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नवागत की आड़ में अनभिज्ञता का स्‍वांग कर रहे यूपी के लेबर कमिश्‍नर

पेशी के वक्‍त सुप्रीम कोर्ट में सच बोलने से बचने का रास्‍ता ढूंढ रहे हैं : लटकती तलवार तले अनभिज्ञता का नकाब, ऐसे हैं यूपी के लेबर कमिश्नर जनाब। ठीक समझे हैं, उत्‍तर प्रदेश के नवागत माननीय श्रम उच्‍चाधिकारी इसी तरह के हैं। या कहें कि ऐसे ही बने हुए हैं और अनजानेपन का स्‍वांग कर रहे हैं, दिखावा कर रहे हैं। वह ऐसे पेश आ रहे हैं मानों मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़ी हुई किसी भी बात को नहीं जानते। उनके कार्यालय में पहले की मैडम लेबर कमिश्‍नर के कार्यकाल में प्रिंट मीडिया के तमाम कर्मचारियों ने मजीठिया वेज बोर्ड अवॉर्ड से जुड़ीं अपनी अनेकानेक समस्‍याओं, मैनेजमेंट की प्रताड़ना, मजीठिया के मुताबिक बनती सेलरी दिलाने की लिखित मांग, मालिकान द्वारा न देने की ढेरों तिकड़मों-बदमाशियों-साजिशों आदि के बारे में उनको अवगत कराना, अपना हक पाने के लिए उनके कार्यालय के चक्‍कर काटते रहना और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को आधा-अधूरा, तथ्‍यों को तोड़-मरोड़ कर अखबार मालिकों के फेवर वाली स्‍टेटस रिपोर्ट बनाकर भेजना आदि-इत्‍यादि हकीकत-सच्‍चाई से वे अनभिज्ञ बने हुए हैं।

पेशी के वक्‍त सुप्रीम कोर्ट में सच बोलने से बचने का रास्‍ता ढूंढ रहे हैं : लटकती तलवार तले अनभिज्ञता का नकाब, ऐसे हैं यूपी के लेबर कमिश्नर जनाब। ठीक समझे हैं, उत्‍तर प्रदेश के नवागत माननीय श्रम उच्‍चाधिकारी इसी तरह के हैं। या कहें कि ऐसे ही बने हुए हैं और अनजानेपन का स्‍वांग कर रहे हैं, दिखावा कर रहे हैं। वह ऐसे पेश आ रहे हैं मानों मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़ी हुई किसी भी बात को नहीं जानते। उनके कार्यालय में पहले की मैडम लेबर कमिश्‍नर के कार्यकाल में प्रिंट मीडिया के तमाम कर्मचारियों ने मजीठिया वेज बोर्ड अवॉर्ड से जुड़ीं अपनी अनेकानेक समस्‍याओं, मैनेजमेंट की प्रताड़ना, मजीठिया के मुताबिक बनती सेलरी दिलाने की लिखित मांग, मालिकान द्वारा न देने की ढेरों तिकड़मों-बदमाशियों-साजिशों आदि के बारे में उनको अवगत कराना, अपना हक पाने के लिए उनके कार्यालय के चक्‍कर काटते रहना और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को आधा-अधूरा, तथ्‍यों को तोड़-मरोड़ कर अखबार मालिकों के फेवर वाली स्‍टेटस रिपोर्ट बनाकर भेजना आदि-इत्‍यादि हकीकत-सच्‍चाई से वे अनभिज्ञ बने हुए हैं।

पूछे जाने पर उनका सधा-सधाया जवाब होता है कि वे अभी-अभी आए हैं, उन्‍हें पता नहीं है कि मजीठिया वेज बोर्ड अवॉर्ड से संबंधित शिेकायतों आदि के बारे में क्‍या-क्‍या उनके आने से पहले हुआ है। वह यह भी नहीं कहते कि हम उनका अध्‍ययन कर रहे हैं, जानकारी ले रहे हैं और उन पर अमल करने, मालिकान की बदमाशियों के खिलाफ कार्रवाई करने की तैयारी कर रहे हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट को 23 अगस्‍त की सुनवाई में पूरी सच्‍चाई से अवगत करा देंगे।

