संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

Navin Kumar : संस्कृत एक मर चुकी भाषा है। ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है। अब इसे ज़िंदा नहीं किया जा सकता। सिर्फ संस्कृत के दम पर मूर्ख ब्राह्मण सदियों बाकी दुनिया से अपनी चरण वंदना करवाते रहे हैं। जब बाकियों ने इसे खारिज कर दिया तो दर्द से बिलबिला उठे हैं, क्योंकि अब वो अपनी मक्कारियों को सिर्फ एक भाषा के दम पर ढक नहीं पा रहे हैं। अब गया वो जमाना जब वेद सुन लेने पर बिरहमन दलितों के कान में शीशा पिघलाकर डाल देते थे। टीक और टीकाधारी पूजापाठियों का ज़माना लद चुका है। अपनी जाहिली पर रोना-धोना बंद कीजिए। इसे बच्चों पर जबरन थोपना एक ऐसा अपराध है जिसे वो बड़े होने के बाद हरगिज माफ नहीं करेंगे। स्मृति ईरानी जनता की गाढ़ी कमाई पंडितों को खुश करने में लुटा रही हैं।

उमा भारती से लेकर स्मृति ईरानी तक को संस्कृत पर विलाप करते देखकर दया आती है। इन्हें पहले भाषा विज्ञान के बारे में कुछ जानना समझना पढ़ना चाहिए। एक जातिमात्र की भाषा का जो हाल होना था वो हुआ। इसपर रोना-चिल्लाना पीटना कैसा? अगर संस्कृत इतनी ही महान, उदार और वैज्ञानिक भाषा है तो उसे समाज ने संवाद की भाषा के तौर पर क्यों स्वीकार नहीं किया? यहां तक कि पूजापाठी ब्राह्मणों को भी आपस में संस्कृत में बातचीत करते नहीं देखा। संस्कृत विश्वविद्यालयों तक में बोलचाल की भाषा हिंदी अंग्रेजी तमिल मलयालम कुछ भी है लेकिन संस्कृत नहीं है।

संस्कृत के विश्वविद्यालय ब्राह्मणों के विशाल गिरोह हैं जहां दलितों-शूद्रों-पिछड़ों का प्रवेश बिना कानून बनाए वर्जित है। अगर आप टीका नहीं लगाते, टीक नहीं रखते, जनेऊ नहीं चढ़ाते तो यह गिरोह आपपर टूट पड़ता है। जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया झोंक-झोंककर आजतक संस्कृत को जिंदा रखा गया है वर्ना वो तो कब की मर चुकी है। सच ये है कि संस्कृत गैर ब्राह्मण भारत के लिए किसी भी विदेशी भाषा से ज्यादा विदेशी रही है। दूसरी विदेशी भाषाओं की कक्षाओँ में घुसते हुए कम से कम जातीय हीनता का बोध तो नहीं होता। ब्राह्मण जानते हैं कि संस्कृत को जबरन न पढ़ाया गया तो कोई इसकी तरफ देखेगा भी नहीं। वेद पुराण के नाम पर जातिवादी अभिजातपन को संस्कृत के लिफाफे में छिपाया जाता रहा है। क्योंकि लंबे समय तक भारत का शासक वर्ग द्विजों के कुल-गोत्र से चुना जाता रहा। अब राजनीति बदल गई है। इसे समझिए। यह अब नहीं चलने वाला है।

अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं से से नफरत के पाखंडियों को अपने बच्चों के लिए अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में लाइन लगाए किसने नहीं देखा? क्या कोई बताएगा कि अभिज्ञान शाकुंतलम के बाद का संस्कृत साहित्य क्या है और पुरस्कारों के लिए जो भी सड़ा-गला गंधाता हुआ लिखा गया है उसकी आधुनिक साहित्य में जगह क्या है? मेरे बिरहमन दोस्त माफ करें लेकिन सच ये है कि संस्कृत को सत्यनारायण की कथा तक समेट देने के कसूरवार आप हैं। यही सच है।

