोहा लेने को उठ खड़े हो जाते थे। उनके बारे में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जितना उन्होंने एनडीटीवी से लिया, उससे अधिक एनडीटीवी को वापस भी दिया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एनडीटीवी को स्थापित करने वाले और अपने पीछे-पीछे तमाम धुरंधर पत्रकारों को ले जाने वाले वही हैं।

अभिरंजन कुमार

Abhiranjan Kumar : मेरे मित्र ही नहीं, भाई समान भी हैं Nadeem Ahmad Kazmi. दो दिन पहले उन्हीं से बात करके जानकारी मिली कि उन्हें एनडीटीवी से निकाल दिया गया है। करीब 20 साल से वहां काम कर रहे थे। संस्थान को परिवार समझते थे और ख़ुद भी काफी वफादार समझे जाते थे। एनडीटीवी पर “कथित सरकारी हमले” की कुछ घटनाओं के बाद संस्थान और मालिकान के पक्ष में सर्वाधिक मुखर वही थे। यहां तक कि एनडीटीवी की एजेंडा पत्रकारिता के बचाव में नदीम भाई अक्सर हम भाइयों से भी लोहा लेने को उठ खड़े हो जाते थे। उनके बारे में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जितना उन्होंने एनडीटीवी से लिया, उससे अधिक एनडीटीवी को वापस भी दिया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एनडीटीवी को स्थापित करने वाले और अपने पीछे-पीछे तमाम धुरंधर पत्रकारों को ले जाने वाले वही हैं।

अभिरंजन कुमार

लेकिन उनके साथ संस्थान ने जो बर्ताव किया, उसके बारे में जानकर मेरे सामने अनेकशः फिल्मी डॉनों की तस्वीरें घूम जा रही हैं, जो ज़रा-सी बात पर अपने सालों पुराने वफादार को एक पल की भी देर किये बिना गोली चलाकर ढेर कर देते हैं। न जाने नदीम भाई की कौन-सी बात डॉन को चुभ गई! यह या तो डॉन जाने या फिर स्वयं नदीम भाई। वैसे एनडीटीवी इंडिया के कई साथी बताते हैं कि संस्थान में डॉन दो ही लोगों को पसंद करता है- या तो जिसका बंगाली कनेक्शन हो या जो जाति और धर्म से अंग्रेज़ हो। तीसरे वही लोग वहां टिके रह सकते थे- जिन्होंने या तो उस बंगाली लॉबी या फिर अंग्रेज़ों की फ़ौज को साध लिया हो, लेकिन यह साधना भी इतनी आसान और सबसे संभव कहां? जिस दिन साधना में ज़रा-सी चूक हुई, गोली चल गई- धांय।

बताया जाता है कि पिछले कई साल से एनडीटीवी इंडिया के फैसले स्वयं डॉन नहीं, बल्कि उनके एक दत्तक पुत्र किया करते हैं। कौन जाने, नदीम भाई पर गोली डॉन के इशारे पर चली, या फिर दत्तक पुत्र ने ही किसी खुन्नस में आकर उन्हें ढेर कर दिया। न जाने इस दत्तक पुत्र में ऐसा क्या है कि डॉन ने उसे चमकाने के लिए एक-एक कर अपने सारे काबिल और वफादार साथियों की बलि दे दी या स्वीकार कर ली।

आज एनडीटीवी इंडिया बौनों की फौज बनकर रह गया है। विचारधारा के नाम पर इस संस्थान ने पत्रकारिता से ऐसा बलात्कार किया है, कि अब हम लोगों को भी मुंह चुराना पड़ता है, जब लोग कहते हैं कि आपने भी तो एनडीटीवी में काम किया है। अपनी स्क्रीन काली करते-करते इस चैनल ने अपना मुंह ही काला कर लिया है। वहां अब सिर्फ़ दत्तक पुत्र का ही चेहरा सफेदी में पुता हुआ दिखाई देता है। बहरहाल, मोगेम्बो आज शायद बहुत खुश होगा। नदीम भाई, मोगेम्बो से लड़ने वाली घड़ी तो हमारे पास नहीं, लेकिन हम आपके साथ हैं। शुक्रिया और शुभकामनाएं।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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