
संजय कुमार सिंह
नवोदय टाइम्स की आज की लीड के अनुसार केंद्र सरकार ने पराली जलाने वाले किसानों पर जुर्माने की राशि दो गुना कर दी है। यह खबर आज अमर उजाला में बॉटम है। अंग्रेजी अखबारों में यह हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम में है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। द हिन्दू में यह खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है।दि एशियन एज में सिंगल कॉलम की खबर बताती है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से किसान नाराज हैं। इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि केंद्र सरकार ने पराली जलाने का जुर्माना अगर दूना कर दिया है और किसान इससे नाराज हैं तो खबर दोनों है या किसानों की नाराजगी ज्यादा महत्वपूर्ण है। खबर दोनों होनी चाहिये थी या यही होनी चाहिये थी। हालांकि उससे महत्वपूर्ण है कि पटाखा चलाने वालों पर क्या कार्रवाई हुई या नहीं हुई तो भी खबर होती। यह सरकार का विशेषाधिकार नहीं है कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पटाखे चलने दे, चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करे और इसी आड़ में किसानों से जुर्माना वसूले और इतनी जल्दी उसे दूना भी कर दे। अगर कर ही दिया है तो किसानों की शिकायत और नाराजगी निश्चित रूप से खबर है।
खासकर इसलिए कि पराली से अगर प्रदूषण होता है तो वह पटाखे से भी होता है और ठीक है कि पटाखे साल में एक ही दिन चलते हैं पर बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए त्यौहार का यह दिन भारी परेशानी का होता है। दूसरी ओर, पराली जलाने का कोई दूसरा आसान और सस्ता विकल्प नहीं है। किसानों को अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिलता है तो वे पराली से निजात पाने का खर्चा कैसे जुटाएंगे और नहीं जुटा पाएंगे तो जुर्माना कैसे भरेंगे? दूसरी ओर, पटाखे चलाना रोकने में ऐसी कोई समस्या नहीं है। फिर भी नहीं रोकी गई क्योंकि सरकार में इच्छाशक्ति की कमी है। जो भी हो, किसानों के खिलाफ कार्रवाई अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण हो रही है तो सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर भी प्रतिबंध लगाया है। केंद्र सरकार का काम है कि दोनों को रोके और ऐसा नहीं कर रही है तो अखबारों का काम है कि सुप्रीम कोर्ट और जनता को बताये कि सरकार भेदभाव कर रही है। तथ्य यह है कि एक तरफ तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता पटाखे चलाते देखे जाते हैं, उनके खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होती है और खबर भी नहीं छपती है। हालांकि खबरें छपती होतीं तो यह सब होता ही नहीं पर वह अलग मामला है। समस्या यह है कि पार्टी के समर्थक त्यौहार पर पटाखे चलाना अपना अधिकार मानते हैं और खबर पटाखे चलाने वाले नेताओं की नहीं छपती है, आतिशबाजी नहीं रोकी गई पर खबर नहीं छपती है और फिर भी जुर्माना दूना कर दिया गया तो किसानों की नाराजगी की खबर सिर्फ दि एशियन एज में पहले पन्ने पर है।
आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबर भारत-कनाडा संबंध में नई नीचता है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड के अनुसार कनाडा ने ऑस्ट्रेलिया के एक समाचार संस्थान की वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया। इसपर विदेश मंत्री एस जयशंकर और ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग की प्रेस कांफ्रेंस दिखाई जा रही थी। इस प्रेस कांफ्रेंस की खबर कल द टेलीग्राफ में छपी थी और मैं उसकी चर्चा कर चुका हूं। भारत के प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं, भारत में समाचार चैनलों पर प्रतिबंध और पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें आम हैं। प्रतिकूल खबरें रोकने के लिए केंद्र सरकार क्या सब करती है और कैसे कानून बनाने की इच्छा रखती है – अब सब सर्वविदित है। ऐसे में कनाडा ने अगर ऑस्ट्रेलिया की वेबसाइट को अपने यहां ब्लॉक कर दिया तो उसका कोई मामला होगा। जब हम अपने मामले में कुछ नहीं कर सकते हैं या हमारी सरकार खुद ऐसी या इससे मिलती जुलती कार्रवाई करती है तो कनाडा की कार्रवाई से क्यों परेशान होना। वैसे भी विदेश मंत्री की प्रेस कांफ्रेंस किसी एक चैनल द्वारा नहीं दिखाई जाएगी और एक ही चैनल दिखा रहा था ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि और चैनल कैसे दिखायें उसके उपाय किये जायें। सरकार को चिन्ता इस बात की करनी चाहिये कि दूसरे चैनल क्यों नहीं दिखा रहे हैं। दिल्ली ने इसे कनाडा का पाखंड कहा है और यह सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की लीड में है।
इंडियन एक्सप्रेस की यह खबर दूसरे अखबारों की लीड नहीं है। दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, सुरक्षा मामले में कुछ कौनसुलर कैम्प बंद किये गये। कनाडा के साथ भारत के संबंध जैसे हो गये हैं उसमें यह सब नया नहीं है और होना ही था। सिर्फ खबर छपने या नहीं छपने से यह ठीक होने वाला भी नहीं है। अखबारों का पूर्वग्रह बना रहा तो संभव है कि हमें मामला ठीक से समझ ही न आये। जो भी हो, आज खबर यह है कि हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, भारत ने अभिव्यक्ति की आजादी पर कनाडा के पाखंड की आलोचना की है। इस खबर का इंट्रो है, भारत ने कहा ओटावा ने विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट को ब्लॉक किया। द हिन्दू की लीड भारत के हवाले से है कि वहां कई कौनसुलर कैम्प रद्द कर दिये हैं। अमर उजाला में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, कनाडा में भारत ने रद्द किये सहायता शिविर। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार कनाडा ने भारतीय नागरिकों के लिए वीजा दिशानिर्देशों में बड़े बदलाव किये हैं और अब भारतीयों को 10 साल का विजिटर वीजा नहीं मिलेगा। भारतीय नागरिकों के लिये अब विजिटर वीजा अवधि को घटा कर एक माह कर दिया गया है। भिन्न अखबारों में इस खबर की प्रस्तुति से आप जनहित का मतलब और उसके गायब होने की चिन्ता न होने का अंतर समझ सकते हैं।
अब आज की तीसरी बड़ी खबर पर आता हूं। यह द टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स में सेकेंड लीड है। खबर के अनुसार, जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लेकर हंगामा जारी है। कल आपने पढ़ा कि इस सबंध में प्रस्ताव पास हुआ है। आज की खबरों के अनुसार विधानसभा में हाथापाई गुई। इंडियन एक्सप्रेस में विधानसभा के दृश्य की तस्वीर है और उसका शीर्षक है, जम्मू और कश्मीर विधानसभा में। कैप्शन में बताया गया है कि गुरुवार को जम्मू और कश्मीर विधानसभा में हाथापाई हो गई। इससे पहले यहां राज्य के विशेष दर्जे को फिर से बहाल करने के मुद्दे पर विरोध और जवाबी विरोध हुए थे। भाजपा के कुछ विधायकों से मार्शल से बाहर निकलवाया गया। दि एशियन एज में यह खबर पांच कॉलम में है। शीर्षक है, जम्मू कश्मीर विधानसभा में हंगामे के बीच भाजपा के तीन विधायकों को निकाला गया। विशेष दर्जा देने के विवाद पर मारपीट, विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह तीन कॉलम की सेकेंड लीड है। इसके साथ कश्मीर की एक और खबर है। आतंकवादियों ने दो ग्रामीण रक्षा गार्ड की हत्या करने का दावा किया। यहाँ अमित शाह की फोटू के साथ सिंगल कॉलम की खबर है, केंद्र जल्दी ही आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए रणनीति पेश करेगी।
