बहुत बड़े ‘खिलाड़ी’ शशि शेखर को पत्रकार नवीन कुमार ने दिखाया भरपूर आइना! (पढ़िए पत्र)

आदरणीय शशि शेखर जी,

नमस्कार,

बहुत तकलीफ के साथ यह पत्र लिख रहा हूं। पता नहीं यह आपतक पहुंचेगा या नहीं। पहुंचेगा तो तवज्जो देंगे या नहीं। बड़े संपादक तुच्छ बातों को महत्त्व नहीं दे। तब भी लिख रहा हूं क्योंकि यह वर्ग सत्ता का नहीं विचार सत्ता का प्रश्न है। एक जिम्मेदार पाठक के तौर पर यह लिखना मेरा दायित्व है। जब संपादक अपने अखबारों को डेरे में बदलने लगें और तथ्यों के साथ डेरा प्रमुख की तरह खेलने लगें तो पत्रकारिता की हालत पंचकुला जैसी हो जाती है और पाठक प्रमुख के पालित सेवादारों के पैरों के नीचे पड़ा होता है।

कल का आपका अखबार पढ़ा। जिसके आप प्रधान संपादक हैं। रविवासरीय हिंदुस्तान। कई अखबार लेता हूं लेकिन एक आदत सी है कि हिंदी के अखबार सबसे पहले पढ़ता हूं। पहली लीड थी – बाबा के बॉडीगार्ड की गोली से भड़की हिंसा, छह पुलिसकर्मी और दो निजी सुरक्षाकर्मियों पर देशद्रोह का केस। मुझे अजीब लगा। एक दिन पहले खट्टर सरकार के ठप पड़ जाने की सारी तस्वीरें पूरा देश देख चुका था। साफ था कि हिंसा भड़की नहीं हैं भड़कने दी गई है। खबर से ऐसा लगा कि अखबार ने सरकार को साफ बचा लेने की नीयत से पूरी खबर लिखी है। कई घटनाएं ऐसी होती हैं संपादक जी, जो संपादकीय विश्वसनीयता के चीथड़े उड़ाकर रख देती हैं। 32 हत्याओं और 200 से ज्यादा घायलों पर एक अखबार सत्य को जब परास्त करने की कोशिश करता है तो तथ्य की लाश पहले ही बिछ जाती है। लेकिन अब यह इतना साधारण सिद्धांत नहीं रहा।

मैंने फिर बाकी के अखबार पढ़े। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदू, नवभारत टाइम्स, भास्कर और आप ही के अखबार का सहोदर हिंदुस्तान टाइम्स। पढ़कर एक अजीब सी विरक्ति से मन उचट गया। एक तो खबरें ऐसी थी और दूसरे मैंने अपने प्रिय अखबार को सत्ता के तल्ले के नीचे कराहते देखा था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा था – “प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री हैं, बीजेपी के नहीं। कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है।” आपने कभी सुना है किसी अदालत ने किसी प्रधानंत्री पर ऐसा अविश्वास जताया हो? उसकी जवाबदेही को ऐसे चिन्हित किया हो? उसकी क्षमताओं को लेकर इस कदर आहत महसूस किया हो? अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से पूछिए शशि जी आपने कभी सुना है ऐसा कि अदालत को याद दिलाना पड़े आप देश के प्रधानमंत्री हैं पार्टी के नहीं? सुना है तो इस पत्र को यहीं स्थगित समझें और नहीं तो एक पाठक की तकलीफ को समझने की कोशिश करें। सारे अखबारों को लगा कि यह खबर है सिवाए दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के। आपके निबंध दोनों ही अखबारों में छपते रहते हैं। फिलहाल सिर्फ दैनिक हिंदुस्तान की बात क्योंकि पहली भाषा हिंदी होने के कारण उससे जुड़ाव ज्यादा है।

मुझे लगा कि अंदर के पन्ने में कहीं छोटी सी खबर होगी जरूर। इतनी महत्त्वपूर्ण खबर को 30 पन्ने के अखबार से उड़ाने के लिए जिगर चाहिए। कोई संपादक इतना निर्लज्ज और निष्ठुर नहीं हो सकता कि वो प्रधानमंत्री को पार्टी का प्रधानमंत्री कहे जाने पर एक भी कॉलम की जगह न दे। और सच में आप साहसी निकले। आपने सच में प्रधानमंत्री पर अदालत की टिप्पणियों को पाठकों की नजर से बचा लिया था। फिर मुझे हंसी आ गई। टिटिहरी के बारे में छात्र जीवन के किस्से की याद आ गई। आपने भी सुना होगा। टिटिहरी जब सोती है तो पैरों को आसमान की तरफ उठाकर रखती है। उसे लगता है कि आसमान को उसी ने थाम रखा है नहीं तो वो गिर जाएगा और सृष्टि खत्म हो जाएगी।

आपके मन में कहीं न कहीं ये जरूर रहा होगा कि अगर हिंदुस्तान खबर उड़ा देगा तो किसी को पता नहीं चलेगा और शहंशाह की नजरों में आपका नंबर बढ़ जाएगा। हर गुनहगार को चोरी करते हुए यही लगता है। वो चाहे शहर का चोर हो या खबर का। नंबर बढ़ने वाली बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि चौदहवें पन्ने पर ही सही आपने मुख्यमंत्री खट्टर पर अदालत की टिप्पणियों को तो जगह दी है लेकिन उसी टिप्पणी में नत्थी प्रधानमंत्री के गिरेबान को साफ बचा लिया है। इसलिए आप इस छूट के पात्र नहीं हैं कि रिपोर्टर ने खबर छोड़ दी या डेस्क वाले से भूल हो गई है। वैसे भी अदालत की खबर आपने एजेंसी से ली है और एजेंसी ने पूरी खबर दी थी। वैसे भी प्रधानमंत्री पर इतनी बड़ी टिप्पणी को ड्रॉप करने का फैसला प्रधान संपादक से नीचे का मुलाजिम नहीं ले सकता।

आप तो जादूगर निकले शशि जी। सधा हुआ मंतरमार। हमने देखा है कि जादूगर नजरों के सामने से ताजमहल गायब कर देता है। कुतुबमीनार गायब कर देता है। और तो और हंसता-खेलता बच्चा गायब कर देता है। आप खबर गायब कर देते हैं। लेकिन पत्रकारिता के इस अपराध को जादू करना एक और अपराध हो जाएगा। इसे होशियारी कहते हैं। लेकिन हर जादू के बाद का सच ये है कि मतिभ्रम स्थायी नहीं होता। सूचना के अतिरेक और रफ्तार के दौर में यह मान लेना ही विचित्र लगता है कि अगर वो तथ्य को छिपा ले जाएगा तो वह जनता तक नहीं पहुंचेगा। मैंने जानबूझकर जनता शब्द का इस्तेमाल किया है पाठक का नहीं। क्योंकि इस फूहड़ मजाक के जरिए आपने एक खास प्रजाति की राजनीति की अनुयायी जनता को ही संबोधित किया था वर्ना पाठकों के विश्वास की फिक्र किसी को इस कदर बेईमान हो जाने की छूट नहीं देती।

