नईदुनिया प्रबन्धन ने मजीठिया क्रांतिकारियों की सेलरी में मात्र सौ रुपये प्रतिमाह की वृद्धि की

जागरण प्रकाशन की इकाई नईदुनिया ने वार्षिक वेतन वृद्धि के दौरान मजीठिया का केस लगाने वाले अपने समस्त कर्मचारियों के वेतन में प्रतिमाह मात्र 100 रुपये की वृद्धि की है। कहा जा रहा है कि ऐसा कर नईदुनिया और जागरण के प्रबन्धन ने अपने कर्मचारियों को, जिन्होंने अपने जायज़ वेतन की मांग के चलते मजीठिया के लिए कोर्ट केस किया हुआ है, सजा के तौर पर यह मामूली वेतन वृद्धि की है।

चर्चित मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह को एनयूजे (महाराष्ट्र) ने बनाया मजीठिया सेल का समन्यवयक

(शशिकांत सिंह)

दो कद्दावर मजीठिया क्रांतिकारियों ने महाराष्ट्र के मीडिया कर्मियों को उनका अधिकार दिलाने के लिए हाथ मिलाया है। देश के जाने माने मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह को नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के अध्यक्ष डॉ उदय जोशी और महाराष्ट्र की जनरल सेक्रेटरी शीतल करदेकर ने महाराष्ट्र का मजीठिया सेल का समन्यवक बनाया है। शीतल करदेकर महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाई गई जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की त्रिपक्षीय कमेटी में भी मीडिया कर्मियों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

मजीठिया : पत्रिका को पत्रकार जितेंद्र जाट का तमाचा, लेबर कोर्ट में जीते टर्मिनेशन का केस

कल 10 जुलाई यानि सावन के पहले सोमवार को एक शुभ समाचार आया। पत्रिका अखबार के मालिक गुलाब कोठारी और उनके ख़ास सिपहसालारों की हार की शुरुआत हो गई है। पत्रिका के मालिकों के खिलाफ जब कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के केस लगाये तो पत्रिका प्रबन्धन ने संबंधित कर्मचारियों को टर्मिनेट-ट्रान्सफर करना शुरू कर दिया। टर्मिनेशन-ट्रान्सफर के खिलाफ कर्मचारी लेबर कोर्ट गए।

मजीठिया पर ताजे फैसले के बाद मीडियाकर्मियों के पक्ष में शुरू हुआ एक्शन, मालिकों और प्यादों के चेहरे सूखे

हाल में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया मामले को लेकर जो आदेश सुनाया, उसने अख़बार मालिकानों की जान हलक में अटका दी है। अब हर मालिकान अपने प्यादों को इस काम में लगा रखा है कि कहीं से भी राहत ढूंढ के लाओ। वैसे तो कमोवेश देश के सभी अखबार मालिकान इस बात को मान चुके हैं कि आये इस आदेश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। मालिकों के पालतू, जो हर यूनिट में 4 या 5 होते हैं और पूरे ग्रुप में 1 या 2, ने कुछ साल पहले मालिकानों को जो आइडिया दिया था ठेके पर वर्कर रखने का, वह भी अब किसी काम का साबित नहीं हुआ।आये फैसले ने सभी को पैसा लेने का हकदार बना दिया और इन पालतुओं की सारी कवायद धरी रह गयी।

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बौखलाए अखबार मालिकों ने सैकड़ों लोगों को नौकरी से बाहर निकाला

लोकमत प्रबंधन ने अपने 186 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया… मजीठिया वेज बोर्ड का भूत डराता रहेगा अखबार मालिकों को…  पिछले दिनों मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई का जब फैसला आया, तब सारे अख़बार मालिकानों ने अपने दफ्तरों में यही खबर फैलाया कि जिन लोगों ने कोर्ट में अवमानना का केस डाला था, वे हार गए। हम यानी अखबार मालिकान जीत गए। फैसला 19 जून को आया था। अब कुछ समय बीत गया है और ज्यों ज्यों समय बीतता जा रहा है, मालिकानों की ख़ुशी गम में बदल रही है। उनके सामने अब बड़ी मुसीबत यह है कि कैसे लड़ाकू वर्करों के अगले कदम का मुकाबला किया जाये और कैसे अंदर बैठे यानी काम करने वाले वर्कर की देनदारी का रास्ता खत्म किया जाये।

