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रवीश कुमार प्राइम टाइम में देश को बताएंगे कि प्रणय राय एनडीटीवी से इतने सारे लोगों को एक साथ क्यों निकाल रहे हैं?

Manish Thakur : स्क्रीन काला नहीं कर सकते, मुंह पर कालिख पोत विरोध तो कीजिए! पत्रकारिता के नाम पर विचारधारा की दुकान चलाने का धंधा करने वाले प्रणय राय अब अपने वफादारों को नौकरी से निकाल कर सड़क पर धकेल रहे हैं। एनडीटीवी से निकाले गए लोगों के पास जीवकोपार्जन की कोई समस्या नहीं होगी यह पत्रकारिता का हर अदना सा व्यक्ति जानता है। वह इसलिए कि बिना टीआरपी वाले इस चैनल के मालिक प्रणय राय ने हवाला और मनीलान्ड्रिंग की कमाई से अपने कर्मयोगियों को दो दशक से ज्यादा वक्त से मोटी सैलरी और तमाम साधनों से इतना संपन्न रखा कि भगवान की दया से उन्हें इस जनम कोई दिक्कत नहीं।

Manish Thakur : स्क्रीन काला नहीं कर सकते, मुंह पर कालिख पोत विरोध तो कीजिए! पत्रकारिता के नाम पर विचारधारा की दुकान चलाने का धंधा करने वाले प्रणय राय अब अपने वफादारों को नौकरी से निकाल कर सड़क पर धकेल रहे हैं। एनडीटीवी से निकाले गए लोगों के पास जीवकोपार्जन की कोई समस्या नहीं होगी यह पत्रकारिता का हर अदना सा व्यक्ति जानता है। वह इसलिए कि बिना टीआरपी वाले इस चैनल के मालिक प्रणय राय ने हवाला और मनीलान्ड्रिंग की कमाई से अपने कर्मयोगियों को दो दशक से ज्यादा वक्त से मोटी सैलरी और तमाम साधनों से इतना संपन्न रखा कि भगवान की दया से उन्हें इस जनम कोई दिक्कत नहीं।

यकीन मानिए पत्रकारिता सिर्फ पैसा कमाने का धंधा नहीं है। यह शाख का वह पेशा है जहां लोग दो जून रोटी कमाकर बीवी बच्चों के प्राथमिक आवश्यकता पूरे करने की लाचारी में भी जीवन भर पत्रकार कहलाने की चाह में रहते हैं। हाल के वर्षो में सौकड़ों नहीं हजारों पत्रकारों की नौकरी गई उसमें सौकड़ो ने दूसरे पेशे को अपना लिया। जिसमें से ज्यादातर पहले से बेहतर आर्थिक हालात में आपको मिलेंगे लेकिन पूराने दिनों की याद में ही दिन रात भजन करते।

यह हालात तब है जब कि यह रीढविहीन लोगों का ऐसा पेशा है जो नौकरी करने के नाम पर दूसरे के हित के लिए तो लड़ता नजर आएगा लेकिन अपने हक की लड़ाई के वक्त नपुंसक की भूमिका में होता है। ये विचारधारा के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल पीटते स्क्रीन काला तो करेगा लेकिन अपनों पर अत्याचार पर चुप्पी लाद लेगा। तब तक जब तक खुद के साथ अत्याचार न हो। पूरे टीवी पत्रकारिता में पी7न्यूज के पत्रकारों ने ही वो मिसाल पेश किया जब चैनल से कुछ लोगों को निकाला जाने लगा तो कुछ पत्रकारों ने बगावत कर दिया।

आज खबर मिली की पत्रकारों के खिलाफ अत्याचार के नाम पर संसद से सड़क तक आवाज लगाने वाले प्रेस कल्ब की राजनीति में उच्च स्थान रखने वाले भाई Nadeem Ahmad Kazmi नदीम काजमी को एनडीटीवी ने नौकरी से निकाल दिया। नदीम भाई 20 साल से एनडीटीवी के वफादार सिपाही थे। मैने उन्हें हमेशा बड़े भाई का सम्मान दिया। जानता हूं वे एक बेहतर आदमी हैं। लेकिन एनडीटीवी के फरेब पर जब भी मैने कलम चलाई, उन्होने निजी रिश्तों को भूलाकर प्रणय राय की वफादारी में मेरे वॉल पर आकर मेरे ऊपर हमला किया। यह जानते हुए कि मालिक कभी किसी का सगा नहीं होता मैने नदीम भाई के भावनाओं का सम्मान करते हुए कभी उन पर हमला नहीं किया। मालिकों की वफादारी करते हुए,अपने चैनल और बैनर के नाम पर लड़ने वाले लिजलिजे पत्रकारों को सबक लेना चाहिए, जब नदीम भाई जैसे कद्दावर पत्रकारों के साथ ऐसा हो सकता है तो उनकी औकात क्या है?

