समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो चुकी है… देखें इंटरव्यू भाग-दो

चर्चित आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को एनडीटीवी के आर्थिक घपलों को पकड़ने के कारण बहुत प्रताड़ित किया गया. इस अफसर के पास एनडीटीवी की पूरी कुंडली है. भड़ास से बातचीत में एसके श्रीवास्तव ने खुलासा किया था कि मनमोहन राज में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने NDTV पर छापा डालने जा रहे इनकम टैक्स अफसरों को रोक दिया था.

IRS अफसर एसके श्रीवास्तव से भड़ास संपादक यशवंत सिंह की बातचीत का दूसरा पार्ट हाजिर है…. इस वीडियो के जरिए जानिए… आखिर प्रणय राय और पी. चिदंबरम में इतनी तगड़ी यारी के पीछे का कारण क्या है… -एनडीटीवी प्रबंधन में दम है तो वह कंपनी के संकट और कालेधन से रिश्ते को लेकर पब्लिक डिबेट करा ले…. -प्रणय राय कंपनी को लूट खा गए, अब एनडीटीवी को इसके मीडियाकर्मियों के हवाले कर देना चाहिए….-समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो गई है… वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

फर्स्ट पार्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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रवीश कुमार प्राइम टाइम में देश को बताएंगे कि प्रणय राय एनडीटीवी से इतने सारे लोगों को एक साथ क्यों निकाल रहे हैं?

Manish Thakur : स्क्रीन काला नहीं कर सकते, मुंह पर कालिख पोत विरोध तो कीजिए! पत्रकारिता के नाम पर विचारधारा की दुकान चलाने का धंधा करने वाले प्रणय राय अब अपने वफादारों को नौकरी से निकाल कर सड़क पर धकेल रहे हैं। एनडीटीवी से निकाले गए लोगों के पास जीवकोपार्जन की कोई समस्या नहीं होगी यह पत्रकारिता का हर अदना सा व्यक्ति जानता है। वह इसलिए कि बिना टीआरपी वाले इस चैनल के मालिक प्रणय राय ने हवाला और मनीलान्ड्रिंग की कमाई से अपने कर्मयोगियों को दो दशक से ज्यादा वक्त से मोटी सैलरी और तमाम साधनों से इतना संपन्न रखा कि भगवान की दया से उन्हें इस जनम कोई दिक्कत नहीं।

यकीन मानिए पत्रकारिता सिर्फ पैसा कमाने का धंधा नहीं है। यह शाख का वह पेशा है जहां लोग दो जून रोटी कमाकर बीवी बच्चों के प्राथमिक आवश्यकता पूरे करने की लाचारी में भी जीवन भर पत्रकार कहलाने की चाह में रहते हैं। हाल के वर्षो में सौकड़ों नहीं हजारों पत्रकारों की नौकरी गई उसमें सौकड़ो ने दूसरे पेशे को अपना लिया। जिसमें से ज्यादातर पहले से बेहतर आर्थिक हालात में आपको मिलेंगे लेकिन पूराने दिनों की याद में ही दिन रात भजन करते।

यह हालात तब है जब कि यह रीढविहीन लोगों का ऐसा पेशा है जो नौकरी करने के नाम पर दूसरे के हित के लिए तो लड़ता नजर आएगा लेकिन अपने हक की लड़ाई के वक्त नपुंसक की भूमिका में होता है। ये विचारधारा के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल पीटते स्क्रीन काला तो करेगा लेकिन अपनों पर अत्याचार पर चुप्पी लाद लेगा। तब तक जब तक खुद के साथ अत्याचार न हो। पूरे टीवी पत्रकारिता में पी7न्यूज के पत्रकारों ने ही वो मिसाल पेश किया जब चैनल से कुछ लोगों को निकाला जाने लगा तो कुछ पत्रकारों ने बगावत कर दिया।

आज खबर मिली की पत्रकारों के खिलाफ अत्याचार के नाम पर संसद से सड़क तक आवाज लगाने वाले प्रेस कल्ब की राजनीति में उच्च स्थान रखने वाले भाई Nadeem Ahmad Kazmi नदीम काजमी को एनडीटीवी ने नौकरी से निकाल दिया। नदीम भाई 20 साल से एनडीटीवी के वफादार सिपाही थे। मैने उन्हें हमेशा बड़े भाई का सम्मान दिया। जानता हूं वे एक बेहतर आदमी हैं। लेकिन एनडीटीवी के फरेब पर जब भी मैने कलम चलाई, उन्होने निजी रिश्तों को भूलाकर प्रणय राय की वफादारी में मेरे वॉल पर आकर मेरे ऊपर हमला किया। यह जानते हुए कि मालिक कभी किसी का सगा नहीं होता मैने नदीम भाई के भावनाओं का सम्मान करते हुए कभी उन पर हमला नहीं किया। मालिकों की वफादारी करते हुए,अपने चैनल और बैनर के नाम पर लड़ने वाले लिजलिजे पत्रकारों को सबक लेना चाहिए, जब नदीम भाई जैसे कद्दावर पत्रकारों के साथ ऐसा हो सकता है तो उनकी औकात क्या है?

बेशर्मी देखिए पिछले दो तीन महीने में बडे पैमाने पर प्रणय राय ने कैमरामैन के पेट पर लात मारा और रिपोर्टरों से मोबाईल सेल्फी लेते रिपोर्टिंग कराई। उसे सूट कर बाप और चाचा के बल पर नौकरी पाए एंकरों से एड करवाया की एनडीटीवी नए टेक्नोलॉजी को अपना रहा है। जब कैमरामैन की नौकरी गई तो किसी पत्रकार को रत्ती भर लज्जा नहीं आई। यह तो सोचते जिसके बल पर तुम सालों से स्क्रीन पर चमक रहे थे उसका क्या होगा? उसके लिए मुंह पर कालिख क्यों नहीं पोतते? विचार धारा का ये दुकानदार ये नहीं बताता कि वफादारों को नौकरी से क्यों निकालना पर रहा है? उनके हवाला के कारोबार को जानने का हक क्या नहीं है हम सब को।

आज सचमुच दुख हो रहा है विचारधारा के नाम पर पत्रकारिता का बलात्कार करने वाले प्रणय राय और उसके दोगले दत्तक पुत्र के फरेब पर जब भी मैने कलम चलाई नदीम भाई जैसे लोगों ने दिल पर ले लिया। यह जानते हुए कि मालिक किसी का सगा नहीं होता। उस दत्तक पुत्र को भी आज लग रहा है कि वो दुनिया का सबसे बड़ा पत्रकार है जबकि यकिन मानिए उसे पत्रकारिता की ABCD नहीं पता। विचारधारा की दुकान पर स्क्रीन काला करने वाले किसी पक्षकार से आज उम्मीद की जानी चाहिए कि विचारधारा के अपने साथी के सड़क पर आने पर एक बार अपने मुंह पर कालिख पोत ले।