भास्कर समूह की कंपनी डीबी कार्प के खिलाफ कट गई आरसी, मजीठिया क्रांतिकारियों का बकाया देने के लिए संपत्ति होगी नीलाम

BHASKAR

मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र में कटी पहली आरसी… दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर समेत कई अखबारों को संचालित करने वाली भास्कर समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड के माहिम और बीकेसी कार्यालय को नीलाम कर कर्मचारियों को बकाया पैसा देने का आदेश…

मजीठिया पर ताजा फैसले के बाद मीडियाकर्मियों और लेबर कोर्ट की सक्रियता देख मालिकों की नींद हराम

यूपी के एक एडिशनल लेबर कमिश्नर ने जो बात कही, वह सच होता दिख रहा है। उनका कहना था कि मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर आये ताजा फैसले से मालिकानों की नींद हराम हो गई होगी। जाहिर सी बात है कि अब वे और उनके गुर्गे इस काम में लग गए हैं कि कैसे इन मजीठिया क्रांतिकारियों से पीछा छुड़ाया जाए। केस में आये पुराने वर्कर से तो वे परेशान हैं ही, अब नए लोगों यानि अंदर काम करने वाले वर्कर भी केस में आने की तैयारी कर चुके हैं। तय है कि जल्द ही नए केस लगने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी।

(आखिरी पार्ट 5) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

26. अधिनियम के प्रावधानों में या वेजबोर्ड अवार्ड की शर्तों में ऐसा कुछ नहीं है, जो हमें अवार्ड के लाभ देने के लिए अनुबंध या ठेका कर्मचारियों को छोड़ कर, नियमित कर्मचारियों तक सीमित करेगा। इस संबंध में हमने अधिनियम की धारा  2(सी), 2(एफ) और 2(डीडी) में परिभाषित समाचारपत्र कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों की परिभाषा पर ध्यान दिया है। जहां तक वेरिएबल-पे का संबंध है, इस पर पहले ही उपरोक्त पैरा 7 में ध्यान दिया गया है और सारगर्भित किया गया है, जब यह न्यायालय वेरिएवल-पे की अवधारणा पर चर्चा की, तो विचार किया कि इस राहत का मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड में उचित और न्यायसंगत निरुपण किया गया है। इसलिए वेरिएबल-पे के संबंध में कोई अन्य विचार लेकर इस लाभ को दबाने/रोकने का कोई प्रश्र नहीं उठता है। वास्तव में अवार्ड के प्रासंगिक भाग का एक पठन यह दर्शाता है कि वेरिएबल-पे की अवधारणा, जो अवार्ड में लागू की गई थी, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट में निहित ग्रेड-पे से ली गई है और इसका उद्देश्य अधिनियम के दायरे में आने वाले श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों को याथासंभव केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समतुल्य लाना है। जहां तक कि भारी नकदी हानि की बात है, हमारा मानना है कि बिलकुल वही भाव स्वयं इंगित करता है कि वह वित्तीय कठिनाइयों से अलग है और इस तरह की हानि प्रकृति में पंगु होने की सीमा से अलग, अवार्ड में निर्धारित समय की अवधि के अनुरुप होने चाहिए। यह तथ्यात्मक सवाल है जिसे केस टू केस या मामला दर मामला निर्धारित किया जाना चाहिए।

एडवोकेट उमेश शर्मा ने मजीठिया के लिए नया क्लेम लगाने वालों के लिए नया फार्मेट जारी किया

अखबार और न्यूज एजेंसियों के मीडियाकर्मियों के वेतन भत्ते प्रमोशन से जुड़े मामले से संबंधित जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट उमेश शर्मा ने माननीय सुप्रीमकोर्ट के १९ जून २०१७ को आये फैसले के बाद उन पत्रकारों तथा गैर-पत्रकारों के लिये एक नया फार्मेट जारी किया है जिन्होंने अभी तक कामगार आयुक्त कार्यालय में अपने बकाये राशि और वेतन वृद्धि के लिये क्लेम नहीं लगाया है।