जब मुझे लोग बताते थे कि आज का संपादक रहते हुए बाबरी मस्जिद को गिराने के समय आज अखबार में कैसे-कैसे जादू किए थे तो लगता था आप कच्चे रहे होंगे। तजुर्बे के अभाव में आपके भीतर का सवर्ण हिंदू फुफकार मार उठा होगा। लेकिन अब लगता है कि आप कच्चे नहीं मंजे हुए थे। आप तो बरसों से अपनी लाइन पर चल रहे हैं। वो तो हम हैं जो अभी भी अखबार को अखबार और संपादक को संपादक माने बैठे हैं। प्रधानमंत्री पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की टिप्पणी को गोल करके मेरे जैसे लाखों पाठकों की बची-खुची धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है।

एक अखबार का खाप में बदल जाना खराब लगता है शशि जी। इससे भी खराब लगता है किसी संपादक का उस खाप का नंबरदार बन जाना। हम सब सत्य के साथ खड़े रहने के साहस के दुर्भिक्ष के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में एक और संपादक का बेपर्दा हो जाना हमारी तरह के आशावादी लोगों के लिए एक और सदमा है। इस अपराध के लिए पाठकों से माफी मांगकर आप इस विश्वास की रक्षा कर सकते हैं लेकिन क्या एक बड़े अखबार का संपादक होने का दंभ और प्रधानमंत्री की नजरों से उतार दिए जाने का भय आपको ऐसा करने देगा?

आज से दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स बंद कर रहा हूं। जानता हूं कि लाखों प्रतियों के प्रसार से एक प्रति का कम हो जाना राई बराबर भी महत्त्व नहीं रखता लेकिन पत्रकारिता के खापों को अपने ड्राइंग रूम में जानते-बूझते सजाकर रख भी तो नहीं सकता। सवाल केवल राम रहीम के डेरे का नहीं है। पत्रकारिता के डेरों और खापों का भी है। अफसोस, राम रहीम के डेरे के आतंक ने 32 नहीं 33 लाशें गिराई हैं। 33वीं लाश का नाम ‘हिंदुस्तान’ है।

आपका,

एक सुधी पाठक

नवीन कुमार

लेखक नवीन कुमार आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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टीवी जर्नलिस्ट और चर्चित एंकर नवीन कुमार को हिंदी अकादमी पत्रकारिता सम्मान

सुलोचना वर्मा : वर्ष 2016-17 के हिंदी अकादमी पत्रकारिता सम्मान की घोषणा हो चुकी है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए यह सम्मान नवीन को दिया जाना सुखद है| कार्यक्रम “ये है इण्डिया” में अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़ों, स्त्री अधिकारों जैसे मुद्दों को लगातार उठाते रहने के कारण आज नवीन को लोग आमजन के पत्रकार के रूप में देखते हैं। खूब बधाई और शुभकामनाएँ!! नेक दोस्त की सलाह : कोई भी पुरस्कार /सम्मान अकेले नहीं आता; लानत-मलामत भी साथ लाता है| घर लौटते हुए कोलेकैल्शिफेरोल की शैशे लेते जाना। हड्डियों के सहने की क्षमता बढ़ेगी 🙂

Anurag Srivastava : कुछ लोग पुरस्कारों से ऊपर होते हैं…हो सकता है Navin Kumar को जीवन भर कोई पुरस्कार नहीं मिलता। मुमकिन है वो ताउम्र बिना किसी पुरस्कार के तमगे के ही काट देते। लेकिन जो लोग उन्हें जानते हैं.. उनके असली किरदार को पहचानते हैं उन्हें पता है कि चुभती आवाज़ और चीर देने वाली कलम का ये सिपाही बेफिक्र होकर उसी तरह मुस्कुराता और लिखता रहता । पुरस्कार मिला है लिहाज़ा खुशी है। लेकिन Navin Kumar की यही खासियत है कि उनकी खुशियां , उनकी कलम, उनका तेवर, उनका कलेवर किसी भी चीज का मोहताज नहीं है। मिलो तो खुश, ना मिलो तो खुश। भईया हम तो हैप्पी हैं और आपका हिसाब पता है। तो जवान खूब जियो, खूब लिखो, मस्त रहो ऐसे ही

Ila Joshi : पहला परिचय Navin से उनकी स्क्रिप्ट और वॉइस ओवर के माध्यम से हुआ और न्यूज़ मीडिया के लगभग सभी जानने वाले उनकी प्रतिभा के कायल थे। पिछले कुछ समय में व्यक्तिगत तौर पर जानने का मौका भी मिला तो लेखनी में और व्यक्तित्व में बहुत समानता पाई जो कि अमूमन कम ही देखने को मिलती है। मौजूदा दौर में भी विचारधारा की सच्चाई को बनाए हुए हैं और एक चैनल में काम करने के तमाम दबावों के बावजूद उनके कार्यक्रम और स्क्रिप्ट पर उसका असर नहीं के बराबर देखने को मिलता है। आज नवीन को उनके कार्यक्रम “ये है इंडिया” के लिए हिंदी अकादमी द्वारा सर्वश्रेष्ठ पत्रकार का सम्मान मिला है जो कि ऐसे पत्रकारों के काम को न सिर्फ़ रेखांकित करता है बल्कि उन्हें उससे बेहतर काम करने के लिए प्रेरित भी करता है। हालांकि नवीन को ये सम्मान बहुत पहले मिल जाना चाहिए था और देर लगने की सबसे बड़ी वजह उनका लंबे समय तक सिर्फ़ डेस्क पर काम करना रहा। इसलिए ये ज़रूरी हो जाता है कि छोटे बड़े पदों पर मौजूद पत्रकार और साथ साथ निर्णायक समितियां डेस्क पर काम करने वालों के काम संज्ञान लें और उन्हें वो सराहना मिले जिसके वो हक़दार हैं। नवीन को बहुत बहुत बधाई, बस यूंही बढ़ते रहें और हर मोर्चे पर डटे रहें।

सौजन्य : फेसबुक

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हीरो मोटर के इस विज्ञापन पर टीवी पत्रकार नवीन कुमार गंभीर आपत्ति, जानिए क्या है मामला