देश को यह जानने का हक है कि एनडीटीवी लोगों को नौकरी से क्यों निकाल रहे हैं। विचारधारा के खिलाड़ियों का फरेब शुरू है। उनकी दलील है कि प्रणय राय के चैनल को सरकारी एड मिलना बंद हो गया है। वे चड़ोरी कर रहे हैं प्रणय राय से, डॉ राय प्रेस कल्ब में सफाई दें कि उनके साथ सरकार अन्याय कर रही है। इसीलिए पत्रकारों की नौकरी जा रही है।

यकीन मानिए ये एक बड़ा फरेब है। तथ्यों संग फरवरी में एक पुस्तक ला रहा हूं जिसमें एक चैप्टर एनडीटीवी के फरेब पर होगा। कैसे इस चैनल ने विचारधारा के नाम पर हवाला का धंधा करते हुए अरबों की कमाई की। सरकारी चैनल दूरदर्शन तक का खून चुसा। सत्ता से सांठगांठ कर आम आदमी के हीतों की हत्या की। राष्ट्रविरोधी एनजीओ संग देश कै खिलाफ साजिश का हिस्सेदार रहा।

आपको आश्यचर्य होगा आज तक किसी भी घोटाले का पर्दाफाश प्रणय के सिपाहियों ने नहीं किया। लेकिन पत्रकारिता के सभी एवार्ड यहीं बिकते रहे। अभी ये पोस्ट उन सिपाहियों को चुभेगा। लेकिन कल समझ में आयेगा। उन्हें आवाज उठाना चाहिए नदीम भाई के लिए। स्क्रीन काला नहीं कर सकते तो मुंह काला करके ही विरोध प्रदर्शन करना चाहिए। अपने लाला से सवाल करना चाहिए, जब तुम्हें कोई वैध आमदनी नहीं थी तो पाप की कमाई से पोषण क्यों किया। जानता हूं हिम्मत नहीं होगी। कोई बात नहीं। ड़ॉ राय के जिंदावाद और उनके शोषण के नाम पर प्रेस कल्ब में एक मीटिंग ही रख लिजीए। तब तक जब तक नमक खा रहे हैं। क्या पता कल नदीम भाई के साथ खड़ा होना पड़े।

ये मेरा भावनात्मक पोस्ट भी है दोस्तों। पत्रकारिता मेरी आत्मा से जुड़ा पेशा है। एनडीटीवी ने नौकरशाह, मंत्री, नेता और बडे अपराधियों के हर पेशे से असफल लोगों का गिरोह बना कर इस पेशे का बलात्कार किया है। मैं जानता हूं कि मेरे संग जुडे हजारो पत्रकार इस पोस्ट को पढकर चुपके से निकलेंगे लेकिन वे चोटिल हैं। नौकरी की लाचारी से मजबूर लिजलिजे येकिन अकड़ वाले। मेरा आग्रह है कि कोई भी साथी इस पोस्ट पर ऐसा कोई कमेंट न करें जो किसी को चोटिल करे। मेरे मानना है वैचारिक मतभेद हमारा मानवीय स्वभाव है लेकिन जरुरी नहीं कि वैचारिक रुप से हम से अलग सोचने वाला हम से बेहतर इंसान न हो। लिहाजा आग्रह है कि व्यक्तिगत कमेंट नहीं करेंगे।

पत्रकार मनीष ठाकुर की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी की एजेंडा पत्रकारिता के बचाव में नदीम भाई अक्सर हम सबसे लोहा लेते..

Abhiranjan Kumar : मेरे मित्र ही नहीं, भाई समान भी हैं Nadeem Ahmad Kazmi. दो दिन पहले उन्हीं से बात करके जानकारी मिली कि उन्हें एनडीटीवी से निकाल दिया गया है। करीब 20 साल से वहां काम कर रहे थे। संस्थान को परिवार समझते थे और ख़ुद भी काफी वफादार समझे जाते थे। एनडीटीवी पर “कथित सरकारी हमले” की कुछ घटनाओं के बाद संस्थान और मालिकान के पक्ष में सर्वाधिक मुखर वही थे। यहां तक कि एनडीटीवी की एजेंडा पत्रकारिता के बचाव में नदीम भाई अक्सर हम भाइयों से भी लोहा लेने को उठ खड़े हो जाते थे। उनके बारे में मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि जितना उन्होंने एनडीटीवी से लिया, उससे अधिक एनडीटीवी को वापस भी दिया। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एनडीटीवी को स्थापित करने वाले और अपने पीछे-पीछे तमाम धुरंधर पत्रकारों को ले जाने वाले वही हैं।

अभिरंजन कुमार

लेकिन उनके साथ संस्थान ने जो बर्ताव किया, उसके बारे में जानकर मेरे सामने अनेकशः फिल्मी डॉनों की तस्वीरें घूम जा रही हैं, जो ज़रा-सी बात पर अपने सालों पुराने वफादार को एक पल की भी देर किये बिना गोली चलाकर ढेर कर देते हैं। न जाने नदीम भाई की कौन-सी बात डॉन को चुभ गई! यह या तो डॉन जाने या फिर स्वयं नदीम भाई। वैसे एनडीटीवी इंडिया के कई साथी बताते हैं कि संस्थान में डॉन दो ही लोगों को पसंद करता है- या तो जिसका बंगाली कनेक्शन हो या जो जाति और धर्म से अंग्रेज़ हो। तीसरे वही लोग वहां टिके रह सकते थे- जिन्होंने या तो उस बंगाली लॉबी या फिर अंग्रेज़ों की फ़ौज को साध लिया हो, लेकिन यह साधना भी इतनी आसान और सबसे संभव कहां? जिस दिन साधना में ज़रा-सी चूक हुई, गोली चल गई- धांय।

बताया जाता है कि पिछले कई साल से एनडीटीवी इंडिया के फैसले स्वयं डॉन नहीं, बल्कि उनके एक दत्तक पुत्र किया करते हैं। कौन जाने, नदीम भाई पर गोली डॉन के इशारे पर चली, या फिर दत्तक पुत्र ने ही किसी खुन्नस में आकर उन्हें ढेर कर दिया। न जाने इस दत्तक पुत्र में ऐसा क्या है कि डॉन ने उसे चमकाने के लिए एक-एक कर अपने सारे काबिल और वफादार साथियों की बलि दे दी या स्वीकार कर ली।

आज एनडीटीवी इंडिया बौनों की फौज बनकर रह गया है। विचारधारा के नाम पर इस संस्थान ने पत्रकारिता से ऐसा बलात्कार किया है, कि अब हम लोगों को भी मुंह चुराना पड़ता है, जब लोग कहते हैं कि आपने भी तो एनडीटीवी में काम किया है। अपनी स्क्रीन काली करते-करते इस चैनल ने अपना मुंह ही काला कर लिया है। वहां अब सिर्फ़ दत्तक पुत्र का ही चेहरा सफेदी में पुता हुआ दिखाई देता है। बहरहाल, मोगेम्बो आज शायद बहुत खुश होगा। नदीम भाई, मोगेम्बो से लड़ने वाली घड़ी तो हमारे पास नहीं, लेकिन हम आपके साथ हैं। शुक्रिया और शुभकामनाएं।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफा ही थी