(पार्ट 4) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

22. प्रत्युत्तर में दायर किए गए विभिन्न शपथपत्रों में समाचारपत्र प्रतिष्ठानों द्वारा अपनाए गए स्टैंड/कदम से, समय-समय पर विभिन्न राज्यों के श्रम आयुक्तों द्वारा दायर की गई रिपोर्टों में किए गए बयानों से, और साथ ही दायर की गई लिखित दलीलों से और आगे दखी गई मौखिक प्रस्तुतियों से यह स्पष्ट होता है कि संबंधित समाचारपत्र प्रतिष्ठानों ने मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड हिस्से में या नहीं कार्यान्वित किया है, इसके तहत क्या इन समाचारपत्र संस्थानों ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत और अधिसूचित मजीठिया वेजबोर्ड, जिसे दी गई चुनौती को इस न्यायालय द्वारा रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 के फैसले/जजमेेंट में निरस्त कर दिया गया है, की गुंजाईश और दायरे को माना है। दृढ़मत है कि अवार्ड के गैर-कार्यान्वयन या आंशिक कार्यान्वयन को लेकर जो आरोप है, जैसा कि हो सकता है, स्पष्ट रूप से विशेष तौर पर संबंधित समाचारपत्र संस्थानों की अवार्ड की समझ से उपजा है, यह हमारा विचारणीय नजरिया है कि संबंधित प्रतिष्ठानों को रिट पेटिशन नंबर 246 आफ 2011 में दिनांक 07.02.2014 को दिए गए फैसले/जजमेेंट की जानबूझकर अव्हेलना का जिम्मेवार नहीं ठहरया जा सकता है। अच्छा रहेगा, कथित चूक को बदल कर इस न्यायालय द्वारा बरकरार रखे गए अवार्ड की गलत समझ के तौर पर जगह दी जाए। इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाएगा, ताकि न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 की धारा 2बी में परिभाषित सिविल अवमानना के उत्तरदायित्व को अकर्षित किया जा सके। यद्यपि कथित चूक हमारे लिए स्पष्टत: साक्ष्य है,किसी भी समाचारपत्र प्रतिष्ठान को जानबूझकर या इरादतन ऐसा करने के विचार की गैरमौजूदगी में अवमानना का उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर वे अवार्ड को इसकी उचित भावना और प्रभाव में, इस रोशनी के साथ कि हम अब क्या राय/समझौता प्रस्तावित करते हैं, लागू करने का एक और अवसर पाने के हकदार हैं।

अगर तीन महीने तक मजीठिया का लाभ नहीं दिया तो सुप्रीम कोर्ट फिर जाने का रास्ता खुला है

7-2-2014 को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया था, उसका कई हिस्सा इस बार भी दुहाराया गया है। ताजे आदेश में स्पष्ट लिखा है कि एक साल के अंदर 4 किश्तों में वर्कर के बकाया राशि का भुगतान मालिकान करें. यानि इस आर्डर के मुताबिक तीन माह बाद अगर वर्कर का पैसा नहीं मिला तो वर्कर फिर से माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे. जब तीन की बजाय 6 माह में भी वर्कर को पैसा मिलने लगेगा, तब नए क्रांतिकारियों की भीड़ डीएलसी और लेबर कोर्ट में जरूर देखने को मिलेगी.

(पार्ट थ्री) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

16. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों को स्वीकार करने और अधिसूचना जारी किए जाने के बाद श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के तहत अपना वेतन/मजदूरी प्राप्त करने के हकदार हैं। यह, अवमानना याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अधिनियम की धारा 16 के साथ धारा 13 के प्रावधानों से होता है, इन प्रावधानों के तहत वेजबोर्ड की सिफारिशें, अधिनियम की धारा 12 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित होने पर, सभी मौजूदा अनंबधों के साथ श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों की सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट अनुबंध/ठेका व्यवस्था को अधिलंघित  (Supersedes) करती है या इसकी जगह लेती है।

जागरण प्रबंधन को करारा तमाचा, दो पत्रकारों ने लेबर डिपार्टमेंट से अपना तबादला रुकवा लिया

मजीठिया वेज बोर्ड के लाभ मांगने पर दैनिक जागरण आगरा के प्रबंधन ने दो पत्रकारों का दूरदराज के इलाकों में तबादला करने का फरमान जारी कर दिया. इसके बाद दोनों पत्रकारों लेबर डिपार्टमेंट गए और अब लेबर डिपार्टमेंट ने इनका तबादला रोक दिया है. इन दो पत्रकारों के नाम हैं सुनयन शर्मा और रूपेश कुमार सिंह. दैनिक जागरण आगरा में सुनयन चीफ सब एडिटर हैं तो रूपेश डिप्टी चीफ सब एडिटर.

