जब पत्रकार को देना पड़े मंत्री को जन्मदिन की बधाई, वह भी अख़बार में!
लखनऊ: पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना और जनता की आवाज़ बनना होता है, लेकिन अब वक्त ऐसा आ गया है कि पत्रकारों को मंत्रियों को जन्मदिन की बधाई देने के लिए अख़बार में विज्ञापन छपवाना पड़ रहा है। ताज़ा मामला लखनऊ का है, जहां पत्रकार व समाजसेवी इंजीनियर गणेश मिश्रा ने आयुष एवं खाद्य सुरक्षा मंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्रा ‘दयालु’ को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए एक अख़बारी विज्ञापन छपवाया है।
पत्रकारिता या चाटुकारिता?
पत्रकारों का काम सत्ता पर नजर रखना और उनकी जवाबदेही तय करना होता है। लेकिन जब पत्रकार खुद सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाएं और अपने पेशे से हटकर नेताओं को खुश करने में जुट जाएं, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। सवाल यह है कि क्या अब पत्रकारों को मंत्रियों की जय-जयकार करने के लिए विज्ञापन देने की जरूरत आन पड़ी है? क्या यह सत्ता से करीबी बढ़ाने का नया तरीका है, या फिर अब पत्रकार भी नेताओं की खुशामद करने पर मजबूर हो गए हैं?
पत्रकारिता का गिरता स्तर
ऐसा नहीं है कि पत्रकारों का नेताओं से मेलजोल रखना कोई नई बात हो, लेकिन जब यह मेलजोल अख़बारों के पन्नों पर खुलेआम दिखने लगे, तो यह ज़रूर सवाल खड़ा करता है कि क्या अब पत्रकारिता सत्ता की गोद में बैठ चुकी है? विज्ञापन में जिस तरह से मंत्री के नाम के साथ उनका ओहदा प्रमुखता से दर्शाया गया है, उससे साफ है कि यह कोई व्यक्तिगत बधाई नहीं, बल्कि एक पब्लिक शो ऑफ़ है।
पत्रकारों का असली दायित्व क्या?
पत्रकारों का असली कर्तव्य नेताओं को जवाबदेह बनाना है, न कि उनके गुणगान में अख़बारों के पन्ने रंग देना। जब पत्रकार अपनी स्वतंत्रता छोड़कर सत्ता की चापलूसी करने लगते हैं, तो इससे न केवल पत्रकारिता की साख गिरती है, बल्कि जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ता है।
अब देखना यह होगा कि यह सिर्फ एक अपवाद है, या फिर आने वाले समय में और पत्रकार सत्ता के करीब जाने के लिए ऐसे ही विज्ञापन देते नजर आएंगे। क्या हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां पत्रकारिता और चाटुकारिता के बीच का फर्क मिटता जा रहा है?


