राकेश कायस्थ-
मैं पिछले 28 साल से हर चुनाव ठीक से देखता आया हूँ। ये चुनाव कई मामलों में अनोखा है–
- मुझे ऐसा कोई और चुनाव याद नहीं आता जिसके केंद्र में किसी एक पार्टी (वो भी विपक्ष) का घोषणापत्र रहा हो। घोषणापत्र को शादी के कार्ड की तरह औपचारिक माना जाता है। ज्यादातर वोटर भी उसे खोलकर देखने की जहमत तक नहीं उठाते।
- ये अपनी तरह का पहला और अनोखा मामला है जब सत्तारूढ़ दल का नेता जनसभाओं में अपनी पार्टी के घोषणा पत्र की बात ना करके विपक्ष के घोषणा पत्र पर लंबे-चौड़े भाषण दे रहा है।
- प्रधानमंत्री मोदी हर जनसभा में ये कह रहे हैं कि कांग्रेस का घोषणा पत्र खतरनाक है। आमतौर पर नेता अपनी विरोधी पार्टी के दावों को हवा-हवाई करार देते हैं लेकिन उससे उलट प्रधानमंत्री के भाषणों में यह ध्वनि है कि कांग्रेस अपने घोषणा पत्र पर शर्तिया अमल करेगी।
- संगठन और धन की कमी से जूझ रही कांग्रेस ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि उसके घोषणा पत्र को जन-जन तक पहुंचाने काम प्रधानमंत्री के हाथों होगा। यह कांग्रेस के लिए लॉटरी लगने जैसी स्थिति है।
- ताजा भाषण में प्रधानमंत्री बुद्धिजीवी वर्ग से अपील करते नज़र आये कि वो कांग्रेस के घोषणा पत्र को पढ़ें और ये समझे कि उसमें किस तरह मुस्लिम लीग की छाप है।
- मोदीजी ने ऐसा कहकर एक तरह का ब्लाइंडर खेला है। उन्हें शत-प्रतिशत भरोसा है कि उनके अनपढ़ या कुपढ़ समर्थक घोषणा पत्र डाउन लोड करके पढ़ने की तकलीफ नहीं करेंगे और अपने नेता के दावे को सच मानते हुए उसे नेशनल नैरेटिव बनाने में जुट जाएंगे।
- विरोधी दल के नेताओं किसी एक शब्द या वाक्य को पकड़कर पूरी कहानी बनाने वाले सरकार समर्थक पत्रकार अब तक कांग्रेस के घोषणा पत्र में कुछ भी ऐसा नहीं ढूंढ पाये हैं, जिससे प्रधानमंत्री के दावे को सच साबित किया जा सके। दूसरी तरह बहुत बड़ी संख्या में उत्सुक आम लोगों ने कांग्रेस का घोषणा पत्र डाउनलोड कर लिया है।
- नरेंद्र मोदी का कैंपेन भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के तौर पर शुरू हुआ था। लेकिन पहला चरण बीतते-बीतते भ्रष्टाचार शब्द गायब हो गया। उसके बाद मोदी की गारंटी आई। फिर गारंटी भी छू-मंतर हो गई और अब उनकी जुबान पर सिर्फ कांग्रेस का घोषणा पत्र है।
- दूसरी तरफ कांग्रेस अपने न्याय पत्र पर अड़ी हुई है। ये जानते हुए भी कि चुनावी बांड का मामला करप्शन की जीती-जागती मिसाल है, कांग्रेस नेता बांड का ज्यादा जिक्र ना करके सिर्फ अपने वायदों की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री बड़ी बेचैनी से कोई ऐसी कहानी ढूंढने में लगे हैं, जो सुपरहिट हो जाये।
- बीजेपी तेजी से एक्शन लेने, गलतियां सुधारने और नैरेटिव गढ़ने में माहिर है। लेकिन इस बार ना तो आईटी सेल की ताकत का पता चल रहा है, ना ही सेकेंड, थर्ड लाइन के बीजेपी नेताओं में पुरानी चुस्ती नजर आ रही है। जुबान लड़खड़ा रही है, शब्द इधर-उधर हो रहे हैं और जुमले मिस फायर हो रहे हैं।
- पहले दो राउंड की वोटिंग का डेटा लंबे समय तक रोकने और फिर वोटिंग प्रतिशत अप्रत्याशित रूप से बढ़ाकर जारी करने जैसी हरकत चुनाव आयोग कर चुका है। सूरत से लेकर इंदौर तक लोकतंत्र को खत्म करने की बेशर्म कोशिशें देश के सामने हैं। ऐसे में ये कहना मुश्किल है कि बीजेपी 400 पार करेगी या 200 से नीचे रह जाएगी। लेकिन ये बात स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री अभी से हार चुके हैं। सत्ता किसी तरह हासिल कर भी लें तो पुराना इकबाल नहीं बचेगा।