मजीठिया का लाभ लेने के लिए यह प्रक्रिया अपनाएं

सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने वाले एडवोकेट उमेश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए एक दिशा-निर्देश जारी किया है जिसे फालो करके कोई भी मीडियाकर्मी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पा सकते है.

मीडिया मालिकों के इस मुखबिर को भड़ास वालों ने दिया करारा जवाब

मजीठिया क्रांतिकारियों… सावधान… मीडिया मालिकों के मुखबिर नए नए रूप में टहलने लगे हैं… ऐसे ही एक मुखबिर ने भड़ास4मीडिया को झांस में लेने के लिए फर्जी आईडी से मीडिया हेल्पर बनने का दावा करते हुए इस उम्मीद से मेल भेजा कि भड़ास पर अच्छे खासे तरीके से छप जाएगा लेकिन भड़ास वालों ने इस मुखबिर की नीयत जान ली और इसे दिया करारा जवाब…

आप बाल-बाल बच गए हैं सर और इस वजह से हम प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल-बाल बचे!

19 जून को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया वेज बोर्ड का फैसला सुनाया था, उसमें मालिकान तो बाल-बाल बचे ही, मालिकानों के खास प्यादे भी बाल बाल बचे और ईश्वर को धन्यवाद किया. 19 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की मीडिया पार्क में देश के तमाम मीडिया कर्मी आये हुए थे। सभी अपने अपने तर्कों से लैस थे। हर कोई अपनी बात को सच साबित करने में जुटा था। अभी दोपहर के बाद का 3 बजकर 20 मिनट हुआ था, देखा की कोर्ट के में गेट से सबसे पहले दैनिक जागरण के एक वकील और 2 प्यादे ऐसे बाहर निकले जैसे उनकी जान कोर्ट ने बख्श दी हो। तीनों के चेहरे पर बाल बाल बचने का भाव स्पष्ट दिख रहा था। वे सब यही सोचते आगे भाग रहे थे, क़ि यह खबर जल्दी से संजय गुप्ता को दें कि आप बाल बाल बच गए हैं सर और आपके बाल बाल बचने के साथ ही हम सब आपके प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल बाल बचे।

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एडवोकेट द्वय उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी दायर करेंगे पुनरीक्षण याचिका

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसला पर मीडियाकर्मियों में बहस-विचार-चर्चा जोरों पर है. ताजी सूचना ये है कि मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई से जुड़े रहे दो वकीलों उमेश शर्मा और दिनेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर करने का ऐलान कर दिया है. ये दोनों वकील अलग-अलग रिव्यू पिटीशन दायर करेंगे. इनकी पुनरीक्षण याचिकाओं में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न माने जाने का बिंदु तो होगा ही, ट्रांसफर-टर्मिनेशन जैसे मसलों पर स्पष्ट आदेश न दिया जाना और इस मजीठिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर न आने की सलाह देने जैसी बातों का भी उल्लेख होगा. इन समेत ढेर सारे बिंदुओं पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करते हुए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया जाएगा.

(पार्ट टू) मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें

11. इस चरण में मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड के खंड 20जे, जो मौजूदा कार्यवाही में विवाद के मुख्य क्षेत्रों में से एक है, पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा सकता है।

“20जे संशोधित वेतनमानसभी कर्मचारियों पर 1 जुलाई 2010 से लागू होगा। हालांकि यदि कोई कर्मचारी इन अनुशंसाओं के प्रवर्तन के लिए अधिनियम की धारा 12 के तहत सरकारी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन हफ्तों के भीतर अपने मौजूदा वेतनमान और वर्तमान परिलब्धियों/प्रतिभूतियों को बनाए रखने का विकल्प चुनता है, तो वह अपने मौजूदा वेतनमान तथा ऐसी परिलब्धियों को बनाए रखने का पात्र होगा।”

मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें (पार्ट वन)

अखबार प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान न दिए जाने और माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई 83 अवमानना याचिकाओं और तीन रिट पेटिशनों का निपटारा करते हुए 19 जून, 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है, उसे कुछ कर्मचारी साथी मालिकों के पक्ष में बताकर निराशा का माहौल पैदा करने में जुटे हुए हैं। हालांकि इस निर्णय में मालिकों के पक्ष में सिर्फ एक ही बात गई है, वो यह है कि कोर्ट ने इनके खिलाफ अवमानना को स्वीकार नहीं किया है और जिन अखबार मालिकों ने मजीठिया वेजबोर्ड अधूरा लागू किया है और जिनने नहीं लागू किया है उन्हें एक और मौका दिया गया है।

बुरे फंसे अखबार मालिक, सुप्रीम कोर्ट ने बचने के सभी दरवाजे बंद किए

अखबार मालिक एक साल में नहीं सुधरे तो मीडियाकर्मियों के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट जाने का मार्ग खुलेगा… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 19 जून 2017 को दिए गए फैसले को अगर गंभीरता से पढ़ें तो माननीय सुप्रीमकोर्ट ने अखबार मालिकों को बचाया नहीं है बल्कि उन खांचों को बंद कर दिया है जिनसे निकलकर वे बच निकलते थे। अब अखबार मालिकों ने एक साल के अंदर जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया तो मीडियाकर्मी फिर उनके खिलाफ अवमानना का सुप्रीमकोर्ट में केस लगा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर बता दिया- इस देश में न्याय ले पाना अब मीडियाकर्मी के भी बूते की बात नहीं!

Ashwini Kumar Srivastava :  बहुत ही अफसोसनाक और लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजने जैसी खबर है यह। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह कानून के साथ खिलवाड़ करने और पत्रकारों के हक को मारने के मीडिया मालिकों / धन्ना सेठों के दुस्साहस को प्रश्रय दिया है, उससे अब मीडिया का रहा-सहा दम भी निकल गया है। मीडिया मालिकों के रूप में पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली और सत्ता के दलाल बनने के अलावा अब पत्रकारों के सामने कोई विकल्प ही नहीं है। अब उन्हें मालिक की शर्तों पर ही बंधुआ मजदूर की तरह डर-डर कर नौकरी करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने आज स्पष्ट तौर पर बता दिया कि इस देश में न्याय ले पाना अब मीडिया के बूते के भी बाहर की बात है, आम आदमी तो खैर अपनी सुरक्षा खुद ही करे तो बेहतर होगा।

एक साल पूरा होने पर हम तीनों को ‘नवां जमाना’ अखबार ने बिना नोटिस द‍िए राम-राम कह दिया!

Reetu Kalsi : सन 2008 की बात है एक दिन मैं और नवराही जी नवां जमाना अखबार के दफ्तर गए, पहले भी अक्सर जाना होता था पर उस दिन हम जस मंड जी से मिले। वे नए नए मैनेजिंग ट्रस्‍टी बने थे नवां जमाना समाचार पत्र के। मैं उस वक्त अमर उजाला में काम कर रही थी। जस मंड अखबार को नई उचाईयां दिलाना चाहते थे। तकरीबन पहले भी इस पर चर्चा करते थे कि कैसे अखबार को और अच्छा बनाया जाए। विज्ञापन कैसे मिल सकते हैं वगैरह वगैरह … तो उस दिन जस मंड जी ने बातो बातों में मुझे नवां जमाना जॉइन करने का ऑफर दे दिया।

न्याय की जहां से आस थी, वह मंदिर बाजार हो गया….!

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट से आए हालिया फैसले को लेकर बरेली के मजीठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा एडवोकेट की कविता पेश-ए-खिदमत है…

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का साइड इफेक्ट : मज़ाकिया मूड में आ गए ‘झींगुर’!

