अभिरंजन कुमार-
क्या इमरजेंसी से भी बुरे दौर में प्रवेश कर चुकी है भारत की पत्रकारिता?
बीबीसी के पत्रकार रहे Sanjeev Srivastava ने जयपुर में मटर कचौरी की दुकान खोल दी है। कारण जो वे बताते हैं, उसका लब्बोलुआब वही है, जो अक्सर मैं भी आपसे साझा करता रहा हूं, कि चाहे मेनस्ट्रीम मीडिया हो या सोशल डिजिटल मीडिया, आजकल दो ही चीजें चलती हैं कि या तो इस राजनीतिक पक्ष की दलाली करो, या तो उस राजनीतिक पक्ष की दलाली करो। वर्तमान संदर्भ में इसका मतलब यह है कि या तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली दो, या उन्हें ईश्वरीय अवतार बताओ। जबकि सच्चाई और पत्रकारिता धर्म इन दोनों ही पक्षों से कोसों दूर है।
दुर्भाग्य यह कि आज के 99% पत्रकार तो यह काम भी बड़ी आसानी से कर ले रहे हैं, लेकिन 1% पत्रकार आज भी ऐसे हैं, संजीव श्रीवास्तव जैसे, जो मटर कचौरी की दुकान खोल लेंगे, लेकिन यह काम नहीं कर पाएंगे। क्यों? क्योंकि अंतरात्मा बेच देने से अच्छा है मटर कचौरी बेच लेना।
इसीलिए मैं कहता हूं कि मैंने इमरजेंसी का दौर नहीं देखा है। जो सुना है, पढ़ा है, उसके आधार पर उसकी कड़ी आलोचना करने में कभी पीछे नहीं रहा। लेकिन अपने लगभग तीन दशकों के पत्रकारिता करियर में यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण समय देख रहा हूं, जब किसी पत्रकार के पास मोटे तौर पर दो ही विकल्प बचे हैं कि या तो वह किसी एक राजनीतिक पक्ष का दलाल बन जाए, या फिर संजीव श्रीवास्तव की तरह मटर कचौरी की दुकान, अथवा मोदी जी की ख्वाहिशों के हिसाब से पकौड़े की दुकान खोल ले।
मीडिया की ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए कई पक्ष जिम्मेदार हैं।
- पहली जिम्मेदारी तो निश्चित रूप से सरकार की ही है, जिसके बारे में अब मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि वह मीडिया पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के कुत्सित इरादे से काम कर रही है, जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया पर तो काफी हद तक उसका नियंत्रण स्थापित हो भी चुका है, और हालात अब अघोषित इमरजेंसी जैसे ही हैं।
मेनस्ट्रीम मीडिया पर दिखावे के लिए कुछ सरकार विरोधी (ज्यादातर नॉनसेंस) आवाज़ें तो बरकरार हैं, लेकिन निष्पक्ष आवाजों को पूरी तरह से साइडलाइन कर दिया गया है। कारण- सरकार में बैठे लोगों को लगता है कि विरोधियों, खास कर नॉनसेंस विरोधियों के बोलने से हमें अपने पक्ष में नैरेटिव बनाने और जातीय व सांप्रदायिक आधार पर जनता का ध्रुवीकरण कराने में सहायता मिलती है, जबकि निष्पक्ष आवाजें हमारी पोल खोलकर रख देंगी।
सोशल डिजिटल मीडिया पर अभी सरकार का पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां सब चंगा है। बल्कि हो यह रहा है कि वहां भी सिर्फ़ और सिर्फ दोनों पक्षों के प्रोपगेंडिस्ट ही सक्रिय हैं, जिसके कारण वहां का माहौल मेनस्ट्रीम मीडिया से भी ज्यादा खराब हो चुका है। ज्यादातर फेक न्यूज़ और नैरेटिव वहीं से फैलाया जा रहा है।
- दूसरी जिम्मेदारी मीडिया मालिकों की भी है, जो यह मान चुके हैं कि मीडिया केवल निजी फायदे या आर्थिक लाभ के लिए चलाना है और इसके लिए किसी एक पक्ष, और मुख्यतः सरकार की दलाली करना गलत नहीं है।
कारण – एक तो निजी लाभ की ख्वाहिश भी रहती है, दूसरा चाहे कोई भी व्यवसायी हो, यह लगभग असंभव है कि उसके व्यापार में कोई भी गड़बड़ी न निकाली जा सके। इसलिए सरकार के सामने घुटने टेक देना एक तरह से उसकी मजबूरी भी है। क्योंकि यदि वह घुटनाटेक मीडिया नहीं चलाएगा, तो सरकार अपनी एजेंसियों को सक्रिय करके किसी भी दिन उसे नेस्तनाबूद कर देगी।
- तीसरी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की भी है, जो मीडिया को केवल अपने ही पक्ष में देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का अहसास नहीं कि उनकी इसी ख्वाहिश ने भारत में गुलाम मीडिया को जन्म दे दिया है, जिसका खामियाजा बारी बारी से उन सबको भी भुगतना पड़ेगा।