बेशर्मी देखिए पिछले दो तीन महीने में बडे पैमाने पर प्रणय राय ने कैमरामैन के पेट पर लात मारा और रिपोर्टरों से मोबाईल सेल्फी लेते रिपोर्टिंग कराई। उसे सूट कर बाप और चाचा के बल पर नौकरी पाए एंकरों से एड करवाया की एनडीटीवी नए टेक्नोलॉजी को अपना रहा है। जब कैमरामैन की नौकरी गई तो किसी पत्रकार को रत्ती भर लज्जा नहीं आई। यह तो सोचते जिसके बल पर तुम सालों से स्क्रीन पर चमक रहे थे उसका क्या होगा? उसके लिए मुंह पर कालिख क्यों नहीं पोतते? विचार धारा का ये दुकानदार ये नहीं बताता कि वफादारों को नौकरी से क्यों निकालना पर रहा है? उनके हवाला के कारोबार को जानने का हक क्या नहीं है हम सब को।

आज सचमुच दुख हो रहा है विचारधारा के नाम पर पत्रकारिता का बलात्कार करने वाले प्रणय राय और उसके दोगले दत्तक पुत्र के फरेब पर जब भी मैने कलम चलाई नदीम भाई जैसे लोगों ने दिल पर ले लिया। यह जानते हुए कि मालिक किसी का सगा नहीं होता। उस दत्तक पुत्र को भी आज लग रहा है कि वो दुनिया का सबसे बड़ा पत्रकार है जबकि यकिन मानिए उसे पत्रकारिता की ABCD नहीं पता। विचारधारा की दुकान पर स्क्रीन काला करने वाले किसी पक्षकार से आज उम्मीद की जानी चाहिए कि विचारधारा के अपने साथी के सड़क पर आने पर एक बार अपने मुंह पर कालिख पोत ले।

देश को यह जानने का हक है कि एनडीटीवी लोगों को नौकरी से क्यों निकाल रहे हैं। विचारधारा के खिलाड़ियों का फरेब शुरू है। उनकी दलील है कि प्रणय राय के चैनल को सरकारी एड मिलना बंद हो गया है। वे चड़ोरी कर रहे हैं प्रणय राय से, डॉ राय प्रेस कल्ब में सफाई दें कि उनके साथ सरकार अन्याय कर रही है। इसीलिए पत्रकारों की नौकरी जा रही है।

यकीन मानिए ये एक बड़ा फरेब है। तथ्यों संग फरवरी में एक पुस्तक ला रहा हूं जिसमें एक चैप्टर एनडीटीवी के फरेब पर होगा। कैसे इस चैनल ने विचारधारा के नाम पर हवाला का धंधा करते हुए अरबों की कमाई की। सरकारी चैनल दूरदर्शन तक का खून चुसा। सत्ता से सांठगांठ कर आम आदमी के हीतों की हत्या की। राष्ट्रविरोधी एनजीओ संग देश कै खिलाफ साजिश का हिस्सेदार रहा।

आपको आश्यचर्य होगा आज तक किसी भी घोटाले का पर्दाफाश प्रणय के सिपाहियों ने नहीं किया। लेकिन पत्रकारिता के सभी एवार्ड यहीं बिकते रहे। अभी ये पोस्ट उन सिपाहियों को चुभेगा। लेकिन कल समझ में आयेगा। उन्हें आवाज उठाना चाहिए नदीम भाई के लिए। स्क्रीन काला नहीं कर सकते तो मुंह काला करके ही विरोध प्रदर्शन करना चाहिए। अपने लाला से सवाल करना चाहिए, जब तुम्हें कोई वैध आमदनी नहीं थी तो पाप की कमाई से पोषण क्यों किया। जानता हूं हिम्मत नहीं होगी। कोई बात नहीं। ड़ॉ राय के जिंदावाद और उनके शोषण के नाम पर प्रेस कल्ब में एक मीटिंग ही रख लिजीए। तब तक जब तक नमक खा रहे हैं। क्या पता कल नदीम भाई के साथ खड़ा होना पड़े।

ये मेरा भावनात्मक पोस्ट भी है दोस्तों। पत्रकारिता मेरी आत्मा से जुड़ा पेशा है। एनडीटीवी ने नौकरशाह, मंत्री, नेता और बडे अपराधियों के हर पेशे से असफल लोगों का गिरोह बना कर इस पेशे का बलात्कार किया है। मैं जानता हूं कि मेरे संग जुडे हजारो पत्रकार इस पोस्ट को पढकर चुपके से निकलेंगे लेकिन वे चोटिल हैं। नौकरी की लाचारी से मजबूर लिजलिजे येकिन अकड़ वाले। मेरा आग्रह है कि कोई भी साथी इस पोस्ट पर ऐसा कोई कमेंट न करें जो किसी को चोटिल करे। मेरे मानना है वैचारिक मतभेद हमारा मानवीय स्वभाव है लेकिन जरुरी नहीं कि वैचारिक रुप से हम से अलग सोचने वाला हम से बेहतर इंसान न हो। लिहाजा आग्रह है कि व्यक्तिगत कमेंट नहीं करेंगे।

पत्रकार मनीष ठाकुर की एफबी वॉल से.

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