प्रिंट मीडिया के सभी वर्कमेन, कर्मचारियों, कामगारों को पता है, ‍फिर भी बता देते हैं कि आगामी 23 अगस्‍त को सुप्रीम कोर्ट ने उत्‍तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्‍तराखंड, नगालैंड और मणिपुर के लेबर कमिश्‍नरों को तलब किया है। कोर्ट के अलावा कर्मचारियों के वकील कोलिन गोंसाल्‍वेज, परमानंद पांडेय, उमेश शर्मा आदि उनसे पूछेंगे, सवाल करेंगे, जिरह करेंगे कि आप महानुभावों ने स्‍टेटस रिपोर्ट क्‍यों सही नहीं भेजी, आपने हकीकत की तहकीकात क्‍यों नहीं की, स्‍पॉट पर गए क्‍यों नहीं, कर्मचारियों के साथ हो रही मैनेमेंटिया बदमाशी के खिलाफ एक्‍शन क्‍यों नहीं लिया, उन्‍हें वेज बोर्ड के लाभ दिलवाने के लिए सक्रिय ढंग से प्रयास क्‍यों नहीं किए, आप के पास इतने अधिकार तो हैं कि आप मैनेजमेंट पर कार्रवाई कर सकते हैं, क्‍या सचमुच आप लोग मालिकों के पे-रोल पर जीते हैं-काम करते हैं और कर्मचारियों पर जुल्‍म में उनके सहभागी हैं, क्‍या लेबर से जुड़े कानूनों, वेज-मजदूरी-पगार-वेतन से संबद्ध कानूनों और जर्नलिस्‍ट एक्‍ट आदि से अनभिज्ञ हैं, अरे भई, आप में से अनेक लोग एलएलबी-एलएलएम की डिग्री लेकर-प्रैक्टिस करके श्रम महकमे के इस बड़े ओहदे पर बिराजते हैं, आदि-इत्‍यादि। मतलब सवालों की भीषण बारिश होगी इन उच्‍च श्रम अधिकारियों पर।

जाहिर है, ज्‍यादातर अफसर पूरी तैयारी के साथ सर्वोच्‍च न्‍यायालय के कोर्ट रूम में दो बजे हाजिर होंगे। पर यूपी के नवागत लेबर कमिश्‍नर जो आईएएस हैं, अनजानेपन का, भोलेपन-मासूमियत का लबादा क्‍यों ओढ़े हैं। वह चाहें तो वेज बोर्ड से जुड़ी प्रिंट मीडिया कर्मचारियों की जितनी फाइलें हैं, सब पढ़ जाते। या अपने मातहत कर्मचारियों की मदद से पूरी जानकारी का सारांश जानकर घोंट जाते। वैसे भी महानुभाव आईएएस हैं। पढ़ना, रटना, घोंटना, कंठस्‍थ करना क्‍या होता है, उनसे बेहतर कौन जानता होगा। और ि‍फर इस बेहद अहम, अनिवार्य काम को करने के लिए उनके पास समय भी पर्याप्‍त है। पर वह टालू रवैया अपनाए हुए हैं तो इसके पीछे जरूर कोई बड़ा कारण, या कहें कि रहस्‍य होगा। जिसे छुपाए रखने के लिए वे अनभिज्ञता-अजनबीपन का आवरण डाले हुए हैं।

जरा सोचें, लेबर कमिश्‍नर साहब नए-नए आए हुए हैं, तो ज्‍वाइन करने के बाद उन्‍होंने अपनी नई जिम्‍मेदारियों के बारे में अपने स्‍टाफ से जानकारी नहीं ली होगी। रवायतन निश्चित रूप से ली होगी। ‍फिर उनसे निपटने की प्राथमिकता तय की होगी। इसी क्रम में जब वेज बोर्ड के मामले सामने आए होंगे और उन्‍हें लेकर पिछले लेबर कमिश्‍नर और उनके सहायकों की मंडली ने क्‍या किया है, जब यह पता हुआ होगा तो उन्‍होंने भी वेज बोर्ड के मामलों को लटकाए रखने की सोच-मंशा बना ली होगी। या ि‍फर संभव है उन्‍हें तब्‍दील कर इसी खास मकसद के लिए लेबर कमिश्‍नरी दी गई हो। क्‍योंकि अतीत में ऐसी सूचनाएं आई थीं कि मैडम लेबर कमिश्‍नर समेत ज्‍यादातर डिप्‍टी लेबर कमिश्‍नरों, असिस्‍टेंट लेबर कमिश्‍नरों एवं लेबर इंस्‍पेक्‍टरों के तबादले कर दिए गए। बताते हैं, इतने बड़े पैमाने पर श्रम महकमे में तबादलों का अहम कारण मजीठिया वेज बोर्ड ही रहा है। अखबार मालिकों-मैनेजमेंट का प्रदेश सरकार पर दबाव या कहें कि मिलीभगत रही है और है कि मीडिया कर्मचारियों को वेज बोर्ड के फायदे किसी भी सूरत में न दिए जाएं। इसे लटकाए रखा जाए और न्‍याय मंदिर को अंधेरे में रखा जाए।