Abhiranjan Kumar : एनडीटीवी एक भला चैनल था। अन्य चैनलों में बकवास बहुत चलता था, लेकिन एनडीटीवी पर सिर्फ़ ख़बरें चलती थीं। हालांकि इसके साथ ही वहां एक बड़ी बुराई भी थी कि अक्सर ख़बरों में मिलावट कर दी जाती थी। सांप्रदायिक तत्व वहां काफी पहले से और ठीक-ठाक मात्रा में मौजूद थे। मुझे याद आती है एक पुरानी स्टोरी, जिसके मुताबिक किसी ट्रेन की मिलिट्री बोगी में घुसने पर एक युवक की पिटाई कर दी गई थी। चैनल पर यह रिपोर्ट बड़े ताम-झाम से चली। संयोग से उस युवक का नाम था शफ़कत और वह कश्मीरी था। फिर क्या था, चैनल के प्रबुद्ध विचारकों को मसाला मिल गया। स्क्रिप्ट की पहली लाइन ही यह लिखी गई- “एक तो मुसलमान, ऊपर से कश्मीरी। शायद शफ़कत का यही गुनाह था।”

मैंने स्क्रिप्ट की इस लाइन का विरोध किया। कहा कि यह नफ़रत और सांप्रदायिकता फैलाने वाली लाइन है। साथ ही, पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और तय मर्यादाओं के ख़िलाफ़ भी। इस लाइन को लिखने की कोई तुक नहीं। स्टोरी इस लाइन के बिना भी लिखी जा सकती है। एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय चैनल को इस तरह की हेट्रेड फैलाने से बचना चाहिए। मुमकिन है कि कोई हिन्दू अथवा ग़ैर-कश्मीरी भारतीय भी किसी मिलिट्री बोगी में घुस जाए, तो उसके साथ भी ऐसा हो सकता है। …और हमें तो यह भी नहीं पता कि शफ़कत के मिलिट्री बोगी में घुसने पर और क्या-क्या हुआ? क्या नाम पूछते ही सैनिकों ने उसपर हमला कर दिया या फिर मार-पीट से पहले दोनों के बीच कुछ बहसबाज़ी भी हुई। क्या सिर्फ़ शफ़कत के बयान को ही अंतिम सत्य माना जा सकता है? क्या स्टोरी में मिलिट्री का भी पक्ष शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

बहरहाल, मेरी बात न सुनी जानी थी, न सुनी गई, क्योंकि पता चला कि वह स्टोरी एक हाई-लेवल प्लानिंग का हिस्सा थी। चैनल के बड़े संपादकों ने मनमोहन सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री संभवतः पी चिदंबरम से शफ़कत की मीटिंग भी फिक्स करा रखी थी और ये मुलाकात हुई भी।

एक अन्य मौके पर, मुंबई पर आतंकवादी हमले के ठीक बाद मैंने एनडीटीवीख़बर.कॉम के लिए एक लेख लिखा था। चूंकि इस घटना में सैंकड़ों बेगुनाह लोग मारे गए थे, इसलिए क्षुब्ध पूरा देश था और ज़ाहिर तौर पर मैं भी था। अपने लेख में मैंने सरकार की कुछ चूकों और नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की थी, लेकिन उसकी एक भी पंक्ति तथ्य से परे नहीं थी। वह लेख एनडीटीवीख़बर.कॉम पर जाते ही वायरल हो गया। कुछ ही देर में उसपर सैकड़ों कमेंट्स आ चुके थे और ज़्यादातर टिप्पणियों में लेख में कही गई बातों का ज़ोरदार समर्थन था। इसके कुछ ही देर बाद मुझे एनडीटीवी इंडिया के तत्कालीन मैनजिंग एडिटर का ई-मेल मिला, जो एनडीटीवीख़बर.कॉम के प्रभारी को लिखा गया था और मुझे भी सीसी मार्क किया गया था। उस ई-मेल में लेख को साइट पर से अविलंब उतारने का निर्देश था, जिसके बाद उस लेख को फौरन उतार लिया गया।

बाद में हमने मैनेजिंग एडिटर से पूछा कि आख़िर लेख में समस्या क्या हुई? इसपर उन्होंने कहा कि “लेख बहुत अच्छा था, लेकिन तुम तो जानते हो यार!” इसके बाद मैंने उन्हें धर्मसंकट में डालना उचित नहीं समझा, इसलिए कुछ नहीं पूछा, लेकिन खुलते-खुलते बात खुल ही गई कि पीएमओ ने उस लेख पर एतराज किया था और पीएमओ से संदेश मिलने के बाद उस लेख को उतारने में इतनी हड़बड़ी दिखाई गई थी। मज़े की बात यह थी कि बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं के वे निराधार, बेसिरपैर और नफ़रत फैलाने वाले बयान ज़ोर-शोर से चलाए जा रहे थे, जिसमें वे उस हमले में आरएसएस का हाथ बता रहे थे, लेकिन हमारी निष्पक्ष और तथ्यात्मक बातें संस्थान के प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं बना पाईं। इसीलिए, जब आज ये लोग कहते हैं कि वे सरकार से लड़ रहे हैं, तो हंसी आती है। एक सरकार की चापलूसी करने वाला संस्थान अगर दूसरी सरकार से लड़ रहा है, तो समझना मुश्किल नहीं कि क्यों और किसके इशारे पर लड़ रहा है।

यानी एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफ़ा ही थी और इस प्रकार निष्पक्षता भी हमेशा से ही संदिग्ध थी। अगर हम जैसे न्यूट्रल लेखक-पत्रकार अपनी बात रखना चाहते, तो उसके लिए एनडीटीवी में स्पेस तब भी बहुत कम था।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की एफबी वॉल से.

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नदीम को हटाए जाने की सूचना पर मीडियाकर्मियों में एनडीटीवी के खिलाफ गुस्सा फैला

Yashwant Singh : कंपनियों का कोई सगा नहीं होता. भाई Nadeem Ahmad Kazmi को एनडीटीवी से कार्यमुक्त किए जाने की सूचना है. यह दुखद घटनाक्रम है. एनडीटीवी के लिए सड़क से लेकर सोशल मीडिया और प्रेस क्लब आफ इंडिया तक में संघर्ष करने वाले नदीम के साथ उनका संस्थान ऐसा सुलूक करेगा, यह नदीम के विरोधियों को भी अंदाजा न रहा होगा. जाने कौन लोग हैं जो इन दिनों प्रणय राय के सलाहकार बने हुए हैं और पैर पर कुल्हाड़ी मारने टाइप सलाह दे रहे हैं.