वैसे, सिंगल कॉलम की यह खबर दि एशियन एज में लीड है। चार कॉलम की इस लीड का फ्लैग शीर्षक गृहमंत्री के हवाले से है, जल्दी ही आतंकवाद से निपटने की राष्ट्रीय नीति का खुलासा किया जायेगा। अमति शाह ने कहा, आतंकवाद से राज्यों और केंद्र को मिलकर लड़ने की जरूरत है। वैसे तो यह बहुत ही आम समझ और बुनियादी जानकारी है लेकिन ऐसे समय में दी गई है जब आतंकवाद खत्म करने का दावा कई बार किया जा चुका है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पुलवामा के बाद प्रधानमंत्री ने घुस कर मारूंगा का ऐसा दावा किया था कि लग ही नहीं रहा था कि यह इतने समय तक चल सकता है और उम्मीद थी कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को खत्म करना चुटकी बजाने की तरह है। यह अलग बात है कि पांच साल कुछ नहीं हुआ फिर भी कश्मीर चुनाव से पहले दावा किया गया कि आतंकवाद खत्म हो चुका है, होने की कगार पर है और अब जब 370 या विशेष दर्जा वापस किये जाने की मांग विधानसभा में हो रही है तो केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर आतंकवाद खत्म करने की बात कर रही है जबकि अभी हाल तक माओवादियों से मुठभेड में महिलाएं भी मारी गई हैं।
ग्रामीण रक्षा गार्ड की हत्या की खबर सभी अखबारों में नहीं है। यहां आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए नई नीति लाने का अमित शाह का दावा है। द टेलीग्राफ में यह सिंगल कॉलम की खबर है। इंडियन एक्सप्रेस में ग्रामीण रक्षा गार्ड की हत्या और उसकी जिम्मेदारी लेने की खबर सिंगल कॉलम में है। अमर उजाला में यह पांच कॉलम की खबर है और इसके साथ दो कॉलम में राष्ट्रीय नीति लाने की अमित शाह की घोषणा क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में पेश की गई है। हालांकि, आप जानते हैं कि असल में ऐसा होता नहीं है। यहां यह याद दिला दूं कि कश्मीर में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और केंद्रीय गृहमंत्री ने क्या दावे किये थे और आतंकवाद कितना कम या खत्म हो गया है। अब अमित शाह ने कहा है और अमर उजाला में अमित शाह की फोटू के साथ सेकेंड लीड की तरह छपी है, आतंकियों और उनके तंत्र से लड़ने के लिए जल्द लायेंगे राष्ट्रीय नीति :शाह।
इन सबके साथ आज खबर यह भी है कि शासन-प्रशासन और जनहित के मामलों में सरकार के इतने खराब प्रदर्शन और देश में स्थितियां इतनी बुरी होने के बावजूद झारखंड जीतने के लिए भाजपा को मोदी के करिश्मा का भी भरोसा है और आदिवासियों को वही प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए रविवार को बोकारो और रांची में प्रधानमंत्री की रैली की योजना बनाई गई है। महाराष्ट्र में भी प्रधानमंत्री की नौ रैलियां हैं जो छह दिनों में होंगी। दोनों खबरें दि एशियन एज में पहले पन्ने पर हैं। इस व्यवस्था से जुड़ी एक दिलचस्प खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में है। सिंगल कॉलम की इस खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश के राज्य महिला आयोग ने प्रस्ताव दिया है कि महिलाओं के बुटीक में पुरुष दर्जी न हों, जिम में पुरुष महिलाओं को प्रशिक्षण नहीं दे सकेंगे और न पुरुष महिलाओं से योग करा सकेंगे। ऐसा व्यावसायिक केद्रों में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। यही नहीं, स्कूल बसों में महिला गार्ड होनी चाहिये – यह सिफारिश भी की गई है। मुझे पुरुष स्त्री रोग विशेषज्ञों की याद आ रही है कि वे बेचारे तो उत्तर प्रदेश में बेरोजगार हो जायेंगे। हालांकि मुझे उनकी चिन्ता नहीं है। वे तो अपनी योग्यता के अनुसार कहीं कुछ काम कर लेंगे महिला मरीज महिला डॉक्टर कहां पायेंगी और जब तक महिला डॉक्टर नहीं मिलेगी उनका इलाज रुका रहेगा या कोई पुरुष डॉक्टर जोखिम लेगा?



