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एक साल पूरा होने पर हम तीनों को ‘नवां जमाना’ अखबार ने बिना नोटिस द‍िए राम-राम कह दिया!

Reetu Kalsi : सन 2008 की बात है एक दिन मैं और नवराही जी नवां जमाना अखबार के दफ्तर गए, पहले भी अक्सर जाना होता था पर उस दिन हम जस मंड जी से मिले। वे नए नए मैनेजिंग ट्रस्‍टी बने थे नवां जमाना समाचार पत्र के। मैं उस वक्त अमर उजाला में काम कर रही थी। जस मंड अखबार को नई उचाईयां दिलाना चाहते थे। तकरीबन पहले भी इस पर चर्चा करते थे कि कैसे अखबार को और अच्छा बनाया जाए। विज्ञापन कैसे मिल सकते हैं वगैरह वगैरह … तो उस दिन जस मंड जी ने बातो बातों में मुझे नवां जमाना जॉइन करने का ऑफर दे दिया।

Reetu Kalsi : सन 2008 की बात है एक दिन मैं और नवराही जी नवां जमाना अखबार के दफ्तर गए, पहले भी अक्सर जाना होता था पर उस दिन हम जस मंड जी से मिले। वे नए नए मैनेजिंग ट्रस्‍टी बने थे नवां जमाना समाचार पत्र के। मैं उस वक्त अमर उजाला में काम कर रही थी। जस मंड अखबार को नई उचाईयां दिलाना चाहते थे। तकरीबन पहले भी इस पर चर्चा करते थे कि कैसे अखबार को और अच्छा बनाया जाए। विज्ञापन कैसे मिल सकते हैं वगैरह वगैरह … तो उस दिन जस मंड जी ने बातो बातों में मुझे नवां जमाना जॉइन करने का ऑफर दे दिया।

मैंने एक दो दिन सोचने में लगाए। नवराही जी से डिस्‍कस किया। नवराही जी के दिल मे भी नवां जमाना के लिए साफ्ट कॉर्नर है, तो वे सहमत हो गए। सो मैंने अमर उजाला को अलविदा कह जून या जुलाई 2008 को नवां जमाना जॉइन कर ल‍िया। सेल्स मार्केर्टिंग वालों का अपना तरीका होता है काम करने का इसलिए यह बात पहले ही क्‍िलयर कर ली। मैंने अपने साथ दो और लोग रखे जो विज्ञापन ला सकें। उन्होंने पूरी मेहनत के साथ काम किया और वहां-वहां से विज्ञापन ले आए जहां से वो लोग सोच भी नहीं सकते थे। बिना सर्कुलेशन यह बड़ी बात थी। मार्केटिंग का ज्यादा काम आपके लिंक्स पर होता है और नवां जमाना के लिए हमने इस्तेमाल किए। पर 2009 में जैसे ही एक साल पूरा हुआ हम तीनों को बिना नोटिस द‍िए राम-राम कह दिया गया क्योंकि हम एक साल के अनुबंध पर रखे गए थे।

यह उस अखबार ने हमारे साथ ऐसा किया जहां पर कर्मचार‍ियों के हक की बात की जाती थी। तब मैंने अपने हक के लिए आवाज क्‍यों नहीं उठाई, आज तक नहीं जान पाई। शायद वहां सबको जानती थी, तो कुछ कह नहीं पाई। यह सच है कि उन्होंने मेरे और मेरी टीम के साथ सही नहीं किया था। आज तक मेरा एक साल का पीएफ, जो कि मेरे ही वेतन काटा गया था मुझे नहीं दिया गया। आज मैं यह बात इसलिए कर रही हूं क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्मचार‍ियों के हक में तो क्या जाना था बल्कि अपना पल्ला ही झाड़ लिया और लेबर कोर्ट जाने की सलाह दे डाली। इस हिसाब से मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में फैसला अखबार के मालिकों के पक्ष में जाता ही समझा जाएगा। खैर, मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। अगर कर्मचारियों के हकों की बात करने वाले अखबार में मेरे सा‍थ ऐसा हो सकता है, तो केवल मुनाफे के लिए छापे जाने वाले संस्‍थान से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं। सच्ची और सार्थक पत्रकार‍िता वाली बात तो सपना ही है।

पंजाब की पत्रकार रीतू कलसी की एफबी वॉल से.

मूल खबर….

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