शायद इसी मंशा के तहत सुप्रीम कोर्ट को भ्रामक, या कहें कि गलत रिपोर्ट भेजी गई। मसलन, सर्वोच्‍च  अदालत को लिख दिया गया कि हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के सभी संस्‍करणों में वेज बोर्ड अवॉर्ड लागू कर दिया गया है। टाइम्‍स ऑफ इंडिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण आदि अखबारों की बाबत भी बेतुकी, झूठी रिपोर्टें भेज दी गईं। इस रिपोर्ट में वेज बोर्ड को भी विवादास्‍पद बता दिया गया। इस संदर्भ में एक रोचक प्रकरण यह है कि यूपी के एडिशनल लेबर कमिश्‍नर प्रदीप गुप्‍ता पर अखबारी मालिकान खासकर दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्‍ता के साथ मिलकर जातिवाद चलाने का आरोप है। बताते हैं कि संजय गुप्‍ता की नृशंस-दानवी-राक्षसी-शैतानी बदमाशियों में इन महाशय ने जमकर साथ दिया और उलझाऊ-भ्रामक, लटकाऊ स्‍टेटस रिपोर्ट माननीय अदालत को भिजवाने में अहम भूमिका निभाई। लखनऊ के खबरिया गलियारे में इसकी खासी चर्चा है।

बहरहाल, लेबर कमिश्‍नर और उनके महकमे के सारे ओहदेदार चाहे जितना जोर लगा लें, चाहे जितना भी वेज बोर्ड के मामलों और स्‍टेटस रिपोर्ट को लटकाएं, तोड़ें मरोड़ें, बहानेबाजी करें, अनभिज्ञता का नकाब पहनें, स्‍वांग करें, ढकोसला करें, गुमराह करें, 23 अगस्‍त को बाद दोपहर 2 बजे सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होना ही होगा। वहां उनसे जिरह, पूछताछ निश्चित रूप से होगी। वहां यह कहने का साहस किसी भी सूरत में नहीं होगा कि — मी लॉर्ड मुझे थोड़ा सोचने, जानकारी लेने, तैयारी करने की मोहलत दी जाए। अगली बार सारा सच उगल देंगे। नहीं, ऐसा बिल्‍कुल नहीं होने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने हर पक्ष को पूरी मोहलत-समय दे दिया है जिसमें लेबर कमिश्‍नर लोग भी शामिल हैं। या कहें कि इन्‍हीं लोगों का सबसे बड़ा रोल था स्‍टेटस रिपोर्ट को ठीक, सटीक और सही ढंग से कोर्ट में रखने का। लेकिन इन्‍हीं लोगों ने धोखा दिया, दगाबाजी की, भ्रमित करने की कोशिश की सर्वोच्‍च अदालत को। पर ये महानुभाव लोग अपनी शातिराना हरकतों-करतूतों को अंजाम देने के चक्‍कर में भूल गए कि माननीय कोर्ट में बैठे माननीय न्‍यायाधीश लोगों के समक्ष ऐसे कारसाज अक्‍सर नमूदार होते हैं, पर जब इंसाफ का वज्र चलता है तो ऐसे तत्‍वों का अता-पता भी नहीं चलता। सब-सारा लापता हो जाता है। कोर्ट ने श्रम विभाग यानी सरकार को पक्षकार यों ही नहीं बना दिया है।

ऐसे में बेहतर यही होगा कि यूपी के नवागत लेबर कमिश्‍नर समेत हिमाचल, उत्‍तराखंड, नगालैंड और मणिपुर के लेबर कमिश्‍नर्स पूरी तैयारी के साथ कोर्ट रूम में उपस्थित हों और सच्‍चाई खुलकर धड़ल्‍ले से बोल दें, बता दें।

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
चंडीगढ़
मो: 9417556066

मूल खबर…

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