मसलन, आज तो भाजपा इस गुलाम मीडिया के दम पर मौज कर रही है, लेकिन जो चलन उसने स्थापित किया है, किसी भी कारण से जब उसकी सत्ता चली जाएगी, तो उन्हें भी वही सब भुगतना पड़ेगा, जो आज के विपक्ष को भुगतना पड़ रहा है।
आखिर जब मीडिया का काम ट्रोलिंग करना और किसी नेता पर पप्पूपना आरोपित करना ही रह जाएगा, तो यकीन मानिए, यह काम नरेंद्र मोदी के लिए भी उसी तरह से किया जा सकता है, जैसे आज राहुल गांधी के लिए किया जा रहा है। यह काम कैसे किया जा सकता है, सभी मीडिया वाले इसे बखूबी जानते हैं।
- चौथी जिम्मेदारी ऐसे बेवकूफ़ अथवा बदमाश दर्शकों की भी है, जिन्होंने अपनी सीमित और संकीर्ण दृष्टि के आधार पर अपना अपना राजनीतिक पक्ष तय कर लिया है, और अब मीडिया से उनकी अपेक्षा है कि वह उनके राजनीतिक पक्ष के हर गलत सही को सपोर्ट करे।
यह दर्शक वर्ग इतना अधिक बेवकूफ अथवा बदमाश है, जो पूरे होशो हवास में यह चाहता है कि जिस राजनीतिक पक्ष का वह समर्थन करता है, यदि उस पक्ष पर भ्रष्टाचार और विभिन्न संगीन अपराधों के भी आरोप हैं, तो मीडिया उसका बचाव करे। उसकी दलील रहती है कि दूसरा पक्ष भी जब ऐसा ही कर रहा है, तो उसका पक्ष ऐसा क्यों नहीं करे! - और, पांचवीं जिम्मेदारी निश्चित रूप से उन पत्रकारों की भी है, जिन्होंने निजी फायदे अथवा सरवाइवल के लिए अपनी पेशागत ईमानदारी को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है और किसी एक पक्ष की दलाली करना स्वीकार कर लिया है।
इस लिहाज से इमरजेंसी का दौर भी आज से बेहतर था, क्योंकि तब पत्रकारों ने सरकार के सामने घुटने नहीं टेके थे, लेकिन आज उन्होंने किसी न किसी एक पक्ष के सामने लगभग पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि संजीव श्रीवास्तव भारत में अकेले ऐसे पत्रकार बचे हैं, जो मुद्दों के आधार पर राजनीतिक पक्ष या विपक्ष तय करना चाहते हैं। ऐसे कम से कम पांच या दस लोगों के नाम तो मैं तुरंत ले सकता हूं, जिनमें निश्चित रूप से मैं भी शामिल हूं। और ज़ाहिर तौर पर इतने बड़े देश में ऐसे और भी कई होंगे।
कायदे से देश की कुत्सित राजनीति के द्वारा हाशिए पर धकेल दिये गये ये सभी पत्रकार भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, यदि वे एकजुट हो जाएं, क्योंकि इनमें से कोई भी पत्रकार गुमनाम नहीं हैं, बल्कि सभी इस देश के जाने माने पत्रकार हैं, और किसी न किसी दौर में पत्रकारिता में बड़ी भूमिका निभा चुके हैं।
इसलिए आज मैं फिर से ऐसे सभी पत्रकारों को आगाह कर देना चाहता हूं कि यदि अब भी आपने एकता नहीं बनाई, तो वो दिन दूर नहीं, जब एक एक करके सभी शुद्ध और प्रबुद्ध, अच्छे और सच्चे, जानदार और ईमानदार पत्रकारों को संजीव श्रीवास्तव की तरह कचौड़ी, बड़ा पाव या पकौड़े बेचने पड़ेंगे।
और महत्वपूर्ण यह भी नहीं है कि ईमानदार पत्रकारों को इस देश में पकौड़े बेचने पड़ेंगे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि जिस देश में ईमानदार पत्रकारों को पत्रकारिता से हटाकर पकौड़े बेचने के लिए मजबूर कर दिया जाएगा, उस देश का, उस देश की जनता का, उस देश के लोकतंत्र का, और प्रकारांतर से उस देश के भविष्य का क्या होगा, इसकी कल्पना मात्र भी सिहरन पैदा करने वाली है।
आज मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि 2047 तक हम विकसित भारत बनने की तरफ नहीं, बल्कि फिर से गुलाम/विभाजित/दमित भारत बनने की ओर अग्रसर हैं, क्योंकि जिस देश में स्वतंत्र आवाजों का कोई अस्तित्व नहीं होगा, उस देश की एकता, अखंडता और स्वतंत्रता भी हमेशा खतरे में रहेगी।
बात कड़वी है, पर सच्ची है। धन्यवाद।



Subodh
February 24, 2026 at 10:11 am
ईमानदारी से तो कचौरी का धंधा नहीं किया जा सकता, कुछ समय के बाद इनको अपने मटर कचौरी के काम में भी ईमानदारी परेशान करेगी तो क्या वो भी छोड़ देंगें
Suprabhat times
March 1, 2026 at 1:25 pm
पूरे जीवन भर बीबीसी का आनंद लिया, पैसा कमाया, जब कमाई बंद हो गई, तो कचोरी बेचकर पैसा कमाने में जुट गए, कुल मिलाकर बस पैसा चाहिए, चाहे कलम
…..! कर मिले या फिर कचौड़ी बेच कर?