मैंने संस्कृत के खत्म हो जाने के कारणों को बहुत सीधे और सपाट लहजे में रेखांकित किया है। मैंने कुछ बुनियादी सवाल उठाए हैं। वो चुभते जरूर हैं लेकिन अपनी जगह कायम हैं। आप उनमें से किसी भी सवाल का जवाब देते तो अच्छा लगता। एक तो संस्कृत हिंदी की तरह चिरायु नहीं है। क्योंकि वो बोलचाल की भाषा कभी नहीं रही। न कभी रोजगार की भाषा रही। उसका आधुनिक साहित्य में कोई योगदान नहीं है। मुझे नहीं पता पिछले दस-बीस साल में संस्कृत के कितने मौलिक उपन्यास, कितनी कविताएं या कितनी कहानियां लिखी गई हैं। संस्कृते के वो कवि, कहानीकार आलोचक कौन हैं, कहां लिखते हैं, कहां रहते हैं?

संस्कृत अभी तक भक्ति काल की विवेचना में ही लगी हुई है। क्या आपने कभी सोचा है संस्कृत के अखबार क्यों नहीं निकले? गैर धार्मिक समाचारों या विचारों पर संस्कृत की पत्रिकाएं क्यों नहीं निकलतीं? क्या आपने कभी सोचा है कि संस्कृत के शब्दकोष बहुत रूढ़ किस्म के हैं। इतने रूढ़ की उनका कोई विस्तार ही नहीं हुआ। फिर किस बूते संस्कृत के बचे होने या उसे बचाने की जिद पाले हुए हैं। संस्कृत जब थी भी तो सिर्फ कर्मकांड की भाषा थी। बिरहमनों ने उसे अपने जिद्दी एकाधिकार से बाहर निकलने ही नहीं दिया। उन्हें ये डर सताता रहा कि इससे उनकी एक्सक्लूसिविटी खत्म हो जाएगी। लोग उनके पैर छूना बंद कर देंगे। संस्कृत ने इसका खामियाजा भुगता है।

कभी पाली के बारे में भी यही बात करते थे लोग कि वो कभी खत्म नहीं हो सकती। बहुत श्रेष्ठ है बहुत उदार है। जबकि पाली की जड़ें समाज में संस्कृत से कहीं ज्यादा गहरी थीं। लेकिन वो मर गई। बिहार के विश्वविद्यालयों में अब भी पाली के विभाग हैं। लेकिन वहां अब इक्के-दुक्के बच्चे दाखिला लेते हैं। वो भी बहुत खुशामद करके करवाते हैं प्रोफेसर।

दूसरे, योगदानों को याद कराने के लिए बार-बार इतिहास की दुहाई देनी पड़े तो मुझे यह एक जबरदस्ती लगती है। कि आप मान क्यों नहीं लेते संस्कृत महान भाषा है। अगर मेेरी तरह के करोड़ों लोगों में संस्कृत को सीखने की कोई इच्छा नहीं जगती तो इसके पैरोकारों को हमें कोसने की बजाय अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। आप बताइए संस्कृत पढ़ने वाले भी संस्कृत में बातचीत क्यों नहीं करते?

संस्कृत और हिंदी का फर्क बाल्मीकि रामायण और राम चरित मानस का फर्क है। कोई भी अंतिम समय तक बहस को स्वतंत्र है लेकिन सच ये है कि पूजा करने के अलावा संस्कृत की कोई उपयोगिता अब बची नहीं है। यह भी बहुत जल्द खत्म हो जाएगी। जब भी कोई भाषा अपने शुद्धतावाद के जाल में उलझती है वो खत्म हो जाती है। इसे किसी भाषा से रिप्लेस करने की कट्टरपंथी, अराजक और फासीवादी जिद इसके खत्म हो जाने की घोषणा है। पाली के बाद हम अपने समय में संस्कृत की मौत देख रहे हैं।

न्यूज24 में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

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Comments on “संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

  • murkh ho tum naveen kumar….
    tumko brahamano ki esi aalochana karane ka adhikar kisane diya…
    rahi bat sansakart ki… to ye batao kya tumane sansakart ke kisi school me adveesan kyo nahi liye…
    pahale kuch jan lo fir fir apni bakawas likhana…

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  • Navee ka contact numberbatao…use pandit ke yaha janam lene ka pachhtava..hai..mai use batunga….basha ke naam par Brahimmmano ko gale dta hain kamine…………mujhse mil,,zara….