संभव है कुछ लोग नदीम को एनडीटीवी से हटाए जाने की सूचना पाकर खुश हो जाएं, पर मुझे यह मौका नदीम का साथ देने और एनडीटीवी से छांटे गए लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने का दिखता है. अगर छंटनी को वापस नहीं किया गया और नदीम समेत सभी कर्मियों को बहाल नहीं किया गया तो हम सब सड़क पर उतरेंगे. भाई नदीम, इस मुश्किल वक्त में मुझे आप अपने साथ खड़ा मानिए और जो आदेश होगा, बताइएगा. भले ही, आप मेरे किसी मुश्किल वक्त में कभी काम न आए हों.

संबंधित खबर का लिंक ये है : https://www.bhadas4media.com/tv/14372-ndtv-ki-sharmnak-harqat

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

मुकुन्द हरि शुक्ल : घोर आश्चर्य ! नदीम भाई के भी साथ ये होगा, सोचा ही न था। मालिक कभी पत्रकार की पीड़ा नहीं समझ सकता। भाई Nadeem Ahmad Kazmi के साथ खड़े होने की जरूरत हर श्रमजीवी पत्रकार की है। प्रणय रॉय के जिस एनडीटीवी के लिये नदीम भाई ने अपना खून-पसीना बहाया, वहीं उनको ऐसा उपहार दिया गया जो मीडिया मालिकों के रक्त शोषण की सच्चाई दिखाता है। इनके अलावा भी करीब 300 कर्मचारियों के निकालने और पिछले दरवाजे से नई भर्तियों की खबर है। विचारधारा में अंतर के बावजूद नदीम काजमी के लिए हम साथ हैं। बधाई Yashwant Singh भाई को भी, जिन्होंने प्रेस क्लब चुनावों में संघी खेमे का ठप्पा लगाने पर भी अन्याय के खिलाफ नदीम अहमद काजमी के हक में आवाज़ उठाई है।

Vivek Shukla : This is very disturbing development. Nadeem Ahmad Kazmi ji is a great friend..

Rehan Ashraf Warsi : ज्यादा कुछ नही जानते मीडिया संस्थानों के बारे में , मगर हर बुराई और गलत के साथ खड़ा होना कोई यशवंत सिंह से सीखे..

Gandhi Mishra ‘Gagan’ : ये दुखद है,एनडीटीवी के स्वामी को नदीम भाई जैसे समर्पित सहयोगियों के साथ इस तरह का वर्ताव नहीं करना चाहिए।

Mukund Mitr बहुत सही लिखा भाई यशवंत…..अब तक का अनुभव तो यही बताता है

Praveen Kumar Khariwal हम भी साथ हैं

Rakesh Kathuria अन्याय को कतई बर्दाश्त नही किया जा सकता।

Sumit Jha : Simply I did not understand why this happens to Nadeem Sir! He is one of finest human beings. Always very supportive to me!

Mohammad Mustahsan : This is a great shock and surprise for all of us. We know the sincerity and hard work of Nadim Ahmad Kazmi. He deserves full and whole hearted support of all of his colleagues to get justice.

Sunil Sharma : Something is wrong with the suave Czar of NDTV… Leninist remedy is the warranted incumbency..to ward off the presiding Ghost riding over the Roy’s slippery head…

Md Afaque Hashmi : Bhai dukhad samachar prantu hausla rakhna….. lagta hai koe bada avsar intezar ker raha hai.

Debjani Choubey : Behad dukhad ghatna hain.nadeem sir k saath meine 5 saal kaam kia hain ndtv me .nadeem sir bohot achhe insaan hain. iye chhatni ka silsila kab khatam hoga pata nehi.mere bohot se apno ne ish baar naukri khoyi hain.bada dukh hota hain iye sab dekh k

Subhash Sinha : Sad……NDTV …loss may be some others gain..

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एनडीटीवी में भयंकर छंटनी पर प्रेस क्लब आफ इंडिया ने लिखा प्रणय रॉय को पत्र

To

Dr. Prannoy Roy,
Founder-Chairperson, NDTV
NEW DELHI

Dear Dr. Roy,

Warm Greetings from the Press Club of India.

As this year comes to an end, there are disturbing reports emanating from the NDTV which refer to massive reduction and lay-offs of employees connected with the news operations of your organisation.

As you are aware, the Press Club of India has been in the lead role of organising protest meets whenever NDTV was targeted by the government or curbs were sought to be put on it. The PCI has led the struggle for upholding the freedom of the press and expression. There is considerable concern among journalistic community over the current reported move of your organisation which might have been taken considering economic viability of running the news channel.

We would like to invite you over to the Press Club of India to address a meet and make the stance of NDTV clear so that the journalistic community can understand the logic and reason behind any such move of large scale retrenchment. As you have been forthcoming in your approach, we are sure you would accept our invitation to address a meet at PCI which we plan to hold over the next few days.

Looking forward to your response.

With Warm Regards

(Gautam Lahiri)
President

(Vinay Kumar)
Secretary General

मूल खबर….

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एनडीटीवी ग्रुप में जबरदस्त छंटनी, करीब तीन सौ मीडियाकर्मी निकाले गए

एनडीटीवी समूह में जमकर छंटनी की जा रही है. खुद एनडीटीवी ग्रुप ने मुंबई स्टाक एक्सचेंज को सूचित किया है कि वह करीब 25 प्रतिशत स्टाफ में कटौती करने जा रहा है. उधर, एनडीटीवी की एडिटोरियल डायरेक्टर और सीनियर एंकर सोनिया सिंह ने ट्विटर पर कहा है कि एनडीटीवी को सरकारी विज्ञापन नहीं मिल रहा है.

पायनियर के पत्रकार जे गोपीकृष्णन ने ट्विटर पर कहा है कि एनडीटीवी में छंटनी के खिलाफ क्या कोई प्रेस क्लब में इकट्ठा होगा? ‘NDTV informs Stock Exchange of terminating 25% of staffers. anybody assembling in Press Clubs to protest?’.

एनडीटीवी की पूर्व मैनेजिंग एडिटर बरखा दत्त ने  जे गोपीकृष्णन के ट्वीट का समर्थन करते हुए कहा कि वाकई अब कोई छंटनी के मारे पत्रकारों के समर्थन में प्रेस क्लब से मार्च नहीं निकालेगा.

पायनियर के पत्रकार के ट्वीट के जवाब में एनडीटीवी की सोनिया सिंह ने सरकारी विज्ञापन न मिलने वाली बात कही है. ‘Yes they should actually to ask why NDTV isnt getting any ‘official’ ads. Speaking truth to power has its financial costs & we’re paying it’।

उधर, बताया जा रहा है कि कई दिनों से हर रोज पचास मीडियाकर्मी की नौकरी एनडीटीवी समूह से जा रही है. कुल तीन सौ लोगों को निकाला गया है या निकाला जाने की प्रक्रिया जारी है. इस बाबत वरिष्ठ पत्रकार शाहिद फरीदी कहते हैं : ”NDTV sacked 50 employees yesterday and will fire another 200 in the next couple of weeks. I hope Press Club managing committee would convene a meeting in support of fired journalists just like it did when the owners of NDTV were raided for alleged financial bungling. It’s time to see if the present committee of the Press Club stands as strongly for working journalists as it did with owners of the TV channel.”