Navin Kumar : इन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन ख़ूब चल रहा है। हीरो मोटर कॉर्प का। यह विज्ञापन बहुत परेशान करने वाला है। यह दिखाता है कि घर का लड़का देर रात तक घर नहीं लौटा है। सब इंतज़ार कर रहे हैं। मां, पिता, छोटे-छोटे बच्चे और एक कुत्ता। नई-नई बीवी इंतज़ार करते-करते खाने के टेबल पर सो गई है। तभी बाइक की हेडलाइट दरवाज़े पर चमकती है। कैमरा दिखाता है कि कुत्ता दौड़ पड़ा। पिता मुस्कुरा उठे। बच्चे भी भागे। फिर बीवी कहां गई? सोती हुई बीवी हलचल होते ही सबसे पहले आईने के सामने भागती है। अपने बाल-मेकअप ठीक करने लगती है। और पूरी तरह संवरकर ही पति के सामने जाती है। गौर कीजिए यह आधी रात के बाद का दृश्य है। आखिर में एक लाइन का संदेश आता है गाड़ी संभलकर चलाइए क्योंकि कोई आपका इंतज़ार कर रहा है।

यह कितना फूहड़ है कि ऐसे संदेश के लिए भी विज्ञापन को कंसीव करने वाले ने और हीरो मोटर कॉर्प ने औरत को सिर्फ एक सामान समझा। किसी गुलदस्ते की तरह। जिसका महत्त्व सिर्फ उसके ताज़े और खिले होने से तय होता है। इसीलिए किसी के सुरक्षित लौट आने का इत्मीनान भी वह अपनी स्वाभाविकता में नहीं जी सकती। उसे पति के सामने मनुष्य की तरह नहीं, फूलदान की तरह पेश होना है। हो सकता है बहुतों को इसमें प्रेम और समर्पण जैसा कुछ नज़र आए। लेकिन मुझे इसमें एक वीभत्स अश्लीलता नज़र आती है।

औरत के पूरे वजूद को सिंगारदान के सामने समेट देने की ऐसी भव्य अश्लीलताओं से हमारा सिनेमा, समाज और संस्कार भरा पड़ा है। करवाचौथ पर छलनी के पीछे से पति की सूरत देखने को तड़प उठने की रवायतें औरतों के पूरे वजूद को एक झटके में खा जाती हैं। अच्छा दिखना एक मानवीय स्वभाव है। लेकिन जब यह मर्दों की सेवा में स्त्री का अनिवार्य संस्कार बन जाए तो यह मान लेने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि उस समाज के मर्द अभी मनुष्य नहीं हुए हैं। हीरो मोटर कॉर्प का विज्ञापन परंपरा के बाज़ार में मनुष्यता की उस क्रमिक मृत्यु का उत्सव गान है।

न्यूज24 में कार्यरत पत्रकार नवीन कुमार की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

गौरव मिश्रा ये क्या भाई साहब कभी मूड्स और कामसूत्र का advt जरूर देखें इससे भी बुरा हाल है

Kamlesh Tiwari विज्ञापन का मक़सद शायद इससे बढ़कर है जितना आप इस पोस्ट में लिख पाये… अभी तक हीरो सबसे अच्छे और सामाजिक सन्देश देने वाले विज्ञापन देने वाली कंपनियों में से रही है… असली अश्लीलता दिखाने वाले और भी ब्रांड्स हैं… उनपर लिखिए सर

Rohit Singh Rajpoot फूलदान में फूल, उसकी पंखड़ियां और महक अपने आप को समर्पित कर देती है। क्योंकि उसका बगीचे से लेके बागबानी तक उसकी शोभा उसी फूलदान में आने के बाद होती है। जब वो दायरे में,करीने से महकती है। गुलदस्ता ही बेजान हो चुके फूलों को अपना गुलिस्तां बना के खुद महकता है, महकाता भी है। आपका अनुज् हूँ । क्षमा।

Tarun Vyas “मर्द अभी मनुष्य नहीं हुए हैं” बहुत सही

Naveen Kumar इस विज्ञापन में एक पिता औऱ मां भी है जो अपनी बेटी का इंतजार कर रहे होते है। उनकी बेटी स्कूटी से वापस आती है।

Neeraaj Choudhary हद तो तब हो जाती है जब टाइल्स और प्लाई के विज्ञापन में लड़कियों को दिखाया जाता है।और तो और मर्दों के मोज़े के विज्ञापन में भी लड़कियां दिखती हैं। जबकि बिना अश्लीलता के विज्ञापन सबसे ज़्यादा हिट होते हैं। फिर भी ये सब समझ से बाहर है।

Pandit Ayush Gaur One should not be so negative always. There is always a positive sign of every story.

Gaurav Kumar वाह सर…तथाकथित बेटी बचाओ..बेटी पढ़ाओ वालों के लिए कड़वी सच्चाई…उखाड़ कर रख दिया आपने तो…

Ila Joshi जो लोग इस तरह के विज्ञापनों में कुछ भी असहज नहीं देख पा रहे हैं दरअसल इन्हीं में से ज़्यादातर लोग सैनिटरी नैपकिन के विज्ञापन आने पर या तो बगलें झाँकने लगते हैं या फिर चैनल ही बदल देते हैं जबकि उसमें तो औरतों के लिए एक ज़रूरी चीज़ की उपयोगिता के बारे में बात होती है और किसी पुरुष को सामान की तरह भी नहीं दिखाया जाता।

Shashaank Shukla हा हा हा….आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहता हैं…. बाप की बेटी के लिए चिंता नजर नहीं आई…एक कुत्ते का मालिक प्रति प्रेम नजर नहीं आया.. आपको वही नजर आया जो आप देखना चाहता थे…और वो था महिला का श्रृंगार….क्योंकि आपकी नजर वहीं टिक गई….आप वही दे…See more

Ila Joshi दरअसल दिक्कत यही है कि उस एक हिस्से को बड़ी चालाकी से पूरे विज्ञापन के बीच इस तरह रखा गया कि अगर कोई उसे चिन्हित करे तो बाकी लोग विज्ञापन के बचाव में आ जाएँ कि अरे तुमने वो क्यों नहीं देखा। या तो आप इस तरह के सेक्सिस्ट उदाहरणों को बड़ी सहुलियत से नज़रअंदाज़ कर देते हैं या आप इसे देखने के लिए conditioned हो चुके हैं या फिर आप भी उन विज्ञापन बनाने वालों जैसी ही सोच रखते हैं। अब चुनाव आप करिए कि आप ख़ुद को तीनों में से किस category में रखना चाहेंगे।

Shashaank Shukla तो ऐसे में किसी महिला का या किसी पुरुष का अपने पति या पत्नी या अपना प्रेमी प्रेमिका के प्रति प्रेम कैसे दिखाना चाहिए….फूल लड़ाकर ?….कभी ओवररिएक्शन नहीं करना चाहिए

Ila Joshi जो उदाहरण आपने दिया वो भी उतना ही फूहड़ है इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन लंबे समय से इन विज्ञापनों को देखने की वजह से हम इन फूहड़ उदाहरणों के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकते। प्रेम जताने के लिए श्रृंगार की अहमियत भी बाज़ार की बनाई ही है। किसी का देर तक इंतज़ार करना ही प्रेम जताने के लिए बहुत नहीं है क्या?

Shashaank Shukla इला जी फिर तो आप कई महिलाएं सवाल उठा सकती हैं कि पत्नी ही देर रात जागकर इंतजार करके परेशान क्यों हो….ये भी गलत है….