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  • NAVIN KUMAR KA DOS NAHI BHARAT KI AAZADI KE BAD NEHRU PARIVAR NE ESI SIKHSA NITI BANAI JISNE HAJARO MEKALE KE DATAK PUTRA BANA DIYE, HAJARO VAMPANTHI NIKAMO KE HATH ME BHARAT KI SIKHSA NITI SONP DI ISKA UPAJ H NAVIN KUMAR

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  • navin ji aap ka vo mai dekhta raha hu, aap kabil admi hai is me koi sak nahi. ek bar phir se aachi aur jamne wali baate likh kar khus kar diya.

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  • Yar tum jo bhi ho but tum kisi samuday vishesh ko MURKH ya is jaese shabd kaese bol sakte ho.. Bilkul kam Budhhi k writer lage tum mujhe.

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  • रवींद्र रंजन says:

    मूर्ख नवीन कुमार नहीं आप लोग हैं जिन्हें सच्चाई को गले उतारना भारी पड़ रहा है. नवीन कुमार को अपनी योग्यता साबित करने की जरूरत नहीं, वो पहले ही साबित हो चुकी है. बाकी आप लोग कितने योग्य हैं ये आप सबके कमेंट्स से पता चल रहा है.

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  • Ye Naveen Kumar to shakal se hi Kabar Bijju dikhai deta hai..Bada hi kunthit aur low IQ ka banda maloom padta hai..Chhota muhn badi baat nahi karte balak..jao abhi khoob seekho…

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  • Abhinav Dwivedi says:

    Hindi :
    नाच न जानेआंगन टेढ़ा।

    Oriya Equivalent:

    Chali Na jani batara dosa.

    Telugu Translation :

    Aadaleka madhela vodu annatlu.
    Aasa laavu peeka sannam

    – Aag Rameshwari Aanee Bamb Someshwari
    (Marathi)

    Chhele koTa? na puRiye khabO.
    age rUp nehari, pore guN bichari.
    (Bengali)

    maine kuchh bhasha me aapke prati aabhar vyakt kiya hai shriman navee ji…..

    aur isi samman ke sath aapko chhote se shabdon me Dhanyawad karna chahunga ke aapki sanskrit bhasha ke prati jo prem hai mai usse bahot khush hua hu….. ye baat mai aapko sanskrit me bhi likh sakta tha magar shayad aapke sanskrit ke prati iss apaar prem ko dekhte huye mujhe laga ke aap sanskrit ke prati itni shraddha dikha rahe hai magar aapse likhit sanchaar karne ke liye,,, muje english lipi me hindi ka prayog karna pad raha,…. jisk liye mai kshama chahunga…. kshama bhi isliye ke aap sanskrit premi hai……

    naveen ji aapke iss sankrit prem ke liye aapka dhanyawad….

    aapne sanskrit bhasha ke prati samaj ko prerit kiya ke wo sanskrit bhasha ko bhi variyata de r sanskrit bhasha ke prati samman rakhte huye apne vichar vyakt kare…..

    jisk liye aapka aabhar vyakt karta hu…..

    mahoday naveen ji….
    ab baat rahi brahman ki to bhasha kisi ki copyright nahi hai…… agar kisi bhasha par kisi ka adhikar kaanooni taur par ya shaastron me varnan hai to kripaya apne padhne waalo ko iski suchna awashya de……..

    aur hum to unme se hai jo apna pura naam pita ka naam pata aur agar chaahe to mob. num. tak aapko upalabdh kara de

    hum aadhe shabdon me kisi baat ko pura nahi karte…..
    dhanyawad

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  • Abhinav Dwivedi says:

    aur sath hi dusron ki yogyataaon ko saabit karne waale mahodayon se anurodh hai ki wo apni yogytaon ko apne aur apni karmabhumi ke liye hi prayog me laaye…..
    qki samaj me sabhi vyakti apne stur par samajh rakhte hai….