सूत्रों का कहना है कि एनडीटीवी वल्ड वाइड की पूरी टीम बाहर कर दी गई है. स्पोट्स डेस्क इंग्लिश से कई लोग बाहर किए गए हैं. कई वरिष्ठ तक छंटनी के दायरे में आए हुए बताए जाते हैं. करीब पंद्रह वीडियो एडिटर्स की नौकरी गई है. एनडीटीवी इंडिया से भी ढेर सारे लोग निकाले गए हैं. 

नीचे देखिए एनडीटीवी की तरफ से जारी मेल और प्रेस रिलीज…

Hi,

We have a big year coming up with NDTV restructuring to focus on one goal: Consolidation To Content.

A part of this plan was implemented in the last quarter and included our much-noted move to mobile journalism.  Our reporters across the country are now using mobile phones for the fastest and most efficient delivery of breaking news.  (Other news networks in India are still experimenting with similar training.)

NDTV Convergence continues to grow rapidly with its traffic and revenue hitting an all-time high this year.  It remains profitable, exceptional for digital content in India.  It is launching new products and sites, with careful attention on where to expand and how quickly.

For our broadcast business, we need to regain our financial strength.  The consolidation strategy that we are adopting calls for a far leaner operation which will feed only our core business: our English and Hindi news channels, and NDTV Convergence, its digital team and the slate of apps and sites they run.

This means minimizing some ancillary businesses that NDTV had expanded into over the last few years.  We believe our strength lies in our fair, accurate and comprehensive journalism, in reportage that makes a difference. Making this the only priority requires the full concentration of the top management, our newsroom, and all available resources.

Given our reprioritization, our workforce has to be altered too. A leaner operation will enable speed, agility and innovation, all required for our new systems of news-gathering and dissemination.  This reconfiguration involves the very tough decision of parting with some of our colleagues. This process has begun.  Severance packages have been organized, we will work hard to help them find jobs elsewhere, and Heads of Departments and HR are now talking to those affected.

NDTV thanks with immense gratitude these colleagues and friends for their hard work and wishes them the very best.  We will always think of them as ours.  

As part of this exercise, top management has taken a pay cut. Several verticals that were created around similar functions have been merged and are already working together for increased efficiency.  We have a new team handling Sales and Revenue to give us a head-start on our path to profitability.   They have already launched new initiatives for strategic alliances and new partnerships. 
I guarantee that Saurav as Co-Ceo, the new strategy team and I are working round-the-clock to make this transition quickly and effectively, in keeping with the values that NDTV is known for, and to facilitate what we love doing –  journalism that makes a difference.

If you have any concerns or feedback, please do email or call me.

Many thanks,

Suparna

Group CEO, NDTV

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एनडीटीवी के बुरे दिन : इनकम टैक्स विभाग ने चैनल के शेयर जब्त कर लिए

कभी कांग्रेस के यार रहे एनडीटीवी और प्रणय राय के दिन इन दिनों भाजपा राज में बुरे चल रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे पी. चिदंबरम व एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की मिलीभगत से ईमानदार इनकम टैक्स अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव को प्रताड़ित करते हुए पागलखाने तक भिजवा देने का पाप अब असर दिखाने लगा है. इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के शेयर जब्त कर लिए हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग के अफसर संजय कुमार श्रीवास्तव ने अपने कार्यकाल में प्रणव राय और पी चिदंबरम की मिलीभगत से 2जी स्कैम के पैसे को हवाला के जरिए ब्लैक से ह्वाइट करने समेत कई किस्म के गड़बड़ घोटाले पकड़े थे जिसके कारण संजय को बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया. इन्हें पागलखाने तक भिजवा दिया गया. इनके उपर कई फर्जी केस लगवा दिए गए. अब एनडीटीवी और प्रणय राय को उन्हीं पापों की सजा भुगतनी पड़ रही है. पी चिदंबरम भी अपने पुत्र के लगातार केंद्रीय एजेंसियों के जाल में फंसते जाने को लेकर एक तरह से उसी पाप की सजा भुगत रहे हैं.

एनडीटीवी के साथ ताजा प्रकरण ये हुआ है कि इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के स्वामित्व वाली कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के सभी शेयर अस्थायी तौर पर जब्त कर लिए हैं. मीडिया कंपनी ने शेयर बाजारों को भेजी सूचना में यह जानकारी दी है. कंपनी के पास कुल 1 करोड़ 88 लाख 13 हजार 928 शेयर हैं जो कुल शेयर का 29.12 प्रतिशत हिस्सा है. आरआरपीआर न्यू दिल्ली टेलिविजन लि. में सबसे बड़ी प्रवर्तक समूह की कंपनी है. यह कंपनी एनडीटीवी 24X7, एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी प्रॉफिट न्यूज चैनलों का संचालन करती है.

कंपनी की तरफ से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को बताया गया है कि उसे इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर की ओर से 25 अक्टूबर को एक पत्र प्राप्त हुआ है, जिसमें कहा गया है कि आयकर कानून, 1961 की धारा 281बी के तहत अस्थायी तौर पर आरआरपीआर की कंपनी में पूरी हिस्सेदारी कुर्क की जा रही है. यह हिस्सेदारी 1.88 करोड़ इक्विटी शेयरों की बैठती है.

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अंग्रेजी वाले श्रीनिवासन जैन अब हिंदी में ‘रियल्टी चेक’ कर रहे हैं!

कानाफूसी है कि हिंदी मीडिया के धुर विरोधी अंग्रेजी चैनल एनडीटीवी 24×7 के इंग्लिश एंकर श्रीनिवासन जैन को अब हिंदी चैनल एनडीटीवी इंडिया पर जाने किस मजबूरी में हिंदी में ही रियल्टी चेक करना पड़ रहा है. बेचारे हिंग्लिश बोल रहे हैं. आखिर पापी पेट का सवाल जो ठहरा. ज्ञात हो कि श्रीनिवासन जैन ने अमित शाह के बेटे जय शाह पर एक स्टोरी लिखी थी जिसे बाद में एनडीटीवी प्रबंधन ने एनडीटीवी की वेबसाइट से हटवा दिया.

श्रीनिवासन जैन ने इसका विरोध किया और इस बाबत पब्लिक डोमेन में अपनी बात रखी. उधर एनडीटीवी का कहना था कि उसने श्रीनिवासन की स्टोरी वकीलों की सलाह पर हटाई. इस प्रकरण के बाद श्रीनिवासन जैन को अब एनडीटीवी के हिंदी चैनल पर भी कार्यक्रम पेश करने के लिए कह दिया गया. लोग इस घटनाक्रम के अपने अपने तरीके से निहितार्थ निकाल रहे हैं.

