एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफा ही थी

Abhiranjan Kumar : एनडीटीवी एक भला चैनल था। अन्य चैनलों में बकवास बहुत चलता था, लेकिन एनडीटीवी पर सिर्फ़ ख़बरें चलती थीं। हालांकि इसके साथ ही वहां एक बड़ी बुराई भी थी कि अक्सर ख़बरों में मिलावट कर दी जाती थी। सांप्रदायिक तत्व वहां काफी पहले से और ठीक-ठाक मात्रा में मौजूद थे। मुझे याद आती है एक पुरानी स्टोरी, जिसके मुताबिक किसी ट्रेन की मिलिट्री बोगी में घुसने पर एक युवक की पिटाई कर दी गई थी। चैनल पर यह रिपोर्ट बड़े ताम-झाम से चली। संयोग से उस युवक का नाम था शफ़कत और वह कश्मीरी था। फिर क्या था, चैनल के प्रबुद्ध विचारकों को मसाला मिल गया। स्क्रिप्ट की पहली लाइन ही यह लिखी गई- “एक तो मुसलमान, ऊपर से कश्मीरी। शायद शफ़कत का यही गुनाह था।”

मैंने स्क्रिप्ट की इस लाइन का विरोध किया। कहा कि यह नफ़रत और सांप्रदायिकता फैलाने वाली लाइन है। साथ ही, पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों और तय मर्यादाओं के ख़िलाफ़ भी। इस लाइन को लिखने की कोई तुक नहीं। स्टोरी इस लाइन के बिना भी लिखी जा सकती है। एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय चैनल को इस तरह की हेट्रेड फैलाने से बचना चाहिए। मुमकिन है कि कोई हिन्दू अथवा ग़ैर-कश्मीरी भारतीय भी किसी मिलिट्री बोगी में घुस जाए, तो उसके साथ भी ऐसा हो सकता है। …और हमें तो यह भी नहीं पता कि शफ़कत के मिलिट्री बोगी में घुसने पर और क्या-क्या हुआ? क्या नाम पूछते ही सैनिकों ने उसपर हमला कर दिया या फिर मार-पीट से पहले दोनों के बीच कुछ बहसबाज़ी भी हुई। क्या सिर्फ़ शफ़कत के बयान को ही अंतिम सत्य माना जा सकता है? क्या स्टोरी में मिलिट्री का भी पक्ष शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

बहरहाल, मेरी बात न सुनी जानी थी, न सुनी गई, क्योंकि पता चला कि वह स्टोरी एक हाई-लेवल प्लानिंग का हिस्सा थी। चैनल के बड़े संपादकों ने मनमोहन सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री संभवतः पी चिदंबरम से शफ़कत की मीटिंग भी फिक्स करा रखी थी और ये मुलाकात हुई भी।

एक अन्य मौके पर, मुंबई पर आतंकवादी हमले के ठीक बाद मैंने एनडीटीवीख़बर.कॉम के लिए एक लेख लिखा था। चूंकि इस घटना में सैंकड़ों बेगुनाह लोग मारे गए थे, इसलिए क्षुब्ध पूरा देश था और ज़ाहिर तौर पर मैं भी था। अपने लेख में मैंने सरकार की कुछ चूकों और नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की थी, लेकिन उसकी एक भी पंक्ति तथ्य से परे नहीं थी। वह लेख एनडीटीवीख़बर.कॉम पर जाते ही वायरल हो गया। कुछ ही देर में उसपर सैकड़ों कमेंट्स आ चुके थे और ज़्यादातर टिप्पणियों में लेख में कही गई बातों का ज़ोरदार समर्थन था। इसके कुछ ही देर बाद मुझे एनडीटीवी इंडिया के तत्कालीन मैनजिंग एडिटर का ई-मेल मिला, जो एनडीटीवीख़बर.कॉम के प्रभारी को लिखा गया था और मुझे भी सीसी मार्क किया गया था। उस ई-मेल में लेख को साइट पर से अविलंब उतारने का निर्देश था, जिसके बाद उस लेख को फौरन उतार लिया गया।

बाद में हमने मैनेजिंग एडिटर से पूछा कि आख़िर लेख में समस्या क्या हुई? इसपर उन्होंने कहा कि “लेख बहुत अच्छा था, लेकिन तुम तो जानते हो यार!” इसके बाद मैंने उन्हें धर्मसंकट में डालना उचित नहीं समझा, इसलिए कुछ नहीं पूछा, लेकिन खुलते-खुलते बात खुल ही गई कि पीएमओ ने उस लेख पर एतराज किया था और पीएमओ से संदेश मिलने के बाद उस लेख को उतारने में इतनी हड़बड़ी दिखाई गई थी। मज़े की बात यह थी कि बाद में कुछ कांग्रेसी नेताओं के वे निराधार, बेसिरपैर और नफ़रत फैलाने वाले बयान ज़ोर-शोर से चलाए जा रहे थे, जिसमें वे उस हमले में आरएसएस का हाथ बता रहे थे, लेकिन हमारी निष्पक्ष और तथ्यात्मक बातें संस्थान के प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं बना पाईं। इसीलिए, जब आज ये लोग कहते हैं कि वे सरकार से लड़ रहे हैं, तो हंसी आती है। एक सरकार की चापलूसी करने वाला संस्थान अगर दूसरी सरकार से लड़ रहा है, तो समझना मुश्किल नहीं कि क्यों और किसके इशारे पर लड़ रहा है।

यानी एनडीटीवी में अभिव्यक्ति की आज़ादी हमेशा से एकतरफ़ा ही थी और इस प्रकार निष्पक्षता भी हमेशा से ही संदिग्ध थी। अगर हम जैसे न्यूट्रल लेखक-पत्रकार अपनी बात रखना चाहते, तो उसके लिए एनडीटीवी में स्पेस तब भी बहुत कम था।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की एफबी वॉल से.



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप- BWG-10

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate






भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code