    isme achchha aur bura dono ka farq bhi samajhte hai

    dhanyawaad

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  • naveen jee men likhne kaa sanskaar hai, sanskaar hai to sanskriti hai, sanskrati hai to sanskrit hai, buddhi se likhaa hai to brahman hai, brahaman hain to shabd ko jante hain, shabd ko jaante hain to braham tak bhee pahunch jayenge….aaj nahee to kal kabir ke saman swayam ko samajh hee jayenge….

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  • students jo bhi bhasha sikhana chahe use sikhane diya jay yu hi koi bhi bhasha ki sakti uchit nahi, SANSKRIT BHI EK VIDESHI BHASHA HI HAI, VIDESHI ARYA BHARAT ME BAS JANE S SANSKRIT BHARTIY BHASHA NAHI HO JATI.YE IRANI MADAM KI IRANI BHASHA HAI..

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  • varn vyavasta ke anusar jo sankhya me jyada hai aise shudra varn ke logon ko padhne-likhane ke adhikaar se vanchit rakha to vo sanskrit hi kya kuch bhi nahi padh sake !! jise padhne ke liye pahle manahi thi use ham ab q padhe ?? ise na padhne se hamara kuch bhi nuksan nahi huva aur padhane se na hi koi labh hoga !! vyarth me iske piche q samay barbaad kare, ye kam arya logon ka hai, vo karte rahe.

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  • Neeti mehrishi says:

    chothi samaj or thoda sa gyan rakhne wale log kabhi-kabhi khud ko sarvopari samajhte hue public ko bebkuf samjhne lagte hai. gyan athah hai, jo jis level par pahunchta hai, usi tarah ki bat karta hai

    so adhjal gagri chalkat jaye, ye kahawat in par charitarth hoti hai

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  • himanshu priyadarshi says:

    maine socha main bhi kuchh likoon lekin yahan to bhai logon ne pahle hi kahar barsa rakha hai naveen per. Yahan main itna hi khoonga ki Naveen jaise Bandar ko gyan dene se apna hi nuksaan hoga.

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  • Sanskrit bhrahman ne hi jivit rakhi hai
    aur na kabhi marthi na kabhi maregi
    ise mrut samjne wale sabhi murkh khudi hi marchuke huve hai

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  • अरविन्द राजपूत says:

    सुन बाबर की औलाद संस्कृति भाषा किसी की दी हुई जागीर नही है जो तेरे जैसे कुत्ते के भूकने या काटने से मर जाएगी |
    रही बात दलित की तो तेरी मानसिकता ये जाहिर करती है की तू 1 न. का जाहिल और गावर है ||

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  • Jitendra Choubey says:

    Naveen kumar tumhara lekh poori tarah se Brahman virodhi or jalan se bhara hua hai, sanskrit ke prati tumhara lagaav isme kahin bhi najar nahi aata. tumne matr sanskrit ko kendra me rakhkar brahmanon par war kiya hai. ek patrakar hone ke naate yah tumhara ek akshamya apradh hai. Adhjal gagri jhalkat jaye wala muhavra tum par sateek baithta hai.
    Vartman Sahitya ki bhasha Hindi or angreji isliye hai kyonki vartman Bolchal ki bhasha bhi hindi or angreji hi hai. aaj bhi desh ke kuchhek gaon me sanskrit aam bolchal ki bhasha hai. jinke bare main shayad tumne nahi suna hoga. Lagatar videshi aakramanon fir sadiyon tak mughal or angreji shasan ne jo Sanskrit ka kshay kiya hai usi ki bharpaai ke liye vartman jaddojahad jari hai. brahman moorkh nahi tum jaise log moorh hain jinke paas koi bhi majboot tark na hone ke bad bhi kaisa bhi sada gala lekh chhapne ke liye mail kar dete hain.

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