Ila Joshi बिल्कुल

Navin Kumar हे Shashaank Shukla आपके मगज में नहीं घुसेगा। आपकी वैचारिक हैसियत से बाहर की बात है। नाम की स्पेलिंग में दो a लगा लेने से बुद्धि का विस्तार नहीं हो जाता। मस्त रहिये।

Amit Singh Virat जहां पर काम करना है…वहां करता कौन है… बस हल्ला मचाते रहते हैं जिम्मेदार लोग.. लगभग सभी विज्ञापनों में महिलाओं को उत्पाद की तरह परोसा जाता है… जबतक मदकत अंदाज में कोई महिला ना हो भला कौन सा विज्ञापन पूरा होता है… लेकिन इस पर किसी की नजर नहीं है..सब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर फोकस कर रहे हैं…

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कमानी ऑडिटोरियम के गेट पर ‘मैला आंचल’ के लिए 17 साल के किशोर से 70 साल के बुजुर्ग तक को गिड़गिड़ाते देखा

Navin Kumar : कोई पचास साल की एक महिला कमानी ऑडिटोरियम के मुख्य गेट के भीतर गार्ड से झगड़ा कर रही थी – मैं अंदर चली आई, मेरे पति को पार्किंग की जगह खोजने में देर लग गई उन्हें अंदर आने दीजिए प्लीज। उनके बुजुर्ग पति गेट के बाहर से हाथ हिलाते हुए कह रहे थे मैं ही हूं इनका पति। गार्ड हाथ जोड़ रहा था, “मैडम आपकी बात ठीक है लेकिन उनके लिए गेट खोला तो डेढ़ सौ लोग चढ़ बैठेंगे।” सोमवार को शाम 7 बजकर 10 मिनट पर दिल्ली के कमानी सभागार का ऐसा ही नज़ारा था। अंदर हॉल ठसाठस भरा हुआ। बीच की गैलरी तक की कारपेट पर लोग बैठे हुए। बाहर लोग मिन्नतें कर रहे थे हमें कोई कुर्सी नहीं चाहिए.. बहुत दूर से किराया भाड़ा खर्च करके आधी छुट्टी लेकर आए हैं बस नाटक देखने दीजिए।

मुझसे देखा नहीं गया तो मैंने अपने बूते में कमानी के प्रबंधकों से कहा कि लोग किसी भी तरह देखने को तैयार हैं तो आपको परेशानी नहीं होनी चाहिए। उनका जवाब था पहले से लोग खड़े हैं अगर गेट खोल दिया तो नाटक ही नहीं हो पाएगा, पहले से खड़े लोग हंगामा कर देंगे। मैं निरुत्तर था। नाटक था मैला आंचल। ऐसा भी नहीं था कि अनुराग कश्यप ने निर्देशित किया हो, ऐसा भी नहीं था कि शबाना आज़मी एक्ट कर रही हों, ऐसा भी नहीं था किसी रिएलिटी शो का मज़ा आने वाला हो। मैं दंग था दिल्ली जैसे शहर में रेणु के इतने कद्रदान आए कहां से? यह एक ऐसी चाहना थी जिससे आमिर खान और शाहरुख खान तक को रश्क हो सकता है।

Maitreyi Pushpa के नेतृत्व में दिल्ली हिंदी अकादमी ने जिस तरह से साहित्यिक दायरे में रहते हुए राजनैतिक हस्तक्षेप का सिलसिला शुरू किया है वह दंग करने वाली है। रेणु की कहानियों का नाट्य रूपांतरण करवाना, उनपर एक महीने का वर्कशॉप करवाना, पूरे हफ्ते रोज़ाना दो नाटकों का मंचन और आखिर मैं मैला आंचल की भव्य प्रस्तुति। एक ऐसे समय में जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय अपने अभिजातपन से बाहर आने को ही तैयार नहीं है और उसके खिलाफ खड़ा हुआ अस्मिता थियेटर विचारों के अस्तबल में तब्दील हो चुका है हिंदी अकादमी का अपने सरकारीपन से बाहर निकलकर मंडी हाऊस के चौराहे पर चीख पड़ना चौंकाता है।

एक ऐसे समय में जब साहित्य अकादमी ने अपने सम्मानित लेखकों का पक्ष छोड़कर पूरी वैचारिकी पर ताला जड़ दिया है तो हिंदी अकादमी का जड़ता को तोड़कर साहित्य के मूल सरोकारों को विमर्श में ला देना आश्चर्य पैदा करता है। एक ऐसे समय में जब चेतन भगत और सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे लेखक पुस्तक मेलों के टॉम ब्वॉय हो चले हैं गांधी स्मृति के आहाते में पाश, धूमिल, गोरख या बल्ली सिंह चीमा के आदमकद पोस्टरों पर यूनिवर्सिटी के छात्रों को बात करते देखना अच्छा लगता है। अच्छा लगता है कोई अकादमी अदम गोंडवी को भी शिद्दत से याद करती है और दिनेश शुक्ल से जइसे आवैं घुइयां चार सुनने के लिए मंचीय योगासनों को छिन्न-भिन्न कर डालती है।

खैर आगे की कथा यह है कि मैं अपने शो ‘ये है इंडिया’ की वजह से ऑफिस पहुंचने के लिए नाटक के बीच से सात बजकर दस मिनट पर हॉल से बाहर निकला था। बाहर निकला तो गेट बंद और उस तरफ इतने लोग जितने आ जाएं तो कोई भी नाटककार अपने को धन्य समझता है। लेकिन गार्ड किसी भी तरह से बाहर वालों को आने देने को तैयार नहीं थे। मैंने कहा कि मुझे तो बाहर जाना है। गार्ड ने कहा सवाल ही नहीं। आप बाहर नहीं जा सकते। मैंने पूछा क्यों? उसने कहा गेट एक ही है आपके लिए खुलेगा तो उनके लिए भी खुल ही जाएगा। फिर पूछा तो क्या करूं। उसका जवाब था करना क्या है अंदर जाकर नाटक देखिए।

अंदर जाकर देखा तो सबसे आगे की मेरी वाली कुर्सी पर कोई और बैठा था। मैंने पूरा नाटक सबसे पीछे खड़े-खड़े देखा। जिन लेखकों और नाटककारों को पाठक और दर्शक न मिलने की शिकायत है उन्हें मेरा जवाब है इसका मतलब आप मर चुके हैं, अपनी मृत्यु के शोकगीत को साहित्य मत कहिए। आप अपने आपको ज़िंदा तो कीजिए। मैंने कल कमानी ऑडिटोरियम के गेट पर मैला आंचल देखने के लिए 17 साल के किशोर से 70 साल के बुजुर्ग तक को गिड़गिड़ाते हुए देखा है।

न्यूज24 में कार्यरत पत्रकार और एंकर नवीन कुमार की एफबी वॉल से.