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बरखा दत्त ने फिर किया धमाका, एनडीटीवी और प्रणय रॉय के कारनामों का किया खुलासा

बरखा दत्त ने एनडीटीवी और प्रणय राय की असलियत बताना जारी रखा हुआ है. उन्होंने फेसबुक पर अपने ताजे धमाके से एनडीटीवी प्रबंधन को बुरी तरह घेर लिया है. प्रणय राय को जरूर जवाब देना चाहिए क्योंकि ये बड़े और गंभीर सवाल कोई भाजपाई या संघी या बाहरी टाइप प्राणी नहीं उठा रहा बल्कि उनके यहां कई दशक तक काम कर चुकीं जानी पहचानीं बरखा दत्त लिखित में उठा रही हैं. एनडीटीवी के घपलों-घोटालों के बारे में ताजे खुलासे में बरखा दत्त ने काफी कुछ जानकारी दी है. पढ़िए बरखा की एफबी पोस्ट….

Barkha Dutt : So since I went public with my earlier battles inside NDTV and called out the hypocrisy of ranting at the Press Club as Anti – Establishment crusaders while desperately seeking help of the BJP ministers and party leaders privately, many of the responses of support have been overwhelming : thank you. Some questions were also raised which I would like to address here along with some points of my own.

1. Why didn’t I speak earlier? Oh But I certainly did- on many emails (my hacked emails capture some of these fights ironically) and via multiple verbal arguments. In fact I spoke so much that by October neither the owners nor the key editors were talking to me any more ! It’s just that while I worked there I did so within the confines of the newsroom as I thought going public was indecorous. Yet, the management told me.that my not batting for them in public in defence of their decision to drop Interviews was a “betrayal.” So is the suggestion that I should have done what a former colleague just did : dissent in public , embarrass the organization, claim the high moral ground and yet conveniently stay on ?! I prefer my route : fight ferociously within and when staying gets untenable because they actively punish you for fighting – you quit. I speak as an ex employee. I am free to do so. Puzzled that my internal argument was a betrayal but a former colleagues public lashing is acceptable! Or is it that the organization is in such a dire place today that it cannot afford to reprimand him in the way it did me ?!

2. The most tired cliched response I’ve heard – when folks can’t come up with anything else is – “But they defended you during Radia tapes controversy”. I have spoken multiple times on that issue -in my book, in interviews, and guess what, even on TV , when I faced a panel of tough questioners for over an hour! Now, did NDTV owners and management subject themselves to a similar one hour grilling by peers from the industry on how they managed their books and on allegations of financial skulduggery – charges way more serious than the ones against me? If not, why not ?. Secondly, while we are on the tapes how many people know that Ms Radia speaks on the tapes of helping NDTV owners – the nearly 400 crores loan came thereafter. The Caravan story on NDTV sought to credit / blame me for this loan when I argued that all I spoke to her about was a news story and I gained nothing more than information. Caravan was wrong: I knew nothing about that loan till much much later when news media reported it. And since I have never held a management position or a financial one ever, even while being a full time employee, I was never going to be made part of any such negotiation. So when we speak of the Radia issue, let’s also examine her role in the financial help she speaks of offering NDTV owners. Haven’t heard much debate on that have we ? I wonder why.

3. Other places are much worse say some:; NDTV tries more than others : SURE. I am adult enough to know that stories are killed in many newsrooms. I am also adult enough to know that in times of existential crisis we would all reach out for help – to govt or to whoever could offer it. The difference is others don’t pretend; they don’t act morally superior and smug and above everyone else. They don’t claim to be something they are not. They don’t stand at Press Club and saw Don’t Crawl while seeking appointments with BJP head honchos by night. This has not been denied by NDTV simply because there are enough witnesses to these meetings and phone calls and they can’t deny them. I am not suggesting any help was offered – the best I know , pleas for help have been soundly rejected. But what’s important is the help was sought while the public pretence carried on.

4. All my life I have lived by what I believe in: sometimes it makes me popular ; sometimes deeply unpopular. So too with this decision. I strongly stand by every word and am open to a no – holds barred debate with any former colleague provided they talk specifics and not in breezy generalisations about legacy and mentoring. many other examples have come to memory since then : how NDTV initially disallowed and dropped the story on National Herald : how it made me edit portions of a Taslima Nasreen interview- the list is endless. And the paranoia with which PC interview was made to vanish – so that even traces of it do not exist on the website today. No lawyers were vetting that one were they ?!  So where did it vanish ? And why ? In all these cases no defamation suits we’re involved !

5. Finally for me this is not a right wing or left wing issue. The examples I have detailed involve both the Congress and the BJP and speak to hypocrisy. I am not an activist who is going to cover some things in a shroud of silence because one or the other side could benefit. That is not my concern. I say what I think and what I feel. I would have spoken a lot earlier but when NDTV was raided by the CBI thought my comments would be seen to hit them when they are down. So I was quiet for a bit. But the recent post by a former colleague quoting censorship as an abberation- a knowing falsehood- triggered me to speak my mind. And I am very very glad I did.

By the way – for those caught in the notion of some enforced loyalty- after two decades of work at NDTV – the Owners did not meet me to tell me to my face that I was being punished for being argumentative – maybe they were embarrassed or uncomfortable or didn’t care – that’s their right; they sent their CEO instead to offer me a non daily news role. Even a request by me to buy at market rates my footage from the Kargil war was turned down. So forgive me for being done with this whole notion of loyalty as mouth- silencer. Somewhere along our journey our scores definitely evened out.

I recall two of my peers and friends from the industry had a lot to say when they exited their erstwhile channel a few years ago. So it’s not as if others in the media have not had their say about their experiencences. I fully intend to have mine – without apology or defensiveness and with standing by every syllable. Neither approval nor criticism would steer my mind. Thanks for reading. over and out. 

इसे भी पढ़ें….

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बरखा दत्त ने एनडीटीवी और प्रणय राय की पोल खोलते हुए फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, उसे हू-ब-हू पढ़ें…

I certainly don’t see NDTV as either victim or crusader…

Barkha Dutt : For the last few days I have observed with cynical amusement a public debate around NDTV taking down a story related to Amit Shah. I am not getting into the specifics of the story here and whether the story was right or wrong but I did point out when I first heard the controversy that the axing of stories at NDTV is hardly new and those seeking the higher moral ground today remained absolutely silent when some of us fought with the owners and management over these issues.

So when a former colleague calls this an “aberration” surely that is a knowing falsehood. The said former colleague and some others who have lately tried to claim the mantle of free speech crusaders- are all aware of the many different times stories were taken down or simply disallowed at NDTV. All of these people were totally silent then or rationalized the management decisions. An interview Nitin Gokhale did with the outgoing Navy Chief was taken down. There were other guests we were instructed not to call on the channel but the management did not want to put this in writing lest the mail leak. I was disallowed from pursuing a story on what was called the Jayanti Tax controversy.