धर्मेंद्र प्रताप सिंह

मैं कुछ निजी कार्यों में उलझा हुआ हूँ. सो, अपनी इस व्यस्तता के कारण मजीठिया वेज बोर्ड पर आये माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद मैंने कोई ‘धांसू’ प्रतिक्रिया क्या नहीं दी, कंपनी के कुछ चमचेनुमा ‘झींगुर’ मज़ाकिया मूड में आ गए लगते हैं! हालांकि इनमें से किसी का नंबर बढ़ने वाला नहीं है… अरे भाई, 21 साल की निर्विवादित नौकरी के बाद भी मुझे परेशान करने की नीयत से कंपनी जब मेरा ट्रांसफर राजस्थान कर सकती है तो लिफाफा पत्रकारिता करने वालों को क्या बख्शेगी? बस, कुछ दिनों तक इस्तेमाल करके पिछवाड़े लात जरूर मारेगी ! फिर भी, ये ‘वाटी पत्रकार’ हम पर हंस रहे हैं! इसलिए मैं फिर कहूंगा कि हंसी वही अच्छी, जो आखिर में हंसी जाए!

मीडियाकर्मियों के हित में है सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश!

”सुप्रीम कोर्ट द्वारा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के संबंध में सोमवार, 19 जून 2017 को दिये गये फैसले का मैं स्वागत करता हूं। यह निर्णय पूरी तरह से कर्मचारियों के पक्ष में दिया गया फैसला है। इतना ही नहीं इस फैसले ठेके पर काम करने वाले पत्रकारों (कांट्रेक्टचुअल जर्नालिस्ट) को भी फायदा होगा।” यह कहना है समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार अजय मुखर्जी का।

एडवोकेट अजय मुखर्जी

मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर एडवोकेट उमेश शर्मा की ये है टिप्पणी

Umesh Sharma
Advocate, Supreme Court


Analysing the order passed by the Supreme Court in the contempt petitions filed by employees against the newspaper establishments, it is evident that the core issue of wilful contempt, deliberate non-compliance of the directions issued by Supreme Court on 7/2/2014 and subsequent acts done by the newspaper establishments in discouraging the employees from claiming money to wage board benefits has escaped the attention of Supreme Court.

न्याय मांगने वालों को याचिकाएं वापस ले लेनी चाहिए क्योंकि अदालतें मनी मैन लोगों के लिए हैं!

वाह सुप्रीम कोर्ट के जज ने अपने आप जान लिया है वे ना समझदार हैं… देश की न्यायपालिका पर नहीं ऐसे गरीब लोगों पर तरस आती है जो इस पर विश्वास करते हैं और यहां न्याय मांगने की भूल कर बैठते है। दरअसल कोर्ट बड़े लोगों के लिए है आम लोगों का गुस्सा सरकार पर या पूंजीपतियों के खिलाफ ना भड़के इसके लिए अंग्रेजों ने कोर्ट बनाया। मजीठिया वेज वोर्ड के फैसले को देखकर भ्ज्ञी ऐसा ही लगता है।

यही फैसला सुनाना था तो इतना ड्रामा क्यों किया जज साहब!

खोदा पहाड़ निकली चुहिया वो भी मरी हुई… कुछ ऐसा ही हाल पत्रकारों के लिए गठित वेजबोर्ड मजीठिया का है। इसके पहले गठित सभी आयोग की सिफारिशें औंधे मुंह गिरी हैं। लगभग सभी में अखबार के मालिकानों ने अपनी माली हालत खस्ता होने का रोना रोकर आयोग की सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डलवाया है। हां यह अलग बात थी कि इस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए अखबारकर्मियों ने आर पार की लड़ाई लड़ी है।

कोर्ट के फैसले से निराश न हों मजीठिया क्रांतिकारी, लेबर कोर्ट के जरिए लेंगे अपना हक

मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलेगा और जरूर मिलेगा, लेकिन सिर्फ क्रांतिकारियों को ही. उन पत्रकार साथियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ अवश्य मिलेगा जिन्होंने रिस्क लेकर इस लड़ाई में कूदने का साहस किया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट का 19 जून 2017 का फैसले सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया जाना चाहिए। हालांकि इस मामले में माननीय कोर्ट ने वह सख्त फैसला नहीं दिया जिसकी अपेक्षा पत्रकारों ने की थी। माननीय कोर्ट ने मीडिया मालिकान को सिर्फ संदेह का लाभ देते हुये उन्हें वेज बोर्ड के कार्यान्वयन का एक और मौका दिया है।

मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट का आज आया पूरा फैसला इस प्रकार है…

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