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सिविल सेवा में ना सिविल जैसा कुछ है न सेवा जैसा, डीएम-एसपी माने बाघ से भी खतरनाक कोई जीव!

Navin Kumar : क्या आपको किसी IAS टॉपर का नाम याद है जिसने जनता के हक़ में कोई महान काम किया है? नहीं याद है तो इस सामंती गुणगान का तमाशा क्यों? ऐसा लग रहा है जैसे राजा की ताजपोशी पर लोग नाचे जा रहे हैं और पता नहीं है कि क्यों नाच रहे हैं?

सिविल सेवा में ना सिविल जैसा कुछ है न सेवा जैसा। इसमें से भ्रष्टाचार और फ़ालतू की अकड़ हटा दीजिये तो इस नौकरी में क्या है? आप अपने गाँव में जाकर पूछ लीजिये डीएम या एसपी क्या होता है? वो बताएगा बाघ से भी खतरनाक कोई जीव होता है जो लगता है खा जायेगा।

टीवी जर्नलिस्ट और एंकर नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

 

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मैं ही हूं रवींद्र कालिया

IIMC पास करने के कुछ दिनों की बात है। पत्रकारिता का नया-नया रंगरूट था। नौकरी नहीं करने का फैसला किया था। फ्रीलांसिंग शानदार चलती थी और लगता था ज़िंदगी में और क्या चाहिए। मोहन सिंह प्लेस कॉफी हाउस में बैठे हुए कुछ लोगों के बीच इलाहाबाद का ज़िक्र छिड़ा। और मेरे मन में तुरंत इलाहाबाद जाने की हुड़क मच गई। ऐसी हुड़क कि मैंने कॉफी हाउस से सीधे इलाहाबाद की ट्रेन पकड़ने का फैसला किया। कोई रिजर्वेशन नहीं, कोई तैयारी नहीं। दूसरा दर्जा तब कैटल क्लास के नाम से कुख्यात नहीं हुआ था।

ख़ैर, एक पत्रिका के संपादक वहीं बैठे थे। मैं उन्हें जानता नहीं था। उन्हें पता नहीं क्या सूझा मेरी तरफ बढ़े और कहा गजब झक्की हो। लेकिन जब जा रहे हो तो एक इंटरव्यू कर लाना। तुम्हें जानता नहीं लेकिन पता नहीं क्यों लगता है कि तुम बढ़िया करोगे। अगली सुबह प्रयागराज एक्सप्रेस के कैटल क्लास में जैसे-तैसे अकड़ा हुआ इलाहाबाद पहुंच ही गया। स्टेशन पर चाय-मठरी खाकर टेंपु में बैठा और अपने पुराने हॉस्टल हॉलैंड हॉल पहुंचा। मैदान में नहाकर। मेहदौरी कॉलोनी के लिए निकला। तब मोबाइल ने दुनिया को मुट्ठी में नहीं किया था।

रवींद्र कालिया का घर उस मोहल्ले में आनंद भवन की तरह था। उनकी किताबें पढ़ चुका था और उनकी किस्सागोई का एक न्यूनतम आतंक भी कहीं न कहीं मौजूद था।

बैठकखाने का दरवाजा खुला था।

मैंने पूछा, कालिया जी यहीं रहते हैं?

“जी हां, आप?” वह ममता कालिया थीं।

“मैं नवीन। दिल्ली से आया हूं। बात करनी है”

अंदर से एक लंबा आदमी बैठकखाने में दाखिल हुआ।

“मैं ही हूं रवींद्र कालिया।”

“क्या करते हो?”, उनका पहला सवाल था।

“कुछ नहीं”, मैंने जवाब दिया।

“बहुत अच्छा करते हो” वो हंस पड़े।

जब इंटरव्यू की बात की तो उन्होंने कहा ब्रेकफास्ट किया है तुमने? मैंने कहा सर ब्रेकफास्ट नहीं करता, खाना खाता हूं।

“तो ब्रेकफास्ट को ही खाना समझकर खा लो।”

ममता जी चौड़ी किनारी वाली थाली में दलिया ले आई थीं। और एक बड़ी सी कटोरी में भरके टेबल पर ही रख दिया था। एक तश्तरी में चम्मच।

कालिया जी ने कहा शुरू करो।

मैं असमंजस में था। वो ताके जा रहे थे। फिर चम्मच उठाकर दलिया खाने लगा। फिर वो ठठाकर हंसने लगे। कहे ऐसे थोड़े खाते हैं। उन्होंने थाली दोनों हाथों से उठाई और एक लंबी सी आवाज आई सुड़़$$$$$.. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कैसे रिएक्ट करूं। उन्होंने लगभग डांटते हुए कहा। तुम तो जवान भी नहीं हुए ठीक से। लंबी सुड़ निकालो। फिर मैंने भी थाली उठा ली। कमरे में बहुत देर-देर तक सिर्फ सुड़-सुड़ की आवाज़ आ रही थी। ममता जी हंस रही थीं, “खेल चुके तो बात भी कर लो तुम लोग।” हम दोनों हंस रहे थे। पता नहीं कब शाम ढल गई थी।

आज जब उस आदमी को लोधी रोड के श्मशान में जलाकर लौटा हूं तो लग रहा है हिंदी का संसार अपने आप से नाराज़ हो गया है। 17 रानडे रोड की किस्सागोई ने कई बार मेरे भीतर रश्क पैदा किया है। ‘गालिब छूटी शराब’ आप सिर्फ शुरू करते हैं, वो खत्म अपने आप हो जाती है। जब वो नया ज्ञानोदय के संपादक थे तब मैं भी एक उपन्यास लिखने की योजना बना रहा था। शिवेंद्र सिंह मुझे लेकर ज्ञानपीठ गए थे। कालिया जी ने पूछा था कबतक लिख लोगे? मैंने कहा था दो महीने में। वो दो महीना आजतक पूरा नहीं हुआ। और दुनिया से रूठ गए रवींद्र कालिया।

इलाहाबाद के उस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था दिल्ली साहित्य की मंडी है। मंडी में सारा माल बिक जाता है इसलिए दिल्ली के बगैर किसा का काम नहीं चल सकता। चलते हुए उन्होंने गालिब छूटी शराब की प्रति देते हुए ताकीद की थी एक पाठक के तौर पर कभी खरीदार मत बनना। न माल को कभी पढ़ना। यह एक लेखक की एक संभावनाशील लेखक को चेतावनी है।.. आज लोधी रोड श्मशान घाट से लौटते हुए लगातार सुड़-सुड़ की वो आवाज़ आती रही। याद आती रही वो चेतावनी। मंडी में बैठकर माल को खारिज करना असंभव से कुछ ही कम है रवींद्र कालिया। मैंने अभीतक किया है। आपके ठहाके मेहदौरी कॉलोनी से मरीन ड्राइव और मशान तक के हर चौराहे पर आपकी उपस्थिति की पंजिका लिए खड़े हैं। एक लेखक कभी नहीं मरता। कभी नहीं।