I was given hell for a story I did on Robert Vadra; the only reason that story was not taken down is because it was already published on the website and at the time the management was convinced that it would draw too much attention to take it down Later. Then an innocuous bread and butter interview I did with Chidambaram was taken off air during the aftermath of the surgical strikes. An internal memo was circulated to justify this and went so far as to say that no politician should be given air time – a diktat that lasted all of a day. Already on the wrong side of the network for my argument over the Vadra story I protested this censorship.

I said while I worked at NDTV I could not criticise them in public but there was no way I could defend this strange axing either. When asked in public I would simply say it was a management decision above my pay grade. Over the next two months , for the stand I took, I was clearly punished with a hostile newsroom environment that sought to push me out of any big news story that the top bosses were anchoring. It was later told to me that my protest was seen as a “betrayal” and that I argued too much about the news.

I was then offered a non daily- news arrangement at NDTV and was told that they – the owners -did not want to hear arguments of the kind I had on News stories like the Vadra issue or the PC axing or other stories. I said that a lack of engagement with the news or elections that were imminent did not suit me and I would rather exit….since my mails had just been hacked ( you can read the fight over the axed PC interview in them) I said I did not want my parting to be linked to that and we agreed I would leave a month later.

What I do know is this : 1. I was punished for taking a stand and speaking my mind on news – censorship. The fights I had applied to both BJP & Congress stories. 2. NDTV wanted me off daily news so that no one would question it’s arbitrary decisions 3. Maybe at that stage NDTV was trying to make peace with the BJP. Incidentally it’s Senior folks have approached a slew of govt ministers for help in the last few months while pretending to fight the BJP at Press Club and so on..so utterly fake. 4. Am adult enough to know that stories are censored in other newsrooms too but who else pretends to be this self righteous and morally Superior. It’s the humbug and hypocrisy that really gets me : say one thing and do another. So forgive me if I laugh at the narrative the company is trying to claim as an anti establishment crusader. Even through this entire period they have repeatedly sought help from the BJP.
I took a stand on censorship and paid a price. So be it. But I don’t see ex colleagues doing that. Nor did they speak up earlier though all were aware of these facts.

And I certainly don’t see NDTV as either victim or crusader. Oh please. This is what is fake liberalism.

चर्चित टीवी पत्रकार बरखा दत्त की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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एनडीटीवी में खबरें रोकने का विरोध किया तो उसकी कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी : बरखा दत्त

(…पार्ट एक से आगे…)

एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन की स्टोरी हटाने के बाद एनडीटीवी से हटाई गईं बरखा दत्त ने सोशल मीडिया पर एनडीटीवी और प्रणय राय की पोल खोल दी. बरखा दत्त ने सर्जिकल स्ट्राइक के दिनों में कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के इंटरव्यू के रोके जाने के प्रकरण पर भी खुलासा किया. बरखा के मुताबिक इंटरव्यू में चिदंबरम ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा था. चैनल प्रबंधन ने उस इंटरव्यू को ऑनएयर होने से रोक दिया. इंटरव्यू रोकने के बाद प्रबंधन ने एक इंटरनल मेल जारी किया जिसमें चैनल में काम कर रहे सभी पत्रकारों को हिदायत दी गई कि किसी नेता को जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम ना दें.

बरखा आगे लिखती हैं- ”इससे पहले मैंने रॉबर्ट वाड्रा को लेकर भी एक स्टोरी कवर की थी. इस पर भी प्रबंधन का ऐसा ही रुख था. तब मैंने प्रबंधन के सामने विरोध दर्ज कराया. नतीजा ये हुआ कि मुझे दो महीने तक बड़ी खबरों को कवर करने से रोक दिया गया. कारण पूछे जाने पर कहा गया कि आपका विरोध प्रबंधन की नजरों में बगावत है. खबर को लेकर आपने प्रबंधन से कुछ ज्यादा ही बहस कर ली थी. मालिक प्रणय रॉय की इच्छा के कारण मुझे मेन स्ट्रीम की खबरों को छोड़ नॉन न्यूज स्टोरी करने को कह दिया गया. चुनाव के माहौल में रिपोर्टिंग से दूर किया जाना मेरे लिए काफी कष्टदायी धा. तब मैंने प्रबंधन से कह दिया कि इससे बेहतर यही है मैं इस्तीफा दे दूं. इस पर चैनल के मालिक और प्रबंधन राजी हो गए. तब मैंने इस्तीफा दे दिया.”

बरखा खुद के इस्तीफे के प्रकरण के बारे में विस्तार से बताती हैं- ”एनडीटीवी के मालिक ने मुझे खबरें करने से इसलिए रोका क्योंकि आगे कोई उनसे खबरों को लेकर सवाल ना कर सके. हो सकता है कि मुझे चैनल से किनारे कर के प्रणय राय बीजेपी से समझौता करने की फिराक में हों. मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी सरकार के मंत्रियों से एनडीटीवी टैक्स मामले में सहयोग चाहते थे. ये वही सहयोगी थे जो प्रेस क्लब में बीजेपी के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. एनडीटीवी की कथनी और करनी में बहुत फर्क और विरोधाभास है. चैनल के मालिक प्रणय रॉय कतई कांतिकारी नहीं हैं. एनडीटीवी भी न तो विक्टिम हैं और ना ही क्रांतिकारी. प्रणय राय चुनाव बाद से लगातार बीजेपी से मदद मांगते रहे. खबरों को रोकने का जो विरोध मैंने किया उसकी कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी. लेकिन मेरे कुछ पुराने साथी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं.”

इसके पहले का पार्ट एक पढ़ने के लिए नीचे दिए हेडिंग पर क्लिक करें :

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

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बरखा दत्त ने खोली पोल- ‘एनडीटीवी और प्रणय राय न तो क्रांतिकारी हैं, न ही सरकार विरोधी!’

बरखा दत्त सोशल मीडिया पर लगातार धमाके कर रही हैं. उनके निशाने पर हैं एनडीटीवी चैनल के मालिक प्रणय राय. बरखा ने साफ कहा- ”प्रणय राय सरकार विरोधी होने का महज नौटंकी करता है, दिखावा करता है. सच्चाई ये है कि एनडीटीवी के मालिक लगातार बीजेपी के आगे झुकते रहे और खबरें रोकते रहे. एक बात तो सच है कि ना तो एनडीटीवी विक्टिम है और ना ही क्रांतिकारी. चुनाव के बाद से लगातार प्रणय रॉय बीजेपी से मदद ही मांगते रहे. विरोध की कीमत मुझे नौकरी गंवा कर चुकानी पड़ी.”

बरखा ने बताया कि टैक्स चोरी के आरोपों में घिरे चैनल के मालिक प्रणय रॉय खबरों को रुकवा दिया करते थे. बीजेपी विरोधी होने का और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने या सरकार से लोहा लेने का जो नाटक एनडीटीवी और उसके मालिक कर रहे हैं, वो महज दिखावा है. प्रणय रॉय अपने फायदे के हिसाब से खबरों को चलाने और रोकने का आदेश देते थे. जो प्रबंधन के इन फैसलों का विरोध करता, उनकी रिपोर्टिंग तक रोक लगा दी जाती थी.