लेखक नवीन कुमार न्यूज24 चैनल से जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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नवीन कुमार ने संस्कृत का मरण उत्सव मनाया है तो मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाउंगा

(पहली किस्त) : न्यूज़ 24 में मेरे बेहद अनन्य नवीन कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर संस्कृत भाषा का बड़ा भारी मरण उत्सव मनाया है। मैंने उसे कहीं दूसरी जगह पढ़ा और देखा क्योंकि अब वो मुझे मेरे फेसबुक पर दिखाई नहीं देते। रोज दफ्तर में मिलते हैं, चर्चा होती है, कुछ हल्की-फुल्की बहस भी। नवीन कुमार में ओज है, तेजस्विता है, ऐसी प्रचंड लपलपाती आग हमेशा चेहरे पर दिखाई देती है कि मानो अभी जलाकर सब कुछ भस्म कर देगी। खैर, उनका मन बालसुलभ कोमलता से भरा है, वो गरजते हैं तो मैंने उन्हें लरजते भी देखा है, निजी चर्चा में उनकी भावना को मैंने समझा है।

चाय की चुस्कियों के साथ किसी मुद्दे पर लपकते और दुबकते भी देखा है। वो वरिष्ठ हैं, अनुभवी है, सब प्रकार से प्रशंसा के पात्र हैं, क्योंकि उनका मन खुला है, विचार खुला है, वो खुद के मन में खौलती, उबलती भावनाओं को औरों की तरह छुपाते नहीं हैं, वो पीछे से वार नहीं करते हैं, वो सीना चौड़ा कर 56 इंची छाती के साथ दक्षिण पंथ पर वामपंथी हसिया-हथौड़ा चलाते हैं, चाहे वो निजी चर्चा हो, फेसबुक वॉल हो या फिर टेलीविज़न पर उनकी दहाड़ती आवाज, उनकी स्क्रिप्ट, वो कोई भी मौका नहीं गंवाते, खुद के विचारों से तालमेल न रखने वाले विचार से दो-दो हाथ करने में। इस काम में उनका तर्क भी शानदार है कि पत्रकारिता व्यवस्था की आलोचना के लिए बनी है, अगर कोई व्यवस्था की तारीफों के पुल बांधता है तो वो पत्रकार नहीं है, उसमें पत्रकार होने का एबीसीडी वाला संस्कार भी नहीं है।

किसी का नवीन कुमार से वैचारिक मतभेद हो सकता है, जैसे कि मेरा भी किन्हीं मुद्दों पर मतभेद रहता ही है, लेकिन वो मनभेद वाले इंसान नहीं हैं, ऐसा मेरा अनुभव है। ये बात सही है कि तस्वीरों की मनमानी सुरुचिपूर्ण व्याख्या करने में कोई उनका सानी नहीं हैं, व्यंग्यात्मक पत्रकारिता और कटाक्ष वाली कटीली जुबान का इस्तेमाल वो टीवी स्क्रिप्ट में करके वाहवाही भी लूटते हैं। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि वो एकतरफा लिखते हैं, जो उन्हें सही लगता है, उनके विचार के मुताबिक जो सही है, वही लिखते हैं, इतिहास के आईने में तथ्यों को खंगालना उन्हें पसंद नहीं है, भारत, भारतीय मानस, संस्कार और संस्कृति के साथ संस्कृत समेत तमाम पहलुओं पर जो बात भारत विरोधियों ने भारत में प्रसारित की है, उसी के साथ कदमताल करते रहना उनकी फितरत बन चुकी है, वो भारतीयता की रोशनी में सही तथ्यों को न जानना चाहते हैं, न सुनना चाहते हैं, न वो अपनी बातों का विहंगावलोकन करने की मेरी कोशिश को शायद कभी मंजूर ही करेंगे।

लेकिन जैसे उन्होंने संस्कृत का मरण त्योहार मनाया है, वैसे ही मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाऊं। उन्हें जवाब प्रेषित करुं। बहस के लिए उनकी चुनौती स्वीकार करुं। अब ऐसा मैं इसलिए नहीं करने जा रहा हूं कि मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा हूं। ऐसा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरी बौद्धिक चेतना मुझे तब तक झकझोरती रहेगी जब तक कि मैं उनके झूठ को जड़मूल से उखाड़ न डालूं जो असल में उसी साम्राज्यवादी साजिश की देन है, जिन्होंने हिंदुस्तान को उसके सांस्कृतिक मूल से उखाड़ने का पाप बीते हज़ार साल में किया है, जिसे अंग्रेजों ने साजिशन हमारे अध्ययन का हिस्सा बनाया, जिसे एनेस्थिसिया बनाकर आजादी के बाद तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी गठजोड़ ने भारतीय मानस को उसकी जड़ों से काटने का कुकृत्य हिंदुस्तान में शुरु किया और इस पापपूर्ण काम में भी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्राप्त ब्राह्मण भी शामिल थे।

नवीन कुमार के मुताबिक, ‘सिर्फ संस्कृत के बल पर मूर्ख ब्राह्ण सदियों तक बाकी दुनिया से अपनी चरणवंदना करवाते रहे’। दूसरी बात शुरु में कही है कि ‘वो जमाना गया कि वेद सुन लेने पर दलितों के कान में शीशा पिघलवा करके डाल देते थे’। मैं भावनाओं से नहीं कुछ कहता लेकिन तथ्यों से बात करुंगा। मेरा सवाल है कि क्या नवीन कुमार इस बात को जानते हैं कि चारों वेदों के रचयिता कौन से ब्राह्ण थे? क्या महर्षि वेदव्यास जाति से ब्राह्ण थे? वेदों के जानकारों ने ही हमें बताया है कि वेदव्यास का जन्म तथाकथित ब्राह्मण कुल में नहीं हुआ था, शास्त्र ही बताते हैं कि वेदव्यास तथाकथित शूद्र कुल में जन्मे थे लेकिन अपने कर्म से वो ब्राह्मणों के लिए भी पूज्य बन गए। वेदव्यास के पहले चारों वेदों की परंपरा श्रुत थी, यानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक वेद कानों से सुनकर दिमाग से रटकर ट्रांसफर होते रहे। यह दुष्कर कार्य पीढ़ियों तक जिन कथित ब्राह्मणों ने किया, उन्हें गाली देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते हैं? वेदकाल से यही सत्य है कि वेदव्यास ने ही वेदों को लिखित रुप दिया, लेखन-पठन-पाठन पर अगर ब्राह्मणों का ही आधिपत्य होता तो क्या ये संभव था?

नवीन कुमार तर्कों का जाल बुन देंगे जैसे वेद विरोधी बुनते चले आए हैं। लेकिन क्या वो बताने की कृपा करेंगे कि महर्षि वाल्मिकी का जन्म किस कथित ब्राह्मण कुल में हुआ था। वाल्मीकि ऋषि तो आदि कवि हैं, संसार के पहले कवि, संस्कृत में लिखी पूरी रामायण में वेदों के जाने कितने श्लोकों को उन्होंने उद्धृत किया है, किस माई के लाल ब्राह्मण ने तथाकथित शूद्र कुल में जन्में महर्षि वाल्मीकि के कान में पिघलाकर शीशा डाला था…? इतिहास में कोई एक उदाहरण तो बताइए? लेकिन ये वाल्मीकि ऋषि को ही सत्य मानने को तैयार नहीं हैं, तो फिर बाकी बात ही क्या की जाए। भारत की जो लिखित विरासत इनके विचार को खंडित करती है, उसे ये मिथक बताकर इतिहास से बाहर कर देते हैं और जो कुछ इधर-उधर की कपोल गप्पें और बेकार बातें इनकी बातों को पुष्ट करती हैं, उसका ये बड़े चाव से बखान करते हैं। जब भारत का सारा अतीत आपके लिए मिथक है, झूठ है, कहानी है तो फिर उसमें से किसी विवादित तथ्य को उद्धरण बनाकर, सच बताकर पेश करना कैसे सही हो सकता है।

तो मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर, अंग्रेजों की विभाजनकारी पढाई और कथित सेक्युलर मार्क्सवादी पाठ के आधार पर लोगों को दिग्भ्रमित करना बंद करिए। अपने ज्ञान को तथ्यों के आईने में संवारिए। आज से डेढ सौ साल पहले ये हिंदी भी नहीं थी जो हम आप लिख रहे हैं, देशज भाषा जो आज भी हमारे गांव-जवार में बोली जाती है, वही हमारे लोकजीवन की भाषा थी। भाषा का संस्कार राजनीतिक जय-पराजय से जुड़ा है, हम हज़ारों सालों से अपने राजनीतिज्ञों के अलगाव की वजह से पददलित हुए, इसी में संस्कृति भी धुंधली पड़ी और संस्कृत भाषा भी। क्या भूल गए- पढ़ें फारसी बेचें तेल वाली कहावत। अंग्रेजी राज में अरबी-फारसी इसी हिंदुस्तान में कैसे देखते-देखते तेल बेचने लगी थी। बात करिए तो सप्रमाण बात करुंगा। क्यों नालंदा जीवित करने की याद आई, किसने नालंदा जलाया, किसने तक्षशिला मिटाया, किसने ज्ञान के सारे स्रोत हिंदुस्तान से उखाड़ फेंकने की कसमें खाईं, किसने सुजलाम-सुफलाम ज़मीन पर खून की नदियां सिर्फ इसलिए बहाईं क्योंकि वैचारिक और मजहबी तालमेल नहीं बैठ रहा था।

नहीं तो यही संस्कृत भाषा है जिसके पचास से अस्सी फीसद शब्द आज भी कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती, डोगरी और हिंदी समेत तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं तक में पाए जाते हैं। यही संस्कृत है जिसने हिंदुस्तान को बताया कि उसकी पहचान क्या है। संस्कृत से इतनी ही अलर्जी है तो नष्ट कर दीजिए ये सारी भाषाएं, मिटा दीजिए सारे सांस्कृतिक प्रमाण, हटा दीजिए अपना ‘नवीन’ पद जिसे रावण ने भी गुनगुनाया था…नवीन मेघमंडली निरुद्धदुर्धर्स्फुरत्करालवालहव्यवाट, जब शिव के सामने रावण ने आंखों में आंसू भरकर नवीन उद्दभट रुप दिखाया था। अरे भारत का सारा सृजन और लोकजीवन और लोकमन का सार बीजमंत्र, भारत के हर शख्स के सुख-दख से जुड़ा राम-कृष्ण-शिव का जीवन काव्य, भारत के जीवन का सारा संगीत, स्वास्थ्य, साहित्य, आयुर्वेद, विज्ञान सबका स्रोत तो इसी संस्कृत में है। इसकी खिलाफत क्यों ? फुर्सत मिले तो दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह चले जाइए किसी रात में, देखिए और सुनिए बड़े-बड़े कव्वाल और बड़े संगीत घराने कैसे गाते हैं शास्त्रीय गायन। सुनकर जिसे दुनिया आज भी खुद को धन्य-धन्य कहने लगती है, सदियों पुरानी वास्तु कला और ऐसी तमाम महान विरासत जो संस्कृत भाषा के जरिए शुद्ध रुप में दुनिया को मिली, अगर उसे सही तरीके से हम और आप संभाल नहीं सकते तो कम से कम उसके लिए जो काम करते हैं, काम करना चाहते हैं, उनके प्रयत्नों को क्यों गरिया रहे हैं।

चलते-चलते बोलूंगा गच्छ, गच्छ। आप सोचेंगे ये क्या बात है। ये गच्छ-गच्छ क्या बला है तो गच्छ-गच्छ की बोली आज भी महावत बोलते हैं, हाथियों को चलने केलिए, बैठे हाथी को उठाने के लिए महावत आज भी गच्छ-गच्छ बोलते हैं। नवीनजी जो अपनी पोस्ट लिख रहे थे तो बता रहे थे कि ब्राह्मणों ने संस्कृत को मार डाला। मैंने पूछा कि गच्छ-गच्छ की आवाज सुनी है कभी? कभी किसी महावत के पास बैठकर बात की है? हिंदुस्तान में हाथी भी समझता है कि गच्छ का मतलब क्या होता है…वही गच्छ जिसके मायने हैं चलो-उठो-चलो। गच्छति, गच्छतः और गच्छंति। कहां हैं मित्रवर, आइए नवीन दिशा में चलें, फिर से कहें गच्छ-गच्छ-गच्छ।

टीवी जर्नलिस्ट राकेश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.


नवीन कुमार की मूल पोस्ट और संंबंधित अन्य पोस्ट…

संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

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संस्कृत भाषा जीवित है, उसे कोई मार नहीं सकता

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संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

Navin Kumar : संस्कृत एक मर चुकी भाषा है। ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है। अब इसे ज़िंदा नहीं किया जा सकता। सिर्फ संस्कृत के दम पर मूर्ख ब्राह्मण सदियों बाकी दुनिया से अपनी चरण वंदना करवाते रहे हैं। जब बाकियों ने इसे खारिज कर दिया तो दर्द से बिलबिला उठे हैं, क्योंकि अब वो अपनी मक्कारियों को सिर्फ एक भाषा के दम पर ढक नहीं पा रहे हैं। अब गया वो जमाना जब वेद सुन लेने पर बिरहमन दलितों के कान में शीशा पिघलाकर डाल देते थे। टीक और टीकाधारी पूजापाठियों का ज़माना लद चुका है। अपनी जाहिली पर रोना-धोना बंद कीजिए। इसे बच्चों पर जबरन थोपना एक ऐसा अपराध है जिसे वो बड़े होने के बाद हरगिज माफ नहीं करेंगे। स्मृति ईरानी जनता की गाढ़ी कमाई पंडितों को खुश करने में लुटा रही हैं।