उल्लेखनीय है कि एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन ने कुछ दिन पहले अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी को दिए लोन पर एक स्टोरी की थी जिसे बाद में हटा दिया गया. तब श्रीनिवासन जैन ने लिखा- ‘एनडीटीवी के वकीलों ने कहा कि स्टोरी को कानूनी वजह से हटाना पड़ेगा. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि रिपोर्ट पूरी तरह सार्वजनिक रूप से मौजूद तथ्यों पर आधारित है.  इसमें किसी तरह का निराधार या अवांछित आरोप नहीं लगाया गया है. ऐसे हालत में पत्रकारों के लिए काम करना काफी मुश्किल है. अभी मैं इसे एक परेशानी भर मान रहा हूं. मैं फिलहाल एनडीटीवी पर पत्रकारिता जारी रखूँगा. ये बातें एनडीटीवी को भी बता दी है.’

…जारी…

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एनडीटीवी : जंग हारने पर यहां हर बार सिपाही हलाल होते हैं, सिपहसालार और राजा कतई ज़िम्मेदार नहीं!

एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए… फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है वहीं दूसरी तरफ अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अनुराग द्वारी ने भी एनडीटीवी छोड़ दिया… दो दशकों का साथी, साथ काम करने का तजुर्बा … बेहतरीन प्रोफेशनल, ज़िंदादिल इंसान … एक दशक से ज्यादा वक्त बिताने के बाद उसने भी एनडीटीवी छोड़ दिया। डेस्क, खेल, राजनीति, क्राइम, शहर, गांव, संगीत हर विषय पर उसकी पकड़ थी … जिस भेंडी बाज़ार को मुंबई में हमने सिर्फ अंडरवर्ल्ड की नज़र से देखा वहां भी वो संगीत का घराना ढूंढ लाया … जुनूनी ऐसा कि किसी ख़बर पर बॉस से भी भिड़ना पड़े तो भिड़ जाए … जिस दौर में स्ट्रिंगरों की खबर पर दिल्ली-मुंबई में बैठे पत्रकार बाईलाइन लूटते हैं उसने अपनी ज़िद से उनकी पीटीसी तक लगवा दी … उनके एक एक बिल के लिये लड़ने वाला … साफ कहता था हमारी तनख्वाह बढ़ती तो उनके लिये क्या महंगाई घटती है।

बहरहाल, एनडीटीवी ने उसकी क्षमताओं का पूरा दोहन किया … डेस्क से लेकर रिपोर्टिंग तक … हिन्दी से लेकर अंग्रेज़ी तक … खेल में कई ख़बरें उसने ब्रेक की होंगी लेकिन हर मौके पर चैनल अपनी कुलीन मानसिकता दिखाता रहा … देश में वो भागे, विदेश जाने का मौका आए तो ऐसे लोग भेजे जाते रहे जिन्होंने ताउम्र सिर्फ चिरौरी की, अपनी अंग्रेज़ियत का हवाला देते रहे … उसका दोस्त होने के नाते हम कई बातों के सामने गवाह रहे, कई बातें वो कहता भी था .. लेकिन एक संतोष के साथ चलो यार अपना नंबर भी आएगा … उसके चेहरे का असंतोष पढ़ पाओ तो पढ़ लो … नहीं तो पंडितजी गरिया देते थे …

चैनल के आख़िरी दिनों में पारिवारिक वजहों से उसने मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख की ज़िम्मेदारी संभाली तो साबित कर दिया कि रिपोर्टिंग के मायने क्या होते हैं, जिन चैनलों को लगता है खबर दिल्ली-मुंबई है वहां उसने हक़ से चैनल का एयर टाइम छीन लिया। उसे लगातार हम टीवी पर देखते रहे और उसकी एनर्जी को सराहते रहे।

बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था लेकिन लगता था उसकी नौकरी पर दिक्कत ना आए, वैसे वो इतना डरपोक नहीं चाहे स्टार में रहा चाहे एनडीटीवी में जब जो ग़लत लगा न्यूज़ रूम हो या उसका अपना स्पेस वो खुलकर बोल देता था … उसका साफ मानना है कि ना लेफ्ट ग़लत हैं ना राइट, और ना दोनों ही एब्सोल्यूट में सही हैं … हमारा काम विचारधारा नहीं बल्कि नीतियों का मूल्यांकन है। क्रांति होगी तो लाला के पैसों से नहीं ख़ुद के दम पर …

जब उसने ख़ुद फेसबुक पर अपनी जाने की ख़बर पोस्ट की, तो लगा कमाल है … हर एक शख्स उसे याद है चाहे वो दस साल पहले ही क्यों ना गया हो या उसे निकाला गया हो … नाम-काम के साथ… बहरहाल उसकी नई पारी के लिये शुभकामना…

लेकिन सवाल जो एनडीटीवी प्रेमी हैं उनसे भी पूछना चाहता हूं कि क्या यहां मामला निवेशकों के साथ धोखे का नहीं .. ये ठीक है कि सरकार चैनल के पीछे है … वो कोर्ट तय कर देगा कौन सच है कौन झूठ … लेकिन जिस बरखा दत्त ने अपनी सफाई के लिये, खुद को बड़ा बनाने चैनल में कोर्ट चला दिया आज वही चैनल पर भ्रष्टाचार की बातों को रिट्वीट करती हैं, जो आज भी चैनल के दिये करोड़ों के बंगले में रहती हैं।

आज भी एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए … फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

अभिजात्य होने का नमूना देखिये… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है यहां वहीं अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … ये चैनल को भारी नहीं लगता… अरे, जंग हारने पर हर बार सिपाही हलाल होगा, सिपहसालार और राजा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं… दो कौड़ी का आइडिया देकर मोबाइल से टीवी चैनल चलवा रहे हैं… कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अभी भी चैनल में काम कर रहे कई साथियों से बात होती है सब हताश हैं, निराश हैं लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं … उनसे बात करेंगे तो पता लगेगा कि सच्चाई क्या है। उनकी ग़लती भी क्या है, जिसने जैसा आदेश दिया, उन्होंने वैसा काम किया… वो आज भी बेहतरीन प्रोफेशनल हैं लेकिन विचारधारा के दबाव में दबाए जा रहे हैं… फील्ड में गालियां उन्हें मिलती हैं और आपके स्टार पत्रकार कॉन्फ्रेंस में जाकर तालियां बजवाते हैं…

लेखक अजय कुमार इन दिनों मुंबई में पदस्थ हैं और अनुराग द्वारी के साथ भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकरिता विश्वविद्यालय में साथ पढ़ाई कर चुके हैं. अजय और अनुराग कई मीडिया संस्थानों जैसे स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी में साथ काम कर चुके हैं. अजय ने कुछ साल पहले खबर की दुनिया से रुखसत ले लिया और अब वो डिजिटल स्पेस में सक्रिय हैं.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

 

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