उमा भारती से लेकर स्मृति ईरानी तक को संस्कृत पर विलाप करते देखकर दया आती है। इन्हें पहले भाषा विज्ञान के बारे में कुछ जानना समझना पढ़ना चाहिए। एक जातिमात्र की भाषा का जो हाल होना था वो हुआ। इसपर रोना-चिल्लाना पीटना कैसा? अगर संस्कृत इतनी ही महान, उदार और वैज्ञानिक भाषा है तो उसे समाज ने संवाद की भाषा के तौर पर क्यों स्वीकार नहीं किया? यहां तक कि पूजापाठी ब्राह्मणों को भी आपस में संस्कृत में बातचीत करते नहीं देखा। संस्कृत विश्वविद्यालयों तक में बोलचाल की भाषा हिंदी अंग्रेजी तमिल मलयालम कुछ भी है लेकिन संस्कृत नहीं है।

संस्कृत के विश्वविद्यालय ब्राह्मणों के विशाल गिरोह हैं जहां दलितों-शूद्रों-पिछड़ों का प्रवेश बिना कानून बनाए वर्जित है। अगर आप टीका नहीं लगाते, टीक नहीं रखते, जनेऊ नहीं चढ़ाते तो यह गिरोह आपपर टूट पड़ता है। जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया झोंक-झोंककर आजतक संस्कृत को जिंदा रखा गया है वर्ना वो तो कब की मर चुकी है। सच ये है कि संस्कृत गैर ब्राह्मण भारत के लिए किसी भी विदेशी भाषा से ज्यादा विदेशी रही है। दूसरी विदेशी भाषाओं की कक्षाओँ में घुसते हुए कम से कम जातीय हीनता का बोध तो नहीं होता। ब्राह्मण जानते हैं कि संस्कृत को जबरन न पढ़ाया गया तो कोई इसकी तरफ देखेगा भी नहीं। वेद पुराण के नाम पर जातिवादी अभिजातपन को संस्कृत के लिफाफे में छिपाया जाता रहा है। क्योंकि लंबे समय तक भारत का शासक वर्ग द्विजों के कुल-गोत्र से चुना जाता रहा। अब राजनीति बदल गई है। इसे समझिए। यह अब नहीं चलने वाला है।

अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं से से नफरत के पाखंडियों को अपने बच्चों के लिए अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में लाइन लगाए किसने नहीं देखा? क्या कोई बताएगा कि अभिज्ञान शाकुंतलम के बाद का संस्कृत साहित्य क्या है और पुरस्कारों के लिए जो भी सड़ा-गला गंधाता हुआ लिखा गया है उसकी आधुनिक साहित्य में जगह क्या है? मेरे बिरहमन दोस्त माफ करें लेकिन सच ये है कि संस्कृत को सत्यनारायण की कथा तक समेट देने के कसूरवार आप हैं। यही सच है।

मैंने संस्कृत के खत्म हो जाने के कारणों को बहुत सीधे और सपाट लहजे में रेखांकित किया है। मैंने कुछ बुनियादी सवाल उठाए हैं। वो चुभते जरूर हैं लेकिन अपनी जगह कायम हैं। आप उनमें से किसी भी सवाल का जवाब देते तो अच्छा लगता। एक तो संस्कृत हिंदी की तरह चिरायु नहीं है। क्योंकि वो बोलचाल की भाषा कभी नहीं रही। न कभी रोजगार की भाषा रही। उसका आधुनिक साहित्य में कोई योगदान नहीं है। मुझे नहीं पता पिछले दस-बीस साल में संस्कृत के कितने मौलिक उपन्यास, कितनी कविताएं या कितनी कहानियां लिखी गई हैं। संस्कृते के वो कवि, कहानीकार आलोचक कौन हैं, कहां लिखते हैं, कहां रहते हैं?

संस्कृत अभी तक भक्ति काल की विवेचना में ही लगी हुई है। क्या आपने कभी सोचा है संस्कृत के अखबार क्यों नहीं निकले? गैर धार्मिक समाचारों या विचारों पर संस्कृत की पत्रिकाएं क्यों नहीं निकलतीं? क्या आपने कभी सोचा है कि संस्कृत के शब्दकोष बहुत रूढ़ किस्म के हैं। इतने रूढ़ की उनका कोई विस्तार ही नहीं हुआ। फिर किस बूते संस्कृत के बचे होने या उसे बचाने की जिद पाले हुए हैं। संस्कृत जब थी भी तो सिर्फ कर्मकांड की भाषा थी। बिरहमनों ने उसे अपने जिद्दी एकाधिकार से बाहर निकलने ही नहीं दिया। उन्हें ये डर सताता रहा कि इससे उनकी एक्सक्लूसिविटी खत्म हो जाएगी। लोग उनके पैर छूना बंद कर देंगे। संस्कृत ने इसका खामियाजा भुगता है।

कभी पाली के बारे में भी यही बात करते थे लोग कि वो कभी खत्म नहीं हो सकती। बहुत श्रेष्ठ है बहुत उदार है। जबकि पाली की जड़ें समाज में संस्कृत से कहीं ज्यादा गहरी थीं। लेकिन वो मर गई। बिहार के विश्वविद्यालयों में अब भी पाली के विभाग हैं। लेकिन वहां अब इक्के-दुक्के बच्चे दाखिला लेते हैं। वो भी बहुत खुशामद करके करवाते हैं प्रोफेसर।

दूसरे, योगदानों को याद कराने के लिए बार-बार इतिहास की दुहाई देनी पड़े तो मुझे यह एक जबरदस्ती लगती है। कि आप मान क्यों नहीं लेते संस्कृत महान भाषा है। अगर मेेरी तरह के करोड़ों लोगों में संस्कृत को सीखने की कोई इच्छा नहीं जगती तो इसके पैरोकारों को हमें कोसने की बजाय अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। आप बताइए संस्कृत पढ़ने वाले भी संस्कृत में बातचीत क्यों नहीं करते?

संस्कृत और हिंदी का फर्क बाल्मीकि रामायण और राम चरित मानस का फर्क है। कोई भी अंतिम समय तक बहस को स्वतंत्र है लेकिन सच ये है कि पूजा करने के अलावा संस्कृत की कोई उपयोगिता अब बची नहीं है। यह भी बहुत जल्द खत्म हो जाएगी। जब भी कोई भाषा अपने शुद्धतावाद के जाल में उलझती है वो खत्म हो जाती है। इसे किसी भाषा से रिप्लेस करने की कट्टरपंथी, अराजक और फासीवादी जिद इसके खत्म हो जाने की घोषणा है। पाली के बाद हम अपने समय में संस्कृत की मौत देख रहे हैं।

न्यूज24 में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार नवीन कुमार के फेसबुक वॉल से.

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